<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.dainikjagranmpcg.com/heritage/tag-18769" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>दैनिक जागरण RSS Feed Generator</generator>
                <title>Heritage - दैनिक जागरण</title>
                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/tag/18769/rss</link>
                <description>Heritage RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अमेरिका आजादी के 250वें वर्ष पर दफन करेगा 408 किलो का टाइम कैप्सूल, 2276 में खुलेगा इतिहास का यह अनोखा संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[फिलाडेल्फिया के इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में 10 फीट नीचे रखा जाएगा विशेष टाइम कैप्सूल, जिसमें AI की भविष्यवाणी, ऐतिहासिक दस्तावेज, व्हेल की हड्डी और 50 राज्यों से चुनी गई यादगार वस्तुएं शामिल हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-will-bury-a-408-kg-time-capsule-on-the/article-57815"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/america-time-capsule.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">अमेरिका अपनी आजादी के 250 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक ऐसा कदम उठाने जा रहा है, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए इतिहास का अनमोल दस्तावेज बन सकता है। 4 जुलाई को फिलाडेल्फिया स्थित इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में करीब 408 किलो वजनी एक विशेष टाइम कैप्सूल जमीन के भीतर दफन किया जाएगा। इसे अब से ठीक 250 साल बाद यानी वर्ष 2276 में खोला जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य केवल कुछ वस्तुओं को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि 2026 के अमेरिका की सोच, तकनीक, संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना भी है। बताया जा रहा है कि इस टाइम कैप्सूल का रिकॉर्ड भी आधिकारिक रूप से दर्ज कर दिया गया है, ताकि आने वाले समय में इसकी सही पहचान और स्थान सुरक्षित रहे।</p>
<p>फिलाडेल्फिया को इस ऐतिहासिक पहल के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यही वह शहर है, जहां 4 जुलाई 1776 को अमेरिका के स्वतंत्रता घोषणा पत्र को मंजूरी मिली थी। इसी कारण इस स्थान को अमेरिकी लोकतंत्र और आजादी का प्रतीक माना जाता है। अधिकारियों के अनुसार, टाइम कैप्सूल में रखी गई वस्तुएं केवल सरकारी संस्थानों ने नहीं चुनीं, बल्कि देश के सभी 50 राज्यों और आम नागरिकों की भागीदारी से उनका चयन किया गया है। इनमें व्हेल की हड्डी, दुनिया के सबसे बड़े जिप्सम रेगिस्तान की रेत, राइट बंधुओं के ऐतिहासिक विमान का कपड़ा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI से जुड़ी भविष्यवाणियां, महत्वपूर्ण दस्तावेज और कई ऐसी वस्तुएं शामिल हैं, जो वर्तमान समय की पहचान मानी जाती हैं।</p>
<p>टाइम कैप्सूल एक ऐसा बंद कंटेनर होता है, जिसमें किसी खास दौर की वस्तुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसका मकसद भविष्य के लोगों को यह बताना होता है कि उस समय समाज कैसा था, लोग किस तरह का जीवन जीते थे और विज्ञान तथा तकनीक किस स्तर पर पहुंच चुके थे। यही वजह है कि इस बार तैयार किया गया अमेरिकी टाइम कैप्सूल केवल इतिहास का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की ओर से भविष्य के लोगों के लिए एक संदेश भी माना जा रहा है।</p>
<p>इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती टाइम कैप्सूल को तैयार करना नहीं, बल्कि उसे पूरे 250 वर्षों तक सुरक्षित बनाए रखना था। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने कई वर्षों तक शोध करने के बाद ऐसा डिजाइन तैयार किया, जो नमी, पानी, जंग और मौसम के प्रभाव से लंबे समय तक बचा रह सके। कैप्सूल को पारंपरिक चौकोर आकार की बजाय बेलनाकार बनाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चौकोर कंटेनरों के कोनों पर समय के साथ दबाव अधिक पड़ता है और वहीं से पानी अंदर जाने की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत बेलनाकार संरचना अधिक मजबूत और टिकाऊ मानी जाती है।</p>
<p>कैप्सूल को विशेष गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील से तैयार किया गया है, जिसका उपयोग वैज्ञानिक उपकरणों और अत्यधिक सुरक्षित संरचनाओं में किया जाता है। इसे पहले ही पूरी तरह सील किया जा चुका है और 4 जुलाई को केवल जमीन के भीतर स्थापित किया जाएगा। सीलिंग के लिए इंडियम नाम की विशेष धातु का इस्तेमाल किया गया है। यह धातु बेहद मुलायम होती है और ढक्कन बंद करते समय सबसे छोटी दरार को भी भर देती है। इससे हवा और पानी के प्रवेश की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।</p>
<p>वैज्ञानिकों ने कैप्सूल के भीतर नमी का स्तर भी सावधानी से नियंत्रित किया है। यदि नमी अधिक होती तो कागज और अन्य सामग्री खराब हो सकती थी, जबकि अत्यधिक सूखापन कुछ वस्तुओं को नुकसान पहुंचा सकता था। इसलिए इसके अंदर लगभग 35 प्रतिशत आर्द्रता बनाए रखी गई है। इसे करीब 10 फीट गहराई में दफनाया जाएगा, जहां तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहता है और मौसम के बदलाव का असर बहुत कम होता है।</p>
