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                <title>Healthcare - दैनिक जागरण</title>
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                <title>सर्जरी में इतिहास रचा:इंसानों जैसे रोबोट ने पहली बार जीवित शरीर पर किया सफल ऑपरेशन</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका के वैज्ञानिकों ने टेलीऑपरेटेड ह्यूमनॉइड रोबोट से प्रीक्लिनिकल ट्रायल में सफल गॉलब्लैडर सर्जरी की, भविष्य में दूरदराज के मरीजों तक पहुंच सकती है विशेषज्ञ इलाज की सुविधा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/history-created-in-surgery-human-like-robot-performed-successful-operation-on/article-58421"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/humanoid-robot.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">चिकित्सा विज्ञान लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है और अब सर्जरी के क्षेत्र में एक ऐसी उपलब्धि सामने आई है, जो भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदल सकती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो (UC San Diego) के वैज्ञानिकों और सर्जनों की टीम ने पहली बार इंसानों जैसे दिखने वाले ह्यूमनॉइड रोबोट की मदद से जीवित प्राणियों पर सफल न्यूनतम इनवेसिव (Minimally Invasive) सर्जरी करने में सफलता हासिल की है। यह उपलब्धि आधुनिक रोबोटिक सर्जरी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस शोध के परिणाम प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में 8 जुलाई 2026 को प्रकाशित किए गए। अध्ययन का शीर्षक "In vivo feasibility study of humanoid robots in surgery" है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पहली बार है जब किसी ह्यूमनॉइड रोबोट ने जीवित शरीर पर सर्जिकल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया है। अब तक अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले रोबोटिक सर्जरी सिस्टम किसी विशेष ऑपरेशन के लिए तैयार किए गए बड़े और महंगे उपकरण होते हैं। इन्हें संचालित करने के लिए विशेष ऑपरेशन थिएटर, अलग इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित टीम की आवश्यकता होती है। लेकिन इस नई तकनीक में वैज्ञानिकों ने सामान्य उपयोग वाले ह्यूमनॉइड रोबोट को सर्जरी के लिए तैयार किया है, जिससे भविष्य में अस्पतालों की लागत और तकनीकी जटिलता दोनों कम हो सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने इस रोबोटिक सिस्टम को "सर्जी" (Surgie) नाम दिया है। यह रोबोट लगभग पांच फीट लंबा और करीब 60 पाउंड वजन का है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अस्पतालों में पहले से इस्तेमाल होने वाले सामान्य लैप्रोस्कोपिक उपकरणों के साथ काम कर सकता है। इसके लिए किसी विशेष सर्जिकल मशीन या महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। परीक्षण के दौरान अनुभवी सर्जनों ने दूर बैठकर एक विशेष टेलीऑपरेशन सिस्टम के जरिए रोबोट को नियंत्रित किया। रोबोट सर्जन के हाथों की हर गतिविधि की नकल करते हुए उसी प्रकार ऑपरेशन करता रहा। इस तकनीक का उद्देश्य यह जांचना था कि क्या मौजूदा ह्यूमनॉइड रोबोट इतनी सटीकता, नियंत्रण और सुरक्षा के साथ सर्जरी कर सकते हैं, जितनी आधुनिक रोबोटिक सिस्टम से अपेक्षित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रीक्लिनिकल ट्रायल के तहत दो बड़े गैर-प्राइमेट स्तनधारी जीवों पर गॉलब्लैडर निकालने की सर्जरी की गई। पहले ऑपरेशन में एक ह्यूमनॉइड रोबोट ने मानव सर्जन के साथ मिलकर काम किया, जबकि दूसरे ऑपरेशन में दो टेलीऑपरेटेड ह्यूमनॉइड रोबोट ने मिलकर पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया। दोनों ही मामलों में सर्जरी सफल रही और किसी बड़ी तकनीकी विफलता की सूचना नहीं मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सफलता केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वास्तविक सर्जिकल परिस्थितियों में रोबोट की क्षमता को भी साबित करती है। इस परियोजना के दौरान पहले प्रयोगशाला परीक्षण, फिर ड्राई लैब और अंत में वास्तविक ऑपरेशन जैसी कई चरणों में तकनीक का मूल्यांकन किया गया। दुनिया के कई देशों में प्रशिक्षित सर्जनों की भारी कमी है। दूरदराज के इलाकों में मरीजों को समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिल पाते, जिससे इलाज में देरी होती है। ऐसे में टेलीऑपरेटेड ह्यूमनॉइड रोबोट भविष्य में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यदि तकनीक और विकसित होती है, तो विशेषज्ञ डॉक्टर हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी मरीजों की सर्जरी कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">यूसी सैन डिएगो के प्रोफेसर माइकल यिप के अनुसार, इस तकनीक से केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि जहां विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, वहां भी भविष्य में रोबोटिक सर्जरी के जरिए मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा। इस शोध का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि ह्यूमनॉइड रोबोट बिना बड़े बदलाव के सामान्य ऑपरेशन थिएटर में आसानी से काम करने में सक्षम रहे। हालांकि कुछ विशेष एडाप्टर तैयार किए गए ताकि रोबोट सामान्य सर्जिकल उपकरण पकड़ सके, लेकिन अस्पताल की मौजूदा व्यवस्था में किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यही विशेषता भविष्य में इस तकनीक को अधिक उपयोगी बना सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अभी यह तकनीक पूरी तरह व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार नहीं है। ऑपरेशन के दौरान रोबोट को कई बार दोबारा कैलिब्रेट करना पड़ा, जिससे सर्जरी सामान्य रोबोटिक सिस्टम की तुलना में अधिक समय तक चली। इसके अलावा सर्जन के आदेश और रोबोट की प्रतिक्रिया के बीच कुछ तकनीकी देरी (Latency) भी देखी गई, जिसे भविष्य में बेहतर बनाने की जरूरत होगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि नियंत्रण प्रणाली, सुरक्षा, विश्वसनीयता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में और सुधार होने के बाद ही इन रोबोट्स का वास्तविक अस्पतालों में नियमित उपयोग संभव हो सकेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 17:11:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>भारत में लॉन्च हुई दुनिया की पहली साप्ताहिक बेसल इंसुलिन, डायबिटीज मरीजों को अब हफ्ते में सिर्फ एक इंजेक्शन</title>
                                    <description><![CDATA[नोवो नॉर्डिस्क की Awiqli (इंसुलिन आइकोडेक) से रोजाना इंजेक्शन की जरूरत होगी खत्म, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के वयस्क मरीजों के लिए नई उम्मीद। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/worlds-first-weekly-basal-insulin-launched-in-india-diabetes-patients/article-58315"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/awiqli.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">भारत में डायबिटीज के इलाज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने देश में Awiqli (इंसुलिन आइकोडेक) लॉन्च कर दी है। कंपनी का दावा है कि यह दुनिया की पहली ऐसी सप्ताह में एक बार दी जाने वाली बेसल इंसुलिन है, जिसे टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित वयस्क मरीजों के लिए विकसित किया गया है। इस नई तकनीक के आने से उन मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अब तक हर दिन इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना पड़ता था।</p>
<p>अब तक अधिकांश इंसुलिन पर निर्भर मरीजों को रोजाना बेसल इंसुलिन लेना पड़ता था। यानी पूरे साल में करीब 365 इंजेक्शन लगाने पड़ते थे। नई साप्ताहिक बेसल इंसुलिन के आने से यह संख्या घटकर केवल 52 इंजेक्शन सालाना रह जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल मरीजों की दिनचर्या आसान होगी, बल्कि इलाज को नियमित रूप से अपनाने की संभावना भी बढ़ेगी।</p>
<p>नोवो नॉर्डिस्क के अनुसार, भारत में इंसुलिन थेरेपी शुरू करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रोजाना इंजेक्शन लगाने का डर है। कई मरीज इंसुलिन शुरू करने से बचते रहते हैं और इलाज में सात से नौ साल तक की देरी हो जाती है। इस देरी के कारण ब्लड शुगर लंबे समय तक अनियंत्रित रहती है, जिससे हृदय, किडनी, आंखों और नसों से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।</p>
