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                <title>Hindu Rituals - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Hindu Rituals RSS Feed</description>
                
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                <title>01 जुलाई 2026 का पंचांग: जानें शुभ मुहूर्त, राहुकाल और आज के विशेष योग</title>
                                    <description><![CDATA[बुधवार के शुभ संयोग में जानें आज की तिथि, नक्षत्र, राहुकाल का समय और काम संवारने वाले भाग्यशाली मुहूर्त।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/horoscope/panchang-of-01-july-2026-know-the-auspicious-time-rahukaal/article-57449"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/panchang-1-july-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पंचांग हिंदू धर्म में समय की गणना का एक प्राचीन और सटीक विज्ञान है। हर नए दिन की शुरुआत के साथ ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति बदलती है, जिसका सीधा असर हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता है। हिंदू परंपरा में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, नए व्यापार की शुरुआत या यात्रा पर जाने से पहले पंचांग देखना बेहद अनिवार्य माना गया है। 01 जुलाई 2026 का पंचांग आपके लिए नए महीने की शुरुआत को शुभ और सफल बनाने में मदद करेगा। आइए जानते हैं आज के तिथि, नक्षत्र, शुभ मुहूर्त और राहुकाल का पूरा विवरण।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पंचांग के पांच मुख्य अंग: आज की स्थिति</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">हिंदू पंचांग मुख्य रूप से पांच तत्वों से मिलकर बनता है: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। आज 01 जुलाई 2026 के दिन इन पांचों अंगों की स्थिति इस प्रकार है:</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1. तिथि (Tithi)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि है। सनातन परंपरा में द्वितीया तिथि को शुभ कार्यों के लिए उत्तम माना जाता है। इस तिथि के देवता ब्रह्मा जी हैं। आज के दिन किए गए कार्यों में स्थिरता आती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>2. वार (Day)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज बुधवार का दिन है। बुधवार का दिन बुद्धि, तर्क और व्यापार के कारक देवता भगवान गणेश और ग्रह मंडल में बुध देव को समर्पित है। आज के दिन विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और बुद्धि का विकास होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>3. नक्षत्र (Nakshatra)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा। यह आकाशमंडल का 21वां नक्षत्र है। इसके स्वामी सूर्य देव हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग साहसी, न्यायप्रिय और समाज में मान-सम्मान पाने वाले होते हैं। आज के दिन सूर्य देव की आराधना करना विशेष फलदायी रहेगा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>4. योग (Yoga)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज ऐन्द्र योग का निर्माण हो रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इस योग को राज्य पक्ष से जुड़े कार्यों के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। यदि आप सरकारी नौकरी, राजनीति या किसी बड़े प्रशासनिक कार्य से जुड़े हैं, तो आज का दिन आपके पक्ष में रहेगा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>5. करण (Karana)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज का मुख्य करण तैतिल है, जिसके बाद गर करण की शुरुआत होगी। तैतिल करण में किए गए कार्य व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा दिलाते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>सूर्य और चंद्रमा की गणना (Sun and Moon Timings)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">01 जुलाई 2026 को सूर्य और चंद्रमा की स्थिति इस प्रकार रहने वाली है:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><strong>सूर्योदय (Sunrise):</strong> सुबह 05:27 बजे</p>
</li>
<li>
<p><strong>सूर्यास्त (Sunset):</strong> शाम 07:12 बजे</p>
</li>
<li>
<p><strong>चन्द्रोदय (Moonrise):</strong> रात 08:35 बजे</p>
</li>
<li>
<p><strong>चन्द्रास्त (Moonset):</strong> सुबह 06:44 बजे</p>
</li>
<li>
<p><strong>चंद्र राशि (Moon Sign):</strong> आज चंद्रमा मकर राशि में संचार करेंगे।</p>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आज के शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यदि आप आज के दिन कोई नया काम शुरू करना चाहते हैं, गृह प्रवेश करना चाहते हैं या कोई कीमती वस्तु खरीदना चाहते हैं, तो आपको शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना चाहिए:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><strong>अभिजीत मुहूर्त (Abhijit Muhurat):</strong> आज दोपहर 11:53 बजे से 12:48 बजे तक रहेगा। यह दिन का सबसे शुभ समय माना जाता है, जिसमें किए गए कार्य हमेशा सफल होते हैं।</p>
</li>
<li>
<p><strong>अमृत काल (Amrit Kaal):</strong> दोपहर 02:15 बजे से 03:50 बजे तक। इस दौरान की गई पूजा-पाठ या मंत्र साधना का विशेष महत्व है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>विजय मुहूर्त (Vijaya Muhurat):</strong> दोपहर 02:38 बजे से 03:33 बजे तक। कोर्ट-कचहरी के मामलों या प्रतियोगिता के लिए यह समय उत्तम है।</p>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आज का अशुभ समय: राहुकाल (Inauspicious Timings)</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों के अनुसार, राहुकाल के दौरान किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरुआत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस समय किए गए कार्यों में बाधाएं आने की आशंका रहती है:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><strong>राहुकाल (Rahukaal):</strong> दोपहर 12:20 बजे से 02:03 बजे तक।</p>
</li>
<li>
<p><strong>यमगण्ड (Yamaganda):</strong> सुबह 07:10 बजे से 08:53 बजे तक।</p>
</li>
<li>
<p><strong>गुलिक काल (Gulik Kaal):</strong> सुबह 10:36 बजे से 12:20 बजे तक।</p>
</li>
</ul>
<blockquote>
<p><strong>विशेष टिप:</strong> यदि राहुकाल के दौरान किसी यात्रा या महत्वपूर्ण कार्य पर जाना बेहद जरूरी हो, तो घर से निकलने से पहले भगवान गणेश को दुर्वा अर्पित करें और थोड़ा सा धनिया खाकर निकलें।</p>
</blockquote>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आज का विशेष धार्मिक महत्व और उपाय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">01 जुलाई 2026 को बुधवार का दिन होने के कारण आज भगवान गणेश की विशेष पूजा का विधान है।</p>
<ol start="1">
<li style="text-align:justify;">
