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                <title>India US Relations - दैनिक जागरण</title>
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                <description>India US Relations RSS Feed</description>
                
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                <title>अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों से प्रतिबंध हटाए, रक्षा और निर्यात क्षेत्र को मिल सकती है नई मजबूती</title>
                                    <description><![CDATA[प्रतिबंध हटने के बाद वैश्विक कारोबार, रक्षा आपूर्ति, हाई-टेक निर्यात और भारत-अमेरिका औद्योगिक सहयोग को मिलने की उम्मीद नई गति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/america-lifts-sanctions-from-four-indian-companies-defense-and-export/article-57513"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/us-sanctions-removed.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध हटा दिए हैं। इस फैसले को भारतीय उद्योग, रक्षा उत्पादन और निर्यात क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इससे न केवल संबंधित कंपनियों के लिए वैश्विक कारोबार के नए अवसर खुलेंगे, बल्कि भारत की उभरती हुई विनिर्माण क्षमता और रक्षा क्षेत्र को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलेगी। ऐसे समय में जब भारत वैश्विक सप्लाई चेन का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, यह निर्णय दोनों देशों के आर्थिक सहयोग को और गति दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका द्वारा प्रतिबंध हटाने के बाद संबंधित भारतीय कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियों में पहले की तुलना में अधिक सहजता से भाग ले सकेंगी। विदेशी कंपनियों के साथ तकनीकी सहयोग, निवेश, उपकरणों की खरीद, वित्तीय लेनदेन और निर्यात से जुड़े कई काम आसान होने की संभावना है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी मजबूत होगी और वे वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति को और विस्तार दे सकेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षा क्षेत्र के दृष्टिकोण से भी इस फैसले को काफी अहम माना जा रहा है। भारत पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ रक्षा निर्यात को भी लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। आधुनिक रक्षा उपकरण, एयरोस्पेस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म, विशेष मशीनरी और उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में भारतीय कंपनियां लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। प्रतिबंध हटने के बाद इन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी की संभावनाएं और मजबूत हो सकती हैं। रक्षा उद्योग में किसी भी कंपनी के लिए तकनीकी सहयोग और आपूर्ति नेटवर्क तक आसान पहुंच बेहद महत्वपूर्ण होती है। जब प्रतिबंध हटते हैं तो विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त परियोजनाओं, अनुसंधान, उत्पादन और निर्यात के अवसर बढ़ जाते हैं। इससे नई तकनीकों का आदान-प्रदान भी आसान होता है और भारतीय उद्योगों को वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उत्पादन करने में मदद मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार भी पिछले कुछ वर्षों से रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे कार्यक्रमों के तहत निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई गई है। रक्षा उत्पादन में नई कंपनियों के प्रवेश, तकनीकी निवेश और निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए कई नीतिगत सुधार भी किए गए हैं। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला भारतीय उद्योगों के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार करने वाला माना जा रहा है। निर्यात क्षेत्र पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। भारत आज इंजीनियरिंग उत्पाद, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, विशेष रसायन, फार्मास्यूटिकल्स और रक्षा उपकरणों के निर्यात में लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। यदि भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में बेहतर पहुंच मिलती है तो देश के कुल निर्यात में भी वृद्धि की संभावना मजबूत होगी। इससे विदेशी मुद्रा आय बढ़ने के साथ-साथ विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह फैसला वैश्विक निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत है। किसी देश की कंपनियों पर लगे प्रतिबंध हटने से निवेशकों का विश्वास बढ़ता है और वे दीर्घकालिक निवेश के प्रति अधिक उत्साहित होते हैं। इसका लाभ संबंधित कंपनियों के साथ-साथ पूरे औद्योगिक क्षेत्र को मिल सकता है। नई साझेदारियां बनने से तकनीकी नवाचार और उत्पादन क्षमता दोनों में वृद्धि होने की संभावना रहती है। भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, अंतरिक्ष और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। ऐसे में प्रतिबंध हटाने का यह निर्णय व्यापक रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को भी नई गति दे सकता है। उद्योग जगत को उम्मीद है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के नए अवसर विकसित होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाने की दिशा में काम कर रही हैं और भारत एक विश्वसनीय उत्पादन केंद्र के रूप में तेजी से उभर रहा है। बेहतर नीतिगत वातावरण, मजबूत बुनियादी ढांचा, कुशल मानव संसाधन और बढ़ती घरेलू मांग भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक बना रही है। ऐसे में अमेरिकी निर्णय से भारतीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा और मजबूत हो सकती है। यदि प्रतिबंध हटने के बाद