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                <title>Public Interest Litigation - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Public Interest Litigation RSS Feed</description>
                
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                <title>बिजली कटौती पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- सिर्फ योजना नहीं, जनता को जमीन पर राहत दिखनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[बार-बार बिजली गुल होने पर शासन ने पेश किया एक्शन प्लान, हाईकोर्ट ने प्रगति रिपोर्ट मांगी; अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-courts-strictness-on-power-cuts-said-not-just/article-58286"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bilaspur-power-cut.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">बारिश और आंधी-तूफान के दौरान बिलासपुर में लगातार हो रही बिजली कटौती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और बिजली विभाग के रवैये पर सख्त टिप्पणी की है। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया गया है और कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट होने के बजाय स्पष्ट कहा कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देगा और आम लोगों को वास्तविक राहत नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे दावों का कोई खास महत्व नहीं रहेगा। कोर्ट ने प्रशासन को योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने और प्रगति रिपोर्ट शपथ पत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से ऊर्जा सचिव और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के प्रबंध निदेशक ने अपना जवाब अदालत में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि बिलासपुर शहर की बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए राज्य स्तर पर बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें नौ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इन फैसलों के तहत बिजली आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और भरोसेमंद बनाने की योजना तैयार की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल यह पूरा मामला बिलासपुर में कुछ दिनों पहले हुई भारी बारिश और तेज आंधी के बाद सामने आया था। शहर के कई हिस्सों में पूरी रात बिजली आपूर्ति बाधित रही। हालात ऐसे थे कि वीवीआईपी क्षेत्र माने जाने वाले कलेक्ट्रेट और सिविल लाइन जैसे इलाकों में भी लंबे समय तक बिजली नहीं रही। इससे आम लोगों के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित हुए। स्थानीय लोगों ने लगातार बिजली गुल रहने, बार-बार फॉल्ट आने और विभाग की धीमी कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताई थी। इस घटना के बाद मीडिया में प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः जनहित याचिका के रूप में मामले की सुनवाई शुरू की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई बड़े सुधार प्रस्तावित हैं। शहर में अब पुराने और क्षतिग्रस्त सीमेंट के बिजली खंभों की जगह लोहे के पोल लगाए जाएंगे, ताकि तेज हवा या अन्य कारणों से बार-बार खंभे गिरने की समस्या कम हो सके। इसके अलावा जहां नए बिजली पोल लगाए जाएंगे, वहां भी स्टील के खंभों का ही उपयोग किया जाएगा। विभाग का मानना है कि इससे बिजली आपूर्ति अधिक सुरक्षित और स्थायी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बिजली उपभोक्ताओं की शिकायतों का तेजी से समाधान करने और बढ़ते लोड को नियंत्रित करने के लिए शहर में दो नए सप्लाई जोन बनाने की योजना भी तैयार की गई है। मंगला और कोनी क्षेत्रों को नए सप्लाई जोन के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके अलावा मुख्यमंत्री शहरी विद्युतीकरण एवं सामान्य विकास योजना के तहत करीब 10 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस राशि से ऐसे क्षेत्रों में खुले बिजली तार हटाकर कवर्ड केबल बिछाई जाएगी, जहां बार-बार फॉल्ट की समस्या सामने आती रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि शहर में बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए नए सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। एक मुख्य सब-स्टेशन और दो 33/11 केवी क्षमता वाले नए सब-स्टेशन बनाने के लिए जिला प्रशासन से भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है। वहीं पेड़ों की शाखाओं से बिजली लाइनों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अतिरिक्त स्काईलिफ्ट वाहन तैनात किए जाएंगे। विभाग में तकनीकी कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्तियों की प्रक्रिया भी शुरू करने की जानकारी अदालत को दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से भी शपथ पत्र पेश किया गया। निगम आयुक्त ने बताया कि मानसून के दौरान जलभराव की समस्या से निपटने के लिए विकास भवन में बाढ़ नियंत्रण कक्ष बनाया गया है। यहां अधिकारियों की शिफ्टवार ड्यूटी लगाई गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। निगम ने यह भी बताया कि अप्रैल 2026 से ही शहर के सभी आठ जोनों में नालियों की सफाई और गाद निकालने का अभियान चलाया जा रहा है। इस कार्य की जियो-टैग्ड तस्वीरें भी अदालत में प्रस्तुत की गई हैं। जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए 14 विशेष वाहनों का बेड़ा भी चौबीसों घंटे तैयार रखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इन सभी दावों के बावजूद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर बनाई गई योजनाओं का वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुंचना चाहिए। यदि बारिश के दौरान फिर बिजली गुल होती है या सड़कों पर जलभराव की स्थिति बनती है, तो इसका अर्थ होगा कि योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हुआ। अदालत ने निर्देश दिया कि मानसून के पूरे दौर में बिजली आपूर्ति यथासंभव निर्बाध रखी जाए और किसी भी शिकायत का तत्काल समाधान किया जाए। डिवीजन बेंच ने नगर निगम आयुक्त और ऊर्जा सचिव को निर्देश दिया है कि वे शपथ पत्र के साथ विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करें। रिपोर्ट में यह स्पष्ट होना चाहिए कि अब तक घोषित योजनाओं पर कितना काम हुआ है और जनता को उसका क्या लाभ मिला है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल योजनाएं बनाकर फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनका असर शहर की व्यवस्था में साफ दिखाई देना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 14:13:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>AI से बने शपथ-पत्र पर भड़के चीफ जस्टिस, CIMS की व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी</title>
                                    <description><![CDATA[बिलासपुर स्थित CIMS अस्पताल की अव्यवस्थाओं पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि कागजों में सब कुछ ठीक दिखाने से हकीकत नहीं बदलती। जरूरतमंद मरीजों को बेहतर इलाज मिलना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chief-justice-angry-over-affidavit-made-by-ai-high-court/article-58199"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/cims-bilaspur.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (CIMS) की बदहाल व्यवस्थाओं और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव की ओर से अदालत में प्रस्तुत किए गए शपथ-पत्र को देखकर मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दस्तावेज के कई हिस्सों में एक जैसी भाषा और दोहराव दिखाई देता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से तैयार किया गया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल व्यवस्थित और आकर्षक दस्तावेज पेश करने से अस्पताल की वास्तविक स्थिति नहीं बदल जाती।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि अस्पताल में सभी व्यवस्थाएं वास्तव में संतोषजनक होतीं तो मामला अदालत तक पहुंचता ही नहीं। उन्होंने सरकार और संबंधित अधिकारियों को यह भी कहा कि अदालत को गुमराह करने की बजाय अस्पताल की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का उद्देश्य किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं, बल्कि अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार सुनिश्चित करना है ताकि मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि किसी सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाला मरीज केवल मशीनों और इमारतों पर भरोसा नहीं करता, बल्कि उसे समय पर उपचार और आवश्यक सुविधाओं की उम्मीद होती है। यदि जरूरतमंद व्यक्ति को सही समय पर इलाज मिलेगा तो वह अस्पताल और वहां कार्यरत लोगों के लिए दुआ करेगा। इसलिए केवल कागजों पर दावे करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वास्तविक सुधार दिखाई देना भी जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मार्च और अप्रैल महीने में किए गए निरीक्षण की रिपोर्ट भी रखी गई। कोर्ट कमिश्नरों ने अपनी रिपोर्ट में अस्पताल की कई गंभीर खामियों का उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल की इमारत में कई स्थानों पर पानी का रिसाव हो रहा था और हाल ही में हुई बारिश के बाद अस्पताल