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                <title>Mental Wellness - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Mental Wellness RSS Feed</description>
                
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                <title>हरिवंश राय बच्चन का जीवन मंत्र: अतीत को छोड़िए, वर्तमान को संवारिए, तभी भविष्य बनेगा बेहतर</title>
                                    <description><![CDATA['जो बीत गई सो बात गई' केवल कविता नहीं, बल्कि जीवन जीने का ऐसा दर्शन है जो निराशा से बाहर निकलकर नई शुरुआत करने की प्रेरणा देता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/mantras-of-life/life-mantra-of-harivansh-rai-bachchan-leave-the-past-cherish/article-58311"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/harivansh-rai-bachchan.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">हिंदी साहित्य के महान कवि हरिवंश राय बच्चन केवल अपनी कविताओं के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन को देखने के सकारात्मक नजरिए के लिए भी जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में जीवन का गहरा अनुभव, संघर्ष, उम्मीद और आगे बढ़ने का संदेश मिलता है। उनकी सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में से एक "जो बीत गई सो बात गई" आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि जीवन जीने का ऐसा दर्शन है, जो इंसान को अतीत के दुखों से बाहर निकलकर वर्तमान में बेहतर जीवन जीने की सीख देता है। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब वह किसी असफलता, रिश्ते के टूटने, आर्थिक नुकसान या किसी प्रियजन के बिछड़ने के कारण दुखी हो जाता है। कई लोग वर्षों तक उन्हीं यादों में उलझे रहते हैं और वर्तमान का आनंद लेना भूल जाते हैं। हरिवंश राय बच्चन का संदेश यही है कि जो समय निकल गया, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। इसलिए बीती बातों पर लगातार दुख मनाने की बजाय वर्तमान को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां—</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>"जो बीत गई सो बात गई,<br />जीवन में एक सितारा था,<br />माना वह बेहद प्यारा था,<br />वह डूब गया तो डूब गया..."</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इन पंक्तियों में जीवन का गहरा सत्य छिपा हुआ है। बच्चन जी बताते हैं कि जीवन में कई बार हमें अपने सबसे प्रिय लोगों, अवसरों या सपनों को खोना पड़ता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जीवन वहीं रुक जाए। जैसे आकाश टूटे हुए तारों के लिए हमेशा शोक नहीं मनाता, उसी तरह इंसान को भी आगे बढ़ना सीखना चाहिए। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि लोग अपने अतीत की गलतियों और दुखों को बार-बार याद करते रहते हैं। सोशल मीडिया के दौर में लोग दूसरों की सफलता देखकर खुद की असफलताओं से तुलना करने लगते हैं। ऐसे समय में बच्चन जी का जीवन मंत्र पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक दिखाई देता है। उनका संदेश हमें सिखाता है कि हर दिन एक नई शुरुआत का अवसर लेकर आता है। सकारात्मक सोच का मतलब यह नहीं कि जीवन में कठिनाइयां नहीं आएंगी। बल्कि इसका अर्थ यह है कि कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद बनाए रखी जाए। हरिवंश राय बच्चन ने अपने जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनके अनुभव उनकी कविताओं में साफ दिखाई देते हैं। यही वजह है कि उनकी रचनाएं आज भी हर पीढ़ी को प्रेरित करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि कोई व्यक्ति अपनी पुरानी असफलताओं को लगातार याद करता रहेगा, तो वह नए अवसरों को पहचान नहीं पाएगा। सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है जो गिरकर दोबारा उठने का साहस रखते हैं। बच्चन जी की कविता हमें यही विश्वास दिलाती है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत संभव है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद को माफ करना भी जरूरी होता है। कई लोग अपनी छोटी-छोटी गलतियों के लिए खुद को वर्षों तक दोषी मानते रहते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है। बच्चन जी की सीख यही है कि गलतियों से सीखिए, लेकिन उन्हें अपनी पहचान मत बनने दीजिए। हर नया दिन खुद को बेहतर बनाने का मौका देता है। उनकी कविता यह भी सिखाती है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता। इसलिए समय के साथ चलना ही समझदारी है। अगर इंसान केवल पीछे मुड़कर देखता रहेगा, तो वह सामने मौजूद अवसरों को खो देगा। जीवन का असली आनंद वर्तमान में जीने में है। आज मोटिवेशनल किताबों, सेमिनारों