व्यापारिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और निर्यात गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ती हैं तो इसका सकारात्मक प्रभाव आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा। रक्षा विनिर्माण, उच्च तकनीक उत्पादन और वैश्विक निर्यात नेटवर्क में भारत की भागीदारी बढ़ने से औद्योगिक विकास को नई गति मिल सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 13:44:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ट्रम्प की नीतियों से भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर, रो खन्ना का बड़ा दावा</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने कहा कि टैरिफ नीति और सहयोगी देशों से बिना सलाह लिए लिए गए फैसलों ने दोनों देशों के बीच भरोसे को कमजोर किया, जबकि अमेरिकी राजदूत ने मजबूत साझेदारी का भरोसा जताया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/ro-khannas-big-claim-on-trumps-policies-affecting-india-us-relations/article-57414"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indore-municipal-corporation-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">भारतीय मूल के अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद रो खन्ना ने भारत और अमेरिका के संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों की वजह से दोनों देशों के रिश्ते पिछले करीब 30 वर्षों में सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। वॉशिंगटन में आयोजित यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप फोरम (USISPF) लीडरशिप समिट 2026 में बोलते हुए खन्ना ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति, सहयोगी देशों से बिना चर्चा किए लिए गए फैसले और ईरान को लेकर अपनाया गया रुख अमेरिका की विश्वसनीयता पर असर डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे करीबी सहयोगी देशों के साथ विश्वास बनाए रखना किसी भी रणनीतिक साझेदारी की सबसे बड़ी जरूरत होती है, लेकिन हाल के वर्षों में इस भरोसे को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, इसी कार्यक्रम में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बताते हुए कहा कि रणनीतिक साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है और एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है।</p>
<p class="isSelectedEnd">रो खन्ना ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय फैसलों में अपने पारंपरिक सहयोगी देशों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया। उनके मुताबिक, ईरान को लेकर हुई सैन्य कार्रवाई जैसे फैसलों में भारत, यूरोप और कनाडा जैसे देशों से पहले चर्चा नहीं की गई। उन्होंने कहा कि जब सहयोगी देशों को विश्वास में नहीं लिया जाता तो इससे लंबे समय में रिश्तों पर असर पड़ता है। खन्ना का कहना था कि किसी भी वैश्विक साझेदारी की मजबूती केवल आर्थिक या सैन्य सहयोग से नहीं बल्कि आपसी भरोसे और संवाद से तय होती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया गया तो भविष्य में संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिकी सांसद ने ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति की भी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि हाल ही में चीन की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक भारतीय राजनयिक से हुई थी। बातचीत के दौरान उस राजनयिक ने उनसे कहा कि अमेरिका की मौजूदा व्यापारिक नीतियों ने वर्षों से बना भरोसा कमजोर कर दिया है। खन्ना ने कहा कि व्यापारिक साझेदारी में अचानक लगाए गए टैरिफ और एकतरफा फैसले केवल आर्थिक प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उनका असर कूटनीतिक संबंधों पर भी दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले तीन दशकों में जो विश्वास बना था, उसे बनाए रखना दोनों देशों के हित में है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अपने संबोधन के दौरान रो खन्ना ने अमेरिकी घरेलू राजनीति का भी जिक्र किया। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प को "लेम डक" राष्ट्रपति बताते हुए दावा किया कि आने वाले मिड-टर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर सकती है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में वापसी करेगी। खन्ना के मुताबिक, नई पीढ़ी के नेताओं के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना नहीं होगी, बल्कि दुनिया के प्रमुख सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करना भी होगा। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी विदेश नीति सहयोग और साझेदारी पर आधारित थी तथा उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति भी सकारात्मक रुख दिखाया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि, कार्यक्रम में मौजूद भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अलग तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत हैं और दोनों देश कई अहम क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है और जल्द इस दिशा में सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सकती है। गोर ने कहा कि अमेरिका भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का सम्मान करता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लेकर प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा तथा निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले वर्षों में यह रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">सर्जियो गोर ने अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले मियामी में आयोजित एक यूएफसी कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने अचानक प्रधानमंत्री मोदी को फोन करने की इच्छा जताई थी। गोर के अनुसार, जब उन्होंने ट्रम्प को बताया कि भारत में उस समय सुबह के करीब छह बजे हैं, तब भी ट्रम्प ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी शायद जाग चुके होंगे। हालांकि कार्यक्रम की व्यस्तता के कारण उस समय बातचीत नहीं हो सकी और बाद में दोनों नेताओं की बातचीत तय हुई। गोर ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत विश्वास और सहज संवाद का उदाहरण है। उनके मुताबिक, जब दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर मजबूत संबंध होते हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव दोनों देशों के व्यापक रिश्तों पर भी पड़ता है।