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                <title>MPHighCourt - दैनिक जागरण</title>
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                <title>14 लाख सालाना कमाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है, आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को इसका लाभ नहीं दिया जा सकता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wife-earning-rs-14-lakh-annually-will-not-get-maintenance/article-56792"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/maintenance-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से सक्षम और स्वयं पर्याप्त आय अर्जित करने वाले जीवनसाथी को अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) का लाभ नहीं दिया जा सकता। भोपाल निवासी एक महिला द्वारा पति से अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मांग प्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में वर्णित “एक पाउंड मांस” की मांग जैसी प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ में हुई। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तलाक से जुड़े लंबित मामले के दौरान अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और आय संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही माना और महिला की याचिका खारिज कर दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रकरण के अनुसार दंपति का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और वर्ष 2023 से वे अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद पत्नी ने अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की थी। सुनवाई के दौरान महिला ने स्वीकार किया कि वह एक निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और नियमित वेतन प्राप्त करती हैं। प्रारंभिक चरण में महिला ने अपनी वार्षिक आय करीब 20 लाख रुपए बताई थी, जबकि पति की आय 30 लाख रुपए से अधिक होने का दावा किया गया था। बाद में महिला की ओर से कहा गया कि उनकी आय में कमी आई है और वर्तमान में वह लगभग 14 लाख रुपए सालाना कमा रही हैं। इसी आधार पर उन्होंने आर्थिक सहायता की मांग की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि अदालत ने केवल मौखिक दावों पर भरोसा नहीं किया बल्कि वेतन संबंधी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि महिला की मासिक आय लगभग 1.25 लाख रुपए है। इस हिसाब से उनकी वार्षिक आय करीब 14.81 लाख रुपए बैठती है। न्यायालय ने माना कि यह आय किसी भी व्यक्ति के सामान्य जीवन-यापन और व्यक्तिगत खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य ऐसे जीवनसाथी को आर्थिक सहायता प्रदान करना है जो स्वयं अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो या आर्थिक रूप से दूसरे पक्ष पर निर्भर हो। यदि कोई व्यक्ति अच्छी आय अर्जित कर रहा है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है तो उसे केवल इस आधार पर मेंटिनेंस नहीं दिया जा सकता कि दूसरे पक्ष की आय उससे अधिक है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दंपति की कोई संतान नहीं है, जिसकी देखभाल का अतिरिक्त वित्तीय भार महिला पर हो। इसके अलावा पति और पत्नी की आय में भी इतना अधिक अंतर नहीं पाया गया जिससे आर्थिक निर्भरता या असमानता का गंभीर आधार बन सके। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण का प्रावधान किसी आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने के लिए नहीं बनाया गया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का उल्लेख भी किया। अदालत ने कहा कि जिस प्रकार नाटक में एक पाउंड मांस की मांग कानूनी और नैतिक सीमाओं के कारण पूरी नहीं की जा सकती थी, उसी तरह वर्तमान मामले में भी कानून की भावना के विपरीत जाकर राहत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा बन गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, जहां दोनों पक्ष आर्थिक रूप से सक्षम हों और फिर भी भरण-पोषण की मांग की जा रही हो। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसकी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंततः हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के 18 फरवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखा। न्यायालय ने दोहराया कि मेंटिनेंस का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है। यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त आय अर्जित कर रहा है और अपना खर्च स्वयं वहन करने में सक्षम है, तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 13:29:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में आज से नियमित सुनवाई शुरू, सभी बेंचें करेंगी काम</title>