और लाइफ कोचिंग में जो बातें बताई जाती हैं, उनका सार हरिवंश राय बच्चन ने दशकों पहले अपनी कविताओं में सरल भाषा में कह दिया था। यही कारण है कि उनकी रचनाएं समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए अतीत की घटनाओं को स्वीकार करना और वर्तमान पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। जब व्यक्ति वर्तमान में जीना सीख जाता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है, निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है और जीवन में संतुलन बना रहता है। हरिवंश राय बच्चन का जीवन मंत्र केवल साहित्य प्रेमियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए उपयोगी है जो किसी कारणवश निराश या परेशान है। उनकी सीख हमें याद दिलाती है कि बीते हुए कल को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आज के फैसले हमारे आने वाले कल को जरूर बेहतर बना सकते हैं। इसलिए अतीत की बेड़ियों से बाहर निकलकर वर्तमान को पूरी ऊर्जा, सकारात्मकता और आत्मविश्वास के साथ जीना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जीवन के मंत्र</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:39:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>'मेंटल हेल्थ को हल्के में न लें', दोस्त संचिता उगाले की मौत पर भावुक हुईं ज्योत्स्ना चंदोला सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[टीवी अभिनेत्री ने साझा किया दर्द, कहा- किसी की उदासी को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/6a3135e07dcf4/article-56118"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jyotsna-chandola-singh.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">टीवी इंडस्ट्री में अभिनेत्री संचिता उगाले की मौत की खबर ने कलाकारों और उनके प्रशंसकों को गहरा झटका दिया है। इस बीच लोकप्रिय टीवी शो 'ससुराल सिमर का' में नजर आ चुकी अभिनेत्री ज्योत्स्ना चंदोला सिंह ने अपनी दोस्त और सह-अभिनेत्री संचिता उगाले को याद करते हुए एक भावुक वीडियो साझा किया है। वीडियो में उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि लोगों की भावनाओं और मानसिक स्थिति को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। ज्योत्स्ना चंदोला सिंह ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में कहा कि वह संचिता की मौत के पीछे की वजहों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहतीं क्योंकि उन्हें इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि जो हुआ वह बेहद दुखद है और किसी व्यक्ति को केवल उसकी अंतिम परिस्थिति के आधार पर कमजोर या मजबूत कहना सही नहीं होगा। उनके अनुसार कई बार जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब व्यक्ति मानसिक दबाव से जूझ रहा होता है और उस समय उसे सबसे अधिक समझ और सहयोग की जरूरत होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अभिनेत्री ने कहा कि मानसिक दबाव किसी भी अन्य दबाव से कम नहीं होता। अक्सर लोग दूसरों की भावनाओं को छोटी बात मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार जब कोई व्यक्ति अपनी परेशानी या दुख साझा करता है तो आसपास के लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते। यही रवैया आगे चलकर बड़ी समस्या का कारण बन सकता है। उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि हर किसी से रोज बातचीत की जाए, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी उदासी या परेशानी जाहिर कर रहा है तो उसकी बात ध्यान से सुननी चाहिए। ज्योत्स्ना ने बताया कि संचिता से उनकी पिछले कुछ समय से बात नहीं हो पाई थी। इस खबर के सामने आने के बाद उन्हें यह बात बार-बार याद आ रही है कि शायद किसी समय संचिता ने भी अपने मन की बात किसी से कही होगी। उन्होंने लोगों से अपील की कि अगर कोई व्यक्ति उदास, परेशान या तनावग्रस्त दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज न करें। कभी-कभी किसी की बात सुन लेना और उसके साथ खड़ा होना भी बड़ी मदद साबित हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">टीवी इंडस्ट्री में काम करने वाले कलाकारों का जीवन बाहर से जितना चमकदार दिखाई देता है, वास्तविकता कई बार उससे अलग होती है। लगातार काम का दबाव, प्रतिस्पर्धा, निजी जीवन की चुनौतियां और भविष्य को लेकर असुरक्षा जैसी कई बातें कलाकारों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि यह समस्याएं केवल मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं हैं। समाज के हर वर्ग में लोग मानसिक तनाव और भावनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना आज की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। लंबे समय