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                <title>MPs - दैनिक जागरण</title>
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                <title>उद्धव की शिवसेना में फिर टूट की चर्चा, 7 सांसदों पर दावा</title>
                                    <description><![CDATA[शिंदे गुट के एमएलसी कृपाल तुमाने ने कहा- सात सांसद संपर्क में हैं, उद्धव ठाकरे बोले- जो जाना चाहता है उसे नहीं रोकेंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a3138a1df29a/article-56120"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/uddhav-thackeray.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना को लेकर हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के विधान परिषद सदस्य कृपाल तुमाने के एक दावे ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। तुमाने ने कहा है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के सात सांसद उनके संपर्क में हैं और मानसून सत्र से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। इस दावे के सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में फिर से संभावित दल-बदल और शक्ति संतुलन को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। कृपाल तुमाने ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि पिछले करीब एक महीने से 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत बातचीत चल रही है और अब यह प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उनके अनुसार शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद शिंदे गुट के संपर्क में हैं और आने वाले दिनों में वे बड़ा फैसला ले सकते हैं। हालांकि उन्होंने सांसदों के नाम सार्वजनिक नहीं किए। उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठने लगा कि क्या महाराष्ट्र में एक बार फिर शिवसेना के भीतर बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इन अटकलों के बीच उद्धव ठाकरे ने भी अपने सांसदों और वरिष्ठ नेताओं की बैठक बुलाई। बैठक में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई नेता या सांसद पार्टी छोड़ना चाहता है तो उसे रोका नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि पार्टी में रहने या जाने का फैसला हर व्यक्ति का अपना है और जो जाना चाहता है, वह खुशी-खुशी जा सकता है। बताया जा रहा है कि बैठक के दौरान उद्धव ठाकरे ने वर्ष 2022 में हुई शिवसेना की बड़ी टूट का भी जिक्र किया और कहा कि उस समय भी उन्हें हालात की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने किसी पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं की थी। उद्धव ठाकरे का यह बयान एक तरह से पार्टी नेताओं को खुली छूट देने जैसा संदेश भी माना जा रहा है। हालांकि पार्टी के भीतर से लगातार यह दावा किया जा रहा है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और किसी भी प्रकार की टूट की संभावना नहीं है। शिवसेना (यूबीटी) के नेता लगातार शिंदे गुट के दावों को राजनीतिक प्रचार बता रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच यवतमाल-वाशिम लोकसभा सीट से सांसद संजय देशमुख की केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव से मुलाकात ने भी चर्चाओं को हवा दे दी। यह मुलाकात दिल्ली में हुई और इसके बाद राजनीतिक अटकलें और तेज हो गईं। संजय देशमुख उस बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो पाए थे, जिसे उद्धव ठाकरे ने सांसदों के साथ आयोजित किया था। हालांकि उनके करीबी सूत्रों ने पारिवारिक कारणों को इसकी वजह बताया। इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को अलग नजरिए से देखा जाने लगा। शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय राउत ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि पार्टी के सभी सांसद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़े हैं। राउत ने कहा कि चार दिन पहले हुई बैठक में सभी सांसदों ने पार्टी नेतृत्व पर भरोसा जताया था। उनके मुताबिक कुछ नेताओं ने तो सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में उद्धव ठाकरे का साथ नहीं छोड़ेंगे। राउत ने यह भी कहा कि शिंदे गुट के दावे केवल भ्रम फैलाने की कोशिश हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"> हाल ही में हुई बैठक में सभी सांसद मौजूद नहीं थे। कुछ सांसदों ने ऑनलाइन हिस्सा लिया जबकि कुछ अनुपस्थित रहे। इसी वजह से राजनीतिक चर्चाओं को और बल मिला। हालांकि अनुपस्थित रहने के पीछे अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं और पार्टी नेतृत्व इसे सामान्य स्थिति बता रहा है। महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना का विभाजन कोई नया विषय नहीं है। जून 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को उस समय बड़ा झटका लगा था जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हो गए थे। उस समय शिवसेना के 55 में से 40 विधायक शिंदे के साथ चले गए थे। इसके बाद राज्य की राजनीति में तेजी से घटनाक्रम बदले और अंततः उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद दोनों गुटों के बीच असली शिवसेना को लेकर कानूनी और राजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और फिर विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर भी सुनवाई हुई। अंततः विधानसभा अध्यक्ष ने शिंदे गुट को बहुमत वाला गुट मानते हुए राहत दी। इसी दौरान चुनाव आयोग ने भी शिवसेना का पारंपरिक चुनाव चिह्न धनुष-बाण शिंदे गुट को आवंटित कर दिया। अब चार साल बाद फिर से टूट और दल-बदल की चर्चा ने महाराष्ट्र की राजनीति को गर्मा दिया है। अभी तक किसी सांसद ने सार्वजनिक रूप से पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 17:45:39 +0530</pubDate>