<p><strong>गणेश जी को मोदक का भोग लगाएं:</strong> आज के दिन गणपति बप्पा को मोदक या लड्डू का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।</p>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<p><strong>हरे मूंग का दान:</strong> बुधवार के दिन गाय को हरी घास खिलाने या जरूरतमंदों को हरी मूंग की दाल दान करने से कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है, जिससे व्यापार और शिक्षा में उन्नति होती है।</p>
</li>
<li>
<p style="text-align:justify;"><strong>सूर्य अर्घ्य:</strong> उत्तराषाढ़ा नक्षत्र होने के कारण आज तांबे के लोटे में जल लेकर सूर्य देव को अर्घ्य देना आरोग्य और यश की प्राप्ति कराएगा।</p>
</li>
</ol>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/horoscope/panchang-of-01-july-2026-know-the-auspicious-time-rahukaal/article-57449</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोमवार भस्म आरती में महाकाल का दिव्य श्रृंगार, पंचामृत पूजन के बाद दिए राजा स्वरूप दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में तड़के भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का जलाभिषेक, पंचामृत पूजन और रजत आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन किए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a38cce6c593f/article-56623"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakal-bhasma-aarti-(9).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में सोमवार तड़के आयोजित होने वाली भस्म आरती के दौरान श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। अलसुबह चार बजे मंदिर के पट खुलते ही गर्भगृह में धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम शुरू हुआ। मंदिर के पंडे-पुजारियों ने विधि-विधान के साथ भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन किया और इसके बाद जलाभिषेक संपन्न कराया। भस्म आरती में शामिल होने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु देर रात से ही मंदिर परिसर में कतारबद्ध होकर बाबा महाकाल के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे। सोमवार होने के कारण महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रही। मंदिर के पट खुलने के बाद सबसे पहले गर्भगृह में स्थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन किया गया। इसके पश्चात भगवान महाकाल का पवित्र जल से अभिषेक किया गया। धार्मिक परंपराओं के अनुसार अभिषेक के दौरान वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया गया, जिससे मंदिर परिसर पूरी तरह आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया। हर-हर महादेव और जय श्री महाकाल के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठा। जलाभिषेक के बाद भगवान महाकाल का पंचामृत से विशेष पूजन किया गया। दूध, दही, घी, शक्कर और विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत भगवान को अर्पित किया गया। सनातन परंपरा में पंचामृत पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बनाए रखते हैं। पूजन के दौरान पुजारियों ने वैदिक विधि से आराधना करते हुए भक्तों की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म आरती से पहले प्रथम घंटाल बजाकर मंदिर में प्रवेश किया गया और मंत्रोच्चार के साथ भगवान का ध्यान किया गया। इसके बाद हरिओम का पवित्र जल अर्पित कर विशेष पूजा की गई। कपूर आरती के पश्चात भगवान महाकाल के मस्तक पर भांग, चंदन और त्रिपुंड अर्पित किया गया। यह श्रृंगार भगवान शिव के स्वरूप का प्रतीक माना जाता है और महाकाल मंदिर की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय भगवान महाकाल का स्वरूप अत्यंत दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है। श्रृंगार की अगली प्रक्रिया में भगवान महाकाल को रजत आभूषणों से अलंकृत किया गया। जटाधारी स्वरूप में विराजमान बाबा महाकाल को राजा स्वरूप में सजाया गया। रजत मुकुट, रजत की मुंडमाल, रुद्राक्ष की मालाएं और अन्य आभूषण अर्पित किए गए। इसके साथ ही सुगंधित पुष्पों से निर्मित विशेष मालाओं से भी भगवान का श्रृंगार किया गया। मोगरा और गुलाब के फूलों की सुगंध से पूरा गर्भगृह महक उठा। भगवान महाकाल का यह राजसी स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर भस्म अर्पित करने की प्रक्रिया शुरू की गई। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई। भस्म आरती महाकाल मंदिर की सबसे प्राचीन और विशेष परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह परंपरा केवल उज्जैन के महाकाल मंदिर में ही देखने को मिलती है, जिसके कारण देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि भस्म आरती को देखने और इसमें शामिल होने की श्रद्धालुओं में विशेष उत्सुकता रहती है। आरती के दौरान मंदिर परिसर में मौजूद भक्त पूरी श्रद्धा के साथ बाबा महाकाल के जयकारे लगाते नजर आए। कई श्रद्धालु इस पल को अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म आरती के पश्चात भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन सोमवार और विशेष पर्वों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर मंदिर प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए थे ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसकी धार्मिक मान्यता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहां प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन को आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। सोमवार की भस्म आरती में भी यही आस्था और भक्ति देखने को मिली। पंचामृत पूजन, रजत आभूषणों से सुसज्जित राजसी श्रृंगार और भस्म आरती के दिव्य दृश्य ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। बाबा महाकाल के दर्शन कर भक्तों ने अपने परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की। मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्ति का माहौल बना रहा और श्रद्धालु महाकाल के जयघोष के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 14:07:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुरुवार भस्म आरती में महाकाल का दिव्य राजा स्वरूप श्रृंगार</title>
                                    <description><![CDATA[श्री महाकालेश्वर मंदिर में तड़के भस्म आरती के दौरान हुआ भव्य पूजन, पंचामृत और भस्म अर्पण से सजा भगवान का स्वरूप]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a3386bb71ac9/article-56257"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakal-bhasma-aarti-(8).jpg" alt=""></a><br /><div class="text-base my-auto mx-auto [--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-xs,calc(var(--spacing)*4))] @w-sm/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-sm,calc(var(--spacing)*6))] @w-lg/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-lg,calc(var(--spacing)*16))] px-(--thread-content-margin)">