<p>कंपनी ने Awiqli का 700 यूनिट पैक 2,611 रुपये में लॉन्च किया है। इस हिसाब से इसकी कीमत लगभग 3.73 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। कंपनी का दावा है कि यह मौजूदा दैनिक बेसल इंसुलिन की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक किफायती है। यदि किसी मरीज को रोजाना 10 यूनिट इंसुलिन की आवश्यकता होती है, तो उसे सप्ताह में 70 यूनिट इंसुलिन लगेगी, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 261 रुपये प्रति सप्ताह होगी।</p>
<p>नई इंसुलिन को FlexTouch पेन डिवाइस के जरिए सप्ताह में केवल एक बार लगाया जाएगा। यह पेन उपयोग में आसान है और मरीज स्वयं भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इंजेक्शन की संख्या कम होने से मरीज इलाज को बीच में छोड़ने की संभावना भी कम होगी।</p>
<p>मुंबई के वरिष्ठ डायबिटीज विशेषज्ञ डॉ. राजीव कोविल का कहना है कि इस दवा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत और आसान उपयोग है। उनके अनुसार, क्लिनिकल ट्रायल में Awiqli ने कई मामलों में रोजाना दी जाने वाली बेसल इंसुलिन के बराबर या उससे बेहतर ब्लड शुगर नियंत्रण दिखाया है। इससे यह तकनीक केवल बड़े शहरों या सीमित मरीजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी।</p>
<p>क्लिनिकल ट्रायल के दौरान ONWARDS-1 प्रोग्राम के आंकड़ों में यह सामने आया कि Awiqli ने ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने और HbA1c स्तर कम करने में सकारात्मक परिणाम दिए। कंपनी के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज के अधिक मरीज बिना गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया की समस्या के HbA1c को 7 प्रतिशत से नीचे लाने में सफल रहे। हालांकि, किसी भी मरीज के लिए दवा की उपयुक्तता का निर्णय उसके चिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए।</p>
<p>भारत में डायबिटीज तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। अनुमान के अनुसार, देश में करीब 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज की स्थिति में हैं। इसके अलावा 9 लाख से अधिक लोग टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित हैं, जिनके इलाज में इंसुलिन अनिवार्य है। वहीं टाइप-2 डायबिटीज के लगभग 10 प्रतिशत मरीजों को भी समय के साथ इंसुलिन थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है।</p>
<p>नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. एस.के. वांगनू का कहना है कि इंसुलिन शुरू करने में देरी और इलाज का नियमित पालन न करना आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। उनके अनुसार, यदि मरीजों को कम इंजेक्शन लगाने पड़ें और उपचार सरल हो, तो अधिक लोग समय रहते इंसुलिन थेरेपी शुरू कर सकते हैं, जिससे भविष्य में जटिलताओं का खतरा कम होगा।</p>
<p>नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत श्रोत्रिया ने इसे भारत में डायबिटीज उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उनका कहना है कि सप्ताह में केवल एक बार की डोज मरीजों पर मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का बोझ कम करेगी। साथ ही इससे इलाज को नियमित रूप से जारी रखने में भी मदद मिलेगी। भारत में फिलहाल लगभग 60 लाख लोग इंसुलिन थेरेपी ले रहे हैं, </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:51:45 +0530</pubDate>
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                <title>ठाणे अस्पताल में डॉक्टर से मारपीट मामले में शिवसेना पार्षद गिरफ्तार, डॉक्टर ने डर के कारण छोड़ा शहर</title>
                                    <description><![CDATA[महिला डॉक्टर को थप्पड़ मारने और मेडिकल स्टाफ से मारपीट के आरोप में शिवसेना (शिंदे गुट) के पार्षद समेत चार आरोपी गिरफ्तार, घटना के बाद डॉक्टर ने नौकरी से दिया इस्तीफा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/shiv-sena-councilor-arrested-for-assault-on-doctor-in-thane/article-58289"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/thane-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र के ठाणे जिले में सरकारी अस्पताल के भीतर डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर गंभीर रूप ले चुका है। कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (KDMC) के शास्त्री नगर अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ कथित मारपीट करने के आरोप में शिवसेना (शिंदे गुट) के पार्षद रमेश म्हात्रे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उनके साथ मौजूद तीन अन्य आरोपियों को भी हिरासत में लिया गया है। घटना के बाद अस्पताल में काम करने वाले एक डॉक्टर ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और सुरक्षा का हवाला देते हुए ठाणे छोड़ने का फैसला किया। डॉक्टर का कहना है कि अब वह कभी इस शहर में वापस आकर काम नहीं करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">यह घटना सोमवार को शास्त्री नगर अस्पताल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष (NICU) में हुई। अस्पताल प्रशासन के अनुसार उस समय NICU के सभी बेड भरे हुए थे। इसी कारण ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर सृष्टि बाविस्कर और डॉ. वैभव सालुंखे ने नवजात के परिजनों को किसी दूसरे अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी थी ताकि बच्चे का समय पर इलाज हो सके। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक डॉक्टरों का कहना था कि अस्पताल में फिलहाल जगह उपलब्ध नहीं है और मरीज के हित में दूसरे अस्पताल ले जाना बेहतर रहेगा। बताया जा रहा है कि डॉक्टरों की इस सलाह से परिजन नाराज हो गए। कुछ ही देर बाद उन्होंने स्थानीय शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को अस्पताल बुला लिया। आरोप है कि पार्षद अपने तीन समर्थकों के साथ अस्पताल पहुंचे और डॉक्टरों से तीखी बहस करने लगे। विवाद कुछ ही मिनटों में हाथापाई में बदल गया। अस्पताल में मौजूद सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आरोपियों ने डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ धक्का-मुक्की की, थप्पड़ और घूंसे मारे तथा अस्पताल के कर्मचारियों को धमकाया।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना के दौरान महिला डॉक्टर के साथ भी अभद्र व्यवहार किए जाने का आरोप है। अस्पताल के कर्मचारियों के मुताबिक जब महिला डॉक्टर किसी को फोन कर मदद मांगने की कोशिश कर रही थीं, तभी आरोपी ने उनका मोबाइल छीन लिया और कथित तौर पर उन्हें थप्पड़ भी मारा। इस पूरी घटना से अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। मरीजों और उनके परिजनों में भी दहशत का माहौल बन गया। बाद में अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद मामला दर्ज किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे सहित चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार आरोपियों के खिलाफ मारपीट, सरकारी कार्य में बाधा डालने और अन्य संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है। जांच एजेंसियां अस्पताल में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी दर्ज कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस घटना के बाद अस्पताल के डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों में नाराजगी देखी गई। मारपीट का शिकार हुए एक डॉक्टर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि घटना के बाद वह खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है और ठाणे छोड़ दिया है। डॉक्टर ने कहा कि यहां ऐसा माहौल बन गया है, जहां डॉक्टर स्वतंत्र रूप से अपना काम नहीं कर सकते। उनका कहना था कि उन्हें लगातार डर बना हुआ है और ऐसा महसूस हो रहा है कि आरोपी या उनके समर्थक उन पर नजर रख रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अब कभी ठाणे वापस नहीं लौटेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉक्टर के इस बयान ने स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है। चिकित्सा संगठनों और डॉक्टरों के विभिन्न समूहों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि अस्पतालों में डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी सुरक्षित नहीं रहेंगे तो इसका सीधा असर मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था पर पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र सरकार में उद्योग मंत्री उदय सामंत ने कहा कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और आरोपी पार्षद को फटकार लगाई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी महिला डॉक्टर पर हाथ उठाना पूरी तरह गलत है और शिवसेना इस तरह की घटना का समर्थन नहीं करती। उन्होंने यह भी कहा कि मामले की जांच में किसी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया गया है और कानून अपना काम कर रहा है। शिवसेना के वरिष्ठ नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से घटना की आलोचना की है। कल्याण से सांसद श्रीकांत शिंदे सहित पार्टी के कई नेताओं ने कहा कि डॉक्टरों के साथ हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। वहीं ठाणे के सांसद नरेश म्हास्के ने जानकारी दी कि पार्टी ने आरोपी पार्षद रमेश म्हात्रे को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। पार्टी स्तर पर भी पूरे मामले की समीक्षा की जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 14:13:59 +0530</pubDate>
