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                <title>America - दैनिक जागरण</title>
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                <description>America RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अमेरिका आजादी के 250वें वर्ष पर दफन करेगा 408 किलो का टाइम कैप्सूल, 2276 में खुलेगा इतिहास का यह अनोखा संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[फिलाडेल्फिया के इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में 10 फीट नीचे रखा जाएगा विशेष टाइम कैप्सूल, जिसमें AI की भविष्यवाणी, ऐतिहासिक दस्तावेज, व्हेल की हड्डी और 50 राज्यों से चुनी गई यादगार वस्तुएं शामिल हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-will-bury-a-408-kg-time-capsule-on-the/article-57815"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/america-time-capsule.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">अमेरिका अपनी आजादी के 250 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक ऐसा कदम उठाने जा रहा है, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए इतिहास का अनमोल दस्तावेज बन सकता है। 4 जुलाई को फिलाडेल्फिया स्थित इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में करीब 408 किलो वजनी एक विशेष टाइम कैप्सूल जमीन के भीतर दफन किया जाएगा। इसे अब से ठीक 250 साल बाद यानी वर्ष 2276 में खोला जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य केवल कुछ वस्तुओं को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि 2026 के अमेरिका की सोच, तकनीक, संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना भी है। बताया जा रहा है कि इस टाइम कैप्सूल का रिकॉर्ड भी आधिकारिक रूप से दर्ज कर दिया गया है, ताकि आने वाले समय में इसकी सही पहचान और स्थान सुरक्षित रहे।</p>
<p>फिलाडेल्फिया को इस ऐतिहासिक पहल के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यही वह शहर है, जहां 4 जुलाई 1776 को अमेरिका के स्वतंत्रता घोषणा पत्र को मंजूरी मिली थी। इसी कारण इस स्थान को अमेरिकी लोकतंत्र और आजादी का प्रतीक माना जाता है। अधिकारियों के अनुसार, टाइम कैप्सूल में रखी गई वस्तुएं केवल सरकारी संस्थानों ने नहीं चुनीं, बल्कि देश के सभी 50 राज्यों और आम नागरिकों की भागीदारी से उनका चयन किया गया है। इनमें व्हेल की हड्डी, दुनिया के सबसे बड़े जिप्सम रेगिस्तान की रेत, राइट बंधुओं के ऐतिहासिक विमान का कपड़ा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI से जुड़ी भविष्यवाणियां, महत्वपूर्ण दस्तावेज और कई ऐसी वस्तुएं शामिल हैं, जो वर्तमान समय की पहचान मानी जाती हैं।</p>
<p>टाइम कैप्सूल एक ऐसा बंद कंटेनर होता है, जिसमें किसी खास दौर की वस्तुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसका मकसद भविष्य के लोगों को यह बताना होता है कि उस समय समाज कैसा था, लोग किस तरह का जीवन जीते थे और विज्ञान तथा तकनीक किस स्तर पर पहुंच चुके थे। यही वजह है कि इस बार तैयार किया गया अमेरिकी टाइम कैप्सूल केवल इतिहास का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की ओर से भविष्य के लोगों के लिए एक संदेश भी माना जा रहा है।</p>
<p>इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती टाइम कैप्सूल को तैयार करना नहीं, बल्कि उसे पूरे 250 वर्षों तक सुरक्षित बनाए रखना था। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने कई वर्षों तक शोध करने के बाद ऐसा डिजाइन तैयार किया, जो नमी, पानी, जंग और मौसम के प्रभाव से लंबे समय तक बचा रह सके। कैप्सूल को पारंपरिक चौकोर आकार की बजाय बेलनाकार बनाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चौकोर कंटेनरों के कोनों पर समय के साथ दबाव अधिक पड़ता है और वहीं से पानी अंदर जाने की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत बेलनाकार संरचना अधिक मजबूत और टिकाऊ मानी जाती है।</p>
<p>कैप्सूल को विशेष गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील से तैयार किया गया है, जिसका उपयोग वैज्ञानिक उपकरणों और अत्यधिक सुरक्षित संरचनाओं में किया जाता है। इसे पहले ही पूरी तरह सील किया जा चुका है और 4 जुलाई को केवल जमीन के भीतर स्थापित किया जाएगा। सीलिंग के लिए इंडियम नाम की विशेष धातु का इस्तेमाल किया गया है। यह धातु बेहद मुलायम होती है और ढक्कन बंद करते समय सबसे छोटी दरार को भी भर देती है। इससे हवा और पानी के प्रवेश की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।</p>
