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                <title>Constitution - दैनिक जागरण</title>
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                <title>2029 तक ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करने की तैयारी तेज, जेपीसी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की दिशा में आगे</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त संसदीय समिति का दावा- अधिकांश लोगों ने किया समर्थन, राज्यों से सुझाव लेकर तैयार हो रहा रोडमैप; संवैधानिक संशोधन और राजनीतिक सहमति होगी सबसे बड़ी चुनौती]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/preparation-to-implement-one-nation-one-election-by-2029-intensifies/article-58506"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/one-nation-one-election-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश में लंबे समय से चर्चा का विषय बने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की दिशा में केंद्र सरकार और संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) तेजी से आगे बढ़ रही है। समिति का लक्ष्य वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस व्यवस्था को लागू करने की संभावनाओं को मजबूत करना है। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा है कि अब तक हुई बैठकों और विचार-विमर्श में शामिल लगभग 99 प्रतिशत लोगों, संगठनों और विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। </p>
<p style="text-align:justify;">जेपीसी ने हाल ही में गोवा का दौरा कर मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्यों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से इस विषय पर चर्चा की। समिति के सदस्य और सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों का प्रभाव छोटे राज्यों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि गोवा जैसे छोटे राज्य में चुनावी प्रक्रिया का प्रशासनिक और आर्थिक असर इतना अधिक है, तो बड़े राज्यों और पूरे देश पर इसका प्रभाव और भी व्यापक होता है। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी और सरकारें विकास कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति का अगला दौरा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रस्तावित है। यहां मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेताओं, विभिन्न राजनीतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों और विशेषज्ञों से विस्तृत चर्चा की जाएगी। इसके बाद समिति 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर संसद में पेश करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार आगे की रणनीति तय करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मूल उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने के बजाय एक निर्धारित चुनावी चक्र के तहत एक साथ कराना है। समर्थकों का मानना है कि इससे चुनावों पर होने वाला भारी सरकारी खर्च कम होगा, बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे और प्रशासनिक मशीनरी का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है। इसके लिए संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार अनुच्छेद 83, 172 और 356 सहित कई संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव आवश्यक होगा। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ देश के कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होगी। यही कारण है कि सरकार राजनीतिक सहमति बनाने पर विशेष जोर दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे बड़ा सवाल उन राज्यों को लेकर है जिनकी विधानसभा का कार्यकाल वर्ष 2029 के बाद तक रहेगा। ऐसे राज्यों के कार्यकाल को समय से पहले समाप्त कर साझा चुनावी चक्र में शामिल करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। वहीं जिन राज्यों का कार्यकाल 2029 से पहले समाप्त होगा, वहां सीमित अवधि के लिए चुनाव कराने या अन्य संवैधानिक विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। यदि किसी राज्य की सरकार बीच कार्यकाल में गिर जाती है, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मध्यावधि चुनाव केवल शेष कार्यकाल के लिए कराए जाने की संभावना है, ताकि निर्धारित चुनावी चक्र प्रभावित न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार इस व्यवस्था को लागू करने के लिए 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' पर भी विचार कर रही है। इस मॉडल के तहत पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के बजाय इसे दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में वर्ष 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ लगभग 20 राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। इसके बाद वर्ष 2034 तक शेष राज्यों को भी इसी चुनावी चक्र में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इस मॉडल से विधानसभाओं के कार्यकाल में अत्यधिक कटौती या विस्तार की आवश्यकता कम होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस विषय पर संवैधानिक विशेषज्ञ भी अपनी राय दे रहे हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान में इस दिशा में बदलाव की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है, लेकिन व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना इसे लागू करना कठिन होगा। अतीत में भी विशेष परिस्थितियों में लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल में परिवर्तन किए जा चुके हैं। इसलिए कानूनी दृष्टि से यह पूरी तरह असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए संसद और राज्यों के बीच सहमति आवश्यक होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने करीब 191 दिनों तक विभिन्न विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, संवैधानिक संस्थाओं और अन्य हितधारकों से चर्चा की। विस्तृत अध्ययन के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी। अब उसी रिपोर्ट और जेपीसी की सिफारिशों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में स्वतंत्रता के बाद शुरुआती चार आम चुनावों तक लोकसभा और अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में यह व्यवस्था बनी रही। लेकिन 1967 के बाद कई राज्यों में सरकारें समय से पहले गिरने लगीं। 1968 और 1969 में कई विधानसभाएं भंग हुईं, जबकि 1970 में लोकसभा भी अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दी गई। इसके बाद चुनावों का साझा चक्र टूट गया और अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 17:50:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>स्कूलों में मंत्रोच्चार पर याचिका खारिज, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सबूत के साथ दोबारा आने को कहा</title>
                                    <description><![CDATA[राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने फिलहाल हस्तक्षेप से इनकार किया, कहा- आदेश लागू होने के ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/chhattisgarh-high-court-rejects-petition-on-chanting-in-schools-asks/article-57670"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(7).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में मंत्रोच्चार कराए जाने संबंधी राज्य शासन के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका फिलहाल खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसे कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि संबंधित आदेश का वास्तव में स्कूलों में पालन शुरू हो चुका है। ऐसे में न्यायालय ने इस स्तर पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि भविष्य में आदेश के अमल से जुड़े ठोस प्रमाण सामने आते हैं तो याचिकाकर्ता नई याचिका दाखिल कर सकते हैं। इस फैसले के बाद फिलहाल इस मुद्दे पर कानूनी राहत नहीं मिली है, लेकिन अदालत ने भविष्य के लिए कानूनी रास्ता खुला रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलमान रिज़वी की ओर से दायर की गई थी। याचिका में राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें स्कूलों में मंत्रोच्चार कराए जाने का प्रावधान बताया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह आदेश संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि इस आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त किया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डॉ. अमीर खान ने पक्ष रखा और कहा कि इस आदेश से संविधान के मूल प्रावधान प्रभावित होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सबसे पहले इस बात पर जोर दिया कि अदालत किसी भी प्रशासनिक आदेश में तभी हस्तक्षेप करती है, जब उसके लागू होने या उससे प्रभावित होने के स्पष्ट और ठोस प्रमाण उपलब्ध हों। अदालत ने कहा कि मौजूदा याचिका में ऐसे दस्तावेज, वीडियो या अन्य सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे यह साबित हो सके कि राज्य सरकार का आदेश वास्तव में स्कूलों में लागू किया जा चुका है। केवल आशंका या संभावना के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। इसी कारण अदालत ने फिलहाल याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिवक्ता डॉ. अमीर खान के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल में इस आदेश का पालन कराए जाने के प्रमाण सामने आते हैं, तो याचिकाकर्ता उन साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर रखकर दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वीडियो, फोटो, आधिकारिक दस्तावेज या अन्य विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध होती है, तो उसके आधार पर नई याचिका पर विचार किया जा सकता है। इस टिप्पणी को मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत ने कानूनी चुनौती का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले के बाद फिलहाल राज्य सरकार के आदेश पर कोई न्यायिक रोक नहीं लगी है। हालांकि अदालत ने आदेश की वैधता पर कोई अंतिम टिप्पणी भी नहीं की है। न्यायालय का पूरा फोकस इस बात पर रहा कि याचिका में प्रस्तुत तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने इस मामले में प्रक्रिया संबंधी सिद्धांतों का पालन करते हुए फैसला दिया है। किसी भी नीति या प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने के लिए उसके प्रभाव या क्रियान्वयन के पर्याप्त प्रमाण होना आवश्यक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था और धार्मिक गतिविधियों को लेकर एक नई बहस भी छेड़ दी है। एक पक्ष का मानना है कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़े कार्यक्रम स्कूलों में कराए जा सकते हैं, जबकि दूसरा पक्ष इसे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संदर्भ में देख रहा है। हालांकि इन सभी मुद्दों पर हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की और केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर केवल याचिका की स्वीकार्यता पर विचार कर रही थी, न कि आदेश की संवैधानिक वैधता पर। भविष्य में यदि किसी स्कूल में आदेश के पालन के प्रमाण सामने आते हैं और उसके आधार पर नई याचिका दायर होती है, तो अदालत उस समय मामले के संवैधानिक पहलुओं पर भी विस्तार से विचार कर सकती है। फिलहाल इस फैसले से यह संदेश गया है कि न्यायालय केवल अनुमान या आशंका के आधार पर हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि ठोस तथ्यों और साक्ष्यों को प्राथमिकता देगा। यही वजह है कि याचिकाकर्ता को दोबारा याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता भी दी गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 17:22:30 +0530</pubDate>
