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                <title>BilaspurNews - दैनिक जागरण</title>
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                <title>बिलासपुर पुलिस व्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव, कमिश्नरेट सिस्टम पर सरकार का फोकस</title>
                                    <description><![CDATA[गृहमंत्री विजय शर्मा ने दिए संकेत, शहर और ग्रामीण पुलिसिंग होगी अलग, निर्णय प्रक्रिया होगी अधिक तेज और प्रभावी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/there-will-be-a-big-change-in-the-bilaspur-police/article-57299"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/bilaspur-police.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पुलिस व्यवस्था को लेकर जल्द बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा ने संकेत दिए हैं कि जिले के पुलिस फॉर्मेशन में व्यापक परिवर्तन करने की तैयारी चल रही है। उन्होंने कहा कि रायपुर में लागू पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और इसी अनुभव के आधार पर आने वाले समय में बिलासपुर सहित अन्य बड़े शहरों में भी इस व्यवस्था को लागू करने पर विचार किया जा रहा है। यदि यह प्रस्ताव अमल में आता है तो शहर की पुलिसिंग का पूरा ढांचा बदल जाएगा और कानून-व्यवस्था से जुड़े कई फैसले पहले की तुलना में अधिक तेजी से लिए जा सकेंगे। रविवार को बिलासपुर में आयोजित सराफा एसोसिएशन के महासम्मेलन में शामिल होने पहुंचे गृहमंत्री विजय शर्मा ने मीडिया से बातचीत के दौरान यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार पुलिस व्यवस्था को अधिक आधुनिक, प्रभावी और जवाबदेह बनाने की दिशा में काम कर रही है। बिलासपुर जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में बढ़ती आबादी, व्यापारिक गतिविधियों और अपराध के बदलते स्वरूप को देखते हुए नई व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस फॉर्मेशन में बदलाव का उद्देश्य केवल प्रशासनिक ढांचा बदलना नहीं, बल्कि आम लोगों को बेहतर और तेज पुलिस सेवाएं उपलब्ध कराना है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गृहमंत्री के इस बयान के बाद यह माना जा रहा है कि गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय स्तर पर बिलासपुर में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू करने को लेकर प्रारंभिक तैयारियां शुरू हो सकती हैं। हालांकि सरकार की ओर से अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन संकेत साफ हैं कि भविष्य में बिलासपुर की पुलिसिंग मौजूदा व्यवस्था से अलग तरीके से संचालित हो सकती है। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर कानून-व्यवस्था से जुड़े फैसलों पर पड़ेगा, जहां कई मामलों में पुलिस को प्रशासनिक अनुमति का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। नई व्यवस्था लागू होने के बाद पुलिस कमिश्नर को कई ऐसे अधिकार मिल सकते हैं, जो वर्तमान में जिला प्रशासन के पास होते हैं। इसमें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक आदेश जारी करना, विशेष परिस्थितियों में प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करना और कुछ प्रशासनिक निर्णय लेना शामिल हो सकता है। इससे अपराध नियंत्रण और आपात स्थिति में पुलिस की प्रतिक्रिया पहले की तुलना में अधिक तेज हो सकेगी। अधिकारियों का मानना है कि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया सरल होगी और समय की बचत भी होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गृहमंत्री विजय शर्मा ने सराफा व्यापारियों से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 317 के तहत चोरी का सामान मिलने पर कार्रवाई का प्रावधान है। व्यापारियों ने इस प्रक्रिया को अधिक सरल और स्पष्ट बनाने की मांग सरकार के सामने रखी है। इस संबंध में उन्होंने कहा कि सरकार इस विषय पर विचार करेगी और आवश्यक होने पर संबंधित विभागों से चर्चा के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा ताकि व्यापारियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े। प्रदेश में बढ़ते अपराधों को लेकर पूछे गए सवाल पर गृहमंत्री ने कहा कि सरकार हर आपराधिक घटना की लगातार समीक्षा कर रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि अपराध