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<p>गुरुवार तड़के उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती के दौरान एक बार फिर दिव्य और अलौकिक दृश्य देखने को मिला। सुबह करीब 4 बजे जैसे ही मंदिर के पट खोले गए, पूरे गर्भगृह में मंत्रोच्चार और घंटियों की आवाज गूंज उठी। भस्म आरती के इस विशेष अवसर पर भगवान महाकाल का विधि-विधान से अभिषेक और पूजन किया गया। मंदिर परिसर में उस समय श्रद्धा और आस्था का माहौल ऐसा था कि हर कोई बाबा महाकाल के दर्शन में लीन दिखाई दिया। पंडे-पुजारियों ने सबसे पहले गर्भगृह में विराजित सभी देव प्रतिमाओं का पूजन किया और इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक प्रारंभ हुआ। हरिओम जल से किए गए इस अभिषेक के दौरान वातावरण में एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस की गई। इसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से विधिवत पूजन और अभिषेक की प्रक्रिया संपन्न की गई। बताया जा रहा है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और हर दिन भस्म आरती के समय इसी विधि का पालन किया जाता है।</p>
<p>इसके बाद प्रथम घंटाल के साथ ‘हरि ओम’ जल अर्पित किया गया और पूरे गर्भगृह में कपूर आरती की गूंज फैल गई। मंदिर में मौजूद श्रद्धालु इस क्षण को अपने मोबाइल और आंखों में कैद करने की कोशिश करते नजर आए, लेकिन व्यवस्था के चलते गर्भगृह के अंदर केवल सीमित लोग ही प्रवेश कर पाए। कपूर आरती के बाद भगवान महाकाल को भांग, चंदन, रजत चंद्र और गुलाब के पुष्प अर्पित किए गए। इसके बाद रजत मुकुट और त्रिपुंड से भगवान का विशेष श्रृंगार किया गया और उन्हें जटाधारी स्वरूप में सजाया गया। यह पूरा दृश्य अत्यंत मनमोहक था और ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे स्वयं कैलाश से भगवान भक्तों को दर्शन देने उतरे हों। श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से आच्छादित कर परंपरागत रूप से भस्म अर्पित की गई। यह वही क्षण होता है जिसका इंतजार देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु सबसे अधिक करते हैं। भस्म अर्पण के समय पूरा वातावरण शांत हो जाता है और केवल मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनाई देती है। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से इस भस्म को अर्पित करने की परंपरा निभाई गई, जिसे सदियों पुरानी धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।</p>
<p>भस्म अर्पण के पश्चात भगवान महाकाल का स्वरूप पूरी तरह बदल गया और उन्हें राजा स्वरूप में श्रृंगारित किया गया। इस दौरान भांग, ड्रायफ्रूट, आभूषण और सुगंधित पुष्पों से उनका भव्य श्रृंगार किया गया। शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुंडमाल, रुद्राक्ष माला और गुलाब के विशेष हार से भगवान को सजाया गया, जिससे उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और आकर्षक दिखाई दे रहा था। इसके बाद भगवान को फल और मिष्ठान का भोग अर्पित किया गया। मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालु इस पूरे दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे और कई लोगों की आंखों में आस्था के आंसू भी नजर आए। सुबह से ही मंदिर परिसर में भारी भीड़ देखने को मिली और हर कोई बाबा महाकाल के दर्शन पाने के लिए उत्सुक दिखाई दिया। बताया जा रहा है कि भस्म आरती के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, और यही मान्यता इस आरती को विशेष बनाती है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए गए थे ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।</p>
</div>
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</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 11:37:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>चंद्र दर्शन 2026 आज: अमावस्या के बाद चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व, श्रद्धालु करेंगे व्रत और पूजा</title>
                                    <description><![CDATA[16 जून को मनाया जाएगा चंद्र दर्शन पर्व, चंद्र देव की आराधना से सुख, समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होने की मान्यता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/chandra-darshan-2026-today-after-amavasya-there-is-special-importance/article-56034"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chandra-darshan-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन का पर्व 16 जून 2026, मंगलवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार अमावस्या के बाद पहली बार चंद्रमा के दर्शन करने की परंपरा को चंद्र दर्शन कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि अमावस्या के अंधकार के बाद चंद्रमा के प्रथम दर्शन जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और शुभ फल लेकर आते हैं। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखते हैं और चंद्र देव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। चंद्रमा को मन, बुद्धि, भावनाओं और शांति का कारक माना गया है। नवग्रहों में भी चंद्रदेव का महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा मजबूत स्थिति में होता है, उन्हें जीवन में सुख, सम्मान और समृद्धि प्राप्त होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु चंद्र दर्शन के दिन उपवास रखकर चंद्रदेव से कृपा और आशीर्वाद की कामना करते हैं। बताया जाता है कि यह पर्व विशेष रूप से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और आर्थिक उन्नति से जुड़ा हुआ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 15 जून की सुबह 8 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 16 जून की सुबह 4 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। वहीं 16 जून को चंद्रमा का उदय सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर और अस्त रात 8 बजकर 50 मिनट पर होगा। हालांकि चंद्र दर्शन के लिए सबसे शुभ समय सूर्यास्त के बाद माना जाता है, जब श्रद्धालु आकाश में नवचंद्र के दर्शन कर पूजा संपन्न करते हैं। कई स्थानों पर परिवार के सदस्य एक साथ चंद्रमा को अर्घ्य देकर मंगलकामना करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करते हैं। शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद पूजा कर व्रत खोला जाता है। पूजा में चंदन, अक्षत, सफेद पुष्प, दूध और मिठाई का विशेष महत्व बताया गया है। कई श्रद्धालु चंद्रदेव के मंत्रों का जाप भी करते हैं। माना जाता है कि इससे मन की अशांति दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन के दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को चावल, चीनी, सफेद वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करने से शुभ फल प्राप्त होता है। कई लोग ब्राह्मणों को भोजन कराकर आशीर्वाद भी प्राप्त करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फलदायी होता है और व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं कम होती हैं। पौराणिक कथाओं में चंद्रदेव को अत्यंत पूजनीय माना गया है। उन्हें राजा दक्ष की 27 पुत्रियों का पति बताया गया है, जिन्हें 27 नक्षत्रों के रूप में जाना जाता है। वहीं बुध ग्रह को चंद्रदेव का पुत्र माना जाता है। चंद्रमा का संबंध प्रकृति, वनस्पति और जीव-जंतुओं के पोषण से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में चंद्रमा केवल एक खगोलीय पिंड नहीं बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन का पर्व उन लोगों के लिए विशेष लाभकारी माना जाता है, जो मानसिक तनाव, निर्णय लेने में कठिनाई या पारिवारिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। चंद्रदेव की आराधना से मन को स्थिरता और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। कई लोग इस दिन चंद्रमा को दूध मिश्रित जल अर्पित कर विशेष पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। देशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भी चंद्र दर्शन को लेकर विशेष आयोजन किए जाते हैं। श्रद्धालु शाम के समय मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और नवचंद्र के दर्शन कर अपने जीवन में सुख, शांति और सफलता की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या के बाद चंद्रमा के प्रथम दर्शन जीवन में नए अवसरों और सकारात्मक बदलावों का संकेत माने जाते हैं। इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व ऐसे समय में आ रहा है जब लोग आध्यात्मिकता और धार्मिक परंपराओं की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे में चंद्र दर्शन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक बन गया है। श्रद्धालुओं को विश्वास है कि चंद्रदेव की कृपा से उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 00:00:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>रविवार भस्म आरती में राजा स्वरूप सजे बाबा महाकाल, श्रद्धालुओं ने किए दिव्य दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[श्री महाकालेश्वर मंदिर में तड़के भस्म आरती के दौरान पंचामृत अभिषेक, भांग, चंदन और बिल्वपत्र अर्पित कर किया गया विशेष श्रृंगार, बड़ी संख्या में पहुंचे भक्त]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/devotees-had-divine-darshan-of-baba-mahakal-dressed-as-king/article-55874"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakal-bhasma-aarti-(7).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में रविवार तड़के आयोजित भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का दिव्य और भव्य श्रृंगार किया गया। सुबह करीब 4 बजे मंदिर के पट खुलते ही धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत हुई। मंदिर के पंडे-पुजारियों ने सबसे पहले गर्भगृह में विराजित सभी देवी-देवताओं का विधि-विधान से पूजन किया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और दूध, दही, घी, शक्कर तथा फलों के रस से तैयार पंचामृत से विशेष अभिषेक संपन्न कराया गया। तड़के से ही मंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिलीं और भस्म आरती में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह नजर आया।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रारंभिक धार्मिक विधियों के बाद भगवान महाकाल का आकर्षक श्रृंगार किया गया। बाबा महाकाल को त्रिशूल, त्रिपुंड और डमरू से अलंकृत किया गया। परंपरा के अनुसार उन्हें भांग अर्पित की गई तथा चंदन और बिल्वपत्र से विशेष पूजन किया गया। गर्भगृह में वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। मंदिर में मौजूद श्रद्धालु बाबा महाकाल के इस अद्भुत स्वरूप के दर्शन कर भावविभोर दिखाई दिए। ऐसा कहा जाता है कि भस्म आरती के समय बाबा महाकाल के दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व होता है और दूर-दूर से श्रद्धालु इस अलौकिक अनुष्ठान को देखने के लिए उज्जैन पहुंचते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">अभिषेक और श्रृंगार के बाद भगवान महाकाल को हरि ओम का जल अर्पित किया गया तथा कपूर आरती उतारी गई। आरती के दौरान मंदिर परिसर जय महाकाल के जयघोष से गूंज उठा। श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर भस्म अर्पित करने की प्रक्रिया शुरू की गई। यह भस्म आरती मंदिर की सबसे प्राचीन और विशिष्ट परंपराओं में शामिल है, जिसे देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। रविवार होने के कारण भक्तों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रही।</p>
<p class="isSelectedEnd">भस्म अर्पित किए जाने के बाद भगवान महाकाल का एक और दिव्य स्वरूप भक्तों के सामने प्रकट हुआ। उन्हें रजत शेषनाग मुकुट, रजत मुंडमाला और रुद्राक्ष की मालाओं से सजाया गया। इसके साथ ही मोगरा और गुलाब के सुगंधित पुष्पों की मालाएं अर्पित की गईं। गर्भगृह में फूलों की सुगंध और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच आध्यात्मिक वातावरण का विशेष अनुभव हुआ। श्रृंगार के बाद भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया तथा मंदिर परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना का क्रम आगे बढ़ाया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">मंदिर प्रशासन के अनुसार भस्म आरती में शामिल होने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचे थे। कई श्रद्धालु देर रात से ही मंदिर परिसर के बाहर कतार में खड़े दिखाई दिए। भस्म आरती के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर भी विशेष इंतजाम किए गए थे ताकि दर्शन व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित हो सके। श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।</p>
<p class="isSelectedEnd">महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भी परंपरा के अनुसार भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। धार्मिक मान्यता है कि भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि महाकाल मंदिर की भस्म आरती देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी विशेष पहचान रखती है। इस अनूठी परंपरा को देखने और बाबा महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।</p>
<p>रविवार की भस्म आरती में भी श्रद्धा, आस्था और भक्ति का ऐसा ही संगम देखने को मिला। मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक वातावरण बना रहा और बाबा महाकाल के जयघोष लगातार गूंजते रहे। दिव्य श्रृंगार, विशेष पूजा-अर्चना और भस्म आरती के दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को धन्य महसूस करते नजर आए। धार्मिक नगरी उज्जैन में एक बार फिर बाबा महाकाल की भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद हर श्रद्धालु को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 12:12:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संकष्टी चतुर्थी 2026: 4 जून को रखा जाएगा गणेश जी का पावन व्रत</title>
