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                <title>CyberSecurity - दैनिक जागरण</title>
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                <description>CyberSecurity RSS Feed</description>
                
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                <title>चलते ई-रिक्शा को रोकने वाले 7 ऐप पर सरकार सख्त, बैटरी सुरक्षा में बड़ी खामी आई सामने</title>
                                    <description><![CDATA[ब्लूटूथ के जरिए ई-रिक्शा की बैटरी बंद करने की शिकायतों के बाद कार्रवाई, सरकार ने ऐप स्टोर से हटाने के दिए निर्देश; इलेक्ट्रिक कार और स्कूटर फिलहाल सुरक्षित।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/government-strict-on-7-apps-that-stop-e-rickshaws-from-moving/article-57821"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/e-rickshaw.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">दिल्ली समेत देश के कई शहरों में ई-रिक्शा चालकों के लिए परेशानी का कारण बने कुछ मोबाइल ऐप्स पर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ऐसे सात ऐप्स को ऐप स्टोर से हटाने के निर्देश दिए हैं, जिनका कथित तौर पर दुरुपयोग कर चलते हुए ई-रिक्शा की बैटरी को ब्लूटूथ के जरिए बंद किया जा रहा था। इनमें BAT-BMS, Smart BMS, Lossigy और Epoch Li-Ion जैसे ऐप शामिल हैं। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो सामने आए थे, जिनमें चलते हुए ई-रिक्शा अचानक बीच सड़क पर रुक जाते थे। इसके बाद शिकायतें मिलने पर सरकार ने मामले का संज्ञान लिया। हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक, निर्देश जारी होने के बावजूद कुछ ऐप्स अभी भी डाउनलोड के लिए उपलब्ध दिखाई दे रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि संबंधित प्लेटफॉर्म से इन्हें पूरी तरह हटाने की प्रक्रिया जारी है। इस पूरे मामले ने ई-रिक्शा में इस्तेमाल होने वाली कुछ लीथियम-आयन बैटरियों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या किसी एक ऐप की नहीं, बल्कि उन बैटरियों की है जिनके ब्लूटूथ बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) में पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई। ऐसे सिस्टम बिना मजबूत पासवर्ड या एन्क्रिप्शन के खुले छोड़ दिए जाते हैं, जिससे कोई भी व्यक्ति सीमित दूरी के भीतर उनसे कनेक्ट होकर बैटरी की सेटिंग्स बदल सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार BAT-BMS जैसे ऐप मूल रूप से बैटरी की निगरानी और रखरखाव के लिए विकसित किए गए थे। इनका उद्देश्य बैटरी की चार्जिंग, तापमान, वोल्टेज, क्षमता और अन्य तकनीकी जानकारियों पर नजर रखना है। जरूरत पड़ने पर अधिकृत उपयोगकर्ता इन ऐप्स के जरिए बैटरी को ऑन या ऑफ भी कर सकता है। यही सुविधा कुछ मामलों में गलत तरीके से इस्तेमाल की गई। बताया जा रहा है कि जिन ई-रिक्शा में ब्लूटूथ आधारित लीथियम-आयन बैटरी लगी है और जिनका ब्लूटूथ बिना पासवर्ड के खुला छोड़ा गया है, वहां यह जोखिम ज्यादा है। ऐसे ऐप लगभग 10 से 15 मीटर की दूरी से बैटरी से कनेक्ट हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि सभी ई-रिक्शा इस समस्या से प्रभावित नहीं हैं। देश में बड़ी संख्या में ऐसे ई-रिक्शा अब भी चल रहे हैं जिनमें पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियां लगी हैं। इनमें ब्लूटूथ आधारित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होता, इसलिए ऐसे वाहनों पर इन ऐप्स का कोई असर नहीं पड़ता। वहीं जिन लीथियम बैटरियों में निर्माता ने मजबूत और यूनिक पासवर्ड सेट किया है, उन्हें भी सामान्य तरीके से एक्सेस नहीं किया जा सकता। इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटरों के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि उनमें कहीं अधिक उन्नत साइबर सुरक्षा, एन्क्रिप्शन और मल्टी-लेयर ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल होता है। इसलिए किसी सामान्य मोबाइल ऐप के जरिए उन्हें नियंत्रित करना संभव नहीं है। यही वजह है कि फिलहाल यह खतरा मुख्य रूप से कुछ कम कीमत वाले ई-रिक्शा की बैटरियों तक सीमित माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">जांच में यह भी सामने आया है कि संबंधित ऐप्स को मूल रूप से ई-रिक्शा नियंत्रित करने के लिए नहीं बनाया गया था। इनका उपयोग सौर ऊर्जा प्रणाली, नावों और अन्य उपकरणों में लगी लीथियम बैटरियों की निगरानी के लिए किया जाता था। भारत में कुछ स्थानीय बैटरी असेंबलरों और कम लागत वाले निर्माताओं ने इन्हीं सिस्टम का उपयोग ई-रिक्शा में भी करना शुरू कर दिया, लेकिन कई मामलों में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम में डिफॉल्ट पासवर्ड जैसे "1234" या "0000" ही छोड़ दिए जाएं या बिल्कुल पासवर्ड न लगाया जाए, तो कोई भी व्यक्ति आसानी से उससे कनेक्ट हो सकता है। इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान मजबूत और यूनिक पासवर्ड सेट करना है। सरकार और तकनीकी विशेषज्ञ ई-रिक्शा चालकों को सलाह दे रहे हैं कि वे अपने नजदीकी बैटरी डीलर या अधिकृत मैकेनिक से संपर्क कर यह सुनिश्चित करें कि उनकी बैटरी का ब्लूटूथ सिस्टम पासवर्ड से सुरक्षित है। यदि डिफॉल्ट पासवर्ड लगा हो तो उसे तुरंत बदल देना चाहिए। इसके अलावा यदि यात्रा के दौरान ई-रिक्शा अचानक बंद हो जाए तो घबराने के बजाय वाहन को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर मुख्य बैटरी स्विच या एमसीबी को बंद करके दोबारा चालू करने की सलाह दी गई है। सरकार का मानना है कि तकनीकी सुरक्षा मानकों को मजबूत करने और ऐसे ऐप्स के दुरुपयोग पर रोक लगाने से भविष्य में इस तरह की घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकेगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>WhatsApp के यूजरनेम फीचर पर सरकार की सख्ती, मेटा को नोटिस जारी कर तीन दिन में मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[सरकार ने मेटा से तीन दिन में जवाब मांगा, ऑनलाइन ठगी और फर्जी पहचान के खतरे के चलते फीचर पर रोक।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/governments-strictness-on-username-feature-of-whatsapp-issued-notice-to/article-57609"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/whatsapp-username-feature.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत में डिजिटल सुरक्षा को लेकर सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp के प्रस्तावित ‘यूजरनेम’ फीचर पर केंद्र सरकार ने फिलहाल रोक लगा दी है और इसकी मूल कंपनी मेटा को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। सरकार का कहना है कि यदि यह फीचर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के लॉन्च किया गया तो देश में ऑनलाइन ठगी, फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट और फर्जी पहचान से जुड़े साइबर अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है। इसी वजह से मेटा से तीन दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा गया है। जब तक सरकार उसके जवाब से संतुष्ट नहीं होती, तब तक इस फीचर को भारत में शुरू करने की अनुमति नहीं मिलेगी। सरकार की ओर से जारी नोटिस में कहा गया है कि यूजरनेम आधारित मैसेजिंग सुविधा साइबर अपराधियों के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है। अभी तक WhatsApp पर किसी व्यक्ति से संपर्क करने के लिए उसका मोबाइल नंबर जरूरी होता है, जिससे पहचान का एक आधार मौजूद रहता है। लेकिन यदि केवल यूजरनेम के जरिए संपर्क करने की सुविधा मिलती है तो अपराधियों के लिए अपनी असली पहचान छिपाना आसान हो जाएगा। इससे लोगों को फर्जी पहचान के जरिए निशाना बनाने का खतरा काफी बढ़ सकता है। नोटिस में सरकार ने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि जब कंपनी को पहले से इस बात की जानकारी है कि इस फीचर का दुरुपयोग ऑनलाइन ठगी और साइबर अपराधों में किया जा सकता है, तब भी इसे लॉन्च करने की तैयारी क्यों की जा रही है। सरकार ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि इस फीचर से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और उससे जुड़े नियमों का उल्लंघन होता है तो मेटा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाए। कंपनी को इन सभी बिंदुओं पर लिखित और विस्तृत जवाब देना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार की सबसे बड़ी चिंता डिजिटल अरेस्ट जैसे तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों को लेकर है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें अपराधियों ने खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग या बैंक अधिकारी बताकर लोगों को फोन या वीडियो कॉल के जरिए डराया और लाखों रुपये की ठगी की। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यूजरनेम के जरिए आसानी से लोगों तक पहुंच बनाई जा सकेगी तो इस तरह के अपराधों को अंजाम देना और आसान हो सकता है। फर्जी पहचान भी सरकार की चिंता का एक बड़ा कारण है। यूजरनेम फीचर आने के बाद कोई भी व्यक्ति किसी प्रसिद्ध कंपनी, सरकारी संस्था या लोकप्रिय व्यक्ति के नाम से मिलता-जुलता यूजरनेम बनाकर लोगों को भ्रमित कर सकता है। आम उपयोगकर्ता के लिए असली और नकली अकाउंट की पहचान करना मुश्किल हो सकता है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मजबूत सत्यापन प्रणाली नहीं बनाई गई तो इसका दुरुपयोग बड़े पैमाने पर हो सकता है।