की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन पुलिस भी तेजी से कार्रवाई कर आरोपियों को गिरफ्तार कर रही है। उनके अनुसार कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है और इसी उद्देश्य से पुलिस तंत्र को लगातार मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि हर गंभीर मामले में पुलिस त्वरित कार्रवाई कर रही है और अपराधियों को कानून के दायरे में लाया जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यदि बिलासपुर में कमिश्नरेट प्रणाली लागू होती है तो शहर और ग्रामीण क्षेत्र की पुलिसिंग को अलग-अलग संचालित किया जाएगा। वर्तमान में पूरे जिले की जिम्मेदारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पास होती है, लेकिन नई व्यवस्था में शहरी क्षेत्र को अलग-अलग जोन में विभाजित किया जा सकता है। प्रत्येक जोन की जिम्मेदारी पुलिस उपायुक्त यानी डीसीपी स्तर के अधिकारी को सौंपी जाएगी। इससे थानों की निगरानी अधिक प्रभावी होगी और वरिष्ठ अधिकारी सीधे फील्ड में मौजूद रहकर कानून-व्यवस्था की समीक्षा कर सकेंगे। माना जा रहा है कि इससे अपराध पर नियंत्रण के साथ-साथ पुलिस की जवाबदेही भी बढ़ेगी। बिलासपुर को पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के लिए उपयुक्त शहर माना जा रहा है क्योंकि यह केवल जिला मुख्यालय नहीं, बल्कि प्रदेश का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और शैक्षणिक केंद्र भी है। यहां हाईकोर्ट, रेलवे जोन, विश्वविद्यालय, बड़े अस्पताल और कोचिंग संस्थानों के कारण हर दिन बड़ी संख्या में लोगों का आना-जाना रहता है। इसके अलावा शहर की लगातार बढ़ती आबादी और शहरी विस्तार के चलते पुलिस के सामने नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। सिविल लाइन, सरकंडा, कोनी जैसे क्षेत्रों में बढ़ते अपराध, साइबर अपराध, ऑनलाइन सट्टा और नशे से जुड़े मामलों ने भी पुलिस व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत महसूस कराई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 14:27:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पुलिस अफसरों के नाम पर युवक से एक लाख की ठगी, बिलासपुर में मामला दर्ज</title>
                                    <description><![CDATA[थाने में हुए विवाद के बाद परिवार को डराकर मांगे गए पांच लाख रुपए, एक आरोपी गिरफ्तार, दो अन्य की भूमिका की जांच जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/case-registered-in-bilaspur-for-cheating-a-young-man-of/article-56913"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/bilaspur-fraud-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पुलिस अधिकारियों के नाम पर ठगी का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि थाने में हुए एक विवाद के बाद युवक की घबराहट का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने उसके परिवार को डरा-धमकाकर पैसों की मांग की। आरोपियों ने खुद को प्रभावशाली लोगों से जुड़ा बताते हुए यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए बड़ी रकम देनी पड़ेगी। परिवार डर गया और एक लाख रुपए आरोपियों के बताए बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिए। रकम मिलने के बाद भी आरोपियों की मांग खत्म नहीं हुई और वे लगातार बाकी रकम के लिए दबाव बनाते रहे। मामले की शिकायत मिलने के बाद तारबाहर पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। एक आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है, जबकि अन्य आरोपियों की भूमिका की पड़ताल जारी है। पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार महासमुंद जिले के सरायपाली थाना क्षेत्र के ग्राम मोहदा निवासी रूपेश पटेल फोटोग्राफी का काम करता है। 