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                <title>आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[याचिका में कहा गया- आधार केवल पहचान का दस्तावेज, नागरिकता, निवास और जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करना कानून के खिलाफ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/question-on-considering-aadhaar-as-proof-of-citizenship-supreme-court/article-56124"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/aadhaar-card.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश में आधार कार्ड के इस्तेमाल को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि आधार कार्ड का उपयोग केवल पहचान साबित करने के लिए किया जाए और इसे नागरिकता, निवास, पते या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए। अदालत के इस कदम ने आधार की कानूनी स्थिति और उसके विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में उपयोग को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने की। याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 स्पष्ट रूप से बताती है कि आधार संख्या किसी व्यक्ति को नागरिकता या निवास का अधिकार प्रदान नहीं करती और न ही इसे नागरिकता या डोमिसाइल का प्रमाण माना जा सकता है। याचिकाकर्ता ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) की अगस्त 2023 की अधिसूचना का भी उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया था कि आधार केवल पहचान का प्रमाण है, न कि नागरिकता, पते या जन्मतिथि का प्रमाण।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून और अधिसूचनाओं में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद देश के कई हिस्सों में आधार कार्ड को उम्र, निवास और नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इसके तहत स्कूलों में प्रवेश, संपत्ति की खरीद-बिक्री, जन्म प्रमाण पत्र बनवाने, राशन कार्ड हासिल करने और ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने जैसी प्रक्रियाओं में आधार का उपयोग किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे कानून की मूल भावना प्रभावित हो रही है और आधार की सीमाओं का उल्लंघन हो रहा है। याचिका में विशेष रूप से नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 का भी उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि इस फॉर्म में आधार को जन्मतिथि और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) के तहत आधार का उपयोग केवल पहचान स्थापित करने के लिए किया जा सकता है, न कि उम्र या निवास साबित करने के लिए। इसलिए फॉर्म-6 में इस तरह का उपयोग कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आधार कार्ड प्राप्त करने के लिए भारतीय नागरिक होना आवश्यक नहीं है। आधार अधिनियम के अनुसार कोई भी निवासी, जिसने एक निर्धारित अवधि तक भारत में निवास किया हो, आधार संख्या प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने चिंता जताई है कि विदेशी नागरिक, अवैध प्रवासी या घुसपैठिए भी आधार प्राप्त कर सकते हैं और बाद में अन्य दस्तावेज हासिल करने में इसका उपयोग कर सकते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि इसी प्रक्रिया के जरिए कुछ लोग मतदाता पहचान पत्र और अन्य सरकारी दस्तावेज प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता ने अदालत से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की है कि आधार कार्ड को केवल पहचान के दस्तावेज के रूप में ही इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार करने की व्यवस्था को भी रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था आधार अधिनियम, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 14 की भावना के विपरीत है। मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार अवैध आव्रजन और घुसपैठ का असर चुनावी व्यवस्था, जनसांख्यिकीय संतुलन और सुरक्षा संबंधी मामलों पर पड़ सकता है। इसी कारण आधार के उपयोग की सीमा को स्पष्ट रूप से तय करना जरूरी है। हालांकि इन दावों पर अंतिम निर्णय अभी अदालत को करना है और केंद्र तथा राज्यों के जवाब के बाद ही मामले की विस्तृत सुनवाई आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस मामले पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले समय में अदालत का फैसला आधार कार्ड के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है। यह मामला केवल एक दस्तावेज के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि पहचान, नागरिकता, चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने ला रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:16 +0530</pubDate>
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