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान गोर ने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक साझेदार हैं और दोनों देशों के संबंध किसी एक मुद्दे या एक सरकार तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि बदलते वैश्विक हालात के बावजूद दोनों देशों के बीच आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग आगे भी जारी रहेगा। वहीं, रो खन्ना के बयान ने इस बात पर नई बहस जरूर छेड़ दी है कि वैश्विक राजनीति, व्यापारिक नीतियां और कूटनीतिक फैसले किस तरह लंबे समय से बने रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते और रणनीतिक सहयोग को लेकर बातचीत जारी है, जिससे आने वाले समय में संबंधों की दिशा और अधिक स्पष्ट होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:17:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड से हटाया ‘इंडो’, भारत की भूमिका पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[2018 में चीन को संतुलित करने की रणनीति के तहत जोड़ा गया था ‘इंडो’, अब नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड करने पर विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-removes-indo-from-indo-pacific-command-questions-raised-on-indias/article-56234"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-pacific-command.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह कदम अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है और क्या इससे भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर कोई नया संदेश जा रहा है। वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने इस सैन्य कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं माना गया था, बल्कि इसे अमेरिका की नई एशिया रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया था। अमेरिका ने तब स्पष्ट किया था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने नाम परिवर्तन की घोषणा करते हुए कहा था कि हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसकी भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था ताकि भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को दर्शाया जा सके।अब आठ साल बाद इस फैसले को पलटते हुए अमेरिका ने फिर से पुराना नाम अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यूएस पैसिफिक कमांड नाम ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है और इसका सैन्य विरासत से गहरा संबंध रहा है। मंत्रालय के अनुसार यह नाम कई महत्वपूर्ण अभियानों, युद्धों और सैन्य उपलब्धियों का प्रतीक है। इसलिए इसे वापस लाने का फैसला किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पेंटागन ने साफ किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की जिम्मेदारियों, अधिकार क्षेत्र, सैन्य रणनीति और संचालन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस कदम को केवल औपचारिक बदलाव मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कूटनीति और सुरक्षा नीति में प्रतीकों का भी बड़ा महत्व होता है और ऐसे फैसले अक्सर व्यापक रणनीतिक संकेत देते हैं। जब 2018 में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था, तब अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी चिंतित था। उस समय भारत को अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय साझेदार माना जा रहा था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का उद्देश्य क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान बदलाव से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका अब अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की नई विदेश नीति सोच से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अब अपने संसाधनों और सैन्य फोकस को अलग तरीके से व्यवस्थित करना चाहता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी रणनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है। इस फैसले पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड के भविष्य के लिए कोई संकेत है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील साबित हो सकती है। थरूर की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों पर लगातार चर्चा हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। इसका क्षेत्र एशिया-प्रशांत के विशाल हिस्से तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और कई अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इसी वजह से इसके नाम में होने वाला बदलाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति के अन्य फैसलों पर नजर रखनी होगी। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह कदम केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच काम कर रही है। फिलहाल अमेरिका ने यह जरूर कहा है कि उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके बावजूद भारत, क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े देशों में इस फैसले को लेकर चर्चा जारी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:39:40 +0530</pubDate>
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