हाल के वर्षों में भारत में साइबर धोखाधड़ी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। फिशिंग लिंक, नकली निवेश योजनाएं, बैंकिंग फ्रॉड, ओटीपी ठगी और सोशल मीडिया के जरिए होने वाले अपराध पहले से ही बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में सरकार किसी भी ऐसे फीचर को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतना चाहती है, जिससे अपराधियों को नया माध्यम मिल सके। यही वजह है कि यूजरनेम फीचर को लेकर पहले सुरक्षा मानकों की समीक्षा करने का फैसला लिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूजरनेम फीचर कई मामलों में उपयोगी साबित हो सकता है। इससे उपयोगकर्ताओं को अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना दूसरे लोगों से संपर्क करने की सुविधा मिलेगी, जिससे उनकी निजता बेहतर तरीके से सुरक्षित रह सकती है। कई अन्य सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पहले से ही यूजरनेम आधारित प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे फीचर को लागू करने से पहले मजबूत पहचान सत्यापन, रिपोर्टिंग सिस्टम और सुरक्षा नियंत्रण बेहद जरूरी हैं। WhatsApp की ओर से फिलहाल इस नोटिस पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। माना जा रहा है कि कंपनी सरकार के सवालों का जवाब तैयार कर रही है और सुरक्षा उपायों से जुड़े अपने प्रस्ताव भी पेश कर सकती है। यदि कंपनी सरकार को संतुष्ट करने में सफल रहती है तो भविष्य में कुछ अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधानों के साथ इस फीचर को मंजूरी मिल सकती है। फिलहाल इसकी लॉन्चिंग पर अनिश्चितता बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार लगातार सख्त रुख अपनाती रही है। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए कई नए दिशा-निर्देश लागू किए गए हैं, जिनका उद्देश्य उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और साइबर अपराधों पर नियंत्रण रखना है। सरकार का मानना है कि नई तकनीकों का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन यदि उनसे आम लोगों की सुरक्षा प्रभावित होने की आशंका हो तो पहले आवश्यक सुरक्षा उपाय लागू करना जरूरी है। आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सरकार के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। एक ओर नई तकनीक उपयोगकर्ताओं को बेहतर सुविधाएं देती है, वहीं दूसरी ओर साइबर अपराधी भी नई तकनीकों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में किसी भी नए फीचर को लागू करने से पहले सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक माना जा रहा है। अब सभी की नजर मेटा के जवाब और सरकार के अगले फैसले पर टिकी हुई है, जिससे तय होगा कि WhatsApp का यूजरनेम फीचर भारत में कब और किन शर्तों के साथ उपलब्ध हो सकेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 11:26:56 +0530</pubDate>
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                <title>यूजर्स का डेटा अब भारत में ही रहेगा, टेलीकॉम सेक्टर के लिए नए नियम लागू</title>
                                    <description><![CDATA[दूरसंचार विभाग ने जारी किया नया ढांचा, डेटा विदेश भेजने पर रोक; कंपनियों को ऑनलाइन मंजूरी और सैटेलाइट सेवाओं पर कड़े प्रावधान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/users-data-will-now-remain-in-india-only-new-rules/article-56882"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/telecom-rules-india.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश में टेलीकॉम सेक्टर के लिए एक बड़ा बदलाव सामने आया है। केंद्र सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) ने नए नियमों की घोषणा करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय यूजर्स का डेटा अब देश के बाहर स्टोर नहीं किया जा सकेगा। मोबाइल कॉल, इंटरनेट इस्तेमाल, मैसेजिंग और अन्य डिजिटल गतिविधियों से जुड़े रिकॉर्ड भारत के भीतर ही सुरक्षित रखने होंगे। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य नागरिकों की प्राइवेसी को मजबूत करना, साइबर सुरक्षा बढ़ाना और देश के डिजिटल इकोसिस्टम को अधिक सुरक्षित बनाना है। इसके साथ ही टेलीकॉम क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही जटिल लाइसेंस प्रक्रिया को भी आसान बनाया गया है, जिससे कंपनियों को सेवाएं शुरू करने और विस्तार करने में पहले की तुलना में कम समय लगेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नए नियमों के तहत टेलीकॉम कंपनियां अब भारतीय उपभोक्ताओं का डेटा किसी विदेशी सर्वर पर नहीं भेज सकेंगी। इसके अलावा बिना निर्धारित अनुमति के किसी विदेशी संस्था या एजेंसी के साथ संवेदनशील रिकॉर्ड साझा करने पर भी रोक रहेगी। पिछले कुछ वर्षों में डेटा सुरक्षा और डिजिटल गोपनीयता को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में सरकार का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार डेटा का स्थानीय स्तर पर भंडारण होने से जांच एजेंसियों को जरूरत पड़ने पर तेजी से जानकारी उपलब्ध हो सकेगी और साइबर अपराधों की निगरानी भी अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकेगी।दूरसंचार विभाग ने इसके साथ एक नया डिजिटल सिस्टम भी शुरू किया है, जिसे ‘टेलीकॉम ई-सर्विसेज पोर्टल’ नाम दिया गया है। इस पोर्टल के जरिए कंपनियां विभिन्न सेवाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगी। अब तक मोबाइल, इंटरनेट या अन्य टेलीकॉम सेवाओं को शुरू करने के लिए कंपनियों को लंबी लाइसेंस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। कई मामलों में मंजूरी मिलने में महीनों का समय लग जाता था। नए ढांचे में लाइसेंस आधारित व्यवस्था की जगह अधिक सरल ऑथराइजेशन सिस्टम लागू किया गया है। सरकार का दावा है कि इससे कारोबार करना आसान होगा और नई तकनीकों के विस्तार में तेजी आएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विशेष बात यह भी है कि जो कंपनियां पहले से पुराने लाइसेंस ढांचे के तहत काम कर रही हैं, उन्हें भी नए सिस्टम में आने का विकल्प दिया गया है। इससे अलग-अलग लाइसेंसों और जटिल प्रक्रियाओं से जुड़ी परेशानियां कम होने की उम्मीद है। उद्योग जगत का मानना है कि डिजिटल मंजूरी व्यवस्था से प्रशासनिक लागत घटेगी और सेवाओं के विस्तार की गति बढ़ेगी। इसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर भी दिखाई दे सकता है। यदि कंपनियों का परिचालन खर्च कम होता है तो बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धा पैदा होगी और ग्राहकों को बेहतर इंटरनेट स्पीड, नई सेवाएं और संभावित रूप से अधिक किफायती प्लान्स मिल सकते हैं। सरकार ने सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को लेकर भी स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। आने वाले समय में कई वैश्विक कंपनियां भारत में सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवाएं शुरू करने की तैयारी कर रही हैं। ऐसे में नए नियमों के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि भारत में सेवाएं देने वाली सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों का मुख्य गेटवे या नियंत्रण केंद्र देश के भीतर ही स्थापित हो। अधिकारियों का मानना है कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिम कम होंगे और भारतीय उपभोक्ताओं का डेटा देश की निगरानी व्यवस्था के दायरे में रहेगा। साथ ही विदेशी कंपनियों द्वारा डेटा के संभावित दुरुपयोग की आशंकाओं पर भी नियंत्रण लगाया जा सकेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डेटा सुरक्षा को लेकर बनाए गए प्रावधानों को नए नियमों का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है। डिजिटल युग में डेटा को नई अर्थव्यवस्था का ईंधन माना जाता है और यही वजह है कि डेटा लीक, साइबर हमले और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे माहौल में सरकार चाहती है कि भारतीय नागरिकों की निजी जानकारी देश के भीतर ही संरक्षित रहे। इससे न केवल गोपनीयता मजबूत होगी बल्कि डेटा से जुड़े कानूनी विवादों और जांच प्रक्रियाओं को भी आसान बनाया जा सकेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील क्षेत्रों के लिए अलग प्रावधान भी किए गए हैं। जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व और अन्य रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकों में नेटवर्क विस्तार या नई सेवाएं शुरू करने से पहले कंपनियों को विशेष सुरक्षा मंजूरी प्राप्त करनी होगी। इसके अलावा संदिग्ध गतिविधियों, साइबर खतरों और देश विरोधी संचार की निगरानी के लिए भी कंपनियों को तकनीकी व्यवस्था विकसित करनी होगी। सरकार का मानना है कि इससे साइबर अपराध, ऑनलाइन फ्रॉड और अवैध नेटवर्क गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। टेलीकॉम सेक्टर में लागू किए गए इन नए नियमों को डिजिटल इंडिया अभियान के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। एक ओर सरकार नागरिकों की डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी को मजबूत करने पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर कारोबार के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाकर निवेश और तकनीकी विकास को बढ़ावा देने की कोशिश भी कर रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 12:16:49 +0530</pubDate>
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