19 जून को वह अपने निजी कार्य से बिलासपुर आया था। इसी दौरान उसकी परिचित महिलाओं भारती मिरे और नेहा पंत के साथ किसी बात को लेकर विवाद हो गया। विवाद बढ़ने पर सभी पक्ष तारबाहर थाने पहुंचे। बताया जा रहा है कि थाने का माहौल और संभावित कार्रवाई को लेकर रूपेश काफी घबरा गया था। इसी दौरान उसने अपने एक परिचित दोस्त सचिन मेहर को फोन कर पूरी स्थिति की जानकारी दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि सचिन मेहर ने यह जानकारी अपने परिचित सुमित देवांगन को दी। आरोप है कि दोनों ने मिलकर रूपेश की मानसिक स्थिति और डर का फायदा उठाने की योजना बनाई। शिकायत के मुताबिक आरोपियों ने रूपेश के परिवार से संपर्क किया और कहा कि मामला गंभीर है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस अधिकारियों और अन्य प्रभावशाली लोगों को संतुष्ट करने के लिए बड़ी रकम की जरूरत पड़ेगी। परिवार को यह विश्वास दिलाया गया कि यदि पैसे नहीं दिए गए तो रूपेश के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो सकती है। परिजनों के अनुसार आरोपियों ने शुरुआत में पांच लाख रुपए की मांग की थी। परिवार पहले से ही तनाव में था और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वास्तव में मामला कितना गंभीर है। इसी डर और दबाव के माहौल में परिवार ने आरोपियों की बातों पर भरोसा कर लिया। शिकायत में कहा गया है कि बाद में सुमित देवांगन द्वारा उपलब्ध कराए गए बैंक खाते में एक लाख रुपए ट्रांसफर कर दिए गए। परिवार को उम्मीद थी कि रकम देने के बाद मामला खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आरोप है कि एक लाख रुपए मिलने के बाद भी आरोपी लगातार रूपेश और उसके परिवार पर बाकी चार लाख रुपए देने का दबाव बनाते रहे। चार दिनों तक फोन कॉल और मैसेज के जरिए उनसे संपर्क किया गया। पैसे नहीं देने पर गंभीर परिणाम भुगतने और पुलिस कार्रवाई का डर दिखाया जाता रहा। इसी दौरान परिवार को संदेह हुआ कि उनके साथ धोखाधड़ी की जा रही है। जब उन्होंने मामले की गहराई से जानकारी जुटाने की कोशिश की तो कई बातें संदिग्ध नजर आईं। पीड़ित रूपेश पटेल ने बाद में सुमित देवांगन से सीधे पूछताछ की। आरोप है कि इस दौरान सुमित ने बताया कि 19 जून की शाम पांच से सात बजे के बीच प्राप्त एक लाख रुपए की राशि उसने चांपा निवासी महेंद्र देवांगन के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी थी। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया। पीड़ित ने पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को दी और कार्रवाई की मांग की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायत मिलने के बाद तारबाहर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। पुलिस ने सचिन मेहर और सुमित देवांगन सहित अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ धोखाधड़ी, धमकी और अवैध वसूली से जुड़ी धाराओं में केस दर्ज किया है। जांच के दौरान एक आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। पुलिस अब बैंक खातों के लेनदेन, मोबाइल कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर लोगों के डर और असमंजस का फायदा उठाया जाता है। किसी कानूनी या पुलिस मामले में फंसने की आशंका होने पर कई लोग बिना सत्यापन किए पैसों का लेनदेन कर बैठते हैं। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारियों के नाम पर पैसे मांगता है या किसी कार्रवाई को रोकने के बदले रकम देने का दबाव बनाता है, तो उसकी सूचना तुरंत पुलिस को दें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 14:41:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>लखनऊ अग्निकांड के बाद छत्तीसगढ़ में कार्रवाई तेज, 67 कोचिंग सेंटरों को नोटिस</title>
                                    <description><![CDATA[दुर्ग में 62 और बिलासपुर में 5 संस्थानों में मिली सुरक्षा खामियां, एक कोचिंग सेंटर सील; फायर सेफ्टी और इमरजेंसी एग्जिट पर विशेष फोकस]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/action-intensified-in-chhattisgarh-after-lucknow-fire-notice-to-67/article-56912"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-coaching-centers.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लखनऊ में कोचिंग सेंटर में हुई भीषण आग की घटना के बाद देशभर में शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के दुर्ग और बिलासपुर जिलों में प्रशासन ने कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे कोचिंग सेंटर सामने आए हैं, जहां बुनियादी सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जा रहा था। अधिकारियों ने इसे गंभीर मानते हुए कई संस्थानों को नोटिस जारी किए हैं, जबकि एक संस्थान को सील भी कर दिया गया है। दुर्ग जिले में बुधवार रात पुलिस और एसडीआरएफ की संयुक्त टीम ने अचानक निरीक्षण अभियान चलाया। करीब दो घंटे तक चले इस अभियान में शहर और आसपास के प्रमुख कोचिंग सेंटरों की जांच की गई। अधिकारियों के अनुसार निरीक्षण के दौरान अधिकांश संस्थानों में फायर सेफ्टी से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आईं। कहीं फायर एक्सटिंग्विशर की वैधता समाप्त हो चुकी थी तो कहीं उपकरण मौजूद होने के बावजूद उनका उपयोग योग्य तरीके से रखरखाव नहीं किया गया था। सबसे बड़ी चिंता इमरजेंसी एग्जिट की व्यवस्था को लेकर सामने आई। जांच में पाया गया कि अधिकांश कोचिंग संस्थानों में वैकल्पिक निकासी मार्ग नहीं थे। कई भवनों में केवल एक ही प्रवेश और निकास द्वार था। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी आपात स्थिति में ऐसी व्यवस्था छात्रों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। यही कारण है कि फायर सेफ्टी विभाग ने 62 कोचिंग सेंटरों को नोटिस जारी करते हुए कमियों को तत्काल दूर करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दुर्ग जिले में बड़ी संख्या में निजी कोचिंग संस्थान संचालित होते हैं। अनुमान के अनुसार यहां 150 से 200 के बीच प्रमुख कोचिंग सेंटर और ट्यूटोरियल संस्थान चल रहे हैं। इनमें से सबसे अधिक संस्थान भिलाई के न्यू सिविक सेंटर क्षेत्र में स्थित हैं। जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि कई कोचिंग सेंटरों में छात्रों की संख्या के मुकाबले जगह काफी कम थी। कुछ भवनों में इतनी संकरी सीढ़ियां थीं कि एक समय में केवल एक व्यक्ति ही ऊपर या नीचे जा सकता था। ऐसी स्थिति में किसी दुर्घटना के दौरान छात्रों को बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो सकता है। निरीक्षण टीम ने छात्रों और संस्थान संचालकों से भी बातचीत की। अधिकारियों ने सुरक्षा इंतजामों की जानकारी ली और यह समझने का प्रयास किया कि संस्थानों में आपातकालीन स्थिति से निपटने की क्या व्यवस्था है। कई जगह संचालक जांच शुरू होते ही फायर सेफ्टी उपकरणों की व्यवस्था करते दिखाई दिए। अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसका वास्तविक रूप से उपलब्ध होना भी जरूरी है। दूसरी ओर बिलासपुर में भी नगर निगम, पुलिस और दमकल विभाग की संयुक्त टीम ने कोचिंग सेंटरों का निरीक्षण किया। शहर के छह प्रमुख संस्थानों की जांच के दौरान पांच में सुरक्षा संबंधी कमियां पाई गईं। इनमें फायर सेफ्टी सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट, भवन अनुमति और अन्य आवश्यक दस्तावेजों से जुड़ी खामियां शामिल थीं। अधिकारियों ने सभी संबंधित संस्थानों को नोटिस जारी कर निर्धारित समय के भीतर जवाब देने और कमियां दूर करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बिलासपुर में निरीक्षण के दौरान एक कोचिंग सेंटर में गंभीर अनियमितताएं सामने आने पर उसे तत्काल प्रभाव से सील कर दिया गया। जांच में पाया गया कि भवन में प्रवेश और निकास के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। इसके अलावा छात्रों की संख्या के अनुपात में भवन की क्षमता भी संतोषजनक नहीं पाई गई। फायर सेफ्टी से जुड़े कई महत्वपूर्ण मानकों का पालन नहीं होने के कारण प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई की। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कई संस्थानों के पास आवश्यक लाइसेंस और भवन संबंधी स्वीकृतियां पूरी तरह उपलब्ध नहीं थीं। कुछ जगहों पर सुरक्षा उपकरणों की संख्या कम थी, जबकि कुछ संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था केवल औपचारिक रूप से दिखाई गई थी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि छात्र सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। हाल के वर्षों में कोचिंग संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन कई जगह सुरक्षा मानकों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। बड़ी संख्या में छात्र रोजाना इन संस्थानों में पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में आग, भूकंप या अन्य आपात स्थिति से निपटने की तैयारी बेहद आवश्यक हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित निरीक्षण और सुरक्षा ऑडिट से ऐसी संभावित घटनाओं को रोका जा सकता है। प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि यह अभियान केवल एक दिन की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में अन्य जिलों में भी कोचिंग सेंटरों और शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा जांच की जाएगी। जिन संस्थानों में कमियां पाई जाएंगी, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होगी। अधिकारियों का