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                <title>NDA Politics - दैनिक जागरण</title>
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                <title>उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका, शिवसेना (UBT) के 6 सांसद बागी; पार्टी में फिर मचा सियासी भूचाल</title>
                                    <description><![CDATA[लोकसभा स्पीकर को विलय की चिट्ठी भेजे जाने का दावा, संजय राउत के तीखे बयान से बढ़ा राजनीतिक विवाद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-blow-to-uddhav-thackeray-6-mps-from-shiv-sena/article-56232"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/shiv-sena-ubt-rebellion.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को उस समय बड़ा झटका लगा, जब पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों के बागी होने की खबरें सामने आईं। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय की इच्छा जताई है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है बताया जा रहा है कि बुधवार सुबह करीब 9:30 बजे बागी सांसदों की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजा गया। इस पत्र में संसदीय दल के विलय से जुड़ी मांग रखी गई है। जिन सांसदों के नाम चर्चा में हैं उनमें नागेश पाटिल आष्टीकर और संजय दीना पाटिल भी शामिल बताए जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि संजय दीना पाटिल ने कुछ घंटे पहले ही पार्टी छोड़ने की खबरों का खंडन किया था और खुद को उद्धव ठाकरे के साथ बताया था। इसके बाद अचानक उनके नाम के बागी सांसदों की सूची में शामिल होने की खबर ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया। दिल्ली और मुंबई के राजनीतिक गलियारों में पिछले कई दिनों से ऐसी अटकलें चल रही थीं कि शिवसेना (UBT) के कुछ सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं। हालांकि पार्टी की ओर से लगातार इन खबरों को खारिज किया जाता रहा। इस बीच दिल्ली में सांसदों की गतिविधियों और अलग-अलग बैठकों ने राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए थे। अब छह सांसदों के एक साथ अलग होने की खबर सामने आने के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम के बीच शिवसेना (UBT) के प्रमुख नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत की प्रतिक्रिया भी चर्चा का विषय बन गई। दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने बागी सांसदों पर तीखा हमला बोला। राउत ने नाराजगी जाहिर करते हुए कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया । उनके बयान के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया। विपक्षी दलों और सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने उनके शब्दों पर सवाल उठाए, जबकि राउत ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि मराठी भाषा और बोलचाल में इस तरह के शब्द कई बार सामान्य रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं। यदि छह सांसदों का अलग होना आधिकारिक रूप से साबित होता है तो यह उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए पिछले चार वर्षों में दूसरा बड़ा झटका होगा। इससे पहले जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के 39 विधायकों ने बगावत कर दी थी। उस बगावत ने न केवल महाराष्ट्र की तत्कालीन महाविकास अघाड़ी सरकार को गिरा दिया था, बल्कि शिवसेना की राजनीतिक दिशा भी पूरी तरह बदल दी थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">2022 के घटनाक्रम के बाद चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को दे दिया था। इसके बाद उद्धव ठाकरे को नए नाम और नए चुनाव चिन्ह के साथ राजनीतिक संघर्ष शुरू करना पड़ा। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन अब सांसदों के संभावित टूटने की खबरें संगठन के लिए नई चुनौती बनकर सामने आई हैं महाराष्ट्र में बदलते समीकरणों का असर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। यदि सांसदों का एक बड़ा वर्ग शिंदे गुट के साथ जाता है तो इससे संगठनात्मक ढांचे और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर प्रभाव पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ गठबंधन इसे अपनी राजनीतिक मजबूती के रूप में देख रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस घटनाक्रम की एक और खास बात यह है कि हाल के महीनों में देश की राजनीति में दल-बदल और राजनीतिक पुनर्संरचना की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के कई सांसद और विधायक नए राजनीतिक विकल्प तलाशते दिखाई दिए हैं। पिछले तीन महीनों के दौरान विपक्षी दलों के करीब 27 सांसद अलग-अलग कारणों से अपने मूल दल से दूरी बनाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के करीब पहुंचे हैं। इनमें आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के नाम भी चर्चा में रहे हैं। हालांकि शिवसेना (UBT) की ओर से अब भी यह दावा किया जा रहा है कि पार्टी मजबूत है और संगठन में किसी तरह की कमजोरी नहीं आई है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि वे अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ मजबूती से खड़े हैं। दूसरी ओर शिंदे गुट के नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम पर संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि जो भी नेता विकास और स्थिरता की राजनीति करना चाहता है, उसका स्वागत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:41:34 +0530</pubDate>