तक तनाव, अकेलापन, चिंता या अवसाद जैसी स्थितियां व्यक्ति के जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। ऐसे में परिवार, मित्रों और सहकर्मियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। कई बार व्यक्ति सीधे मदद नहीं मांगता, लेकिन उसके व्यवहार और बातों में बदलाव से संकेत मिल सकते हैं कि वह किसी परेशानी से गुजर रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संचिता उगाले की मौत के बाद सोशल मीडिया पर भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कई कलाकारों और प्रशंसकों ने लोगों से अपील की है कि वे अपने आसपास के लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील बनें। लोगों का कहना है कि समाज में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर बातचीत होना जरूरी है ताकि जरूरत पड़ने पर लोग बिना किसी झिझक के मदद मांग सकें। ज्योत्स्ना चंदोला सिंह के बयान को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। उन्होंने अपने वीडियो में किसी तरह की अटकलों या आरोपों की बजाय केवल इस बात पर जोर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर विषय है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार कई बार लोग हंसते-मुस्कुराते दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहे होते हैं। ऐसे में संवेदनशीलता और संवाद दोनों जरूरी हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मनोरंजन जगत में पहले भी कई बार मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। विभिन्न कलाकार समय-समय पर इस विषय पर खुलकर अपनी राय रखते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितनी ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लगातार उदासी, तनाव या भावनात्मक परेशानी महसूस कर रहा है तो उसे पेशेवर सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। संचिता उगाले की मौत ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का विषय भी है। किसी की बात सुनना, उसके साथ समय बिताना और जरूरत पड़ने पर उसे मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना छोटे कदम जरूर हैं, लेकिन कई बार यही कदम किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। अभिनेत्री ज्योत्स्ना चंदोला सिंह का संदेश भी इसी दिशा में है कि लोगों की भावनाओं को समझा जाए और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लिया जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 17:45:56 +0530</pubDate>
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                <title>स्क्रीन के दौर में कितना काम सही, कब रुकना है यह समझना भी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लैपटॉप और मोबाइल के सामने बिताया गया समय केवल आंखों ही नहीं, शरीर और दिमाग पर भी असर डाल सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/in-the-age-of-screens-it-is-important-to-understand/article-55858"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/monsoon-skin-care-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज की दुनिया पहले से काफी अलग हो चुकी है। काम करने के तरीके बदल गए हैं और अब बड़ी संख्या में लोग दिन का अधिकांश समय कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन के सामने बिताते हैं। दफ्तरों से लेकर घरों तक, पढ़ाई से लेकर व्यापार तक, लगभग हर काम किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ गया है। ऐसे में एक सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर एक व्यक्ति को दिन में कितने घंटे काम करना चाहिए और लगातार स्क्रीन देखने से होने वाले असर से खुद को कैसे बचाया जा सकता है। मेरी नजर में काम के घंटों का कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं है जो हर व्यक्ति पर लागू हो सके। किसी का काम शारीरिक होता है तो किसी का मानसिक। कोई कम समय में बेहतर परिणाम दे देता है तो कोई ज्यादा समय लगाता है। फिर भी यदि सामान्य स्थिति की बात करें तो 7 से 9 घंटे का कार्य समय संतुलित माना जा सकता है। इससे व्यक्ति को अपने परिवार, स्वास्थ्य, आराम और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी पर्याप्त समय मिल जाता है। असल समस्या तब पैदा होती है जब काम केवल समय का खेल बन जाता है। आज कई लोग 10 से 12 घंटे तक लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। शुरुआत में यह सामान्य लगता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका असर दिखाई देने लगता है। आंखों में थकान, सिर भारी लगना, गर्दन में जकड़न, पीठ दर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। कई बार व्यक्ति को लगता है कि वह ज्यादा समय