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                <title>Moon Worship - दैनिक जागरण</title>
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                <title>संकष्टी चतुर्थी 3 जुलाई को, जानिए व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[3 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी संकष्टी चतुर्थी, भगवान गणेश की पूजा, चंद्र दर्शन, व्रत विधि और शुभ मुहूर्त जानिए विस्तार से।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/know-the-auspicious-time-of-sankashti-chaturthi-fast-on-3rd/article-57452"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sankashti-chaturthi-2026-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी का पर्व भगवान श्री गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने और पूरे श्रद्धाभाव से व्रत रखने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी 3 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन देशभर के गणेश भक्त उपवास रखकर भगवान गणपति का पूजन करेंगे और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो जीवन में लगातार बाधाओं, आर्थिक परेशानियों, पारिवारिक तनाव या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हों। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 3 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर 4 जुलाई को दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर संकष्टी चतुर्थी का व्रत 3 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन शाम को भगवान गणेश की पूजा के बाद चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखने के बाद रात में चंद्र दर्शन करते हैं और फिर व्रत खोलते हैं। मंदिरों में भी विशेष पूजा-अर्चना और गणपति आरती का आयोजन किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">'संकष्टी' शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है संकटों से मुक्ति। वहीं 'चतुर्थी' का अर्थ है चंद्र पक्ष का चौथा दिन। इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी वह पावन अवसर माना जाता है जब भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी संकट दूर करते हैं। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके पूजन से ही होती है। इसलिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। घर के मंदिर या पूजा स्थल को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद दूर्वा घास, लाल फूल, सिंदूर, अक्षत, चंदन, धूप, दीप और मोदक का भोग अर्पित किया जाता है। भगवान गणेश के मंत्रों का जाप, गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशन स्तोत्र और गणेश चालीसा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार ग्रहण करते हैं। शाम के समय विशेष पूजा के बाद चंद्रमा को जल अर्पित कर व्रत का समापन किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को मोदक, लड्डू और तिल से बने प्रसाद का विशेष भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि गणेश जी को मोदक अत्यंत प्रिय हैं। पूजा के दौरान 21 दूर्वा, 21 लड्डू और लाल पुष्प अर्पित करने की भी परंपरा है। पूजा समाप्त होने के बाद परिवार के सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण करते हैं और भगवान गणेश से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक ग्रंथों में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन की कठिनाइयां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, व्यापारियों को कारोबार में उन्नति, नौकरीपेशा लोगों को करियर में प्रगति और परिवार को सुख-शांति प्राप्त होती है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति भी श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखते हैं। कई लोग इसे मानसिक शांति और आत्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का भी माध्यम मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सहित देश के कई राज्यों में संकष्टी चतुर्थी बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। विशेष रूप से महाराष्ट्र में गणपति मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। कई स्थानों पर सामूहिक आरती और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु पूरे परिवार के साथ भगवान गणेश के दर्शन करने पहुंचते हैं और मंगलकामनाएं करते हैं। जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी शुक्रवार को पड़ रही है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी अधिक माना जा रहा है। हालांकि यह अंगारकी संकष्टी चतुर्थी नहीं है, क्योंकि अंगारकी संकष्टी तब होती है जब यह व्रत मंगलवार को पड़ता है। फिर भी शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश दोनों की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालु इस दिन गणेश पूजा के साथ मां लक्ष्मी की आराधना भी कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी माध्यम है। इसलिए इस दिन क्रोध, झूठ, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भगवान गणेश का स्मरण करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों की सहायता, दान-पुण्य और गौ सेवा जैसे कार्य भी इस दिन शुभ माने जाते हैं। ऐसा करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।इस वर्ष 3 जुलाई को पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी पर देशभर के गणेश मंदिरों में विशेष आयोजन होंगे। श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से पूजा कर अपने जीवन से विघ्नों के निवारण और सुख-समृद्धि की कामना करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत भगवान गणेश को प्रसन्न करता है और भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा, सफलता और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:01:53 +0530</pubDate>