                                    <description><![CDATA[समर वेकेशन समाप्त होने के बाद जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में फिर शुरू होगा नियमित न्यायिक कार्य, प्रशासनिक बदलावों की भी चर्चा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/somvati-amavasya-today-a-rare-coincidence-of-amrit-siddhi-yoga/article-55957"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/madhya-pradesh-high-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक महीने के ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद सोमवार से नियमित न्यायिक कार्य फिर शुरू हो गया है। जबलपुर स्थित मुख्यपीठ के साथ-साथ इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में भी सभी नियमित बेंचें अब पूर्व की तरह मामलों की सुनवाई करेंगी। लंबे अवकाश के बाद अदालतों में एक बार फिर सामान्य गतिविधियां लौटने से वकीलों, पक्षकारों और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है। पिछले एक महीने के दौरान केवल जरूरी और अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई हो रही थी, जबकि बड़ी संख्या में नियमित मामलों की सुनवाई अवकाश समाप्त होने का इंतजार कर रही थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस वर्ष हाईकोर्ट का समर वेकेशन 16 मई से शुरू होकर 14 जून तक चला। इस दौरान अदालत पूरी तरह बंद नहीं रही बल्कि विशेष व्यवस्था के तहत वेकेशन बेंचों का गठन किया गया था। इन बेंचों ने आवश्यक मामलों पर सुनवाई जारी रखी। हालांकि नियमित मामलों की संख्या काफी अधिक होने के कारण बड़ी संख्या में प्रकरण लंबित रहे, जिनकी सुनवाई अब शुरू होगी। न्यायिक हलकों में माना जा रहा है कि अवकाश के बाद शुरुआती दिनों में अदालतों में मामलों की संख्या सामान्य से अधिक रह सकती है क्योंकि बड़ी संख्या में लंबित याचिकाएं और अपीलें सूचीबद्ध की जाएंगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बार समर वेकेशन के दौरान सुनवाई की व्यवस्था भी कुछ अलग रही। आमतौर पर ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान वेकेशन बेंच सप्ताह में केवल दो दिन बैठती थी, लेकिन न्यायिक कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के उद्देश्य से इस बार नई व्यवस्था लागू की गई। विशेष बेंचों ने सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को सुनवाई की। अधिकारियों के अनुसार इस व्यवस्था का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला और कई अर्जेंट मामलों का समय पर निराकरण हो सका। साथ ही लंबित मामलों के दबाव को भी कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई की शुरुआत ऐसे समय हो रही है जब न्यायिक प्रशासन में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने के बाद हाईकोर्ट की जिम्मेदारी फिलहाल एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया संभाल रहे हैं। उनके नेतृत्व में अब नियमित बेंचों का संचालन किया जाएगा। न्यायिक समुदाय की नजरें इस बात पर भी टिकी हुई हैं कि आने वाले दिनों में प्रशासनिक स्तर पर क्या बदलाव किए जाते हैं और न्यायिक व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कौन से कदम उठाए जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंदौर खंडपीठ में भी जल्द प्रशासनिक फेरबदल देखने को मिल सकता है। इंदौर खंडपीठ के प्रशासनिक न्यायाधीश जस्टिस विजय कुमार शुक्ला इस महीने के अंत में सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। उनकी सेवानिवृत्ति से पहले और उसके बाद न्यायिक जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। न्यायिक सूत्रों का कहना है कि मुख्यपीठ से किसी वरिष्ठ न्यायाधीश को इंदौर भेजा जा सकता है ताकि प्रशासनिक कार्यों में निरंतरता बनी रहे। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस सुबोध अभ्यंकर के नाम संभावित प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए चर्चा में हैं। यदि ऐसा होता है तो इंदौर खंडपीठ के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव देखने को मिल सकता है। न्यायिक हलकों का मानना है कि प्रशासनिक पदों पर अनुभवी न्यायाधीशों की नियुक्ति से मामलों के प्रबंधन और न्यायिक कार्यों के संचालन में गति आएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने एक बड़ी चुनौती न्यायाधीशों के रिक्त पदों की भी है। वर्तमान में हाईकोर्ट में कुल 53 न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन सभी पद भरे नहीं हैं। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की सेवानिवृत्ति के बाद कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या और कम होकर 37 रह जाएगी। इसका मतलब है कि कुल 16 पद रिक्त हो जाएंगे। न्यायिक विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायाधीशों की कमी का सीधा असर मामलों के निपटारे की गति पर पड़ता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पहले से ही बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। ऐसे में रिक्त पदों को जल्द भरना आवश्यक माना जा रहा है।  यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं तो लंबित मामलों का बोझ और बढ़ सकता है। वहीं दूसरी ओर अदालतों में तकनीकी सुधार, ई-कोर्ट व्यवस्था और बेहतर केस मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए भी लंबित मामलों को कम करने की कोशिशें जारी हैं। समर वेकेशन समाप्त होने के साथ ही हाईकोर्ट की सभी नियमित बेंचों में कामकाज सामान्य हो गया है। पक्षकारों को अब अपने मामलों की सुनवाई के लिए नई तारीखों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और नियमित न्यायिक प्रक्रिया फिर से गति पकड़ती दिखाई दे रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 12:41:49 +0530</pubDate>
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