                                    <description><![CDATA[भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने और जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए श्रद्धालु 4 जून 2026 को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखेंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/sankashti-chaturthi-2026-the-holy-fast-of-lord-ganesha-will/article-54815"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sankashti-chaturthi-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है और प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी 4 जून, गुरुवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के संकट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि देशभर में लाखों श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर विघ्नहर्ता गणेश की आराधना करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि का आरंभ 3 जून 2026 को रात 9 बजकर 21 मिनट पर होगा और इसका समापन 4 जून 2026 को रात 11 बजकर 30 मिनट पर होगा। चूंकि उदया तिथि के आधार पर व्रत और पर्व निर्धारित किए जाते हैं, इसलिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत 4 जून को रखा जाएगा। इस दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखकर शाम को भगवान गणेश की पूजा करते हैं और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी को कई स्थानों पर संकटहारा चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत भाषा में "संकष्टी" का अर्थ होता है संकटों से मुक्ति और "चतुर्थी" का अर्थ चौथा दिन। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली परेशानियां, बाधाएं और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि गणपति बप्पा की कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी सफल हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित देश के कई राज्यों में इस व्रत को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र में संकष्टी चतुर्थी का उत्साह अधिक देखने को मिलता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। कई गणेश मंदिरों में भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">व्रत के दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके भगवान गणेश का स्मरण करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। पूरे दिन उपवास रखा जाता है। कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार का सेवन करते हैं। व्रत के दौरान सामान्य भोजन का त्याग किया जाता है। फल, दूध, साबूदाना, मूंगफली, आलू और अन्य व्रत में उपयोग होने वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखना भी आवश्यक माना गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शाम के समय भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाती है। गणपति की प्रतिमा को दूर्वा घास, लाल फूल और चंदन अर्पित किया जाता है। दीपक जलाकर धूप और अगरबत्ती से पूजा की जाती है। इसके बाद गणेश मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ किया जाता है। कई श्रद्धालु गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशन स्तोत्र और वक्रतुंड महाकाय मंत्र का जाप भी करते हैं। पूजा के दौरान भगवान गणेश को मोदक, लड्डू और अन्य प्रिय भोग अर्पित किए जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में चंद्र दर्शन का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा के बाद चंद्रमा के दर्शन करके उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात ही व्रत का पारण किया जाता है। चंद्रमा की पूजा के दौरान जल, अक्षत, चंदन और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि इससे व्रत पूर्ण माना जाता है और पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों में संकष्टी चतुर्थी व्रत को अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जीवन में आ रही आर्थिक, पारिवारिक और मानसिक परेशानियां दूर होने लगती हैं। कई दंपति संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत रखते हैं। भक्तों का विश्वास है कि गणेश जी सभी प्रकार के विघ्नों का नाश करते हैं और जीवन में शुभता का संचार करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विशेष बात यह है कि प्रत्येक माह आने वाली संकष्टी चतुर्थी का अपना अलग महत्व और व्रत कथा होती है। वर्ष भर में कुल 12 संकष्टी चतुर्थी आती हैं, जबकि अधिक मास होने पर इनकी संख्या 13 हो सकती है। हर माह भगवान गणेश के अलग स्वरूप और विशेष महिमा का वर्णन किया जाता है। यही कारण है कि यह व्रत पूरे वर्ष श्रद्धापूर्वक किया जाता है। 4 जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश की आराधना का एक महत्वपूर्ण अवसर है। श्रद्धालु इस दिन उपवास, पूजा और चंद्र दर्शन के माध्यम से गणपति बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत जीवन के संकटों को दूर करने और सुख-समृद्धि प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 11:14:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मई 2026 में प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा समय और संपूर्ण विधि</title>
                                    <description><![CDATA[28 मई 2026 को गुरुवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/pradosh-vrat-importance-puja-time-and-complete-method-in-may/article-54348"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/pradosh-vrat-2026-(2).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
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<p style="text-align:justify;">प्रदोष व्रत हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत माना जाता है, जिसे हर महीने की त्रयोदशी तिथि को शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। वर्ष 2026 में मई माह का प्रदोष व्रत 28 मई, गुरुवार के दिन पड़ रहा है, जो जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष का महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर माना जा रहा है। इस दिन देशभर के शिवभक्त विशेष रूप से उपवास रखते हैं और संध्या काल में भगवान शिव की आराधना कर उनके आशीर्वाद की प्राप्ति की कामना करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का वह समय होता है जिसे अत्यंत शुभ और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना गया है। मान्यता है कि इसी समय भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं, इसलिए इस समय की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">28 मई 2026 को प्रदोष व्रत के दिन सूर्यास्त लगभग शाम 07:02 बजे होगा, जिसके तुरंत बाद प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त प्रारंभ होकर रात 09:11 बजे तक रहेगा। इसी संध्या काल में भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं, दीप प्रज्वलित करते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत कथा का श्रवण करते हैं। त्रयोदशी तिथि इस दिन सुबह 07:57 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 29 मई को सुबह 09:51 बजे तक रहेगी, लेकिन धार्मिक दृष्टि से संध्या काल का समय ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण से भक्त विशेष रूप से सूर्यास्त के बाद शिव पूजा की तैयारी करते हैं और पूरे विधि-विधान के साथ आराधना करते हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि का भी मार्ग माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदोष व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल होने के बावजूद गहरी आस्था और शुद्धता की मांग करती है। इस दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और