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                <title>रायपुर ने रचा नया रिकॉर्ड, 99 सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं को मिला NQAS प्रमाणन</title>
                                    <description><![CDATA[इलाज, जांच, स्वच्छता और मरीजों की सुरक्षा के मानकों पर खरे उतरे अस्पताल; छत्तीसगढ़ का पहला जिला बना रायपुर।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/6a4f3c907401d/article-58260"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/raipur-health.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">रायपुर जिले ने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जिले की 99 सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं को राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (एनक्यूएएस) यानी नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड (NQAS) का प्रमाणन प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि के साथ रायपुर छत्तीसगढ़ का पहला जिला बन गया है, जहां सबसे अधिक सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को यह राष्ट्रीय स्तर का गुणवत्ता प्रमाणपत्र मिला है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह उपलब्धि लगातार मॉनिटरिंग, बेहतर प्रबंधन और स्वास्थ्य कर्मियों की टीमवर्क का परिणाम है। अभी जिले की दो स्वास्थ्य संस्थाओं के मूल्यांकन का परिणाम भारत सरकार से आना बाकी है, जबकि तीन अन्य संस्थानों का राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन होना शेष है। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित एक महत्वपूर्ण गुणवत्ता मूल्यांकन कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को बेहतर, सुरक्षित और मानक आधारित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थाओं का कई स्तरों पर विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है। इनमें मरीजों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, इलाज और जांच की गुणवत्ता, दवाओं की उपलब्धता, अस्पताल की स्वच्छता, रिकॉर्ड प्रबंधन, जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन, मरीजों की सुविधा और प्रशासनिक व्यवस्था जैसे अनेक मानकों को परखा जाता है। निर्धारित मानकों पर सफल होने के बाद ही किसी स्वास्थ्य संस्था को NQAS प्रमाणपत्र दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विभाग के अनुसार रायपुर जिले में पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे थे। अस्पतालों में आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने, चिकित्सकीय सेवाओं में सुधार, नियमित निरीक्षण और कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। इसी का परिणाम है कि बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संस्थाएं राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरी उतर सकीं। अधिकारियों का कहना है कि यह प्रमाणन केवल एक उपलब्धि नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार सुधार की जिम्मेदारी भी है। रायपुर कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने इस उपलब्धि पर स्वास्थ्य विभाग की पूरी टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि जिले के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके अनुसार स्वास्थ्य संस्थाओं में नियमित मॉनिटरिंग, समय-समय पर समीक्षा बैठकें और टीमवर्क के कारण यह सफलता हासिल हुई है। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी गुणवत्ता के इन मानकों को बनाए रखने और स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास जारी रहेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मिथिलेश चौधरी ने कहा कि NQAS प्रमाणन किसी भी स्वास्थ्य संस्था के लिए गुणवत्ता और विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण प्रमाण होता है। उन्होंने बताया कि मरीजों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, अस्पतालों की स्वच्छता और सेवा व्यवस्था की लगातार निगरानी की जा रही है। यही कारण है कि रायपुर जिले ने प्रदेश में सबसे अधिक NQAS प्रमाणित स्वास्थ्य संस्थाओं वाला पहला जिला बनने का गौरव हासिल किया है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन संस्थानों का मूल्यांकन अभी बाकी है, उन्हें भी आवश्यक तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">NQAS प्रमाणन का सबसे बड़ा लाभ आम मरीजों को मिलता है। इससे अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता बेहतर होती है, मरीजों को सुरक्षित वातावरण मिलता है और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ती है। अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की प्रभावी व्यवस्था होने से मरीजों और स्वास्थ्य कर्मियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। साथ ही रिकॉर्ड प्रबंधन और दवा वितरण प्रणाली में सुधार आने से सेवाएं अधिक व्यवस्थित और भरोसेमंद बनती हैं। सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं में गुणवत्ता सुधार का सीधा असर मरीजों के भरोसे पर भी पड़ता है। जब अस्पताल राष्ट्रीय स्तर के गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं, तो लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक विश्वास जताते हैं। इससे निजी अस्पतालों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलती है। रायपुर जिले में बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संस्थाओं को NQAS प्रमाणन मिलने के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि प्रदेश के अन्य जिले भी इसी दिशा में तेजी से काम करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक के तहत प्रमाणित संस्थाओं का समय-समय पर दोबारा मूल्यांकन भी किया जाता है। इसलिए प्रमाणपत्र मिलने के बाद भी अस्पतालों को लगातार गुणवत्ता बनाए रखनी होती है। यदि किसी संस्था में निर्धारित मानकों का पालन नहीं होता है तो उसका प्रमाणन प्रभावित हो सकता है। इसी कारण स्वास्थ्य विभाग लगातार निगरानी और सुधार की प्रक्रिया को जारी रखता है। रायपुर की इस उपलब्धि को प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इससे जिले की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी। साथ ही यह उपलब्धि अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा का काम करेगी। विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले समय में शेष स्वास्थ्य संस्थाओं को भी NQAS प्रमाणन दिलाया जाए और पूरे प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 13:13:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मानसून में स्किन इंफेक्शन से बचना है? जानिए एक्सपर्ट्स का सही स्किनकेयर रूटीन</title>
