<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.dainikjagranmpcg.com/court-order/tag-18725" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>दैनिक जागरण RSS Feed Generator</generator>
                <title>CourtOrder - दैनिक जागरण</title>
                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/tag/18725/rss</link>
                <description>CourtOrder RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>14 लाख सालाना कमाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है, आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को इसका लाभ नहीं दिया जा सकता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wife-earning-rs-14-lakh-annually-will-not-get-maintenance/article-56792"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/maintenance-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से सक्षम और स्वयं पर्याप्त आय अर्जित करने वाले जीवनसाथी को अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) का लाभ नहीं दिया जा सकता। भोपाल निवासी एक महिला द्वारा पति से अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मांग प्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में वर्णित “एक पाउंड मांस” की मांग जैसी प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ में हुई। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तलाक से जुड़े लंबित मामले के दौरान अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और आय संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही माना और महिला की याचिका खारिज कर दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रकरण के अनुसार दंपति का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और वर्ष 2023 से वे अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद पत्नी ने अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की थी। सुनवाई के दौरान महिला ने स्वीकार किया कि वह एक निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और नियमित वेतन प्राप्त करती हैं। प्रारंभिक चरण में महिला ने अपनी वार्षिक आय करीब 20 लाख रुपए बताई थी, जबकि पति की आय 30 लाख रुपए से अधिक होने का दावा किया गया था। बाद में महिला की ओर से कहा गया कि उनकी आय में कमी आई है और वर्तमान में वह लगभग 14 लाख रुपए सालाना कमा रही हैं। इसी आधार पर उन्होंने आर्थिक सहायता की मांग की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि अदालत ने केवल मौखिक दावों पर भरोसा नहीं किया बल्कि वेतन संबंधी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि महिला की मासिक आय लगभग 1.25 लाख रुपए है। इस हिसाब से उनकी वार्षिक आय करीब 14.81 लाख रुपए बैठती है। न्यायालय ने माना कि यह आय किसी भी व्यक्ति के सामान्य जीवन-यापन और व्यक्तिगत खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य ऐसे जीवनसाथी को आर्थिक सहायता प्रदान करना है जो स्वयं अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो या आर्थिक रूप से दूसरे पक्ष पर निर्भर हो। यदि कोई व्यक्ति अच्छी आय अर्जित कर रहा है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है तो उसे केवल इस आधार पर मेंटिनेंस नहीं दिया जा सकता कि दूसरे पक्ष की आय उससे अधिक है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दंपति की कोई संतान नहीं है, जिसकी देखभाल का अतिरिक्त वित्तीय भार महिला पर हो। इसके अलावा पति और पत्नी की आय में भी इतना अधिक अंतर नहीं पाया गया जिससे आर्थिक निर्भरता या असमानता का गंभीर आधार बन सके। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण का प्रावधान किसी आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने के लिए नहीं बनाया गया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का उल्लेख भी किया। अदालत ने कहा कि जिस प्रकार नाटक में एक पाउंड मांस की मांग कानूनी और नैतिक सीमाओं के कारण पूरी नहीं की जा सकती थी, उसी तरह वर्तमान मामले में भी कानून की भावना के विपरीत जाकर राहत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा बन गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, जहां दोनों पक्ष आर्थिक रूप से सक्षम हों और फिर भी भरण-पोषण की मांग की जा रही हो। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसकी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंततः हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के 18 फरवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखा। न्यायालय ने दोहराया कि मेंटिनेंस का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है। यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त आय अर्जित कर रहा है और अपना खर्च स्वयं वहन करने में सक्षम है, तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wife-earning-rs-14-lakh-annually-will-not-get-maintenance/article-56792</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wife-earning-rs-14-lakh-annually-will-not-get-maintenance/article-56792</guid>
                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 13:29:42 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-06/maintenance-case.jpg"                         length="194118"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>6 साल की देरी को हाईकोर्ट ने बताया प्रताड़ना, महिला पत्रकार को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[जांच और चार्जशीट में अनुचित देरी को अदालत ने प्रताड़ना माना, कहा- यह अनुच्छेद 21 के तहत मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a311c93a2d3f/article-56093"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि बिना किसी ठोस वजह के किसी आपराधिक मामले की जांच और चार्जशीट दाखिल करने में छह साल से ज्यादा की देरी करना आरोपी को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महिला पत्रकार श्रिया पांडेय के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट दोनों को निरस्त कर दिया। मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य की एजेंसियां किसी भी नागरिक को अनिश्चितकाल तक आपराधिक मुकदमे की तलवार के नीचे नहीं रख सकतीं। यदि जांच एजेंसी समय पर कार्रवाई नहीं करती और उसके पास देरी का कोई उचित कारण भी नहीं है, तो यह न्याय प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">यह मामला साल 2018 का है। याचिकाकर्ता श्रिया पांडेय उस समय बिलासपुर में एक न्यूज चैनल में रिपोर्टर के रूप में काम कर रही थीं। जून 2018 में पुलिसकर्मियों का आंदोलन चल रहा था। इसी दौरान यह सूचना मिली कि आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नी को महिला थाने में बैठाया गया है। खबर की पुष्टि करने और जानकारी लेने के लिए श्रिया पांडेय अपनी टीम के साथ देर रात महिला थाना पहुंचीं। आरोप है कि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने सहयोग करने के बजाय उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा डालने, पुलिसकर्मियों से मारपीट करने और मिलीभगत जैसे आरोप लगाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 186, 353, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया। पत्रकार का कहना था कि वह केवल एक रिपोर्टर के तौर पर तथ्य जुटाने गई थीं और उनके खिलाफ दर्ज मामला पुलिस की नाराजगी का परिणाम था।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">इस कार्रवाई के खिलाफ श्रिया पांडेय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि घटना जून 2018 की है, जबकि पुलिस ने चार्जशीट नवंबर 2024 में पेश की। यानी जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में छह साल से अधिक का समय लग गया। अदालत ने जब इस देरी का कारण पूछा तो पुलिस विभाग की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केस डायरी और चार्जशीट का अवलोकन करने से स्पष्ट होता है कि पूरा मामला केवल पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े गवाहों के बयानों पर आधारित है। घटना स्थल पर मौजूद किसी स्वतंत्र गवाह का बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि गवाहों के बयानों में आपसी विरोधाभास है और महिला पत्रकार के खिलाफ किसी भी अपराध का प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने यह भी माना कि लंबी देरी के कारण आरोपी को मानसिक और पेशेवर दोनों तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। खासतौर पर जब मामला किसी पत्रकार से जुड़ा हो, तो इसका असर उसकी प्रतिष्ठा और कामकाज पर भी पड़ता है। यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आपराधिक न्याय व्यवस्था में समयबद्ध जांच और अभियोजन की आवश्यकता पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि राज्य की जांच एजेंसियां अनिश्चितकाल तक मामलों को लंबित नहीं रख सकतीं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय की संवैधानिक जिम्मेदारी है। पत्रकार संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय उन मामलों में मिसाल बन सकता है जहां पत्रकारों या आम नागरिकों पर लंबे समय तक मुकदमे लटकाकर दबाव बनाया जाता है। अदालत के इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ है कि केवल पुलिस के बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य भी आवश्यक हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a311c93a2d3f/article-56093</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a311c93a2d3f/article-56093</guid>
                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 15:27:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-06/chhattisgarh-high-court-%282%29.jpg"                         length="177711"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        