के कुछ हिस्सों में पानी भर गया था। इसके अलावा अस्पताल का फायर फाइटिंग सिस्टम भी लंबे समय से बंद पड़ा हुआ मिला, जिससे किसी भी आपात स्थिति में मरीजों और कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि फायर फाइटिंग सिस्टम की मरम्मत के लिए 15 जून 2026 को आदेश जारी कर दिया गया था और वर्तमान में मरम्मत का कार्य तेजी से चल रहा है। अधिकारियों ने दावा किया कि जल्द ही यह प्रणाली पूरी तरह चालू कर दी जाएगी। हालांकि अदालत ने इस दावे पर संतोष व्यक्त करने के बजाय कहा कि इन कार्यों की वास्तविक स्थिति का सत्यापन आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) ने भी अदालत में एक अलग शपथ-पत्र प्रस्तुत किया। इसमें CIMS के लिए खरीदी जा रही आधुनिक चिकित्सा मशीनों और उपकरणों की विस्तृत जानकारी दी गई। रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल के लिए कुल 31 अत्याधुनिक मशीनों की खरीद प्रक्रिया जारी है। इनमें से 13 मशीनें अस्पताल पहुंच चुकी हैं, जबकि दो मशीनों के लिए जून महीने में खरीद आदेश जारी किए जा चुके हैं। दो अन्य मशीनों की कीमत अधिक होने के कारण उनकी खरीद के लिए CIMS प्रशासन से अतिरिक्त स्वीकृति मांगी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">शपथ-पत्र में यह भी बताया गया कि कुछ मशीनें अभी तकनीकी परीक्षण के चरण में हैं। परीक्षण पूरा होने के बाद उनकी वित्तीय बोली खोली जाएगी। वहीं कुछ अन्य उपकरणों के टेंडर का मूल्यांकन जारी है और शेष मशीनों की निविदाएं भी तय कार्यक्रम के अनुसार खोली जानी हैं। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी दर्ज करते हुए कहा कि मशीनों की खरीद तभी सार्थक मानी जाएगी जब वे अस्पताल में स्थापित होकर मरीजों के इलाज में उपयोग होने लगें।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत केवल सरकारी दावों पर निर्भर नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि कोर्ट कमिश्नर किसी भी समय अस्पताल का निरीक्षण कर सकते हैं और यह जांच सकते हैं कि अदालत में प्रस्तुत किए गए दावों के अनुरूप वास्तव में काम हुआ है या नहीं। उन्होंने अधिकारियों को याद दिलाया कि न्यायालय के समक्ष तथ्यों को पूरी ईमानदारी के साथ रखना उनकी जिम्मेदारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">AI से तैयार किए गए शपथ-पत्र को लेकर की गई टिप्पणी भी सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी दस्तावेज को आधुनिक तकनीक की सहायता से तैयार किया जाता है, तब भी उसमें वास्तविक तथ्यों का सही और स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। केवल भाषा को आकर्षक बनाकर या एक जैसी सामग्री दोहराकर अदालत को प्रभावित करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय ने अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे भविष्य में ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करें जो वास्तविक स्थिति का सटीक चित्र प्रस्तुत करें।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला पिछले कुछ समय से CIMS अस्पताल में मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं, भवन की स्थिति, चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा में है। जनहित याचिका के माध्यम से अस्पताल की कई कमियों को अदालत के सामने रखा गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट ने नियमित रूप से इस मामले की निगरानी शुरू की। अदालत का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 15:52:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>बिलासपुर की बदहाल बिजली व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त, विभाग से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[आंधी-बारिश के बाद घंटों ब्लैकआउट और जलभराव पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए ऊर्जा विभाग व निगम अधिकारियों से जवाब तलब किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-demands-strict-response-from-the-department-on-the/article-57672"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bilaspur-news-(4).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बिजली व्यवस्था की लगातार बिगड़ती स्थिति अब न्यायपालिका की निगरानी में पहुंच गई है। शहर में आधे घंटे की आंधी और बारिश के बाद पूरी रात बिजली गुल रहने और लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करते हुए ऊर्जा विभाग, नगर निगम और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को निर्धारित की गई है।</p>