<p>इस टाइम कैप्सूल की सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त स्टील सिलेंडर भी लगाया जाएगा। दोनों परतों के बीच मौजूद हवा पानी को भीतर पहुंचने से रोकेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भविष्य में भूजल का स्तर बढ़ भी जाए या बाढ़ जैसी स्थिति बन जाए, तब भी यह संरचना लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती है। परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसी दिन इस कैप्सूल तक पानी पहुंच गया, तो इसका मतलब होगा कि पूरा क्षेत्र गंभीर प्राकृतिक संकट का सामना कर रहा होगा।</p>
<p>अमेरिका इस पहल के जरिए केवल अपनी उपलब्धियों को संरक्षित नहीं करना चाहता, बल्कि यह भी दिखाना चाहता है कि वर्ष 2026 का समाज किस तरह सोचता था और किन तकनीकों का उपयोग कर रहा था। यही कारण है कि इसमें सरकारी दस्तावेजों के साथ आम लोगों की ओर से चुनी गई वस्तुओं को भी समान महत्व दिया गया है। इससे भविष्य की पीढ़ियां उस दौर को केवल किताबों के माध्यम से नहीं, बल्कि वास्तविक वस्तुओं के जरिए भी समझ सकेंगी।</p>
<p>दुनिया में इससे पहले भी कई प्रसिद्ध टाइम कैप्सूल बनाए जा चुके हैं। अमेरिका का 'क्रिप्ट ऑफ सिविलाइजेशन' सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल है, जिसे लगभग 6,000 वर्षों तक बंद रखने की योजना बनाई गई है और इसे वर्ष 8113 में खोला जाएगा। वहीं 1939 में न्यूयॉर्क में दफन किया गया वेस्टिंगहाउस टाइम कैप्सूल भी भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है। भारत में भी 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान लाल किले के पास 'कलपात्र' नाम से टाइम कैप्सूल दफन किया गया था, जिसे बाद में नई सरकार बनने पर बाहर निकाल लिया गया। हालांकि उसमें मौजूद सामग्री को लेकर आज भी कई चर्चाएं होती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-will-bury-a-408-kg-time-capsule-on-the/article-57815</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-will-bury-a-408-kg-time-capsule-on-the/article-57815</guid>
                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/america-time-capsule.jpg"                         length="126291"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'क्षिप्रा' नहीं, 'शिप्रा' कहिए: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया नदी का वास्तविक नाम</title>
                                    <description><![CDATA[भोपाल में सिंहस्थ और नर्मदा परियोजना की समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सरकारी अभिलेखों और प्रस्तुतियों में नदी का मूल एवं प्रामाणिक नाम 'शिप्रा' ही लिखा जाए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/call-it-shipra-not-kshipra-chief-minister-mohan-yadav-told/article-57742"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/cm-mohan-yadav-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भोपाल में गुरुवार को आयोजित सिंहस्थ-2028 की तैयारियों और नर्मदा नदी परियोजना की समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शिप्रा नदी के नाम को लेकर अधिकारियों का ध्यान एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर आकर्षित किया। बैठक में प्रस्तुत किए गए प्रेजेंटेशन में नदी का नाम "क्षिप्रा" लिखा गया था। इसे देखते ही मुख्यमंत्री ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि नदी का वास्तविक, ऐतिहासिक और प्रामाणिक नाम "शिप्रा" है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि भविष्य में सभी सरकारी दस्तावेजों, प्रस्तुतियों और आधिकारिक अभिलेखों में "शिप्रा" नाम का ही उपयोग सुनिश्चित किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व रखने वाली नदियों के नामों को लेकर किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक स्तर पर भी ऐतिहासिक तथ्यों और प्रामाणिक स्रोतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक के दौरान अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि कई डिजिटल प्लेटफॉर्म, इंटरनेट स्रोतों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित प्रणालियों में नदी का नाम "क्षिप्रा" भी दर्ज है। अधिकारियों का कहना था कि इसी आधार पर प्रस्तुतीकरण में यह नाम शामिल किया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि आधुनिक तकनीक उपयोगी है, लेकिन केवल एआई या इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने अधिकारियों को सलाह दी कि ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों में मूल ग्रंथों और प्रामाणिक साहित्य का अध्ययन भी आवश्यक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषय पर निर्णय लेते समय तकनीकी स्रोतों के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान और प्रमाणित साहित्य का भी सहारा लिया जाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध संस्कृत काव्य <strong>'मेघदूतम्'</strong> तथा वैदिक ग्रंथों का अध्ययन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इन