दिनभर उपवास का पालन करते हैं। कई भक्त निर्जला व्रत रखते हैं जबकि कुछ फलाहार या सात्विक भोजन का सेवन करते हैं। सूर्यास्त से लगभग एक घंटे पहले पूजा की तैयारी शुरू की जाती है। घर या मंदिर में पूजा स्थल को शुद्ध करके भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी की स्थापना की जाती है। इसके बाद शिवलिंग का अभिषेक दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से किया जाता है। बिल्वपत्र अर्पित करना इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है क्योंकि इसे भगवान शिव को अत्यंत प्रिय बताया गया है। पूजा के दौरान भक्त “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं और कई स्थानों पर महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार उच्चारण भी किया जाता है, जिसे जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा और दीर्घायु प्रदान करने वाला माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजा के पश्चात प्रदोष व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है, जिसमें इस व्रत के महत्व और इसके पालन से मिलने वाले लाभों का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने और सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। पूजा समाप्त होने के बाद भक्त अपने माथे पर भस्म या चंदन का तिलक लगाते हैं और कलश के पवित्र जल को ग्रहण करते हैं। इसके बाद कई श्रद्धालु शिव मंदिर जाकर दर्शन करते हैं और दीपदान करते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पूरे वातावरण में भक्ति, मंत्रोच्चार और दीपों की रोशनी से एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है, जो श्रद्धालुओं के मन को शांति और संतोष प्रदान करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों विशेषकर स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत का अत्यधिक महत्व बताया गया है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ करता है, उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत न केवल भौतिक सुख-संपत्ति और समृद्धि प्रदान करता है, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का भी माध्यम बनता है। गुरुवार को पड़ने के कारण यह व्रत “गुरुवारा प्रदोष” कहलाता है, जिसे विशेष रूप से ज्ञान, बाधाओं के निवारण और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई साधना से जीवन की कठिनाइयाँ दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस प्रकार 28 मई 2026 का प्रदोष व्रत शिवभक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है, जो आस्था, भक्ति और आत्मिक शुद्धि का संदेश देता है और जीवन में सुख-शांति तथा कल्याण की कामना को पूर्ण करने वाला माना जाता है।</p>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 17:07:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सूर्य को जल चढ़ाने का सही समय और तरीका क्या है? जानें मंत्र, नियम और लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[सूर्य को जल चढ़ाने का सही समय, सही तरीका, मंत्र और लाभ जानें। ज्योतिष अनुसार सूर्य को अर्घ्य देने से यश, स्वास्थ्य और समृद्धि बढ़ती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/rules-for-offering-water-to-the-sun-what-is-the/article-52442"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/surya-ko-jal-chadhane-ka-sahi-samay.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;"><strong>Surya Ko Jal Arpit karne Ke Niyam:</strong> हिंदू धर्म में सूर्य को अर्घ्य देने का बड़ा महत्व बताया गया है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य को यश, तेज, प्रसिद्धि, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। अब अगर आप नियमित रूप से सूर्य को जल चढ़ाते हैं तो जीवन में सूर्य की कृपा बनी रहती है। इससे जातक की समृद्धि और प्रसिद्धि में बढ़ौतरी होती है। हालांकि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य को अर्घ्य देते समय कुछ मंत्रो का ध्यान रखना जरूरी होता है। अगर आप गलत तरीके से जल चढ़ाते हैं तो पूजा का फल नहीं मिलता है। आइए आपको इस बारे पूरी जानकारी देते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य देवे को जल चढ़ाने का सही समय क्या है?</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ज्योतिषचार्य के अनुसार, सूर्य को सही समय पर अर्घ्य देना जरूरी होता है। वरना इसका कम फल मिलता है। माना जाता है कि सूर्य देव को जल अर्पित करने का सबसे सही समय सुबह 5 से 8 बजे के बीच होता है। इस दौरान सूर्य पूर्व दिशा में होते हैं और 8 बजे के बाद दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर चले जाते हैं। ज्योतिषशास्त्र में कहा जाता है कि जब सूर्य खुद की दिशा में हो तभी सूर्य को अर्घ्य देने से ज्यादा महत्व मिलता है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">क्या है सूर्य देव को अर्घ्य देने का सही तरीका</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">मान्यता के अनुसार सबसे पहले सुबह सूरज उगने के पहले उठना अच्छा माना जाता है। इसलिए सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद साफ कपडे पहनने चहिए। इसके बड़ा एक तांबे के लोटे में जल लेकर दोनों से हाथों से पकड़कर अपने सर के ऊपर से नीचे जल डालें। सूर्य को जल अर्पित करते समय हाथ हमेशा सर के ऊपर होने चाहिए। इस तरीके से सूर्य को जल अर्पित करना सही और शुभ माना जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य को जल अर्पित करते समय किन बातों का ध्यान रखें</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य को जल करते समय कुछ बातों का खास ध्यान रखना होता है। जैसे कि जब जल की धारा नीचे गिरे तो एक धार में गिरनी चाहिए। यानी जल की धारा कभी भी बीच से नहीं टूटनी चाहिए। मान्यता है कि जल की एक धारा गिरने से उसकी ऊर्जा इंसान के अंदर समाहित होती है। इसके साथ हमेशा साफ स्थान पर ही सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए। जल को किसी गंदे नाले या किसी गंदे स्थान पर नहीं देना चाहिए। जल को किसी पौधे, नदी या किसी ऐसे स्थान पर देना चाहिए, जहां पर पानी को धरती सोख लें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य को जल अर्पित करते समयँम इन मंत्रों का जाप करें</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य देव को जल अर्पित करते समय कुछ जाप करने से बहुत शुभ माना जाता है। जा सूर्य को जल अर्पित करें तो उसी स्थान पर खड़े रहकर 'ओम घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का जाप कर सकते हैं। इसके आलावा आदित्य हृदय स्तोत्र और गायत्री मंत्र का जाप करना भी काफी शुभ माना जाता है। सूर्य को जल अर्पति करते समय इन मंत्रों का जाप करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य देव को जल अर्पित करने से लाभ</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य देव को विधि-विधान से जल देने से काफी शुभ फल की प्राप्ति होती है। इससे सेहत अच्छी रहती है। सूर्य को प्रसिद्धि को प्रतीक माना जाता है, इसलिए जातक की प्रसिद्धि और समृद्धि बढ़ती है। सूर्य को नियम से जल अर्पित करने से कई तरह की बिमारियों का नाश होता है। इसका वैज्ञानिक कारण भी माना गया है। वैज्ञानिक कारणों के अनुसार, सुबह 5 से 8 क बीच सूर्य से निकलने वाली किरणों और ऊर्जा को काफी अच्छा माना जाता है। सूर्य की किरणों से विटामिन डी की भी कमी पूरी होती है। इसके साथ ही कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी खत्म होती हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 11:50:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बुधवार के उपाय: गणेश पूजा से सुख-समृद्धि पाने के आसान तरीके</title>
