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                <title>बिलासपुर के स्कूलों में बिना किताबों के पढ़ाई, नए शिक्षा सत्र के 15 दिन बाद भी नहीं पहुंचीं पाठ्य पुस्तकें</title>
                                    <description><![CDATA[70 और 80 जीएसएम कागज विवाद, टेंडर प्रक्रिया और तकनीकी देरी बनी वजह। जिला शिक्षा अधिकारी ने जल्द वितरण का भरोसा दिया, लाखों छात्र अब भी नई किताबों का इंतजार कर रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/studying-without-books-in-bilaspur-schools-text-books-did-not/article-57950"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bilaspur-schools.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में नया शिक्षा सत्र शुरू हुए दो सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन सरकारी स्कूलों के हजारों विद्यार्थियों को अब तक नई पाठ्य पुस्तकें नहीं मिल सकी हैं। स्कूलों में नियमित रूप से कक्षाएं लग रही हैं, शिक्षक पढ़ाई भी करवा रहे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में छात्र बिना किताबों के ही पढ़ाई करने को मजबूर हैं। कई बच्चे पुराने नोट्स, पिछले सत्र की किताबों या शिक्षकों द्वारा ब्लैकबोर्ड पर लिखाए गए पाठ के सहारे अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं। शिक्षा सत्र की शुरुआत में ही किताबों की अनुपलब्धता ने विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार इस बार किताबों के वितरण में देरी का मुख्य कारण कागज की गुणवत्ता को लेकर चला विवाद, टेंडर प्रक्रिया में विलंब और प्रशासनिक स्तर पर हुई तकनीकी दिक्कतें हैं। पाठ्य पुस्तक निगम से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस वर्ष 70 जीएसएम और 80 जीएसएम कागज के उपयोग को लेकर लंबे समय तक निर्णय नहीं हो सका। इसी वजह से किताबों की छपाई निर्धारित समय पर पूरी नहीं हो पाई और वितरण प्रक्रिया भी प्रभावित हो गई। इसका सीधा असर स्कूलों में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों पर दिखाई दे रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिलासपुर जिले में करीब तीन लाख विद्यार्थियों के लिए नए शिक्षा सत्र में लगभग 15 लाख पाठ्य पुस्तकों की आवश्यकता है। कक्षा के अनुसार प्रत्येक छात्र को तीन से छह किताबें उपलब्ध कराई जाती हैं। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को तीन से चार पुस्तकें, मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों को लगभग पांच और हाईस्कूल स्तर पर छह तक किताबें दी जाती हैं। राज्य सरकार की योजना के तहत कक्षा पहली से दसवीं तक पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों को निशुल्क पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं। इन पुस्तकों की छपाई और स्कूलों तक वितरण की जिम्मेदारी पाठ्य पुस्तक निगम की होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार नया सत्र शुरू होने से पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि सभी स्कूलों में समय पर किताबें पहुंच जाएंगी। कुछ समय पहले बिलासपुर दौरे पर आए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने भी अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि नए सत्र की शुरुआत से पहले सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली जाएं और विद्यार्थियों तक किताबें समय पर पहुंचाई जाएं। हालांकि जमीनी स्थिति इससे अलग दिखाई दे रही है। जिले के कई सरकारी और कुछ निजी विद्यालयों में अब तक विद्यार्थियों को पूरी पुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई जा सकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बिना किताबों के पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों का कहना है कि उन्हें फिलहाल पुराने नोट्स या पिछले साल की पुस्तकों से पढ़ने को कहा गया है। कई बच्चों ने बताया कि शिक्षक बोर्ड पर पाठ लिखवाकर पढ़ाई करा रहे हैं, लेकिन किताबें नहीं होने से घर पर दोबारा पढ़ाई करने में परेशानी होती है। जिन विद्यार्थियों के पास पुराने संस्करण की किताबें भी नहीं हैं, उन्हें सहपाठियों की मदद लेनी पड़ रही है। इससे पढ़ाई की गति भी प्रभावित हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अभिभावकों ने भी इस स्थिति पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि जब शिक्षा विभाग को पहले से स्कूल खुलने की तारीख की जानकारी थी, तो किताबों की छपाई और वितरण की प्रक्रिया समय रहते पूरी कर लेनी चाहिए थी। उनका