कहना है कि छात्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी संस्था को सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 14:41:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>12 साल पुराने सरपंच आत्महत्या मामले में ठेकेदार बरी, हाईकोर्ट ने 7 साल की सजा रद्द की</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि उधार दी गई रकम की मांग करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर नहीं है। अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/contractor-acquitted-in-12-year-old-sarpanch-suicide-case-high/article-56714"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh1.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 12 वर्ष पुराने एक चर्चित आत्महत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी ठहराए गए ठेकेदार की सात साल की सजा रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को उधार दी गई राशि वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या भुगतान के लिए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना अपने आप में आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला धमतरी जिले के बलियारा गांव का है, जहां जून 2014 में तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी का शव खेत में मिला था। जांच के दौरान यह सामने आया कि उन्होंने कथित रूप से कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या की थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में एक ठेकेदार का नाम दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">मृतक के परिजनों का आरोप था कि चौपाल निर्माण कार्य में उपयोग की गई सामग्री के भुगतान को लेकर आरोपी लगातार दबाव बना रहा था और मूल राशि से अधिक रकम की मांग कर रहा था। उनका कहना था कि इसी मानसिक दबाव के कारण सरपंच ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का दोषी मानते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।</p>
<h2>हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी</h2>
<p class="isSelectedEnd">अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकलपीठ ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और पूर्व न्यायिक निर्णयों का अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया या प्रेरित किया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">अदालत ने अपने आदेश में कहा कि लेनदार को अपनी राशि वापस मांगने का वैध अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति भुगतान के लिए संपर्क करता है या कानूनी विकल्प अपनाने की बात करता है तो इसे आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण साबित करने के लिए प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं।</p>
<h2>आर्थिक संकट भी बना कारण</h2>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि मृतक ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए बैंक से ऋण लिया था। ऋण की किस्तें जमा नहीं होने पर बैंक ने ट्रैक्टर जब्त कर उसकी नीलामी कर दी थी। रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख था कि बैंक का बकाया भुगतान मृतक पर लंबित था।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट ने माना कि आर्थिक संकट, बैंक का दबाव और संपत्ति जब्त होने जैसी परिस्थितियां भी व्यक्ति के मानसिक तनाव का कारण बन सकती हैं। इसलिए केवल आरोपी द्वारा पैसे मांगने को आत्महत्या का सीधा कारण नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd">अदालत ने एससी-एसटी एक्ट से जुड़े आरोपों पर भी विचार किया। फैसले में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि मृतक को उसकी जातीय पहचान के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित किया गया था। इसलिए इस कानून के तहत लगाए गए आरोप भी टिक नहीं सके।</p>
<p>सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी अशोक कुमार वाधवानी को दोषमुक्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा रद्द कर दी। साथ ही मृतक पक्ष की ओर से सजा बढ़ाने और एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग वाली अपील भी खारिज कर दी गई। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की आवश्यकता और कानूनी मानकों को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:44:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दैनिक जागरण]]></dc:creator>
