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                <title>Research - दैनिक जागरण</title>
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                <title>भोपाल में 12 जुलाई को होगा कालिदास राष्ट्रीय महर्षि ज्योतिष विज्ञान सम्मेलन का समापन</title>
                                    <description><![CDATA[दो दिवसीय सम्मेलन में देशभर से आए 300 से अधिक विद्वान, ज्योतिषाचार्य और शोधकर्ता वैदिक ज्योतिष, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत पर मंथन कर रहे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/kalidas-national-maharishi-astrology-science-conference-will-conclude-on-12th/article-58472"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/kalidas-conference.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भोपाल में आयोजित दो दिवसीय कालिदास राष्ट्रीय महर्षि ज्योतिष विज्ञान सम्मेलन अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। 12 जुलाई को सम्मेलन का समापन होगा, जिसमें देशभर से आए विद्वान, ज्योतिषाचार्य, शोधकर्ता और सांस्कृतिक विशेषज्ञ अंतिम सत्रों में भाग लेंगे। सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक ज्योतिष और प्राचीन वैज्ञानिक विचारों पर गंभीर अकादमिक चर्चा को बढ़ावा देना है। इस आयोजन में 300 से अधिक विद्वानों और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों की भागीदारी दर्ज की गई है। दो दिनों तक चले विभिन्न तकनीकी और शैक्षणिक सत्रों में भारतीय ज्योतिष शास्त्र के विभिन्न पहलुओं, शोध कार्यों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। आयोजकों के अनुसार सम्मेलन का मकसद केवल पारंपरिक ज्ञान को याद करना नहीं, बल्कि उसे आधुनिक समय की जरूरतों के अनुरूप समझना और शोध के माध्यम से आगे बढ़ाना भी है। यही कारण है कि इसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आए विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और शोध साझा किए।</p>
<p style="text-align:justify;">सम्मेलन के दौरान वैदिक ज्योतिष, पंचांग विज्ञान, भारतीय दर्शन, खगोल विज्ञान, संस्कृति और शिक्षा जैसे विषयों पर कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में शोधकर्ताओं ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए और विशेषज्ञों के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया। कई वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक सोच और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणालियां केवल धार्मिक या सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा और जीवन शैली के अनेक पहलुओं से भी जुड़ी रही हैं। सम्मेलन में इस बात पर भी चर्चा हुई कि नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने के लिए शोध, उच्च शिक्षा और अकादमिक संस्थानों की भूमिका को और मजबूत करने की जरूरत है। प्रतिभागियों ने यह भी कहा कि प्राचीन ग्रंथों और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक की मदद से संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे लाभ उठा सकें। सम्मेलन के दौरान विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों को एक साझा मंच मिला, जहां उन्होंने अपने शोध अनुभव साझा किए और भारतीय ज्योतिष विज्ञान से जुड़े नए दृष्टिकोणों पर चर्चा की। आयोजन में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र रहे, जिनमें भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली। इन प्रस्तुतियों ने सम्मेलन के शैक्षणिक वातावरण को सांस्कृतिक रंग भी प्रदान किया।</p>
<p style="text-align:justify;">सम्मेलन के समापन दिवस पर कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। अंतिम दिन समापन सत्र, विशिष्ट विद्वानों के मुख्य व्याख्यान और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण तथा संवर्धन पर विशेष चर्चा आयोजित की जाएगी। इसके साथ ही सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत शोधपत्रों और प्रमुख निष्कर्षों का भी सार प्रस्तुत किया जाएगा। आयोजकों का मानना है कि ऐसे आयोजनों से देशभर के शोधकर्ताओं, शिक्षकों और सांस्कृतिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है और पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों पर नए शोध को प्रोत्साहन मिलता है। सम्मेलन में शामिल विद्वानों ने शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि प्राचीन ज्ञान को समकालीन संदर्भों में नई पहचान मिल सके। भोपाल में आयोजित यह राष्ट्रीय सम्मेलन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। दो दिनों तक चले इस आयोजन ने न केवल देशभर के विशेषज्ञों को एक मंच पर जोड़ा, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक ज्योतिष और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर नए विचारों और शोध को भी गति दी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 11:27:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>दुर्ग यूनिवर्सिटी में 11 साल बाद शुरू होगी यूटीडी, जुलाई से पीजी पढ़ाई</title>