                                    <description><![CDATA[बुधवार के उपाय अपनाकर बुध ग्रह को मजबूत करें, गणेश पूजा से करियर और धन लाभ के संकेत बुधवार के दिन किए गए छोटे-छोटे उपाय जीवन पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन गणेश जी और बुध ग्रह को प्रसन्न करने का अवसर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/remedies-for-wednesday-easy-ways-to-get-happiness-and-prosperity/article-52310"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/budhavaar-ke-upaya3.jpg" alt=""></a><br /><p>बुधवार के उपाय को लेकर धार्मिक मान्यताओं में विशेष महत्व बताया गया है। यह दिन भगवान गणेश और बुध ग्रह को समर्पित माना जाता है, जो बुद्धि, व्यापार और संचार के कारक माने जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और कुछ विशेष उपाय करने से जीवन में सुख-समृद्धि, नौकरी में तरक्की और आर्थिक मजबूती आती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, बुधवार को गणेश जी को सिंदूर और 21 दूर्वा अर्पित करने से बाधाएं दूर होती हैं और कार्यों में सफलता मिलती है। इसके अलावा हरी मूंग का दान, गाय को हरा चारा खिलाना और हरे रंग का प्रयोग शुभ माना जाता है। देशभर में बड़ी संख्या में लोग इन उपायों को अपनाते हैं, खासकर वे लोग जो करियर, व्यवसाय या वैवाहिक जीवन में आ रही समस्याओं से राहत चाहते हैं।</p>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बुधवार को गणेश जी की पूजा करने से रोग, कर्ज और बाधाएं दूर होती हैं। पूजा में धूप, दीप और मोदक का भोग लगाना शुभ माना जाता है।ज्योतिष विशेषज्ञों के मुताबिक, बुध ग्रह के प्रभाव को मजबूत करने के लिए हरे रंग का विशेष महत्व होता है, इसलिए इस दिन हरे वस्त्र पहनने या हरा रुमाल रखने की सलाह दी जाती है।</p>
<p><strong>गणेश पूजा का महत्व</strong><br />गणेश जी को विघ्नहर्ता माना जाता है, इसलिए बुधवार को उनकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।21 दूर्वा अर्पित करने और "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का जाप करने से कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है।नियमित रूप से इन उपायों को करने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी बढ़ती है।</p>
<p><strong>दान और सेवा के उपाय</strong><br />बुधवार को हरी मूंग की दाल का दान और गाय को हरा चारा खिलाना शुभ माना जाता है।ऐसा करने से बुध ग्रह मजबूत होता है और पारिवारिक रिश्तों में मधुरता आती है।इसके अलावा जरूरतमंदों को हरे कपड़े दान करने से भी सकारात्मक फल मिलने की मान्यता है।हिंदू धर्म में सप्ताह के प्रत्येक दिन को किसी न किसी देवता और ग्रह से जोड़ा गया है। बुधवार को विशेष रूप से बुध ग्रह और गणेश जी कीपूजा का दिन माना जाता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश जी की पूजा से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं और शुभ कार्यों की शुरुआत सफल होती है।</p>
<p>ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में बुध ग्रह कमजोर होता है, उन्हें बुधवार के उपाय नियमित रूप से करने चाहिए।इन उपायों से व्यापार, शिक्षा और संचार से जुड़े कार्यों में सुधार देखा जाता है।हालांकि, विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि इन उपायों को आस्था और सकारात्मक सोच के साथ ही करना चाहिए।बुधवार के उपाय का असर केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी देखा जाता है।नियमित पूजा और दान-पुण्य से व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ता है और मानसिक संतुलन बना रहता है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 09:51:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोमवार उपाय: भगवान शिव की पूजा से मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद</title>
                                    <description><![CDATA[सोमवार के दिन शिव पूजा और विशेष उपाय करने से धन, स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त होने की मान्यता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/monday-remedy-worshiping-lord-shiva-will-bless-you-with-happiness/article-52174"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/somvaar-ke-upay2.jpg" alt=""></a><br /><p>सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और कुछ विशेष उपाय अपनाने से जीवन में सुख-समृद्धि, धन लाभ और मानसिक शांति प्राप्त होती है। शिवलिंग पर जल, दूध और पंचामृत अर्पित करना बेहद शुभ फलदायी माना गया है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर और मंत्र जाप करके अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की कामना करते हैं।</p>
<h5><span><strong>शिव पूजा का महत्व</strong></span></h5>
<p>धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सोमवार को भगवान शिव को प्रसन्न करना अपेक्षाकृत सरल माना जाता है। शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल अर्पित करने से जीवन की नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। सफेद चंदन, अक्षत और धतूरा चढ़ाना भी शुभ माना गया है।सुबह के समय ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति और आत्मबल में वृद्धि होती है।</p>
<h5><span><strong>मुख्य उपाय </strong></span></h5>
<p><strong>स्वास्थ्य सुधार</strong><br />सोमवार को शिवलिंग पर जल, दूध, काले तिल और चावल अर्पित करने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में राहत मिलने की मान्यता है।</p>
<p><strong>धन वृद्धि</strong><br />कच्चे दूध और गंगाजल मिश्रित जल अर्पित करना आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में सहायक माना जाता है। सफेद वस्तुओं जैसे चावल, चीनी और दूध का दान करना भी शुभ फल देता है।</p>
<p><strong>कर्ज से मुक्ति</strong><br />शिवलिंग पर जल में अक्षत मिलाकर अर्पित करने से कर्ज संबंधी परेशानियों से राहत मिल सकती है, ऐसा धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है।</p>
<p><strong>सुख-समृद्धि</strong><br />शाम के समय शिवलिंग पर सफेद चंदन, अक्षत और धतूरा अर्पित कर घी का दीपक जलाना घर में सुख और शांति लाने वाला माना जाता है।</p>
<p><strong>शत्रु बाधा से राहत</strong><br />भोलेनाथ के समक्ष ‘ॐ शं शं शिवाय शं शं कुरु कुरु ॐ’ मंत्र का 11 बार जाप करने से विरोधियों से सुरक्षा मिलने की मान्यता है।</p>