                                    <description><![CDATA[बारिश के मौसम में बढ़ जाती हैं त्वचा संबंधी समस्याएं, जानिए विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए आसान उपाय और स्किन केयर टिप्स जो त्वचा को रखेंगे स्वस्थ और सुरक्षित।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/adopt-proper-skincare-in-monsoon-to-avoid-fungal-infections-and/article-57958"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/monsoon-skin-care-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">बारिश का मौसम जहां गर्मी से राहत लेकर आता है, वहीं यह त्वचा संबंधी कई समस्याओं को भी साथ लेकर आता है। लगातार बढ़ी हुई नमी, पसीना, गीले कपड़े और बैक्टीरिया-फंगस के तेजी से पनपने के कारण मानसून में स्किन इंफेक्शन, खुजली, रैशेज, दाद, फंगल संक्रमण और एलर्जी जैसी परेशानियां आम हो जाती हैं। यदि इस मौसम में त्वचा की सही देखभाल न की जाए तो छोटी-सी समस्या भी गंभीर संक्रमण का रूप ले सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार मानसून में स्किन को साफ, सूखा और हाइड्रेटेड रखना सबसे जरूरी होता है। सही स्किनकेयर रूटीन अपनाकर न केवल संक्रमण से बचा जा सकता है, बल्कि त्वचा को स्वस्थ और चमकदार भी बनाए रखा जा सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>नमी बढ़ने से क्यों बढ़ता है स्किन इंफेक्शन?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बारिश के मौसम में वातावरण में नमी अधिक रहती है। इससे त्वचा पर पसीना लंबे समय तक बना रहता है। गीली त्वचा पर बैक्टीरिया और फंगस तेजी से विकसित होते हैं, जिससे खुजली, लाल चकत्ते, फंगल इंफेक्शन और दाद जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। पैरों की उंगलियों के बीच, बगल, गर्दन और कमर जैसे हिस्सों में संक्रमण का खतरा सबसे अधिक रहता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>दिन में दो बार करें त्वचा की सफाई</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">मानसून के दौरान चेहरे और शरीर को दिन में कम से कम दो बार साफ करना चाहिए। अपनी त्वचा के अनुसार माइल्ड फेसवॉश और बॉडी क्लेंजर का उपयोग करें। बाहर से घर लौटने के बाद चेहरे और हाथ-पैरों की सफाई अवश्य करें ताकि धूल, पसीना और बैक्टीरिया त्वचा पर जमा न रहें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>त्वचा को हमेशा सूखा रखें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यदि बारिश में भीग जाएं तो घर पहुंचते ही कपड़े बदलें और शरीर को अच्छी तरह सुखाएं। खासकर पैरों की उंगलियों, बगल और त्वचा की सिलवटों को अच्छी तरह पोंछें। लंबे समय तक गीले कपड़े पहनने से फंगल संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हल्का मॉइस्चराइजर लगाना न भूलें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोग सोचते हैं कि बारिश में मॉइस्चराइजर की जरूरत नहीं होती, जबकि ऐसा नहीं है। ऑयल-फ्री या जेल बेस्ड मॉइस्चराइजर त्वचा को हाइड्रेट रखता है और उसकी प्राकृतिक नमी बनाए रखने में मदद करता है। इससे त्वचा रूखी होने और जलन की समस्या भी कम होती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">सनस्क्रीन का इस्तेमाल जारी रखें</h5>
<p style="text-align:justify;">बादल छाए रहने के बावजूद सूरज की यूवी किरणें त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए मानसून में भी बाहर निकलते समय एसपीएफ़ युक्त सनस्क्रीन लगाना जरूरी है। यह त्वचा को टैनिंग, पिगमेंटेशन और समय से पहले बूढ़ा होने से बचाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>सूती कपड़े पहनें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बारिश के मौसम में ढीले और सूती कपड़े पहनना सबसे अच्छा विकल्प है। सूती कपड़े पसीना जल्दी सोख लेते हैं और त्वचा को सांस लेने का मौका देते हैं। सिंथेटिक या टाइट कपड़े पहनने से त्वचा में रगड़ बढ़ती है, जिससे रैशेज और संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पैरों की सफाई पर दें विशेष ध्यान</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बारिश में सबसे ज्यादा संक्रमण पैरों में होता है। बाहर से आने के बाद पैरों को साफ पानी से धोकर अच्छी तरह सुखाएं। यदि जूते गीले हो जाएं तो उन्हें पूरी तरह सूखने के बाद ही दोबारा पहनें। रोज साफ और सूखे मोजे पहनने की आदत डालें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>संतुलित आहार भी है जरूरी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">स्वस्थ त्वचा के लिए केवल बाहरी देखभाल ही नहीं, बल्कि संतुलित आहार भी जरूरी है। मौसमी फल, हरी सब्जियां, दही, विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर खाद्य पदार्थ त्वचा की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>स्किन इंफेक्शन होने पर क्या करें?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यदि त्वचा पर लगातार खुजली, लाल चकत्ते, जलन, पानी वाले दाने या फंगल संक्रमण दिखाई दे तो घरेलू उपचार करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लें। बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉयड क्रीम या दवाओं का इस्तेमाल करने से संक्रमण और गंभीर हो सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>किन बातों का रखें विशेष ध्यान?</strong></h5>
<ul style="text-align:justify;">
<li>गीले कपड़े तुरंत बदलें।</li>
<li>तौलिया और कपड़े किसी के साथ साझा न करें।</li>
<li>रोजाना साफ कपड़े पहनें।</li>
<li>त्वचा को ज्यादा देर तक गीला न रहने दें।</li>
<li>संतुलित आहार और पर्याप्त पानी का सेवन करें।</li>
<li>संक्रमण के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मानसून में सही स्किनकेयर ही सबसे बड़ा बचाव</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बारिश का मौसम आनंद और ताजगी लेकर आता है, लेकिन थोड़ी-सी लापरवाही त्वचा संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है। यदि नियमित सफाई, सही स्किनकेयर, संतुलित खानपान और स्वच्छता का ध्यान रखा जाए तो मानसून में भी त्वचा को स्वस्थ, सुरक्षित और संक्रमण मुक्त रखा जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/adopt-proper-skincare-in-monsoon-to-avoid-fungal-infections-and/article-57958</link>
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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:40:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रायपुर में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं, डायबिटीज मरीजों को विशेषज्ञ इलाज का इंतजार</title>
                                    <description><![CDATA[डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में शासन की मंजूरी के बावजूद एंडोक्राइनोलॉजी विभाग अब तक शुरू नहीं हो सका। आंबेडकर अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होने के बावजूद डायबिटीज और हार्मोनल बीमारियों के मरीजों को अलग विशेषज्ञ सेवाएं नहीं मिल रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/endocrinology-department-not-started-in-raipur-diabetes-patients-wait-for/article-57779"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/dks-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय और डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डायबिटीज और हार्मोन से जुड़ी बीमारियों के मरीजों को अब तक विशेषज्ञ उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। राज्य सरकार की मंजूरी मिलने के बाद भी डीकेएस अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं हो सका है, जबकि आंबेडकर अस्पताल में सुपर स्पेशलिटी डिग्रीधारी डॉक्टर होने के बावजूद मरीजों को इस विशेषज्ञता का लाभ नहीं मिल रहा। इससे प्रतिदिन सैकड़ों मरीज सामान्य विभागों में इलाज कराने को मजबूर हैं। मधुमेह और हार्मोनल रोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इसके बावजूद राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा शुरू नहीं होना मरीजों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आंबेडकर अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 2,500 से अधिक मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। इनमें करीब 20 प्रतिशत यानी 500 से अधिक मरीज डायबिटीज, थायरॉयड, हार्मोन असंतुलन, पिट्यूटरी और अन्य अंतःस्रावी (एंडोक्राइन) रोगों से पीड़ित होते हैं। विशेषज्ञ विभाग नहीं होने के कारण इन मरीजों का इलाज फिलहाल मेडिसिन, जिरियाट्रिक और पीडियाट्रिक विभागों के चिकित्सकों द्वारा किया जा रहा है। हालांकि जटिल मामलों में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट की विशेषज्ञ सलाह की जरूरत महसूस की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य शासन ने डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग स्थापित करने की मंजूरी पहले ही दे दी