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                <title>Healthy Habits - दैनिक जागरण</title>
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                <title>तनाव कम करने के लिए अपनाएं ये 7 आसान डेली हैबिट्स, मानसिक स्वास्थ्य रहेगा बेहतर</title>
                                    <description><![CDATA[भागदौड़ भरी जिंदगी में छोटी-छोटी अच्छी आदतें तनाव कम करने, मन शांत रखने और रोजमर्रा की चुनौतियों से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/adopt-these-7-easy-daily-habits-to-reduce-stress-mental/article-58447"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/stress-management.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">तनाव आज की जीवनशैली का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिससे शायद ही कोई पूरी तरह बच पाता हो। नौकरी का दबाव, पढ़ाई की चिंता, परिवार की जिम्मेदारियां, आर्थिक परेशानियां और लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है। कई बार लोग तनाव को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर और दिमाग दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि तनाव को पूरी तरह खत्म करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन कुछ आसान डेली हैबिट्स अपनाकर इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अच्छी बात यह है कि इसके लिए किसी महंगे इलाज या बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होती। रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें मानसिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। यदि दिन की शुरुआत सकारात्मक तरीके से हो और जीवनशैली में कुछ जरूरी बदलाव किए जाएं तो तनाव का असर काफी कम महसूस होता है। यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए नियमित दिनचर्या अपनाने की सलाह दी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे पहली आदत है सुबह की शुरुआत बिना मोबाइल फोन देखे करना। बहुत से लोग जागते ही सोशल मीडिया, ईमेल या खबरें देखने लगते हैं, जिससे दिमाग पर शुरुआत से ही अतिरिक्त दबाव बनने लगता है। इसके बजाय कुछ मिनट शांत बैठना, गहरी सांस लेना या हल्की स्ट्रेचिंग करना दिन को बेहतर बना सकता है। दूसरी जरूरी आदत है नियमित व्यायाम। रोजाना 30 मिनट की वॉक, योग या हल्की एक्सरसाइज शरीर में ऐसे हार्मोन सक्रिय करती है जो तनाव कम करने और मूड बेहतर बनाने में मदद करते हैं। तीसरी आदत पर्याप्त और अच्छी नींद लेना है। लगातार कम नींद लेने से चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है और मानसिक थकान महसूस होती है। अधिकांश विशेषज्ञ वयस्कों के लिए रोजाना सात से आठ घंटे की नींद को जरूरी मानते हैं। चौथी आदत संतुलित भोजन करना है। समय पर पौष्टिक भोजन और पर्याप्त पानी पीना भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। जरूरत से ज्यादा चाय, कॉफी या जंक फूड का सेवन कई लोगों में बेचैनी और तनाव बढ़ा सकता है। पांचवीं आदत अपने लिए थोड़ा समय निकालना है। दिनभर की व्यस्तता के बीच कुछ मिनट अपनी पसंद का संगीत सुनना, किताब पढ़ना, बागवानी करना या किसी रचनात्मक काम में समय बिताना मन को सुकून देता है। छठी आदत अपने करीबी लोगों से खुलकर बातचीत करना है। कई लोग अपनी परेशानियां मन में दबाकर रखते हैं, जिससे तनाव और बढ़ जाता है। परिवार या दोस्तों से बातचीत करने से मन हल्का होता है और समस्याओं को नए नजरिए से देखने का मौका मिलता है। सातवीं और सबसे अहम आदत है डिजिटल ब्रेक लेना। लगातार मोबाइल, लैपटॉप और सोशल मीडिया पर बने रहने से मानसिक थकान बढ़ सकती है। दिन में कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाना आंखों और दिमाग दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तनाव कम करने के लिए अपनाई गई ये सात आसान डेली हैबिट्स तभी असर दिखाती हैं जब इन्हें नियमित रूप से जीवन का हिस्सा बनाया जाए। एक-दो दिन अपनाने से बड़ा बदलाव नजर नहीं आता, लेकिन लगातार अभ्यास से मानसिक स्थिति में सकारात्मक सुधार महसूस होने लगता है। साथ ही समय प्रबंधन भी तनाव कम करने में अहम भूमिका निभाता है। जरूरी कामों की प्राथमिकता तय करना, एक साथ कई काम करने से बचना और बीच-बीच में छोटा ब्रेक लेना मानसिक दबाव को कम कर सकता है। अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक उदासी, बेचैनी, घबराहट, नींद न आना या किसी काम में मन न लगने जैसी समस्याएं लगातार बनी रहें तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर विकल्प हो सकता है। तनाव