मानना है कि शिक्षा सत्र के शुरुआती दिनों में ही पढ़ाई की मजबूत नींव रखी जाती है। यदि इसी समय विद्यार्थियों को जरूरी अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं होगी तो इसका असर पूरे सत्र की पढ़ाई पर पड़ सकता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार इस बार राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के नए दिशा-निर्देशों के कारण भी प्रकाशन प्रक्रिया में बदलाव करना पड़ा। पहले विभाग 70 जीएसएम कागज पर किताबें छपवाता था, लेकिन इस बार 80 जीएसएम कागज पर छपाई का प्रस्ताव सामने आया। बाद में इस पर यह तर्क दिया गया कि मोटे कागज से किताबों का वजन बढ़ जाएगा और बच्चों के स्कूल बैग अधिक भारी हो जाएंगे। इस मुद्दे पर आपत्तियां आने के बाद प्रस्ताव में संशोधन करना पड़ा, जिससे टेंडर प्रक्रिया दोबारा प्रभावित हुई और किताबों की छपाई में अपेक्षा से अधिक समय लग गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसएम यानी ग्राम प्रति वर्ग मीटर, कागज की मोटाई और वजन मापने का मानक होता है। 70 जीएसएम कागज सामान्य रूप से कॉपियों और पुस्तकों में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि 80 जीएसएम कागज अधिक मजबूत और बेहतर गुणवत्ता वाला माना जाता है। हालांकि इसकी मोटाई अधिक होने से किताबों का कुल वजन भी बढ़ जाता है। यही वजह रही कि इस मुद्दे पर लंबे समय तक विचार-विमर्श चलता रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर जायसवाल ने कहा है कि पाठ्य पुस्तक निगम से नई किताबें जिले में पहुंच चुकी हैं और उनका वितरण जल्द शुरू किया जाएगा। उन्होंने बताया कि स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों सहित अन्य विद्यालयों में भी अगले दो से तीन दिनों के भीतर किताबें पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। निजी स्कूलों के लिए भी जल्द वितरण शुरू होने की बात कही गई है। हर नए शिक्षा सत्र की शुरुआत में विद्यार्थियों को समय पर किताबें उपलब्ध कराना बेहद जरूरी होता है। शुरुआती दिनों में पढ़ाई का आधार मजबूत किया जाता है और यदि इसी दौरान अध्ययन सामग्री उपलब्ध न हो तो सीखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। ऐसे में विभाग के लिए जरूरी है कि भविष्य में टेंडर, छपाई और वितरण की पूरी प्रक्रिया पहले से तय समय सीमा के भीतर पूरी की जाए ताकि विद्यार्थियों को ऐसी परेशानी का सामना न करना पड़े।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:24:00 +0530</pubDate>
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                <title>बिना इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ रहा जनरल नॉलेज, गांव की दीवारें बनीं बच्चों की पाठशाला</title>
                                    <description><![CDATA[बिलासपुर के ग्राम पंचायत सेलर में विद्यार्थियों के लिए अनोखी पहल शुरू की गई है। स्कूल जाने वाले रास्ते की दीवारों पर सामान्य ज्ञान के प्रश्न लिखे जा रहे हैं, ताकि बच्चे रोज पढ़ते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/general-knowledge-is-increasing-without-internet-and-mobile-village-walls/article-57211"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/general-knowledge.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बिलासपुर जिले के ग्राम पंचायत सेलर में शिक्षा को लेकर एक अनोखी पहल शुरू की गई है, जिसकी चर्चा अब आसपास के इलाकों में भी होने लगी है। यहां बच्चों के जनरल नॉलेज को मजबूत बनाने के लिए स्कूल के रास्ते की दीवारों को ही खुली पाठशाला में बदल दिया गया है। गांव के सरपंच धनंजय सिंह के नेतृत्व में स्कूल से मुख्य गुड्डी तक की दीवारों पर सामान्य ज्ञान से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न लिखे गए हैं। इसका उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी रोजाना स्कूल आते-जाते इन प्रश्नों को पढ़ें और बिना अलग से समय निकाले सामान्य ज्ञान की तैयारी करते रहें। इस पहल की खास बात यह है कि इसमें किसी प्रकार की सरकारी राशि का उपयोग नहीं किया जा रहा, बल्कि पूरा कार्य ग्रामीणों के जनसहयोग से किया जा रहा है। ग्राम पंचायत का मानना है कि आज के समय में लगभग हर प्रतियोगी परीक्षा में सामान्य ज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में यदि बच्चों को शुरुआती स्तर से ही इतिहास, भूगोल, विज्ञान, भारतीय संविधान, खेल, संस्कृति और समसामयिक घटनाओं की जानकारी मिलती रहे तो आगे चलकर उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं में काफी मदद मिलेगी। इसी सोच के साथ गांव में दीवार लेखन का यह अभियान शुरू किया गया है। विद्यार्थी रोज जब स्कूल जाएंगे और लौटेंगे तो इन प्रश्नों पर उनकी नजर पड़ेगी। धीरे-धीरे यही जानकारी उनकी याददाश्त का हिस्सा बन जाएगी और पढ़ाई के प्रति उनकी रुचि भी बढ़ेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस अभियान को केवल एक बार का प्रयोग बनाकर नहीं छोड़ा गया है। पंचायत ने पहले से ही इसकी आगे की योजना भी तैयार कर ली है। तय किया गया है कि हर 60 दिन बाद दीवारों पर लिखे पुराने प्रश्न हटाकर उनकी जगह नए प्रश्न लिखे जाएंगे। इससे विद्यार्थियों को लगातार नई जानकारी मिलती रहेगी और वे एक ही विषय तक सीमित नहीं रहेंगे। हर दो महीने में अलग-अलग विषयों के प्रश्न लिखे जाने से बच्चों का ज्ञान लगातार बढ़ेगा और उन्हें देश-दुनिया से जुड़ी नई जानकारियां भी मिलती रहेंगी। पंचायत ने इस पहल को और प्रभावी बनाने के लिए प्रतियोगिता का भी रास्ता चुना है। प्रत्येक दो माह बाद कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए सामान्य ज्ञान की परीक्षा आयोजित की जाएगी। परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित और पुरस्कृत किया जाएगा। पंचायत का मानना है कि पुरस्कार मिलने से बच्चों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होगी और वे नियमित रूप से पढ़ाई के लिए प्रेरित होंगे। इससे केवल अच्छे अंक लाने की सोच नहीं बल्कि सीखने की आदत भी विकसित होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस अभियान में केवल पंचायत ही नहीं बल्कि पूरा गांव सहयोग कर रहा है। स्कूल विकास समिति के अध्यक्ष, समिति के सदस्य, शिक्षक और गांव के कई गणमान्य नागरिक इसमें सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। दीवारों पर प्रश्न लिखने से लेकर उन्हें समय-समय पर बदलने तक का पूरा काम जनसहयोग से किया जा रहा है। पंचायत का कहना है कि भविष्य में गांव के अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भी सामान्य ज्ञान से जुड़े सवाल लिखे जाएंगे, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। सरपंच धनंजय सिंह का कहना है कि यदि विद्यार्थी प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी सामान्य ज्ञान की जानकारी भी हासिल करते रहें तो 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते उनके पास हजारों महत्वपूर्ण प्रश्नों का संग्रह होगा। इससे वे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अधिक आत्मविश्वास के साथ शामिल हो सकेंगे। उनका मानना है कि पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि गांव का वातावरण भी सीखने वाला बन जाए तो बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिक्षकों का भी कहना है कि बच्चों के लिए यह पहल काफी उपयोगी साबित होगी। सामान्य तौर पर विद्यार्थी सामान्य ज्ञान को अलग विषय मानकर कम महत्व देते हैं, लेकिन जब वही जानकारी रोज रास्ते में दिखाई देगी तो उसे पढ़ना उनकी आदत बन जाएगी। बार-बार एक ही प्रश्न देखने और पढ़ने से याददाश्त मजबूत होती है और बिना किसी अतिरिक्त दबाव के सीखने की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है। यह तरीका खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के उन विद्यार्थियों के लिए अधिक फायदेमंद हो सकता है, जिनके पास इंटरनेट या डिजिटल संसाधनों की सीमित पहुंच है। सामान्य ज्ञान केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। यह व्यक्तित्व विकास, तार्किक सोच और जागरूक नागरिक बनने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश, संविधान, विज्ञान, पर्यावरण और समसामयिक घटनाओं की जानकारी बच्चों को समाज और दुनिया को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है। ऐसे प्रयास ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। ग्राम पंचायत सेलर की यह पहल अब दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। कम संसाधनों में शिक्षा को रोचक और प्रभावी बनाने का यह मॉडल दिखाता है कि यदि स्थानीय स्तर पर इच्छाशक्ति और जनसहयोग हो तो बड़े बदलाव संभव हैं। आने वाले समय में यदि अन्य पंचायतें भी इस तरह के प्रयास अपनाती हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों विद्यार्थियों को इसका सीधा लाभ मिल सकता है और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उनकी तैयारी पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 15:39:56 +0530</pubDate>
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