प्राचीन ग्रंथों में नदी का उल्लेख "शिप्रा" नाम से मिलता है, जो इसके मूल स्वरूप को प्रमाणित करता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत हजारों वर्षों पुरानी है और उसकी प्रमाणिकता प्राचीन साहित्य में सुरक्षित है। इसलिए प्रशासनिक निर्णय लेते समय उन स्रोतों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। बैठक में मौजूद अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के सुझाव के बाद उपलब्ध स्रोतों की दोबारा समीक्षा की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद अधिकारियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित माध्यमों से दोबारा जानकारी की पुष्टि की। पुनः जांच के दौरान एआई ने भी यह स्वीकार किया कि नदी का मूल नाम "शिप्रा" ही माना जाता है और पहले प्रस्तुत जानकारी पूरी तरह सटीक नहीं थी। इस घटनाक्रम के बाद अधिकारियों ने प्रस्तुतीकरण में आवश्यक संशोधन करने की सहमति जताई। मुख्यमंत्री ने कहा कि भविष्य में इस प्रकार की त्रुटियों से बचने के लिए तथ्यों का बहुस्तरीय सत्यापन किया जाना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि तकनीकी साधन सहायक हो सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय प्रमाणिक स्रोतों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने "शिप्रा" और "क्षिप्र" शब्दों के अर्थ भी समझाए। उन्होंने कहा कि संस्कृत में "क्षिप्र" का अर्थ होता है तेज गति से चलने वाला, जबकि "शिप्रा" का अर्थ शांत, सौम्य और संतुलित प्रवाह वाली नदी माना जाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि शिप्रा नदी अपने शांत स्वभाव और धार्मिक महत्व के कारण जानी जाती है। सामान्य परिस्थितियों में इसका प्रवाह संतुलित रहता है और यही इसकी विशेष पहचान भी है। उन्होंने कहा कि किसी नदी के नाम का संबंध केवल भाषा से नहीं बल्कि उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्वरूप से भी होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिप्रा नदी के नाम को लेकर यह पहली बार चर्चा नहीं हुई है। वर्ष 2016 के सिंहस्थ महापर्व से पहले भी "शिप्रा" और "क्षिप्रा" नामों को लेकर बहस सामने आई थी। उस समय भी विभिन्न प्रशासनिक दस्तावेजों और सार्वजनिक उपयोग में दोनों नाम देखने को मिले थे। धार्मिक विद्वानों और इतिहासकारों के बीच भी इस विषय पर अलग-अलग मत सामने आए थे। हालांकि अनेक प्राचीन ग्रंथों और साहित्यिक संदर्भों में "शिप्रा" नाम का उल्लेख प्रमुख रूप से मिलता है। मुख्यमंत्री के ताजा निर्देश के बाद एक बार फिर यह विषय चर्चा में आ गया है और माना जा रहा है कि आने वाले समय में सरकारी स्तर पर एकरूपता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक में सिंहस्थ-2028 की तैयारियों और नर्मदा परियोजना की प्रगति की भी विस्तार से समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने संबंधित विभागों को समयबद्ध कार्ययोजना के अनुसार सभी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि सिंहस्थ जैसे अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आयोजन के लिए आधारभूत संरचना, यातायात, पेयजल, स्वच्छता और अन्य व्यवस्थाओं को समय रहते पूरा करना आवश्यक है। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि सभी योजनाओं की नियमित समीक्षा की जाए ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। बैठक में विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी-अपनी परियोजनाओं की प्रगति रिपोर्ट भी प्रस्तुत की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/call-it-shipra-not-kshipra-chief-minister-mohan-yadav-told/article-57742</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/call-it-shipra-not-kshipra-chief-minister-mohan-yadav-told/article-57742</guid>
                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 10:53:24 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/cm-mohan-yadav-%282%29.jpg"                         length="246113"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जगदीशपुर किले में होगी कैबिनेट बैठक, राष्ट्रीय पहचान दिलाने की तैयारी में सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री मोहन यादव ने संस्कृति विभाग को दिए निर्देश, कलाकारों और पद्म पुरस्कार विजेताओं के लिए नई योजनाओं पर भी जोर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/cabinet-meeting-will-be-held-in-jagdishpur-fort-government-is/article-56106"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jagdishpur-fort.