<p>दरअसल, सोमवार शाम बिलासपुर में तेज आंधी और बारिश के बाद शहर के अधिकांश हिस्सों में बिजली आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई थी। कई इलाकों में रात करीब तीन बजे तक ब्लैकआउट की स्थिति बनी रही। गर्मी और उमस के बीच घंटों बिजली नहीं मिलने से लोग पूरी रात परेशान रहे। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि नाराज नागरिक बिजली विभाग के नेहरू नगर जोन कार्यालय पहुंच गए और अधिकारियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। लोगों का आरोप था कि विभाग की लापरवाही और कमजोर व्यवस्था के कारण हर बार हल्की बारिश या तेज हवा के बाद शहर को लंबे बिजली संकट का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>जानकारी के अनुसार सरकंडा क्षेत्र के बंधवापारा फीडर, महर्षि स्कूल फीडर, ओम नगर, सिंधी कॉलोनी, वेयरहाउस क्षेत्र और शेफर स्कूल सहित कई प्रमुख फीडर पूरी तरह बंद हो गए थे। कई स्थानों पर बिजली के खंभे गिर गए, इंसुलेटर क्षतिग्रस्त हो गए और कलेक्टर बंगले के पास एक बड़ा पेड़ गिरने से 11 केवी की मुख्य बिजली लाइन भी टूट गई। इसके अलावा बृहस्पति बाजार सब स्टेशन में तकनीकी खराबी आने से वहां देर रात तक सुधार कार्य प्रभावित रहा। कई इलाकों में ट्रांसफार्मर खराब होने के कारण अगले दिन तक भी पूरी तरह बिजली बहाल नहीं हो सकी।</p>
<p>शहरवासियों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से बिलासपुर में बिजली कटौती लगातार बढ़ती जा रही है। मामूली बारिश या तेज हवा के बाद कई घंटे तक बिजली गुल रहना अब सामान्य बात हो गई है। लोगों का आरोप है कि बिजली विभाग समय रहते आवश्यक रखरखाव नहीं करता, जिसके कारण हर बार ऐसी स्थिति बनती है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को रातभर बिजली नहीं मिलने से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।</p>
<p>बिजली विभाग के अधिकारियों ने भी माना है कि वे संसाधनों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। विभाग के अनुसार आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी रात केवल तीन मरम्मत टीमें मैदान में थीं, जिनमें कुल 12 कर्मचारी शामिल थे। एक साथ कई जगह फॉल्ट आने के कारण प्रत्येक लाइन की मरम्मत में दो से तीन घंटे का समय लग रहा था। अधिकारियों का कहना है कि सीमित स्टाफ और लगातार बढ़ती शिकायतों के कारण बिजली आपूर्ति बहाल करने में अपेक्षा से अधिक समय लगा।</p>
<p>इस पूरे मामले को मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित खबरों के आधार पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान में लिया। अदालत ने माना कि यह केवल बिजली कटौती का मामला नहीं बल्कि आम नागरिकों के जीवन और मूलभूत सुविधाओं से जुड़ा गंभीर विषय है। इसी कारण इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज करते हुए संबंधित विभागों से जवाब मांगा गया है।</p>
<p>हाईकोर्ट ने ऊर्जा विभाग के सचिव, बिलासपुर नगर निगम आयुक्त और सीएसपीडीसीएल के प्रबंध निदेशक को व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पूछा है कि शहर में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या योजना तैयार की गई है। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि बिजली वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए विभाग किस प्रकार की कार्ययोजना पर काम कर रहा है।</p>
<p>केवल बिजली व्यवस्था ही नहीं, बल्कि शहर में जलभराव की समस्या भी अदालत की चिंता का विषय बनी है। हाईकोर्ट ने नगर निगम से सड़कों, गलियों और निचले इलाकों में पानी भरने से रोकने के लिए ड्रेनेज सिस्टम की वर्तमान स्थिति और उसके सुधार को लेकर भी विस्तृत जानकारी मांगी है। अदालत का मानना है कि बारिश के दौरान जलभराव और बिजली व्यवस्था दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनका प्रभाव सीधे आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 16:06:31 +0530</pubDate>
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                <title>खनन डिफॉल्टरों को दोबारा लीज देने पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[ग्वालियर हाईकोर्ट ने अवैध खनन से जुड़े बकायेदारों को नई और नवीनीकृत खनन लीज दिए जाने पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strictly-seeks-response-from-government-on-re-granting-lease/article-57408"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-mining-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश में अवैध खनन और उससे जुड़े कथित घोटालों को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि जिन खनन संचालकों पर करोड़ों रुपये की पेनल्टी बकाया है, उनसे अब तक वसूली क्यों नहीं की गई और आखिर उन्हें दोबारा खनन लीज किस आधार पर दे दी गई। अदालत की यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें आरोप लगाया गया है कि खनिज विभाग की लापरवाही और कथित मिलीभगत के कारण अवैध खनन करने वाले कई प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए एक सप्ताह की मोहलत दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को होगी। यह मामला उस समय और गंभीर हो गया जब याचिका में दावा किया गया कि ग्वालियर जिले में खनन से जुड़े कई डिफॉल्टरों पर करीब 305 करोड़ 97 लाख रुपये की पेनल्टी वर्षों से बकाया है। बताया गया कि यह राशि वर्ष 2017 से लंबित है, लेकिन संबंधित विभाग अब तक इसकी वसूली नहीं कर पाया। याचिकाकर्ता का कहना है कि नियमों के अनुसार यदि कोई खदान संचालक जुर्माना जमा नहीं करता तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए और उसकी खनन गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए। इसके बावजूद न केवल कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि कई मामलों में उन्हीं लोगों को फिर से खनन की अनुमति भी दे दी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने इसी पहलू पर सरकार से जवाब मांगा। न्यायालय ने जानना चाहा कि जब बकाया राशि इतनी बड़ी है और सरकारी खजाने का नुकसान स्पष्ट रूप से सामने है, तब जिम्मेदार विभाग ने वसूली के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए। अदालत के सवाल इस बात की ओर भी संकेत करते हैं कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो इससे शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। फिलहाल अदालत ने सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने का अवसर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिन लोगों पर पहले से भारी जुर्माना बकाया था, उनकी पुरानी खदानों का नवीनीकरण कर दिया गया। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में उन्हें नई जगहों पर भी खनन लीज आवंटित कर दी गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह फैसला नियमों की भावना के विपरीत है और इससे यह संदेश जाता है कि बकाया राशि जमा किए बिना भी खनन का काम जारी रखा जा सकता है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह प्रशासनिक जवाबदेही और खनन व्यवस्था दोनों के लिए बड़ा सवाल बन सकता है। मामले में पर्यावरणीय नुकसान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। याचिका के अनुसार ग्वालियर जिले के बिलौआ और बेरजा क्षेत्र में लंबे समय से बड़े पैमाने पर काले पत्थर का खनन किया जा रहा है। आरोप है कि कई स्थानों पर तय मानकों से कहीं अधिक गहराई तक खुदाई की गई, जिससे जमीन बड़े-बड़े गड्ढों में बदल गई। बताया गया कि कुछ इलाकों में लगभग 25 से 30 मीटर यानी करीब 100 फीट तक खुदाई की गई है। इससे न केवल प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हुआ बल्कि आसपास के क्षेत्र में पर्यावरणीय जोखिम भी बढ़ा है। स्थानीय स्तर पर ऐसे मामलों को लेकर पहले भी चिंता जताई जाती रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी कहा गया है कि पूर्व में खनिज विभाग की जांच में बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन की पुष्टि हुई थी। जांच में यह सामने आया कि कई हजार घनमीटर मूल्यवान काला पत्थर बिना वैध अनुमति के निकाला गया और बाजार में बेचा गया। आरोप है कि इससे जो राजस्व सरकार को मिलना चाहिए था, वह सरकारी खजाने तक पहुंचने के बजाय अवैध रूप से निजी हाथों में चला गया। इसी आधार पर संबंधित संचालकों पर करोड़ों रुपये की पेनल्टी लगाई गई थी, लेकिन वर्षों बाद भी उसकी वसूली अधूरी है। खनन से जुड़े मामलों में समय-समय पर नियमों के पालन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अदालतें सख्त रुख अपनाती रही हैं। अवैध खनन केवल सरकारी राजस्व को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इससे प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान, भूजल स्तर पर असर और स्थानीय पर्यावरण को भी गंभीर क्षति पहुंचती है। ऐसे मामलों में नियामक एजेंसियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि नियमों का प्रभावी पालन ही अवैध गतिविधियों पर रोक लगा सकता है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह केवल औपचारिक जवाब से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि यह भी देखेगी कि बकाया राशि की वसूली, लीज आवंटन की प्रक्रिया और नियमों के पालन को लेकर सरकार का पक्ष कितना ठोस है। यदि अदालत को जवाब संतोषजनक नहीं लगता, तो आगे और सख्त निर्देश भी दिए जा सकते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:16:56 +0530</pubDate>
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