                                    <description><![CDATA[फिजिक्स, केमिस्ट्री समेत पांच विषयों में होगी शुरुआत, नई बिल्डिंग का लोकार्पण अब भी बाकी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/utd-will-start-pg-studies-in-durg-university-after-11/article-57216"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/durg-university.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दुर्ग स्थित हेमचंद यादव विश्वविद्यालय अब केवल परीक्षा आयोजित करने और परिणाम घोषित करने वाली संस्था नहीं रहेगा। करीब 11 साल बाद विश्वविद्यालय में पहली बार यूनिवर्सिटी टीचिंग डिपार्टमेंट (यूटीडी) की शुरुआत होने जा रही है। नए शैक्षणिक सत्र से विश्वविद्यालय परिसर में सीधे स्नातकोत्तर (पीजी) स्तर की पढ़ाई शुरू होगी। इसके लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथेमेटिक्स, बॉटनी और जूलॉजी जैसे पांच विषयों को मंजूरी मिल चुकी है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने जुलाई से कक्षाएं शुरू करने की तैयारी पूरी कर ली है। प्रवेश प्रक्रिया के बाद विद्यार्थियों के लिए नियमित अध्ययन और शोध का नया अध्याय शुरू होगा। लंबे समय से इस पहल का इंतजार किया जा रहा था, जिसे अब आखिरकार अमलीजामा पहनाया जा रहा है। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की स्थापना अप्रैल 2015 में हुई थी। स्थापना के बाद से विश्वविद्यालय का मुख्य कार्य संबद्ध कॉलेजों की परीक्षाएं आयोजित करना, परिणाम जारी करना और प्रशासनिक गतिविधियों तक सीमित रहा। विश्वविद्यालय परिसर में सीधे पढ़ाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण यहां यूटीडी शुरू नहीं हो सका था। अब पहली बार विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय परिसर में ही उच्च शिक्षा और शोध का अवसर मिलेगा। कुलपति प्रो. संजय तिवारी के अनुसार विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना भी है। इसी दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिन पांच विषयों का प्रस्ताव भेजा था, उन्हें स्वीकृति मिल चुकी है। इनमें फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथेमेटिक्स, बॉटनी और जूलॉजी शामिल हैं। इन सभी विषयों में स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई जुलाई से शुरू होगी। इसके लिए अधिसूचना भी जारी कर दी गई है। प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमित कक्षाओं का संचालन शुरू कर दिया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे दुर्ग और आसपास के जिलों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होने से छात्रों को समय और खर्च दोनों की बचत होगी। विश्वविद्यालय ने केवल पारंपरिक विषयों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है। कुलपति प्रो. तिवारी ने बताया कि ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) से आठ नए प्रोफेशनल कोर्स को भी मंजूरी मिल चुकी है। इनमें एमबीए, एमसीए और फिनटेक जैसे आधुनिक पाठ्यक्रम शामिल हैं। इसके अलावा राज्य सरकार के विजन डॉक्यूमेंट को ध्यान में रखते हुए सप्लाई चेन मैनेजमेंट, ब्लॉकचेन मैनेजमेंट और ट्रैवल एंड टूरिज्म जैसे रोजगार आधारित कोर्स शुरू करने की तैयारी भी की जा रही है। इन कोर्सों का उद्देश्य छात्रों को बदलते रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय प्रशासन भविष्य में विशेष शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा कदम उठाने की योजना बना रहा है। रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया (आरसीआई) से स्पेशल बीएड प्रोग्राम शुरू करने का प्रस्ताव अंतिम चरण में है। अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान समय में केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में स्पेशल बीएड प्रशिक्षित शिक्षकों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसे देखते हुए विश्वविद्यालय सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन स्पेशल एजुकेशन स्थापित करना चाहता है। राज्य सरकार से अनुमति मिलने के बाद इस दिशा में काम शुरू किया जाएगा। यूटीडी शुरू करने की योजना नई नहीं है। करीब आठ वर्ष पहले इसके लिए प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर सहित कुल 64 पदों को स्वीकृति मिल चुकी थी। हालांकि विभिन्न प्रशासनिक कारणों से नियुक्ति प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी और यूटीडी शुरू नहीं हो पाया। अब जब विश्वविद्यालय में नियमित पढ़ाई शुरू होने जा रही है तो इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया दोबारा शुरू होने की उम्मीद भी बढ़ गई है। इससे न केवल विश्वविद्यालय में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति होगी, बल्कि शोध और अकादमिक गतिविधियों को भी मजबूती मिलेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि विश्वविद्यालय की नई बिल्डिंग पूरी तरह तैयार होने के बावजूद अब तक उसका औपचारिक लोकार्पण नहीं हो पाया है। इसी कारण शुरुआती दौर में पढ़ाई और प्रायोगिक कक्षाओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। कुलपति ने बताया कि इस संबंध में शासकीय वीवाईटी साइंस कॉलेज के साथ एमओयू किया गया है। जिन विषयों के लिए अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होगी, वहां विद्यार्थियों को सहयोगी कॉलेजों की लैब सुविधाओं का उपयोग कराया जाएगा। विश्वविद्यालय परिसर में भी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए कुछ प्रायोगिक कार्य कराए जाएंगे ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो। प्रशासन का कहना है कि रूसा योजना के तहत सहयोगी कॉलेजों में प्रयोगशालाओं और अन्य शैक्षणिक सुविधाओं को पहले ही मजबूत किया जा चुका है। इसका लाभ सीधे विद्यार्थियों को मिलेगा। विश्वविद्यालय का मानना है कि यूटीडी की शुरुआत से केवल नियमित पढ़ाई ही नहीं, बल्कि शोध गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। प्री-पीएचडी परीक्षा पहले ही शुरू हो चुकी है और आने वाले समय में रिसर्च को विश्वविद्यालय की प्राथमिकता बनाया जाएगा। साथ ही मेरिट सूची में स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को गोल्ड मेडल देकर सम्मानित करने की भी योजना है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 15:39:26 +0530</pubDate>
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