थी। इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जा चुकी हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं होने के कारण विभाग आज तक शुरू नहीं हो पाया। अस्पताल प्रबंधन नियमित रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित कर रहा है, लेकिन अब तक कोई योग्य चिकित्सक स्थायी रूप से नियुक्त नहीं हुआ है। इसका सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। आंबेडकर अस्पताल में डीएम एंडोक्राइनोलॉजी की डिग्री प्राप्त एक विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं। इसके बावजूद वे एंडोक्राइनोलॉजी विभाग में सेवाएं नहीं दे रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी वर्तमान पदस्थापना पीडियाट्रिक विभाग में है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डॉक्टर का तर्क है कि उन्हें उनकी सुपर स्पेशलिटी योग्यता के अनुरूप पद और वेतनमान नहीं मिला है। इसी कारण वे अपनी विशेषज्ञता के अनुरूप सेवाएं नहीं दे रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक जानकारी के अनुसार उन्हें डीएम डिग्री के आधार पर तीन अतिरिक्त वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) का लाभ दिया जा चुका है। सरकारी प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) के तहत सुपर स्पेशलिटी की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को निर्धारित अवधि तक उसी विषय में सरकारी सेवा देना अनिवार्य होता है। इसके लिए बांड भी भरवाया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी डॉक्टर ने सरकारी खर्च पर एंडोक्राइनोलॉजी की पढ़ाई की है तो उनकी विशेषज्ञता का उपयोग उसी विभाग में क्यों नहीं हो रहा। उनका मानना है कि इससे सरकारी संसाधनों का पूरा लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा है। डायबिटीज केवल रक्त में शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है। यदि समय पर उचित इलाज और निगरानी न मिले तो यह हृदय, किडनी, आंखों, नसों और मस्तिष्क पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी वजह से कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विभागों में भी बड़ी संख्या में ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी मूल समस्या डायबिटीज से जुड़ी होती है। एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ इन जटिलताओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डायबिटीज के अलावा थायरॉयड विकार, मोटापा, हार्मोन असंतुलन, बच्चों में ग्रोथ संबंधी समस्याएं, महिलाओं में हार्मोनल विकार और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों के मामलों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। इन सभी बीमारियों के लिए एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है। लेकिन विशेषज्ञ विभाग उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां इलाज का खर्च काफी अधिक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डीकेएस अस्पताल प्रशासन का कहना है कि विभाग शुरू करने की पूरी तैयारी है। अस्पताल के उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा के अनुसार हर महीने एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किए जा रहे हैं। जैसे ही योग्य डॉक्टर उपलब्ध होंगे, विभाग की शुरुआत कर दी जाएगी। प्रशासन का कहना है कि राज्य सरकार भी इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है ताकि मरीजों को जल्द से जल्द विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।रायपुर जैसे बड़े चिकित्सा केंद्र में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग का संचालन समय की आवश्यकता है। इससे न केवल राजधानी बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा। वर्तमान में कई मरीजों को रायपुर से बाहर अन्य राज्यों के बड़े अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त लागत आती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/endocrinology-department-not-started-in-raipur-diabetes-patients-wait-for/article-57779</link>
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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:25:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डॉक्टर्स डे पर रीवा में उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल बोले- डॉक्टरों का पेशा जीवन को सार्थक बनाने वाला, समाज में भगवान जैसा सम्मान</title>
                                    <description><![CDATA[श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ चिकित्सकों का सम्मान, दो पुस्तकों का हुआ विमोचन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/vindhya-rewa/on-doctors-day-deputy-chief-minister-rajendra-shukla-said-in/article-57537"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm-(2).mp4" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">डॉक्टर्स डे के अवसर पर रीवा स्थित श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में चिकित्सा सेवा, मानवता और समाज के प्रति डॉक्टरों के समर्पण को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किया गया, जिसमें मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री <strong>राजेंद्र शुक्ल</strong> ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का पेशा केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि मानव जीवन को बचाने और उसे नई उम्मीद देने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि समाज में डॉक्टरों को भगवान के समान सम्मान इसलिए मिलता है क्योंकि वे कठिन परिस्थितियों में भी लोगों के जीवन की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करते हैं।</p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm-(2).mp4" controls=""></video>
<p>उप मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि हर व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी रूप में डॉक्टरों की सेवाओं का लाभ लेता है। जब कोई व्यक्ति बीमारी, दुर्घटना या गंभीर स्वास्थ्य संकट से जूझता है, तब सबसे पहले डॉक्टर ही उसकी उम्मीद बनते हैं। यही कारण है कि चिकित्सा सेवा को समाज में सबसे सम्मानजनक और जिम्मेदारी भरा कार्य माना जाता है। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का दायित्व केवल उपचार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे मरीजों और उनके परिवारों में विश्वास और आत्मबल भी जगाते हैं।</p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.20-pm.mp4" controls=""></video>
<p>कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों <strong>"दिल की बात"</strong> और <strong>"बच्चों में बढ़ता दृष्टि दोष"</strong> का विधिवत विमोचन किया गया। इन पुस्तकों का लेखन वरिष्ठ चिकित्सक <strong>डॉ. बी.डी. त्रिपाठी</strong> और <strong>डॉ. नेहा त्रिपाठी</strong> ने किया है। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने इन पुस्तकों को चिकित्सा जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि सरल भाषा में तैयार की गई ऐसी पुस्तकें आम लोगों को स्वास्थ्य संबंधी विषयों की बेहतर समझ विकसित करने में मदद करेंगी। <strong>"दिल की बात"</strong> पुस्तक में हृदय रोगों, उनके कारणों, बचाव और स्वस्थ जीवनशैली से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। वहीं <strong>"बच्चों में बढ़ता दृष्टि दोष"</strong> पुस्तक में वर्तमान समय में बच्चों में तेजी से बढ़ रही आंखों की समस्याओं, डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग, समय पर जांच और उचित देखभाल के बारे में उपयोगी जानकारी दी गई है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पुस्तकें जनजागरूकता अभियान को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।</p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm-(1).mp4" controls=""></video>