<p>वैज्ञानिकों ने कैप्सूल के भीतर नमी का स्तर भी सावधानी से नियंत्रित किया है। यदि नमी अधिक होती तो कागज और अन्य सामग्री खराब हो सकती थी, जबकि अत्यधिक सूखापन कुछ वस्तुओं को नुकसान पहुंचा सकता था। इसलिए इसके अंदर लगभग 35 प्रतिशत आर्द्रता बनाए रखी गई है। इसे करीब 10 फीट गहराई में दफनाया जाएगा, जहां तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहता है और मौसम के बदलाव का असर बहुत कम होता है।</p>
<p>इस टाइम कैप्सूल की सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त स्टील सिलेंडर भी लगाया जाएगा। दोनों परतों के बीच मौजूद हवा पानी को भीतर पहुंचने से रोकेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भविष्य में भूजल का स्तर बढ़ भी जाए या बाढ़ जैसी स्थिति बन जाए, तब भी यह संरचना लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती है। परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसी दिन इस कैप्सूल तक पानी पहुंच गया, तो इसका मतलब होगा कि पूरा क्षेत्र गंभीर प्राकृतिक संकट का सामना कर रहा होगा।</p>
<p>अमेरिका इस पहल के जरिए केवल अपनी उपलब्धियों को संरक्षित नहीं करना चाहता, बल्कि यह भी दिखाना चाहता है कि वर्ष 2026 का समाज किस तरह सोचता था और किन तकनीकों का उपयोग कर रहा था। यही कारण है कि इसमें सरकारी दस्तावेजों के साथ आम लोगों की ओर से चुनी गई वस्तुओं को भी समान महत्व दिया गया है। इससे भविष्य की पीढ़ियां उस दौर को केवल किताबों के माध्यम से नहीं, बल्कि वास्तविक वस्तुओं के जरिए भी समझ सकेंगी।</p>
<p>दुनिया में इससे पहले भी कई प्रसिद्ध टाइम कैप्सूल बनाए जा चुके हैं। अमेरिका का 'क्रिप्ट ऑफ सिविलाइजेशन' सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल है, जिसे लगभग 6,000 वर्षों तक बंद रखने की योजना बनाई गई है और इसे वर्ष 8113 में खोला जाएगा। वहीं 1939 में न्यूयॉर्क में दफन किया गया वेस्टिंगहाउस टाइम कैप्सूल भी भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है। भारत में भी 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान लाल किले के पास 'कलपात्र' नाम से टाइम कैप्सूल दफन किया गया था, जिसे बाद में नई सरकार बनने पर बाहर निकाल लिया गया। हालांकि उसमें मौजूद सामग्री को लेकर आज भी कई चर्चाएं होती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कतर में अमेरिका-ईरान वार्ता तेज, जमी संपत्ति और MoU क्रियान्वयन पर अहम चर्चा</title>
                                    <description><![CDATA[दोहा में अप्रत्यक्ष वार्ता के दौरान जमी संपत्ति, हॉटलाइन व्यवस्था, होर्मुज जलडमरूमध्य और क्षेत्रीय सुरक्षा समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a463522a604b/article-57668"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/america-iran-talks.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर अहम अप्रत्यक्ष वार्ता हुई, जिसमें दोनों देशों के बीच पहले हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के क्रियान्वयन, ईरान की जमी हुई संपत्तियों के उपयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में लगातार तनाव बना हुआ है और दोनों देशों के बीच भरोसा बहाल करने की कोशिशें जारी हैं। बातचीत में प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधि आमने-सामने नहीं बैठे, बल्कि कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए संवाद आगे बढ़ाया गया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक दोनों पक्षों ने वार्ता जारी रखने पर सहमति जताई है और कई प्रस्तावों पर आगे भी विचार किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने बताया कि इस दौर की बातचीत समाप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि बैठक के दौरान समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक विशेष संचार व्यवस्था यानी हॉटलाइन स्थापित करने पर भी चर्चा हुई। प्रस्ताव है कि गुरुवार तक ऐसी प्रणाली तैयार की जाए जिसके जरिए यदि किसी भी पक्ष की ओर से MoU का उल्लंघन होता है तो उसकी जानकारी तुरंत साझा की जा सके। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था भविष्य में विवादों को बढ़ने से रोकने और संवाद को जारी रखने में मददगार साबित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक का सबसे अहम विषय ईरान की विदेशों में जमी हुई संपत्ति रहा। कतर में रखी गई ईरान की अरबों डॉलर की राशि के उपयोग को लेकर दोनों पक्षों के बीच विस्तार से बातचीत हुई। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि इस राशि का इस्तेमाल सीधे नकद भुगतान के बजाय आवश्यक वस्तुओं की खरीद के लिए किया जाएगा। इन वस्तुओं को बाद में ईरान भेजा जाएगा ताकि प्रतिबंधों के बीच भी जरूरी जरूरतें पूरी की जा सकें। बताया गया कि शुरुआती छह अरब डॉलर की राशि में से एक हिस्से के उपयोग के तौर-तरीकों पर भी कतर के अधिकारियों और वहां के केंद्रीय बैंक के साथ चर्चा हुई। ईरान का कहना है कि वह इस धनराशि का इस्तेमाल मानवीय जरूरतों और जरूरी सामान की खरीद तक सीमित रखना चाहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वार्ता के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधी बातचीत नहीं हुई। सभी संदेश और प्रस्ताव मध्यस्थ देशों के माध्यम से साझा किए गए। कतर लंबे समय से दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इस बार पाकिस्तान की भी मध्यस्थता में भागीदारी रही, जिससे वार्ता को आगे बढ़ाने में मदद मिली। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष बातचीत भले ही नहीं हुई हो, लेकिन अप्रत्यक्ष संवाद भी दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोहा में हुई बैठकों के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी प्रमुखता से उठाए गए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ईरान, कतर और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय बैठक में लेबनान की स्थिति, इजरायल की सैन्य गतिविधियों और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े हालात पर विस्तार से विचार किया गया। ईरान ने आरोप लगाया कि लेबनान में इजरायल की सैन्य मौजूदगी समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन रही है। इसके साथ ही ईरान ने दोहराया कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान और ओमान की संप्रभुता है और इस क्षेत्र से जुड़े किसी भी निर्णय में उनकी भूमिका सर्वोपरि रहनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक में ओमान की ओर से दिए गए नए प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा और जहाजों की आवाजाही को लेकर भविष्य की रणनीति पर बातचीत जारी रहेगी। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल अब अपने-अपने देशों में इस प्रस्ताव का अध्ययन करेंगे और आवश्यक परामर्श के बाद अगली बैठक में अपना रुख स्पष्ट करेंगे। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान ने वार्ता के दौरान यह भी मांग रखी कि MoU के पांच प्रमुख प्रावधानों को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाए। अधिकारियों का कहना है कि समझौते के सभी बिंदुओं पर समान गति से काम होना जरूरी है ताकि किसी भी पक्ष को असंतोष का मौका न मिले। दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष की ओर से सार्वजनिक रूप से ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि वह भी चरणबद्ध तरीके से समझौते को आगे बढ़ाने के पक्ष में है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि दोहा में हुई यह वार्ता भविष्य की कूटनीतिक प्रक्रिया के लिए अहम साबित हो सकती है। हालांकि अभी कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं, लेकिन बातचीत जारी रहने की सहमति अपने आप में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। आने वाले दिनों में यदि जमी हुई संपत्तियों के उपयोग, हॉटलाइन व्यवस्था और समझौते के अन्य प्रावधानों पर ठोस प्रगति होती है तो इससे दोनों देशों के संबंधों में कुछ हद तक नरमी आ सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 16:06:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरान युद्ध खर्च पर ट्रम्प ने मांगे ₹8.3 लाख करोड़, संसद में बढ़ा विरोध</title>