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                <title>6 साल की देरी को हाईकोर्ट ने बताया प्रताड़ना, महिला पत्रकार को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[जांच और चार्जशीट में अनुचित देरी को अदालत ने प्रताड़ना माना, कहा- यह अनुच्छेद 21 के तहत मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a311c93a2d3f/article-56093"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि बिना किसी ठोस वजह के किसी आपराधिक मामले की जांच और चार्जशीट दाखिल करने में छह साल से ज्यादा की देरी करना आरोपी को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महिला पत्रकार श्रिया पांडेय के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट दोनों को निरस्त कर दिया। मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य की एजेंसियां किसी भी नागरिक को अनिश्चितकाल तक आपराधिक मुकदमे की तलवार के नीचे नहीं रख सकतीं। यदि जांच एजेंसी समय पर कार्रवाई नहीं करती और उसके पास देरी का कोई उचित कारण भी नहीं है, तो यह न्याय प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">यह मामला साल 2018 का है। याचिकाकर्ता श्रिया पांडेय उस समय बिलासपुर में एक न्यूज चैनल में रिपोर्टर के रूप में काम कर रही थीं। जून 2018 में पुलिसकर्मियों का आंदोलन चल रहा था। इसी दौरान यह सूचना मिली कि आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नी को महिला थाने में बैठाया गया है। खबर की पुष्टि करने और जानकारी लेने के लिए श्रिया पांडेय अपनी टीम के साथ देर रात महिला थाना पहुंचीं। आरोप है कि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने सहयोग करने के बजाय उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा डालने, पुलिसकर्मियों से मारपीट करने और मिलीभगत जैसे आरोप लगाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 186, 353, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया। पत्रकार का कहना था कि वह केवल एक रिपोर्टर के तौर पर तथ्य जुटाने गई थीं और उनके खिलाफ दर्ज मामला पुलिस की नाराजगी का परिणाम था।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">इस कार्रवाई के खिलाफ श्रिया पांडेय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि घटना जून 2018 की है, जबकि पुलिस ने चार्जशीट नवंबर 2024 में पेश की। यानी जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में छह साल से अधिक का समय लग गया। अदालत ने जब इस देरी का कारण पूछा तो पुलिस विभाग की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केस डायरी और चार्जशीट का अवलोकन करने से स्पष्ट होता है कि पूरा मामला केवल पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े गवाहों के बयानों पर आधारित है। घटना स्थल पर मौजूद किसी स्वतंत्र गवाह का बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि गवाहों के बयानों में आपसी विरोधाभास है और महिला पत्रकार के खिलाफ किसी भी अपराध का प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने यह भी माना कि लंबी देरी के कारण आरोपी को मानसिक और पेशेवर दोनों तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। खासतौर पर जब मामला किसी पत्रकार से जुड़ा हो, तो इसका असर उसकी प्रतिष्ठा और कामकाज पर भी पड़ता है। यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आपराधिक न्याय व्यवस्था में समयबद्ध जांच और अभियोजन की आवश्यकता पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि राज्य की जांच एजेंसियां अनिश्चितकाल तक मामलों को लंबित नहीं रख सकतीं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय की संवैधानिक जिम्मेदारी है। पत्रकार संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय उन मामलों में मिसाल बन सकता है जहां पत्रकारों या आम नागरिकों पर लंबे समय तक मुकदमे लटकाकर दबाव बनाया जाता है। अदालत के इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ है कि केवल पुलिस के बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य भी आवश्यक हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 15:27:49 +0530</pubDate>
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