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                <title>अमेरिका-ईरान 14 सूत्रीय डील का खुलासा, होर्मुज और परमाणु मुद्दे अहम</title>
                                    <description><![CDATA[शांति समझौते में 60 दिन की समयसीमा, प्रतिबंधों में राहत और ईरान को आर्थिक पैकेज का प्रावधान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-iran-14-point-deal-revealed-hormuz-and-nuclear-issues-important/article-56251"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/hormuz-strait-agreement-2026.jpg" alt=""></a><br /><div class="qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot">
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<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद अब 14 सूत्रीय डील की पूरी जानकारी सामने आ गई है। इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने डिजिटल हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद यह तुरंत प्रभाव में आ गया। पेरिस के वर्साय पैलेस में हुए इस घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है क्योंकि इसमें युद्धविराम से लेकर परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों तक कई अहम मुद्दे शामिल हैं। इस डील का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 60 दिनों की समयसीमा है, जिसके भीतर दोनों देशों को अंतिम समझौते तक पहुंचना होगा। इस दौरान न तो कोई सैन्य कार्रवाई होगी और न ही कोई बड़ा राजनीतिक या आर्थिक दबाव बढ़ाया जाएगा। इसी समयसीमा के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को 60 दिनों के लिए शुल्क-मुक्त खोले जाने का प्रावधान भी शामिल है। यह फैसला वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि होर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और व्यापारिक सामान गुजरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित और निगरानी योग्य दायरे में रखेगा। इसके बदले अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ईरान के लिए लगभग 300 अरब डॉलर यानी करीब 28 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पुनर्निर्माण पैकेज का संकेत दिया है। हालांकि यह फंड तुरंत जारी नहीं होगा और इसे अंतिम समझौते की शर्तों से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे प्रतिबंधों से बाहर निकालना बताया जा रहा है। डील के तहत अमेरिका ने ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का भी वादा किया है। इसमें तेल निर्यात, बैंकिंग, बीमा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कई प्रतिबंध शामिल हैं। इसके हटने से ईरान को वैश्विक बाजार में दोबारा प्रवेश मिलने की संभावना है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है। लंबे समय से प्रतिबंधों के कारण ईरान की आर्थिक स्थिति दबाव में रही है और यह समझौता उसके लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते का एक और अहम पहलू अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी हटाना है। इसके बाद ईरान के बंदरगाहों से व्यापारिक गतिविधियां दोबारा शुरू हो सकेंगी। तेल और अन्य निर्यात वस्तुओं के लिए रास्ता खुलने से ईरान को विदेशी मुद्रा प्राप्त होने लगेगी, जिससे उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है। हालांकि इस कदम से अमेरिका का क्षेत्रीय दबाव बनाए रखने का एक बड़ा साधन खत्म हो जाएगा। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी बड़ा फैसला लिया गया है। समझौते के अनुसार ईरान ने अगले 60 दिनों तक इस मार्ग से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लेने का वादा किया है। इस अवधि में वैश्विक व्यापार बिना किसी रुकावट के जारी रहेगा। लेकिन 60 दिन के बाद स्थिति बदल सकती है और ईरान शुल्क लगाने का निर्णय ले सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की लागत प्रभावित हो सकती है। डील में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर भी कड़ा लेकिन संतुलित रुख अपनाया गया है। समझौते के अनुसार ईरान अपने पास मौजूद लगभग 11 टन संवर्धित यूरेनियम को कम घनत्व में बदलेगा, ताकि उसका उपयोग हथियार निर्माण में न हो सके। यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में होगी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान अपने यूरेनियम भंडार को विदेश भेजेगा या देश के भीतर ही उसका रूपांतरण करेगा, जिससे कई सवाल अभी भी अनसुलझे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते में यह भी तय किया गया है कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान करेंगे। यह बिंदु अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना कम हो सकती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे रणनीतिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं, जिससे अमेरिका का क्षेत्रीय प्रभाव सीमित हो सकता है। इसके अलावा दोनों देशों ने एक संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने पर सहमति जताई है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि समझौते की सभी शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं। यह प्रणाली पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाई जाएगी। साथ ही अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी दिलाने का भी प्रावधान है, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता मिल सके। अंततः यह 14 सूत्रीय समझौता केवल युद्ध समाप्ति का दस्तावेज नहीं बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।</p>
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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 11:35:55 +0530</pubDate>
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