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                <title>ट्रंप ने ईरान पर भारतीय जहाजों पर हमले का आरोप लगाया, तेहरान ने बताया निराधार</title>
                                    <description><![CDATA[हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास भारतीय क्रू वाले जहाजों पर हमलों को लेकर अमेरिका और ईरान आमने-सामने, भारत ने भी जताई चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trump-accused-iran-of-attacking-indian-ships-tehran-called-it/article-55831"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(3).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास भारतीय क्रू वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर भारतीय जहाजों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। वहीं ईरान ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्हें निराधार और तथ्यों से परे बताया है। इस बीच समुद्री सुरक्षा और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भारत ने भी अपनी चिंता जाहिर की है। हाल के दिनों में ओमान तट के निकट हुए हमलों ने क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में दावा किया कि ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से निकल रहे भारतीय जहाजों पर ड्रोन हमले किए। उन्होंने इस कथित कार्रवाई को पूरी तरह अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि ऐसे हमले अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात और वैश्विक व्यापार के लिए गंभीर खतरा हैं। ट्रंप ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि ईरान ने उस शांति समझौते की शर्तों को मीडिया में लीक किया, जिन पर बातचीत चल रही थी और जिनका सार्वजनिक होना उचित नहीं था।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद ईरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। भारत में ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया के जरिए जारी बयान में कहा कि भारतीय जहाजों पर हमले को लेकर ईरान पर लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार हैं। दूतावास ने कहा कि ऐसे आरोप वास्तविक घटनाओं से ध्यान भटकाने का प्रयास हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि हाल के दिनों में जिन तीन भारतीय जहाजों को नुकसान पहुंचा, उनके लिए ईरान जिम्मेदार नहीं है। तेहरान ने अमेरिकी आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी करार दिया है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ओमान तट के पास इस सप्ताह भारतीय क्रू वाले तीन वाणिज्यिक जहाज हमलों का शिकार हुए। इनमें से एक घटना में 10 जून को तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई थी। इस घटना ने भारत में भी चिंता बढ़ा दी है क्योंकि पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग भारतीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">घटनाओं के बाद भारत ने भी कड़ा रुख अपनाया है। जानकारी के अनुसार नई दिल्ली ने अमेरिकी दूतावास के उप प्रमुख को तलब कर भारतीय नागरिकों और जहाजों पर हुए हमलों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। भारतीय अधिकारियों ने वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को बेहद चिंताजनक बताया है। सरकार का कहना है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है और किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई या हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव का असर अब समुद्री गतिविधियों पर भी दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ वर्षों में हॉर्मुज क्षेत्र में कई बार तेल टैंकरों, मालवाहक जहाजों और वाणिज्यिक पोतों को लेकर विवाद सामने आए हैं। ऐसे में भारतीय जहाजों से जुड़ी घटनाओं ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। भारत दोनों देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर संबंध रखता है, इसलिए वह इस मामले में संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। भारत सहित कई देशों का व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। तेल और गैस की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी इसी समुद्री क्षेत्र पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और ऊर्जा कीमतों पर दिखाई दे सकता है। भारतीय जहाजों पर हुए हमलों को लेकर अलग-अलग दावे और प्रतिदावे सामने आ रहे हैं। अमेरिका जहां ईरान को जिम्मेदार ठहरा रहा है, वहीं ईरान इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है। इस बीच भारत का मुख्य फोकस अपने नागरिकों और समुद्री हितों की सुरक्षा पर है। सरकार घटनाओं की निगरानी कर रही है और संबंधित पक्षों के साथ संपर्क बनाए हुए है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 14:19:17 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिका-ईरान समझौते की ओर बढ़ी बातचीत, संवर्धित यूरेनियम पर बनी सहमति के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[प्रस्तावित समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य और क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों को शामिल किए जाने की चर्चा, दोनों पक्षों ने जताया सकारात्मक रुख]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/talks-move-towards-us-iran-agreement-signs-of-consensus-on-enriched/article-55826"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-deal-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही तनावपूर्ण कूटनीतिक खींचतान के बीच अब एक संभावित समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति के संकेत सामने आए हैं। अमेरिकी अधिकारियों और ईरानी विदेश मंत्री के हालिया बयानों से यह आभास मिल रहा है कि दोनों देशों के बीच एक प्रारूप समझौते पर सहमति बनने के करीब है। चर्चा का सबसे अहम मुद्दा ईरान के पास मौजूद उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का भंडार है, जिसे लेकर दोनों पक्षों के बीच नई व्यवस्था पर बातचीत चल रही है। एक अमेरिकी अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को नष्ट करने और बाद में उसे देश से बाहर ले जाने की व्यवस्था शामिल है। अधिकारी ने कहा कि समझौते का उद्देश्य परमाणु गतिविधियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को कम करना और क्षेत्र में स्थिरता को बढ़ावा देना है। हालांकि समझौते का अंतिम स्वरूप अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि इसमें कई संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दों को भी शामिल किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह मसौदा केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया की व्यापक सुरक्षा स्थिति को भी ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। सूत्रों के अनुसार, इसमें लेबनान की स्थिति और वहां सक्रिय ईरान समर्थित समूहों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की गई है। अमेरिकी अधिकारी ने यह भी संकेत दिया कि प्रस्तावित व्यवस्था के बावजूद इजराइल को अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार बना रहेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि इजराइल भी अंततः इस समझौते का समर्थन कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी बातचीत में प्रगति की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि समझौते को आने वाले दिनों में अंतिम रूप दिया जा सकता है और इसकी औपचारिक मंजूरी दूरस्थ माध्यम से भी संभव है। अराघची ने दावा किया कि प्रस्तावित व्यवस्था ईरान और ओमान को होर्मुज जलडमरूमध्य की निगरानी और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका देती है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान का मानना है कि उसके संवर्धित यूरेनियम को यदि कम संवर्धित स्तर पर लाना है तो यह प्रक्रिया देश के भीतर ही की जानी चाहिए। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से में जाने वाला तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और ऊर्जा कीमतों पर पड़ता है। हाल के वर्षों में इस मार्ग को लेकर कई बार तनाव की स्थिति बनी, जिसके कारण वैश्विक शक्तियों की नजर लगातार इस क्षेत्र पर बनी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि शांति समझौते का अंतिम और सहमतिपूर्ण मसौदा तैयार कर लिया गया है। उनके बयान को इस प्रक्रिया में बड़ी प्रगति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक संबंधित देशों की ओर से आधिकारिक रूप से अंतिम समझौते की घोषणा नहीं की गई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि संयुक्त अरब अमीरात ईरान के लिए अरबों डॉलर की वित्तीय संपत्तियों को अनलॉक करने पर सहमत हो सकता है। हालांकि अबू धाबी ने इन खबरों का खंडन किया है और ऐसी किसी सहमति से इनकार किया है। इसके बावजूद क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि कई देश इस समझौते को सफल बनाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्रालय ने भी कथित तौर पर समझौते पर हस्ताक्षर के लिए मेजबानी की पेशकश की है। स्विट्जरलैंड लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं और संवेदनशील कूटनीतिक बैठकों के लिए एक तटस्थ मंच के रूप में जाना जाता है। ऐसे में यदि दोनों पक्ष अंतिम सहमति तक पहुंचते हैं तो वहां औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू हो जाता है तो इससे न केवल अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों पुराने तनाव को कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को भी बल मिल सकता है। दूसरी तरफ कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि समझौते के कई बिंदुओं पर अभी भी मतभेद मौजूद हैं और अंतिम दस्तावेज सामने आने तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। दोनों पक्षों के बयानों से यह स्पष्ट है कि बातचीत निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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