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रही है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल के निकट स्थित ऐतिहासिक जगदीशपुर किले को देशभर में नई पहचान दिलाने के लिए वहां जल्द ही राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक आयोजित करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री का मानना है कि इस पहल से न केवल क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास को नई पहचान मिलेगी, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। संस्कृति विभाग की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि जगदीशपुर के ऐतिहासिक महत्व को व्यापक स्तर पर प्रचारित किया जाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश की ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को केवल स्थानीय पहचान तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थापित करने के प्रयास होने चाहिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि जगदीशपुर किले से जुड़े इतिहास, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत को लोगों तक पहुंचाने के लिए विशेष योजना तैयार की जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि जगदीशपुर में प्रस्तावित कैबिनेट बैठक केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं होगी, बल्कि इसके माध्यम से प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का संदेश भी दिया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बैठक के आयोजन से जुड़ी सभी व्यवस्थाएं समय पर पूरी की जाएं और इस अवसर को प्रदेश की विरासत के प्रचार-प्रसार के रूप में उपयोग किया जाए। गौरतलब है कि कुछ समय पहले इस्लाम नगर का नाम बदलकर जगदीशपुर किया गया था। इसके बाद से ही राज्य सरकार इस क्षेत्र को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष पहचान दिलाने की दिशा में काम कर रही है। माना जा रहा है कि कैबिनेट बैठक के आयोजन से जगदीशपुर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन सकता है। इससे क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री ने बैठक में संस्कृति संरक्षण से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कलाकारों, साहित्यकारों, समाजसेवियों और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करने की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने संस्कृति विभाग को निर्देश दिया कि पद्म पुरस्कारों के लिए भेजे जाने वाले प्रस्तावों में विभाग भी सक्रिय भूमिका निभाए और योग्य प्रतिभाओं की पहचान कर अपनी अनुशंसा केंद्र सरकार को भेजे। डॉ. यादव ने कहा कि मध्य प्रदेश प्रतिभाओं की भूमि है और यहां के अनेक कलाकारों ने राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। ऐसे कलाकारों की सूची तैयार कर उन्हें प्रदेश में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इससे नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी और प्रदेश की कला एवं संस्कृति को नई ऊर्जा प्राप्त होगी। बैठक में पद्म पुरस्कार विजेताओं को आर्थिक सहयोग प्रदान करने के लिए एक स्थायी योजना तैयार करने पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि जिन लोगों ने अपने कार्यों के माध्यम से प्रदेश और देश का नाम रोशन किया है, उनके सम्मान और सहयोग के लिए दीर्घकालिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। इससे प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिलेगा और समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मध्य प्रदेश में जन्मे या यहां से जुड़े ऐसे कलाकारों, गायकों और सांस्कृतिक हस्तियों का डाटा तैयार किया जाए जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान बनाई है। उन्हें समय-समय पर प्रदेश में आयोजित कार्यक्रमों में शामिल किया जाए ताकि स्थानीय कलाकारों को भी उनसे सीखने और प्रेरणा लेने का अवसर मिल सके। बैठक में धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में कई ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल हैं जिनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत की जा सकती है। यदि इन स्थलों का व्यवस्थित विकास किया जाए तो पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि संस्कृति और पर्यटन विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें ताकि प्रदेश की विरासत को व्यापक पहचान मिल सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक में मुख्य सचिव सहित संस्कृति विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। अधिकारियों ने विभाग की विभिन्न योजनाओं और प्रस्तावों की जानकारी मुख्यमंत्री को दी। इस दौरान जगदीशपुर में कैबिनेट बैठक आयोजित करने की रूपरेखा पर भी चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करना और उन्हें नई पहचान दिलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। यदि जगदीशपुर में कैबिनेट बैठक आयोजित होती है तो इससे क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। साथ ही प्रदेश सरकार की सांस्कृतिक संरक्षण और विरासत संवर्धन की नीति को भी मजबूती मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/cabinet-meeting-will-be-held-in-jagdishpur-fort-government-is/article-56106</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/cabinet-meeting-will-be-held-in-jagdishpur-fort-government-is/article-56106</guid>
                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 16:29:56 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-06/jagdishpur-fort.jpg"                         length="140176"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        