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                <title>चंद्र दर्शन 2026 आज: अमावस्या के बाद चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व, श्रद्धालु करेंगे व्रत और पूजा</title>
                                    <description><![CDATA[16 जून को मनाया जाएगा चंद्र दर्शन पर्व, चंद्र देव की आराधना से सुख, समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होने की मान्यता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/chandra-darshan-2026-today-after-amavasya-there-is-special-importance/article-56034"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chandra-darshan-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन का पर्व 16 जून 2026, मंगलवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार अमावस्या के बाद पहली बार चंद्रमा के दर्शन करने की परंपरा को चंद्र दर्शन कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि अमावस्या के अंधकार के बाद चंद्रमा के प्रथम दर्शन जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और शुभ फल लेकर आते हैं। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखते हैं और चंद्र देव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। चंद्रमा को मन, बुद्धि, भावनाओं और शांति का कारक माना गया है। नवग्रहों में भी चंद्रदेव का महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा मजबूत स्थिति में होता है, उन्हें जीवन में सुख, सम्मान और समृद्धि प्राप्त होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु चंद्र दर्शन के दिन उपवास रखकर चंद्रदेव से कृपा और आशीर्वाद की कामना करते हैं। बताया जाता है कि यह पर्व विशेष रूप से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और आर्थिक उन्नति से जुड़ा हुआ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 15 जून की सुबह 8 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 16 जून की सुबह 4 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। वहीं 16 जून को चंद्रमा का उदय सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर और अस्त रात 8 बजकर 50 मिनट पर होगा। हालांकि चंद्र दर्शन के लिए सबसे शुभ समय सूर्यास्त के बाद माना जाता है, जब श्रद्धालु आकाश में नवचंद्र के दर्शन कर पूजा संपन्न करते हैं। कई स्थानों पर परिवार के सदस्य एक साथ चंद्रमा को अर्घ्य देकर मंगलकामना करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करते हैं। शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद पूजा कर व्रत खोला जाता है। पूजा में चंदन, अक्षत, सफेद पुष्प, दूध और मिठाई का विशेष महत्व बताया गया है। कई श्रद्धालु चंद्रदेव के मंत्रों का जाप भी करते हैं। माना जाता है कि इससे मन की अशांति दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन के दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को चावल, चीनी, सफेद वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करने से शुभ फल प्राप्त होता है। कई लोग ब्राह्मणों को भोजन कराकर आशीर्वाद भी प्राप्त करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फलदायी होता है और व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं कम होती हैं। पौराणिक कथाओं में चंद्रदेव को अत्यंत पूजनीय माना गया है। उन्हें राजा दक्ष की 27 पुत्रियों का पति बताया गया है, जिन्हें 27 नक्षत्रों के रूप में जाना जाता है। वहीं बुध ग्रह को चंद्रदेव का पुत्र माना जाता है। चंद्रमा का संबंध प्रकृति, वनस्पति और जीव-जंतुओं के पोषण से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में चंद्रमा केवल एक खगोलीय पिंड नहीं बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन का पर्व उन लोगों के लिए विशेष लाभकारी माना जाता है, जो मानसिक तनाव, निर्णय लेने में कठिनाई या पारिवारिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। चंद्रदेव की आराधना से मन को स्थिरता और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। कई लोग इस दिन चंद्रमा को दूध मिश्रित जल अर्पित कर विशेष पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। देशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भी चंद्र दर्शन को लेकर विशेष आयोजन किए जाते हैं। श्रद्धालु शाम के समय मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और नवचंद्र के दर्शन कर अपने जीवन में सुख, शांति और सफलता की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या के बाद चंद्रमा के प्रथम दर्शन जीवन में नए अवसरों और सकारात्मक बदलावों का संकेत माने जाते हैं। इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व ऐसे समय में आ रहा है जब लोग आध्यात्मिकता और धार्मिक परंपराओं की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे में चंद्र दर्शन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक बन गया है। श्रद्धालुओं को विश्वास है कि चंद्रदेव की कृपा से उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 00:00:02 +0530</pubDate>
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