देकर ज्यादा काम कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह होती है कि लंबे समय तक लगातार काम करने से एकाग्रता कम होने लगती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरा मानना है कि काम की गुणवत्ता हमेशा काम के घंटों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति आठ घंटे में अपना काम अच्छे ढंग से पूरा कर सकता है तो उसे केवल दिखावे के लिए देर रात तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने की जरूरत नहीं है। उत्पादकता का मतलब केवल अधिक समय तक काम करना नहीं, बल्कि बेहतर परिणाम देना भी है। स्क्रीन आधारित काम करने वालों के लिए सबसे जरूरी बात आंखों का ध्यान रखना है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है। इसलिए हर कुछ समय बाद नजरें स्क्रीन से हटानी चाहिए। कई लोग घंटों तक बिना रुके काम करते रहते हैं, जिससे आंखों में सूखापन और जलन की समस्या बढ़ सकती है। थोड़ी देर के लिए दूर देखना या कुछ मिनट का ब्रेक लेना आंखों को आराम देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही स्क्रीन की रोशनी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई लोग बहुत तेज ब्राइटनेस पर काम करते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत कम रोशनी में स्क्रीन देखते हैं। दोनों ही स्थितियां आंखों को प्रभावित कर सकती हैं। कमरे की रोशनी और स्क्रीन की ब्राइटनेस में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। शाम और रात के समय मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय स्क्रीन की चमक कम रखना बेहतर माना जाता है। एक और बड़ी समस्या लंबे समय तक बैठे रहना है। आधुनिक जीवनशैली में लोगों की शारीरिक गतिविधियां लगातार कम हो रही हैं। सुबह कुर्सी पर बैठकर काम शुरू होता है और कई बार देर शाम तक वही स्थिति बनी रहती है। इससे शरीर की मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं और कमर, कंधे तथा गर्दन में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। इसलिए हर घंटे कुछ मिनट के लिए उठना, चलना और शरीर को स्ट्रेच करना जरूरी है। बैठने की सही मुद्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कंप्यूटर स्क्रीन आंखों के स्तर से बहुत नीचे या ऊपर हो तो गर्दन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी तरह गलत ऊंचाई वाली कुर्सी और टेबल भी परेशानी बढ़ा सकती है। आज कम उम्र के युवाओं में भी पीठ और गर्दन से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका एक कारण लगातार गलत मुद्रा में काम करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल फोन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। दिनभर लैपटॉप पर काम करने के बाद भी कई लोग घंटों सोशल मीडिया, वीडियो या गेम में समय बिताते हैं। इससे कुल स्क्रीन टाइम काफी बढ़ जाता है। ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि काम के बाद कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाई जाए। परिवार के साथ बातचीत, किताब पढ़ना, टहलना या किसी शौक को समय देना मानसिक रूप से भी राहत देता है। नींद पर भी स्क्रीन का सीधा असर पड़ता है। रात में सोने से ठीक पहले मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत अब आम हो चुकी है। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी लंबे समय तक स्क्रीन देखते रहते हैं। इसका असर नींद की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। यदि सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन का उपयोग कम कर दिया जाए तो दिमाग को आराम मिलने में मदद मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम जरूरी है और सफलता हासिल करने के लिए मेहनत भी जरूरी है। लेकिन यह भी सच है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई निवेश नहीं होता। यदि काम के कारण शरीर और मन लगातार थकान महसूस करने लगें तो लंबे समय में इसका असर जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ सकता है। इसलिए काम और आराम के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। मेरे विचार से सफलता का मतलब केवल ज्यादा घंटे काम करना नहीं है। असली सफलता वही है जिसमें करियर आगे बढ़े, लेकिन स्वास्थ्य पीछे न छूटे। नियमित ब्रेक, पर्याप्त नींद, थोड़ी शारीरिक गतिविधि और सीमित स्क्रीन टाइम जैसी छोटी आदतें लंबे समय तक बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकती हैं। काम कीजिए, लक्ष्य हासिल कीजिए, लेकिन अपने शरीर और आंखों को नजरअंदाज किए बिना। यही आधुनिक दौर में स्वस्थ और संतुलित जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 17:43:00 +0530</pubDate>
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