जीवन का हिस्सा जरूर है, लेकिन इसे जीवन पर हावी होने देना सही नहीं है। छोटी-छोटी सकारात्मक आदतें न केवल तनाव को कम करने में मदद करती हैं, बल्कि आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, रिश्तों को बेहतर बनाती हैं और काम करने की क्षमता में भी सुधार लाती हैं। स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मन भी उतना ही जरूरी है और इसकी शुरुआत रोजमर्रा की अच्छी आदतों से ही होती है। बदलती जीवनशैली के इस दौर में यदि लोग अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और नियमित रूप से इन आसान उपायों को अपनाएं, तो वे न सिर्फ तनाव से बेहतर तरीके से निपट पाएंगे बल्कि अधिक संतुलित, खुशहाल और ऊर्जावान जीवन भी जी सकेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:04:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रात को देर तक मोबाइल चलाना पड़ सकता है भारी, जानिए शरीर और दिमाग पर इसके गंभीर असर</title>
                                    <description><![CDATA[नींद की कमी से लेकर आंखों की समस्या, मानसिक तनाव और हार्मोन असंतुलन तक—विशेषज्ञ बताते हैं क्यों सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाना है जरूरी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/using-mobile-phone-till-late-at-night-can-be-harmful/article-58219"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mobile-at-night.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">रात को सोने से पहले मोबाइल फोन चलाना आज की जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना, चैटिंग करना या वेब सीरीज देखना कई लोगों की रोजमर्रा की आदत बन गई है। लेकिन यही आदत धीरे-धीरे सेहत पर भारी पड़ सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात तक मोबाइल स्क्रीन के सामने समय बिताने से न केवल नींद प्रभावित होती है, बल्कि इसका असर शरीर, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के समय में बच्चे, युवा और बुजुर्ग लगभग हर आयु वर्ग के लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी एक-दो घंटे तक मोबाइल देखते रहते हैं। शुरुआत में यह सामान्य आदत लगती है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करने से कई गंभीर समस्याएं जन्म ले सकती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करती है। यही हार्मोन शरीर को यह संकेत देता है कि अब सोने का समय हो गया है। जब रात में लंबे समय तक मोबाइल का इस्तेमाल किया जाता है, तो मस्तिष्क सक्रिय बना रहता है और नींद आने में देरी होती है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति पर्याप्त नींद नहीं ले पाता और अगले दिन थकान महसूस करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार कई दिनों तक नींद पूरी नहीं होने पर शरीर की कार्यक्षमता कम होने लगती है। इससे काम में मन नहीं लगता, याददाश्त कमजोर हो सकती है और दिनभर चिड़चिड़ापन बना रहता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आंखों पर बढ़ता है दबाव</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल स्क्रीन को लगातार देखने से आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे आंखों में जलन, सूखापन, धुंधला दिखाई देना और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कई लोग देर रात तक अंधेरे कमरे में मोबाइल चलाते हैं, जिससे आंखों को और अधिक नुकसान पहुंच सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मानसिक स्वास्थ्य भी हो सकता है प्रभावित</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">देर रात तक सोशल मीडिया का उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। लगातार नकारात्मक खबरें, तुलना की भावना और सोशल मीडिया का दबाव तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। कई बार लोग देर रात तक ऑनलाइन रहने के कारण मानसिक रूप से शांत नहीं हो पाते, जिससे दिमाग को आराम नहीं मिल पाता।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बढ़ सकता है मोटापा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कम लोग जानते हैं कि देर रात तक जागने और मोबाइल चलाने का संबंध वजन बढ़ने से भी जुड़ा हो सकता है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने पर शरीर में भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं। इसके कारण व्यक्ति को बार-बार भूख लगती है और जंक फूड खाने की इच्छा बढ़ सकती है। इसके अलावा देर रात तक जागने वाले लोग अक्सर शारीरिक गतिविधियां कम करते हैं, जिससे मोटापे का खतरा भी बढ़ जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गर्दन और पीठ में दर्द की समस्या</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल का लगातार उपयोग करते समय अधिकांश लोग गर्दन झुकाकर बैठते या लेटते हैं। लंबे समय तक इसी स्थिति में रहने से गर्दन, कंधे और पीठ में दर्द की शिकायत शुरू हो सकती है। इसे कई विशेषज्ञ "टेक्स्ट नेक" की समस्या भी मानते हैं।