                                    <description><![CDATA[व्हाइट हाउस ने अतिरिक्त रक्षा फंडिंग की मांग को सैन्य तैयारी और हथियार भंडार से जोड़ा, जबकि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में सैन्य कार्रवाई को लेकर सवाल तेज हो गए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trump-demands-%E2%82%B983-lakh-crore-on-iran-war-expenditure-opposition/article-56869"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(5).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अपनी विदेश नीति और रक्षा रणनीति को लेकर घरेलू राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी संसद से 87.6 अरब डॉलर यानी करीब 8.3 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त फंडिंग मंजूर करने की मांग की है। सरकार का कहना है कि यह रकम ईरान के खिलाफ हालिया सैन्य अभियानों, सेना की तैयारियों और हथियारों के भंडार को दोबारा मजबूत करने के लिए जरूरी है। हालांकि संसद में इस प्रस्ताव को लेकर विरोध बढ़ता दिखाई दे रहा है और कई सांसद इसे सैन्य खर्च बढ़ाने की दिशा में एक विवादित कदम मान रहे हैं। व्हाइट हाउस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक यह अतिरिक्त फंडिंग पहले से स्वीकृत रक्षा बजट का हिस्सा नहीं है। पिछले साल अमेरिकी कांग्रेस करीब 1 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट को मंजूरी दे चुकी थी, जबकि अगले वित्तीय वर्ष के लिए लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर की नई मांग पहले से ही रखी जा चुकी है। इसके बावजूद ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि ईरान के साथ बढ़े तनाव और सैन्य अभियानों के कारण अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता पैदा हुई है। अधिकारियों के अनुसार इस राशि का इस्तेमाल सैन्य ऑपरेशनों की लागत पूरी करने, आधुनिक हथियारों की खरीद, गोला-बारूद के भंडार को फिर से भरने और कुछ गोपनीय रक्षा कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि हाल के महीनों में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। ईरान और उसके समर्थक समूहों के साथ तनाव के बीच अमेरिका ने कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। इन अभियानों में बड़ी मात्रा में मिसाइलों, रक्षा प्रणालियों और अन्य सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल हुआ है। प्रशासन का तर्क है कि यदि समय रहते अतिरिक्त धन उपलब्ध नहीं कराया गया तो सेना की परिचालन क्षमता और भविष्य की तैयारियों पर असर पड़ सकता है। रक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण सैन्य भंडार अपेक्षा से अधिक तेजी से खर्च हुए हैं, जिनकी भरपाई जरूरी है। हालांकि संसद में इस मांग को लेकर माहौल पूरी तरह सरकार के पक्ष में नहीं दिख रहा। मंगलवार को अमेरिकी सीनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर ट्रम्प प्रशासन से ईरान के खिलाफ आगे की सैन्य कार्रवाई रोकने का आग्रह किया। इससे पहले प्रतिनिधि सभा यानी लोअर हाउस भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। इन प्रस्तावों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना स्पष्ट संसदीय मंजूरी के किसी बड़े सैन्य संघर्ष में अमेरिका की भागीदारी न बढ़े। दिलचस्प बात यह रही कि कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट सांसदों का समर्थन किया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह मामला सिर्फ रक्षा बजट तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रपति और संसद के बीच अधिकारों की बहस भी इससे जुड़ी हुई है। अमेरिका में युद्ध और सैन्य कार्रवाई से जुड़े फैसलों पर लंबे समय से विवाद रहा है। कई सांसदों का तर्क है कि बड़े सैन्य अभियानों से पहले कांग्रेस की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर ट्रम्प समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में राष्ट्रपति को तेजी से फैसले लेने की जरूरत होती है और ऐसे समय में राजनीतिक मतभेदों को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए। आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रस्ताव चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिका पहले से ही बड़े बजट घाटे और बढ़ते सरकारी कर्ज की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में अतिरिक्त 87.6 अरब डॉलर की मांग को लेकर वित्तीय विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाए हैं। रक्षा खर्च लगातार बढ़ने से अन्य घरेलू योजनाओं पर दबाव पड़ सकता है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर खर्च को कम नहीं किया जा सकता और वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सेना को पर्याप्त संसाधन देना जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 11:42:39 +0530</pubDate>
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