<h5><span><strong>क्या न करें</strong></span></h5>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। शिवलिंग पर हल्दी अर्पित नहीं करनी चाहिए। जल चढ़ाते समय नारियल पानी का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसके अलावा सोमवार को काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचने की सलाह दी जाती है।सही विधि और मन से की गई पूजा ही सकारात्मक परिणाम देती है।</p>
<p>यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये सभी उपाय धार्मिक आस्था पर आधारित हैं और व्यक्ति अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार इन्हें अपनाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 09:59:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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                <title>आज का पंचांग: मोहिनी एकादशी व्रत आज, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल</title>
                                    <description><![CDATA[वैशाख शुक्ल एकादशी पर विशेष संयोग, दिनभर पूजा-अर्चना के लिए अनुकूल समय]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/todays-panchang-mohini-ekadashi-fast-know-the-auspicious-time-and/article-52170"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/aaj-ka-panchang-.-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>वैशाख मास की शुक्ल पक्ष एकादशी सोमवार को मनाई जा रही है, जिसे मोहिनी एकादशी के रूप में जाना जाता है। पंचांग के अनुसार आज पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र और ध्रुव योग का संयोग बन रहा है, जो धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। </p>
<p>आज एकादशी तिथि शाम 6 बजकर 15 मिनट तक प्रभावी रहेगी, जिसके बाद द्वादशी तिथि प्रारंभ होगी। इस दौरान श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि मोहिनी एकादशी का व्रत आध्यात्मिक शुद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।</p>
<p>पंचांग के मुताबिक, सूर्योदय सुबह 5:44 बजे और सूर्यास्त शाम 6:54 बजे होगा। चंद्रमा सिंह राशि में संचरण करेगा। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र रात 9:18 बजे तक रहेगा, इसके बाद उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र आरंभ होगा। ध्रुव योग रात 9:36 बजे तक प्रभावी रहेगा, जिसे स्थिरता और शुभता का प्रतीक माना जाता है।</p>
<p>आज के शुभ मुहूर्तों में अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:53 से 12:45 बजे तक रहेगा, जबकि अमृत काल दोपहर 2:41 से शाम 4:20 बजे तक है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:16 से 5:00 बजे तक रहेगा, जो पूजा और ध्यान के लिए उपयुक्त माना जाता है।</p>
<p>वहीं, अशुभ समय में राहुकाल सुबह 7:30 से 9:00 बजे तक रहेगा। इसके अलावा यमगंड सुबह 10:30 से दोपहर 12:00 बजे तक और गुलिक काल दोपहर 1:30 से 3:00 बजे तक रहेगा। इन समयों में शुभ कार्यों से परहेज करने की सलाह दी जाती है।</p>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मोहिनी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ा हुआ है। इस दिन व्रत और पूजा करने से जीवन में सकारात्मकता और मानसिक शांति प्राप्त होती है। सोमवार होने के कारण भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है।</p>
<p>एकादशी व्रत का पारण 28 अप्रैल को सुबह 5:43 से 8:21 बजे के बीच किया जाएगा। श्रद्धालुओं को निर्धारित समय के अनुसार व्रत पूर्ण करने की सलाह दी गई है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 08:36:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रविवार के उपाय : जानें पूजा विधि, मंत्र जाप और शुभ टोटके जो बढ़ाते हैं मान-सम्मान और सफलता</title>
                                    <description><![CDATA[सूर्य उपासना से जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रगति के संकेत; जानें सरल धार्मिक उपाय और सावधानियां]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/sundays-surya-remedies-2026-know-the-puja-method-mantra-chanting/article-52114"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/ravivaar-ke-upaye-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p>रविवार का दिन हिंदू धर्म में सूर्य देव की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार इस दिन की गई पूजा और साधना व्यक्ति के जीवन में मान-सम्मान, उत्तम स्वास्थ्य और कार्यक्षेत्र में सफलता के योग को मजबूत करती है। धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में रविवार को सूर्य उपासना को विशेष फलदायी बताया गया है।</p>
<p><strong>इस दिन का महत्व</strong><br />रविवार को सूर्य देव को सृष्टि की ऊर्जा और आत्मबल का स्रोत माना जाता है। इसी कारण इस दिन सूर्य आराधना को आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला माना गया है। विशेष रूप से वे लोग जो करियर या व्यापार में प्रगति चाहते हैं, उनके लिए यह दिन महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p><strong>कैसे करें सूर्य देव की पूजा</strong><br />धार्मिक परंपराओं के अनुसार रविवार की सुबह सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें लाल फूल, रोली और चावल मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। अर्घ्य देते समय “ॐ घृणि सूर्याय नमः” या “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करने की परंपरा है। इससे मानसिक स्थिरता और आत्मबल में वृद्धि होने की मान्यता है।</p>
<p><strong>दान और व्रत का महत्व</strong><br />रविवार के दिन गुड़, गेहूं, तांबे के बर्तन और लाल या नारंगी वस्त्रों का दान करने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। कई लोग रविवार का व्रत रखकर संयम और साधना का पालन करते हैं।</p>
<p><strong>विशेष टोटके और लोक मान्यताएं</strong><br />लोक परंपराओं में रविवार को घर के मुख्य द्वार पर देसी घी का दीपक जलाना शुभ माना गया है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है। आर्थिक समृद्धि के लिए कुछ लोग तिजोरी में बरगद का पत्ता रखने या जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा निभाते हैं। वहीं, बुरी नजर से बचाव के लिए नींबू और काले तिल से किए जाने वाले उपाय भी प्रचलित हैं।</p>
<p><strong>क्या न करें रविवार को</strong><br />मान्यताओं के अनुसार रविवार को नमक का अधिक सेवन, मांसाहार और नशे से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है। साथ ही बाल और नाखून काटने से भी परहेज करने की परंपरा बताई जाती है, हालांकि यह पूर्णतः धार्मिक विश्वासों पर आधारित है।</p>
<p>धार्मिक दृष्टि से सूर्य देव को स्वास्थ्य, ऊर्जा और आत्मबल का कारक माना गया है। इसी कारण रविवार की पूजा को जीवन में अनुशासन और सकारात्मकता लाने वाला माना जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि नियमित सूर्य उपासना से जीवन में स्थिरता और सफलता के मार्ग खुलते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 08:20:20 +0530</pubDate>
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