<p>कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण चिकित्सा क्षेत्र में लंबे समय से उत्कृष्ट सेवाएं देने वाले वरिष्ठ चिकित्सकों का सम्मान समारोह भी रहा। विभिन्न विशेषज्ञताओं से जुड़े डॉक्टरों को उनकी उल्लेखनीय सेवाओं, चिकित्सा अनुसंधान, मरीजों के प्रति समर्पण और समाज में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। सम्मान प्राप्त करने वाले चिकित्सकों ने इसे अपने पूरे चिकित्सा जीवन के लिए प्रेरणादायक बताया और भविष्य में भी सेवा कार्य को उसी समर्पण के साथ जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया। अपने संबोधन में उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन डॉक्टरों की संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण आज भी चिकित्सा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि नई तकनीक, आधुनिक उपकरण और उन्नत उपचार पद्धतियां तभी प्रभावी होती हैं जब उनके पीछे सेवा भाव और मरीज के प्रति समर्पण की भावना हो। उन्होंने युवाओं से भी चिकित्सा क्षेत्र को सेवा का माध्यम मानकर आगे आने का आह्वान किया। उनका कहना था कि डॉक्टर बनना केवल एक पेशा चुनना नहीं बल्कि समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वीकार करना है। आने वाले समय में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रशिक्षित और संवेदनशील डॉक्टरों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।</p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm.mp4" controls=""></video>
<p>कार्यक्रम में उपस्थित चिकित्सा विशेषज्ञों ने भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने, समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराने, संतुलित आहार अपनाने और नियमित व्यायाम करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कई गंभीर बीमारियों से केवल जागरूकता और समय पर जांच के माध्यम से बचा जा सकता है। लोगों को स्वास्थ्य संबंधी छोटी समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के प्रतिनिधियों ने भी डॉक्टरों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि चिकित्सा सेवा केवल शरीर का उपचार नहीं करती, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी लोगों को नई ऊर्जा प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि सेवा, करुणा और सकारात्मक सोच किसी भी डॉक्टर की सबसे बड़ी पहचान होती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में चिकित्सक, मेडिकल कॉलेज के शिक्षक, मेडिकल छात्र, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। पूरे आयोजन के दौरान डॉक्टरों की सेवा भावना, चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धियों और स्वास्थ्य जागरूकता को लेकर सार्थक चर्चा हुई। उपस्थित लोगों ने भी वरिष्ठ चिकित्सकों का सम्मान कर उनके प्रति आभार व्यक्त किया। डॉक्टर्स डे के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम चिकित्सा सेवा के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ-साथ समाज में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बना। डॉक्टरों के अनुभव और आमजन की जागरूकता मिलकर ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं। ऐसे आयोजन चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले चिकित्सकों का उत्साह बढ़ाने के साथ नई पीढ़ी को भी सेवा और समर्पण की प्रेरणा देते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>विंध्य/रीवा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:51:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>छत्तीसगढ़ के मेडिकल छात्रों को बड़ी राहत, सिम्स बिलासपुर की 150 एमबीबीएस सीटों को मिली मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए मान्यता का नवीनीकरण किया, अब 150 नए विद्यार्थियों के प्रवेश का रास्ता साफ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-relief-to-medical-students-of-chhattisgarh-150-mbbs-seats/article-57526"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sims-bilaspur.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के मेडिकल शिक्षा क्षेत्र के लिए एक बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी), नई दिल्ली ने बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) की 150 एमबीबीएस सीटों की मान्यता का शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए नवीनीकरण कर दिया है। इस फैसले के साथ ही आगामी सत्र में 150 नए विद्यार्थियों के प्रवेश का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। यह निर्णय प्रदेश के उन हजारों छात्रों के लिए राहत लेकर आया है, जो हर वर्ष मेडिकल की पढ़ाई के लिए बेहतर संस्थानों में प्रवेश का सपना देखते हैं। एनएमसी के स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी आदेश के बाद सिम्स प्रशासन ने इसे संस्थान की बड़ी उपलब्धि बताया है। मान्यता के नवीनीकरण का अर्थ है कि संस्थान ने मेडिकल शिक्षा, शिक्षकों की उपलब्धता, अस्पताल की सुविधाओं, क्लिनिकल प्रशिक्षण, प्रयोगशालाओं और अन्य आवश्यक मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इसके बाद अब शैक्षणिक सत्र 2026-27 में नियमित रूप से 150 एमबीबीएस सीटों पर प्रवेश प्रक्रिया संचालित की जा सकेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह केवल प्रशासनिक मंजूरी नहीं बल्कि संस्थान की गुणवत्ता, मेहनत और निरंतर सुधार की दिशा में किए गए प्रयासों की राष्ट्रीय स्तर पर पुष्टि है। उन्होंने बताया कि संस्थान में विद्यार्थियों को आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के अनुरूप सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसमें अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, डिजिटल शिक्षण व्यवस्था, अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन और अस्पताल में व्यापक क्लिनिकल प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। मेडिकल सीटों की उपलब्धता बढ़ने से प्रदेश के विद्यार्थियों को बाहर के राज्यों पर कम निर्भर रहना पड़ेगा। हर वर्ष बड़ी संख्या में छात्र राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के माध्यम से एमबीबीएस में प्रवेश का प्रयास करते हैं, लेकिन सीमित सीटों के कारण कई योग्य छात्रों को अवसर नहीं मिल पाता। ऐसे में सिम्स की 150 सीटों का नवीनीकरण मेडिकल शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिलासपुर स्थित सिम्स लंबे समय से छत्तीसगढ़ के प्रमुख सरकारी मेडिकल संस्थानों में शामिल है। यहां न केवल एमबीबीएस की पढ़ाई कराई जाती है, बल्कि बड़ी संख्या में मरीजों का उपचार भी होता है। मेडिकल छात्र पढ़ाई के साथ-साथ अस्पताल में मरीजों के उपचार की वास्तविक प्रक्रिया को भी करीब से सीखते हैं। यही व्यावहारिक प्रशिक्षण भविष्य में उन्हें बेहतर चिकित्सक बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग समय-समय पर सभी मेडिकल कॉलेजों का मूल्यांकन करता है। इस दौरान फैकल्टी की संख्या, अस्पताल में मरीजों की उपलब्धता, उपकरण, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, हॉस्टल, अनुसंधान सुविधाएं और शैक्षणिक व्यवस्था सहित कई बिंदुओं की समीक्षा की जाती है। निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले संस्थानों की मान्यता का नवीनीकरण किया जाता है। सिम्स का इस प्रक्रिया में सफल होना संस्थान की निरंतर प्रगति का संकेत माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में डॉक्टरों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए मेडिकल शिक्षा का विस्तार बेहद जरूरी है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना समय की आवश्यकता है। ऐसे में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ना या उनकी मान्यता का नवीनीकरण होना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी सकारात्मक माना जाता है। प्रदेश के विद्यार्थियों और अभिभावकों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई का खर्च निजी संस्थानों की तुलना में काफी कम होता है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मेधावी छात्रों को भी डॉक्टर बनने का अवसर मिलता है। सीटों की निरंतर उपलब्धता से प्रतिस्पर्धा के बीच योग्य छात्रों के लिए बेहतर संभावनाएं तैयार होंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सिम्स प्रशासन के अनुसार आने वाले समय में संस्थान में शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर को और बेहतर बनाने की दिशा में कार्य जारी रहेगा। नई तकनीकों को शिक्षा में शामिल करने, अनुसंधान गतिविधियों को बढ़ावा देने, आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता और विशेषज्ञ चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने पर भी लगातार ध्यान दिया जा रहा है। इससे छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा शिक्षा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। ऐसे निर्णय प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे को भी मजबूत बनाते हैं। अधिक संख्या में प्रशिक्षित डॉक्टर तैयार होने से भविष्य में सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता बढ़ सकती है। इससे मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने की संभावना भी मजबूत होगी। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग द्वारा सिम्स बिलासपुर की 150 एमबीबीएस सीटों की मान्यता का नवीनीकरण छत्तीसगढ़ के मेडिकल शिक्षा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे न केवल नए विद्यार्थियों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ है, बल्कि प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:13:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एसिड अटैक पीड़ित मासूम के इलाज पर हाईकोर्ट सख्त, निजी अस्पताल में भर्ती के दिए निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चार वर्षीय बच्ची के बेहतर इलाज के लिए बॉम्बे हॉस्पिटल में तत्काल भर्ती कराने का आदेश दिया, खर्च आयुष्मान योजना और जरूरत पड़ने पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण उठाएगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-gave-strict-instructions-on-the-treatment-of-acid/article-56990"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/acid-attack.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बड़वानी जिले में एसिड अटैक का शिकार हुई चार वर्षीय बच्ची के इलाज को लेकर अहम अंतरिम आदेश जारी किया है। अदालत ने बच्ची को तत्काल इंदौर के बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती कर समुचित इलाज शुरू करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उपचार के दौरान पीड़ित परिवार से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा। इलाज का खर्च पहले आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत वहन किया जाएगा और यदि किसी विशेष सर्जरी या अतिरिक्त चिकित्सा पर बीमा राशि से अधिक खर्च आता है तो उसकी व्यवस्था जिला विधिक सेवा प्राधिकरण करेगा। यह मामला उस दर्दनाक घटना से जुड़ा है जिसमें 29 मई को हुए एसिड अटैक में चार वर्षीय बच्ची, उसका छह वर्षीय भाई और उनकी मां गंभीर रूप से झुलस गए थे। प्रारंभिक इलाज बड़वानी जिले के राजपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में किया गया, लेकिन वहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण परिवार ने बेहतर उपचार की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश मेडिकल रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया कि तीनों घायलों को लंबे समय तक विशेष बर्न ट्रीटमेंट की जरूरत है, जो इंदौर के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में उपलब्ध है। हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता शन्नो शगुफ्ता खान ने अस्पताल के बर्न वार्ड की तस्वीरें अदालत के सामने रखीं और वहां की साफ-सफाई तथा रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए। तस्वीरों में वार्ड की दीवारों पर फंगल संक्रमण के निशान और चूहों की मौजूदगी का दावा किया गया, जिस पर अदालत ने भी गंभीरता दिखाई। याचिकाकर्ता का कहना था कि गंभीर रूप से झुलसे मरीजों के लिए संक्रमण सबसे बड़ा खतरा होता है और यदि ऐसे वातावरण में उनका इलाज किया जाएगा तो उनकी स्थिति और बिगड़ सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान डॉक्टरों की समिति की रिपोर्ट भी अदालत के सामने रखी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों बच्चों को गंभीर बर्न इंजरी हुई है और यदि उन्हें समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधा नहीं मिली तो सेप्सिस, सेप्टिक शॉक और अन्य जटिल मेडिकल समस्याएं जानलेवा साबित हो सकती हैं। अदालत ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए तत्काल बेहतर इलाज सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'लक्ष्मी बनाम भारत संघ' का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया था कि एसिड अटैक पीड़ितों को निजी अस्पतालों में भी निशुल्क और संपूर्ण इलाज उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसमें दवाइयां, ऑपरेशन, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, भोजन और अस्पताल में भर्ती रहने की सभी आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यही सिद्धांत इस मामले में भी लागू होगा और किसी भी हालत में पीड़ित परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि पीड़ित परिवार के पास आयुष्मान भारत योजना का कार्ड उपलब्ध है, जिसके तहत पांच लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज कराया जा सकता है। कोर्ट ने अस्पताल को निर्देश दिया कि इलाज का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए ताकि प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया में किसी तरह की परेशानी न आए। यदि इलाज की लागत बीमा सीमा से अधिक होती है तो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण आवश्यक राशि उपलब्ध कराएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने 24 जून को पारित अपने आदेश में यह भी कहा कि बच्ची को उसी दिन अस्पताल में भर्ती कर उपचार शुरू किया जाए और किसी भी स्तर पर देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भी निर्देश दिए कि वह सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हर जरूरी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराए। इस मामले में याचिका के जरिए मांगी गई अन्य राहतों पर भी अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। कानूनी यह आदेश केवल एक पीड़ित परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में एसिड अटैक पीड़ितों के उपचार से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामलों में इलाज की गुणवत्ता और समय पर चिकित्सा उपलब्ध कराना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि गंभीर रूप से झुलसे मरीजों के लिए शुरुआती उपचार ही आगे की जिंदगी तय करता है। अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार सर्वोपरि है और यदि सरकारी व्यवस्था में किसी स्तर पर कमी दिखाई देती है तो न्यायालय आवश्यक हस्तक्षेप कर पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा कर सकता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 13:23:11 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>रक्तदान के बदले VIP दर्शन योजना हिट, ओंकारेश्वर में बढ़ा उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[ओंकारेश्वर मंदिर की अनोखी पहल से ब्लड बैंकों में बढ़ा भंडार, रक्तदान करने वालों को परिवार समेत मिल रहा VIP दर्शन का लाभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/vip-darshan-scheme-in-exchange-for-blood-donation-increases-enthusiasm/article-55993"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/omkareshwar-temple.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में शुरू की गई रक्तदान के बदले VIP दर्शन योजना को जबरदस्त सफलता मिल रही है। धार्मिक आस्था और सामाजिक सेवा को जोड़ने वाली इस पहल ने न केवल श्रद्धालुओं को आकर्षित किया है, बल्कि जिले और आसपास के क्षेत्रों में रक्त की कमी की समस्या को भी काफी हद तक दूर कर दिया है। फरवरी 2026 में शुरू हुई इस योजना के बाद से रक्तदान करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और अब स्थिति यह है कि खंडवा जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में जरूरत से ज्यादा रक्त उपलब्ध है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विश्व रक्तदाता दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि इस पहल के कारण जिले में रक्त संग्रहण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हर सप्ताह औसतन 150 यूनिट रक्त एकत्र किया जा रहा है। लगातार बढ़ते संग्रह के चलते खंडवा ब्लड बैंक अब पड़ोसी जिलों की भी मदद कर रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बुरहानपुर, धार और बैतूल जिलों को 150-150 यूनिट रक्त भेजा गया है, जबकि बड़वानी को 200 यूनिट और हरदा जिले को 80 यूनिट रक्त उपलब्ध कराया गया है। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि श्रद्धालुओं को एक छोटे से सामाजिक योगदान के बदले लंबी कतारों से राहत मिल रही है। आम दिनों में ओंकारेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए तीन से चार घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। वहीं रक्तदान करने वाले श्रद्धालु और उनके परिवार को VIP दर्शन की सुविधा दी जाती है, जिससे वे कम समय में मंदिर में प्रवेश कर दर्शन कर सकते हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग इस पहल से जुड़ रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">खंडवा कलेक्टर ऋषभ गुप्ता की पहल पर शुरू की गई इस योजना के तहत मंदिर परिसर के पास पांच बेड वाला विशेष रक्त संग्रह केंद्र स्थापित किया गया है। यहां 18 से 60 वर्ष तक की आयु के स्वस्थ व्यक्ति, जिनका वजन कम से कम 45 किलोग्राम हो, रक्तदान कर सकते हैं। पूरी प्रक्रिया लगभग 20 मिनट में पूरी हो जाती है। रक्तदान के बाद दाताओं को अल्पाहार, प्रमाण पत्र, प्रसाद और भगवान ओंकारेश्वर की तस्वीर भी भेंट की जाती है। प्रमाण पत्र मिलने के बाद रक्तदाता अपने परिवार के साथ VIP दर्शन का लाभ उठा सकता है। अधिकारियों के अनुसार, एक स्वस्थ सदस्य द्वारा रक्तदान करने पर परिवार के बुजुर्गों और छोटे बच्चों को भी प्राथमिकता के साथ दर्शन की सुविधा मिलती है। इस व्यवस्था ने धार्मिक यात्रियों के बीच काफी लोकप्रियता हासिल की है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस अभियान का एक और सकारात्मक परिणाम यह हुआ है कि अब दुर्लभ रक्त समूहों का भी पर्याप्त भंडार उपलब्ध होने लगा है। एबी नेगेटिव, ओ नेगेटिव, ए नेगेटिव और बी नेगेटिव जैसे दुर्लभ ब्लड ग्रुप पहले अक्सर कमी में रहते थे, लेकिन अब इनके पर्याप्त यूनिट सुरक्षित रखे जा रहे हैं। इससे आपातकालीन स्थितियों में मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराने में आसानी हो रही है। अधिक मास और धार्मिक आयोजनों के दौरान रक्तदान में विशेष बढ़ोतरी देखने को मिली है। हिंदू धर्म में दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है और इसी भावना के कारण श्रद्धालु बड़ी संख्या में रक्तदान के लिए आगे आ रहे हैं। जून महीने के पहले पखवाड़े में ही रिकॉर्ड स्तर पर रक्त संग्रह हुआ है। 14 जून तक ओंकारेश्वर शिविर से 497 यूनिट रक्त एकत्र किया गया, जबकि योजना की शुरुआत वाले फरवरी महीने में यह आंकड़ा 168 यूनिट था।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"> यह मॉडल देश के अन्य धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो सकता है। जहां एक ओर श्रद्धालुओं को दर्शन की सुविधा मिलती है, वहीं दूसरी ओर अस्पतालों में रक्त की उपलब्धता बढ़ती है। इससे समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों को लाभ होता है। स्थानीय मेडिकल कॉलेज शुरू होने के बाद खंडवा जिले में हर महीने रक्त की मांग लगभग 1200 यूनिट तक पहुंच गई थी। पहले आयोजित रक्तदान शिविर इस आवश्यकता का केवल आधा हिस्सा ही पूरा कर पाते थे। लेकिन अब ओंकारेश्वर से जुड़ी इस योजना ने रक्त संग्रह की स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। बढ़ते भंडार को देखते हुए मेडिकल कॉलेज में एक अलग और आधुनिक ब्लड बैंक स्थापित करने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 17:05:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>भोपाल एम्स में बड़ी लापरवाही: फॉर्मेलिन इंजेक्ट होने से 3 साल के बच्चे की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[ब्लड कैंसर से जूझ रहे मासूम को दवा की जगह लगा दिया गया खतरनाक रसायन, पिता की चेतावनी भी अनसुनी; दो नर्सिंग अधिकारियों पर केस दर्ज]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/3-year-old-child-dies-due-to-negligence-in-injecting/article-55798"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/aiims-bhopal-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इलाज करा रहे तीन साल के एक मासूम की मौत ने अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा व्यवस्था और मेडिकल प्रोटोकॉल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामने आई जांच रिपोर्ट के मुताबिक ब्लड कैंसर से पीड़ित बच्चे को दवा की जगह गलती से फॉर्मेलिन इंजेक्ट कर दिया गया, जिसके कुछ ही देर बाद उसकी हालत तेजी से बिगड़ गई और डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। घटना के बाद अस्पताल प्रशासन ने आंतरिक जांच कराई, जिसमें नर्सिंग स्टाफ की गंभीर लापरवाही सामने आई है। इसी आधार पर पुलिस ने दो नर्सिंग अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सागर जिले की बीना तहसील के ग्राम कौरजा निवासी तीन वर्षीय सार्थक यादव बी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया नामक ब्लड कैंसर से पीड़ित था। उसकी हालत गंभीर होने के बाद 15 दिसंबर 2025 को उसे एम्स भोपाल के पीडियाट्रिक वार्ड में भर्ती कराया गया था। परिवार को उम्मीद थी कि बड़े अस्पताल में इलाज मिलने से बच्चे की तबीयत में सुधार होगा, लेकिन दो दिन बाद जो हुआ उसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक 17 दिसंबर की सुबह बच्चे की आईवी लाइन चोक हो गई थी। इसी दौरान ड्यूटी पर मौजूद नर्सिंग स्टाफ ने ऐसी गलती कर दी, जो बाद में बच्चे की मौत की वजह बन गई। जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि बायोप्सी और अन्य मेडिकल सैंपल को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला रसायन फॉर्मेलिन एक सिरिंज में भरकर वार्ड में रखा गया था। अस्पताल के नियमों के अनुसार इस तरह के रसायनों को सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए, लेकिन आरोप है कि ड्यूटी पर मौजूद नर्सिंग ऑफिसर अनुका गुजराती ने इसे मरीज के बेड के पास ही छोड़ दिया। बाद में दूसरी नर्सिंग ऑफिसर मधुबाला शर्मा ने बिना लेबल जांचे और बिना दवा की पहचान सुनिश्चित किए उसी सिरिंज को उठा लिया और बच्चे की नस में इंजेक्ट कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">परिजनों का कहना है कि इंजेक्शन लगाने के दौरान बच्चे के पिता ने कई बार नर्स को चेतावनी दी थी कि सिरिंज में दवा नहीं है और कुछ गड़बड़ लग रही है। परिवार का आरोप है कि उन्होंने तीन बार नर्स को रोकने की कोशिश की, लेकिन उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। इंजेक्शन लगने के कुछ ही क्षण बाद बच्चे की हालत अचानक बिगड़ने लगी। वह अचेत हो गया और मेडिकल स्टाफ में अफरा-तफरी मच गई। तत्काल उसे पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया, जहां डॉक्टरों ने सीपीआर समेत कई आपातकालीन उपचार दिए, लेकिन सुबह करीब 8:45 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया। एम्स की आंतरिक जांच समिति ने मामले की विस्तार से पड़ताल की। जांच के दौरान यह निष्कर्ष निकला कि बच्चे की मौत का सीधा कारण नस के जरिए शरीर में फॉर्मेलिन का पहुंचना था। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि यह एक गंभीर मानवीय त्रुटि और मेडिकल प्रोटोकॉल की अनदेखी का मामला है। जांच समिति ने संबंधित नर्सिंग स्टाफ की जिम्मेदारी तय करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जांच रिपोर्ट मिलने के बाद बागसेवनिया थाना पुलिस ने 11 जून को दोनों नर्सिंग अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। नर्स मधुबाला शर्मा पर घोर लापरवाही से मौत कारित करने के आरोप में भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(1) के तहत केस दर्ज किया गया है। वहीं अनुका गुजराती पर खतरनाक रसायन को असुरक्षित तरीके से रखने के आरोप में धारा 286 के तहत कार्रवाई की गई है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार मामले की विस्तृत जांच जारी है और जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। फॉर्मेलिन अत्यंत विषैला रसायन होता है। यह मूल रूप से फॉर्मल्डिहाइड गैस का घोल है और मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों तथा प्रयोगशालाओं में ऊतकों और बायोप्सी सैंपल को संरक्षित रखने के लिए उपयोग किया जाता है। यदि यह गलती से मानव शरीर में पहुंच जाए तो ऊतकों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। विशेष रूप से नस के जरिए शरीर में जाने पर इसका असर बेहद घातक हो सकता है। इससे शरीर को शॉक लग सकता है, महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद कर सकते हैं और कुछ मामलों में तत्काल मौत भी हो सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 12:37:16 +0530</pubDate>
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