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                <title>टीएमसी में बगावत तेज, ममता के करीबी सुदीप बंदोपाध्याय भी बागी खेमे में शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, बागी सांसदों ने लोकसभा में ‘असली टीएमसी’ होने का दावा ठोकने की तैयारी की, स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात संभव।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/rebellion-in-tmc-intensifies-mamatas-close-friend-sudeep-bandopadhyay-also/article-55921"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-rebellion.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है और पार्टी की शीर्ष नेतृत्व के लिए यह स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। ताजा घटनाक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी और पार्टी के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंदोपाध्याय के बागी खेमे के साथ खड़े होने की खबरों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि यह घटनाक्रम टीएमसी के अंदर चल रहे शक्ति संघर्ष को और तेज कर सकता है। विधानसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद संगठन के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। अब यह असंतोष खुली बगावत का रूप लेता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि सुदीप बंदोपाध्याय ने बागी सांसदों के साथ बैठकें की हैं और आगे की रणनीति पर चर्चा भी की है। इस घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सुदीप लंबे समय से ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागी गुट सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर सकता है। इस मुलाकात के दौरान बागी सांसद अपने पक्ष को विस्तार से रखने और संसदीय स्तर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह टीएमसी के लिए एक बड़ा संस्थागत संकट साबित हो सकता है। लोकसभा में पार्टी की स्थिति और नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं। बागी खेमे की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि लोकसभा में उनके समूह का नेतृत्व सुदीप बंदोपाध्याय करें। विद्रोही नेताओं का मानना है कि उनके अनुभव और राजनीतिक पकड़ को देखते हुए वे इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इस विषय पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ सुदीप बंदोपाध्याय की मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। रिपोर्टों के अनुसार इस मुलाकात में टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय भी मौजूद थीं। इसके अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की खबरों ने भी राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। विपक्षी दल और राजनीतिक पर्यवेक्षक इन बैठकों को बंगाल की राजनीति में संभावित नए समीकरणों के संकेत के रूप में देख रहे हैं। टीएमसी के भीतर असंतोष केवल संसदीय स्तर तक सीमित नहीं है। विधानसभा में भी स्थिति पार्टी नेतृत्व के लिए चिंताजनक बताई जा रही है। खबरों के मुताबिक बड़ी संख्या में विधायक पहले ही हाईकमान के फैसलों पर सवाल उठा चुके हैं। बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी को नेता के रूप में समर्थन देने का संकेत दिया है। इससे साफ है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभरकर सामने आए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूर्व मंत्री मानस भूनिया का हाल ही में पार्टी से इस्तीफा देना भी इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। उनके इस्तीफे के बाद यह संदेश गया कि असंतोष केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के विभिन्न स्तरों पर इसकी गूंज सुनाई दे रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाता तो आने वाले समय में और भी नेता खुलकर विरोध का रास्ता अपना सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागी सांसद जगदीश चंद्र बसूनिया ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट कहा कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंप दिया है और वे जल्द ही अपने समूह की ओर से औपचारिक दावा पेश करेंगे। उनका कहना है कि उनका गुट ही वास्तविक तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है और इसी आधार पर वे संसदीय मान्यता की मांग करेंगे। इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उधर टीएमसी समर्थकों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व अभी भी मजबूत स्थिति में है और बागी नेताओं की गतिविधियां संगठन को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगी। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह असंतोष अस्थायी है और समय के साथ स्थिति सामान्य हो जाएगी। हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना आसान नहीं है कि विवाद किस दिशा में जाएगा। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से नाटकीय घटनाक्रमों और तीखे राजनीतिक संघर्षों के लिए जानी जाती रही है। मौजूदा संकट भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 17:25:51 +0530</pubDate>
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