यदि यह आदत लंबे समय तक बनी रहती है तो रीढ़ की हड्डी पर भी असर पड़ सकता है और मांसपेशियों में खिंचाव की समस्या बढ़ सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हार्मोन संतुलन पर असर</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त नींद शरीर के हार्मोन संतुलन के लिए बेहद जरूरी होती है। लगातार देर रात तक मोबाइल चलाने और कम सोने से शरीर का जैविक चक्र प्रभावित होता है। इससे प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है और शरीर की रिकवरी प्रक्रिया भी धीमी पड़ सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बच्चों और किशोरों के लिए ज्यादा नुकसानदायक</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों और किशोरों में मोबाइल की लत तेजी से बढ़ रही है। पढ़ाई के बाद भी घंटों मोबाइल देखने से उनकी नींद, पढ़ाई और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। कई बच्चों में ध्यान की कमी, व्यवहार में बदलाव और आंखों की समस्याएं भी देखने को मिल रही हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें और सोने से पहले मोबाइल के इस्तेमाल की आदत को सीमित करें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>कैसे करें बचाव</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कुछ आसान उपाय अपनाने की सलाह देते हैं। सोने से कम से कम 45 मिनट से एक घंटे पहले मोबाइल का उपयोग बंद कर दें। यदि जरूरी हो तो मोबाइल में ब्लू लाइट फिल्टर या नाइट मोड का इस्तेमाल करें। बिस्तर पर मोबाइल लेकर न जाएं और अलार्म के लिए अलग घड़ी का उपयोग करें। रात के समय किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या ध्यान करना बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इसके अलावा दिनभर नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और समय पर सोने की आदत भी अच्छी नींद और बेहतर स्वास्थ्य के लिए जरूरी मानी जाती है। आज के डिजिटल दौर में मोबाइल हमारी जरूरत बन चुका है, लेकिन इसका सही समय और सीमित उपयोग ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है। छोटी-सी सावधानी भविष्य में कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकती है। यदि आप भी रात को देर तक मोबाइल चलाने की आदत रखते हैं, तो समय रहते इस आदत में बदलाव करना आपके शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 17:37:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>स्क्रीन के दौर में कितना काम सही, कब रुकना है यह समझना भी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लैपटॉप और मोबाइल के सामने बिताया गया समय केवल आंखों ही नहीं, शरीर और दिमाग पर भी असर डाल सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/in-the-age-of-screens-it-is-important-to-understand/article-55858"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/monsoon-skin-care-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज की दुनिया पहले से काफी अलग हो चुकी है। काम करने के तरीके बदल गए हैं और अब बड़ी संख्या में लोग दिन का अधिकांश समय कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन के सामने बिताते हैं। दफ्तरों से लेकर घरों तक, पढ़ाई से लेकर व्यापार तक, लगभग हर काम किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ गया है। ऐसे में एक सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर एक व्यक्ति को दिन में कितने घंटे काम करना चाहिए और लगातार स्क्रीन देखने से होने वाले असर से खुद को कैसे बचाया जा सकता है। मेरी नजर में काम के घंटों का कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं है जो हर व्यक्ति पर लागू हो सके। किसी का काम शारीरिक होता है तो किसी का मानसिक। कोई कम समय में बेहतर परिणाम दे देता है तो कोई ज्यादा समय लगाता है। फिर भी यदि सामान्य स्थिति की बात करें तो 7 से 9 घंटे का कार्य समय संतुलित माना जा सकता है। इससे व्यक्ति को अपने परिवार, स्वास्थ्य, आराम और व्यक्तिगत जीवन के लिए भी पर्याप्त समय मिल जाता है। असल समस्या तब पैदा होती है जब काम केवल समय का खेल बन जाता है। आज कई लोग 10 से 12 घंटे तक लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। शुरुआत में यह सामान्य लगता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका असर दिखाई देने लगता है। आंखों में थकान, सिर भारी लगना, गर्दन में जकड़न, पीठ दर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। कई बार व्यक्ति को लगता है कि वह ज्यादा समय देकर ज्यादा काम कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह होती है कि लंबे समय तक लगातार काम करने से एकाग्रता कम होने लगती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरा मानना है कि काम की गुणवत्ता हमेशा काम के घंटों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति आठ घंटे में अपना काम अच्छे ढंग से पूरा कर सकता है तो उसे केवल दिखावे के लिए देर रात तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने की जरूरत नहीं है। उत्पादकता का मतलब केवल अधिक समय तक काम करना नहीं, बल्कि बेहतर परिणाम देना भी है। स्क्रीन आधारित काम करने वालों के लिए सबसे जरूरी बात आंखों का ध्यान रखना है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है। इसलिए हर कुछ समय बाद नजरें स्क्रीन से हटानी चाहिए। कई लोग घंटों तक बिना रुके काम करते रहते हैं, जिससे आंखों में सूखापन और जलन की समस्या बढ़ सकती है। थोड़ी देर के लिए दूर देखना या कुछ मिनट का ब्रेक लेना आंखों को आराम देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही स्क्रीन की रोशनी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई लोग बहुत तेज ब्राइटनेस पर काम करते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत कम रोशनी में स्क्रीन देखते हैं। दोनों ही स्थितियां आंखों को प्रभावित कर सकती हैं। कमरे की रोशनी और स्क्रीन की ब्राइटनेस में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। शाम और रात के समय मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय स्क्रीन की चमक कम रखना बेहतर माना जाता है। एक और बड़ी समस्या लंबे समय तक बैठे रहना है। आधुनिक जीवनशैली में लोगों की शारीरिक गतिविधियां लगातार कम हो रही हैं। सुबह कुर्सी पर बैठकर काम शुरू होता है और कई बार देर शाम तक वही स्थिति बनी रहती है। इससे शरीर की मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं और कमर, कंधे तथा गर्दन में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। इसलिए हर घंटे कुछ मिनट के लिए उठना, चलना और शरीर को स्ट्रेच करना जरूरी है। बैठने की सही मुद्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कंप्यूटर स्क्रीन आंखों के स्तर से बहुत नीचे या ऊपर हो तो गर्दन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी तरह गलत ऊंचाई वाली कुर्सी और टेबल भी परेशानी बढ़ा सकती है। आज कम उम्र के युवाओं में भी पीठ और गर्दन से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका एक कारण लगातार गलत मुद्रा में काम करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल फोन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। दिनभर लैपटॉप पर काम करने के बाद भी कई लोग घंटों सोशल मीडिया, वीडियो या गेम में समय बिताते हैं। इससे कुल स्क्रीन टाइम काफी बढ़ जाता है। ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि काम के बाद कुछ समय स्क्रीन से दूरी बनाई जाए। परिवार के साथ बातचीत, किताब पढ़ना, टहलना या किसी शौक को समय देना मानसिक रूप से भी राहत देता है। नींद पर भी स्क्रीन का सीधा असर पड़ता है। रात में सोने से ठीक पहले मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत अब आम हो चुकी है। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी लंबे समय तक स्क्रीन देखते रहते हैं। इसका असर नींद की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। यदि सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन का उपयोग कम कर दिया जाए तो दिमाग को आराम मिलने में मदद मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम जरूरी है और सफलता हासिल करने के लिए मेहनत भी जरूरी है। लेकिन यह भी सच है कि स्वास्थ्य से बड़ा कोई निवेश नहीं होता। यदि काम के कारण शरीर और मन लगातार थकान महसूस करने लगें तो लंबे समय में इसका असर जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ सकता है। इसलिए काम और आराम के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। मेरे विचार से सफलता का मतलब केवल ज्यादा घंटे काम करना नहीं है। असली सफलता वही है जिसमें करियर आगे बढ़े, लेकिन स्वास्थ्य पीछे न छूटे। नियमित ब्रेक, पर्याप्त नींद, थोड़ी शारीरिक गतिविधि और सीमित स्क्रीन टाइम जैसी छोटी आदतें लंबे समय तक बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकती हैं। काम कीजिए, लक्ष्य हासिल कीजिए, लेकिन अपने शरीर और आंखों को नजरअंदाज किए बिना। यही आधुनिक दौर में स्वस्थ और संतुलित जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 17:43:00 +0530</pubDate>