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                <title>तृणमूल के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़ एनसीपीआई में किया विलय</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीपीआई में शामिल होकर बगावती सांसदों ने साधा संवैधानिक दांव, भाजपा से सीधा जुड़ाव टालने के पीछे भी रही राजनीतिक रणनीति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/20-trinamool-mps-left-the-party-and-merged-with-ncpi/article-56133"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/trinamool-congress.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के एक साथ पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करने के फैसले ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पहली नजर में यह फैसला चौंकाने वाला लग सकता है क्योंकि जिस पार्टी में इन सांसदों ने विलय किया है, वह राष्ट्रीय स्तर पर लगभग अज्ञात राजनीतिक संगठन मानी जाती है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी रणनीति भी जुड़ी हुई बताई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष एनसीपीआई में विलय का दावा पेश किया। यह संख्या तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है। यही आंकड़ा इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए यह रास्ता चुना, क्योंकि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में केवल दो-तिहाई सदस्यों के साथ किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय ही उन्हें अयोग्यता से बचा सकता है। एनसीपीआई की बात करें तो यह पार्टी त्रिपुरा में पंजीकृत है, लेकिन अभी तक राष्ट्रीय राजनीति में उसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं रहा है। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सीमित स्तर पर चुनाव लड़ा था और उसे बेहद कम वोट मिले थे। इसके बावजूद अब अचानक यह पार्टी लोकसभा में 20 सांसदों के साथ चर्चा के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बागी सांसदों ने इतनी छोटी पार्टी को ही क्यों चुना। शुरुआत में सांसदों के बीच अलग राजनीतिक समूह बनाने पर भी चर्चा हुई थी। लेकिन दल-बदल कानून की मौजूदा व्यवस्था के तहत ऐसा करना आसान नहीं था। यदि सांसद अलग समूह बनाते तो उन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता था। यही वजह रही कि उन्होंने विलय का विकल्प चुना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ की पृष्ठभूमि इस फैसले को समझने में अहम भूमिका निभाती है। जब यह कानून 1985 में लागू हुआ था तब इसमें एक-तिहाई विधायकों या सांसदों के समर्थन से अलग समूह बनाने की छूट थी। लेकिन बाद के वर्षों में इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ। कई राज्यों और केंद्र की राजनीति में नेताओं ने बार-बार दल बदलकर सरकारों की दिशा बदल दी। इसे देखते हुए वर्ष 2003 में कानून में संशोधन किया गया और अलग समूह बनाने वाली व्यवस्था समाप्त कर दी गई। संशोधन के बाद केवल एक ही रास्ता बचा, जिसमें किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर सकते हैं। इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का फैसला किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पूरी तरह संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें सामने आती रही थीं कि बागी सांसद भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं। अटकलें लगाई जा रही थीं कि वे सीधे भाजपा में शामिल हो सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। इसके पीछे भी राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रही हैं। ऐसे में यदि सांसद सीधे भाजपा में शामिल हो जाते तो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में इसका नकारात्मक संदेश जा सकता था। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी इतने बड़े समूह को सीधे पार्टी संरचना में समायोजित करना आसान नहीं होता। पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी असंतोष पैदा हो सकता था। एनसीपीआई का विकल्प इस लिहाज से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया। यह पार्टी राजनीतिक रूप से छोटी है और उसका संगठनात्मक ढांचा सीमित है। ऐसे में बागी सांसद वहां अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रख सकते हैं। साथ ही वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन देकर केंद्र की राजनीति में अपनी भूमिका भी कायम रख सकते हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ने से एनडीए को भी राजनीतिक लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से उन विधेयकों के संदर्भ में, जिनके लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता होती है। माना जा रहा है कि लोकसभा में संख्या बल बढ़ने से सरकार की रणनीतिक स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आने की संभावना जताई जा रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:23 +0530</pubDate>
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