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                <title>स्मार्ट बच्चों की स्क्रीन टाइम आदत कैसे कंट्रोल करें:  पेरेंटिंग के असरदार तरीके</title>
                                    <description><![CDATA[मोबाइल और टीवी के बढ़ते उपयोग के बीच बच्चों की दिनचर्या संतुलित रखने के व्यावहारिक उपाय]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/6996c1d6edb13/article-46674"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/busniess-(76).jpg" alt=""></a><br /><p>डिजिटल दौर में बच्चों का स्क्रीन से जुड़ाव तेजी से बढ़ा है। ऑनलाइन पढ़ाई, गेम्स और मनोरंजन के साधनों ने मोबाइल, टैबलेट और टीवी को उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना दिया है। हालांकि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की आंखों, नींद, व्यवहार और मानसिक विकास पर असर डाल सकता है। ऐसे में माता-पिता के लिए यह समझना जरूरी है कि स्क्रीन को पूरी तरह हटाने के बजाय संतुलित उपयोग कैसे सुनिश्चित किया जाए।</p>
<h5><strong>स्क्रीन टाइम के लिए स्पष्ट नियम बनाएं</strong></h5>
<p>सबसे पहले घर में स्क्रीन उपयोग को लेकर स्पष्ट और व्यावहारिक नियम तय करें। बच्चों की उम्र के अनुसार समय सीमा तय करें और उसे नियमित रूप से लागू करें। उदाहरण के तौर पर पढ़ाई के बाद सीमित समय तक ही मोबाइल या टीवी देखने की अनुमति दें। नियम जितने स्पष्ट होंगे, बच्चे उन्हें उतनी आसानी से स्वीकार करेंगे।</p>
<h5><strong>खुद उदाहरण बनें</strong></h5>
<p>बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। यदि घर के बड़े लगातार मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों से स्क्रीन कम करने की अपेक्षा प्रभावी नहीं होगी। परिवार के साथ समय बिताते समय स्क्रीन से दूरी बनाकर सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करें।</p>
<h5><strong>वैकल्पिक गतिविधियों को बढ़ावा दें</strong></h5>
<p>स्क्रीन की जगह रोचक और रचनात्मक गतिविधियों को शामिल करें। खेलकूद, पेंटिंग, कहानी पढ़ना, संगीत या आउटडोर गतिविधियां बच्चों को व्यस्त रखने के बेहतर विकल्प हैं। जब बच्चे नई गतिविधियों में रुचि लेने लगते हैं, तो स्क्रीन पर निर्भरता स्वतः कम होने लगती है।</p>
<h5><strong>नो-स्क्रीन ज़ोन तय करें</strong></h5>
<p>घर में कुछ जगहों और समय को ‘नो-स्क्रीन’ घोषित करना प्रभावी उपाय हो सकता है। जैसे भोजन के समय, सोने से एक घंटा पहले और परिवार के साथ बातचीत के दौरान स्क्रीन का उपयोग न करने का नियम बनाएं। इससे बच्चों में अनुशासन और संतुलन की आदत विकसित होती है।</p>
<h5><strong>बातचीत और समझ जरूरी</strong></h5>
<p>स्क्रीन के नुकसान केवल प्रतिबंध लगाकर नहीं समझाए जा सकते। बच्चों से सरल भाषा में बातचीत करें और उन्हें बताएं कि आंखों की सेहत, नींद और पढ़ाई पर इसका क्या असर पड़ता है। जब बच्चे कारण समझते हैं, तो वे नियमों का पालन करने के लिए अधिक तैयार होते हैं।</p>
<h5><strong>तकनीक का समझदारी से उपयोग</strong></h5>
<p>पैरेंटल कंट्रोल, स्क्रीन टाइम ट्रैकिंग और कंटेंट फिल्टर जैसे विकल्प तकनीक को सुरक्षित बनाने में मदद करते हैं। इन सुविधाओं के माध्यम से माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं और अनुचित सामग्री से उन्हें दूर रख सकते हैं।</p>
<h5><strong>संतुलन ही सबसे बेहतर समाधान</strong></h5>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से बच्चों में जिज्ञासा और विरोध की भावना बढ़ सकती है। इसलिए संतुलित उपयोग और सही मार्गदर्शन ही सबसे कारगर तरीका है। परिवार का सहयोग, नियमित संवाद और सकारात्मक वातावरण बच्चों को स्वस्थ डिजिटल आदतें अपनाने में मदद करता है।</p>
<p>बदलते समय में तकनीक से दूरी संभव नहीं, लेकिन उसका सही उपयोग जरूर सिखाया जा सकता है। थोड़े प्रयास और नियमितता से बच्चों की स्क्रीन टाइम आदत को संतुलित बनाया जा सकता है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर बना रहता है।</p>
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                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 14:54:09 +0530</pubDate>
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