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                <title>Digital Life - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Digital Life RSS Feed</description>
                
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                <title>क्या मोबाइल फोन कपल्स के बीच सबसे बड़ा तीसरा व्यक्ति बन गया है? रिश्तों में बढ़ती दूरी पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[एक ही कमरे में साथ रहने के बावजूद स्क्रीन में खोए रहते हैं लोग, क्या स्मार्टफोन रिश्तों की गर्माहट कम कर रहा है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/has-mobile-phone-become-the-biggest-third-person-among-couples/article-58117"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/relationship-advice.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">आज के दौर में मोबाइल फोन जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक ज्यादातर लोगों का समय किसी न किसी स्क्रीन के साथ गुजरता है। फोन ने जहां लोगों के काम आसान किए हैं, वहीं रिश्तों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। खासकर कपल्स के बीच अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है, जहां एक ही घर में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से ज्यादा समय मोबाइल स्क्रीन के साथ बिताने लगे हैं। कई रिश्तों में अब शिकायत यह नहीं होती कि पार्टनर समय नहीं देता, बल्कि यह होती है कि पार्टनर साथ होकर भी मौजूद नहीं रहता। बातचीत के बीच बार-बार फोन देखना, खाने की टेबल पर मोबाइल चलाना या सोने से पहले घंटों सोशल मीडिया पर लगे रहना धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी पैदा कर सकता है।  किसी भी रिश्ते की मजबूती बातचीत, ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करती है। जब मोबाइल लगातार ध्यान खींचता रहता है तो पार्टनर के साथ बिताया जाने वाला समय कम होने लगता है। यह छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर बड़े मतभेद का कारण बन सकती हैं। पहले कपल्स अपने खाली समय में एक-दूसरे से बातें करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे और साथ में समय बिताते थे। लेकिन अब कई बार दोनों लोग एक ही जगह बैठे होते हैं और अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर रिश्ते में भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल फोन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है। शुरुआत में कुछ मिनट के लिए फोन देखना सामान्य लगता है, लेकिन कब यह घंटों में बदल जाता है, इसका पता नहीं चलता। सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन इंसान का ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचते हैं। कई कपल्स में यह भी देखा गया है कि फोन को लेकर शक और असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी है। पार्टनर ज्यादा समय मोबाइल पर बिताता है तो दूसरा व्यक्ति खुद को नजरअंदाज महसूस कर सकता है। कभी-कभी फोन की प्राइवेसी को लेकर भी रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल फोन रिश्तों का दुश्मन है। सही इस्तेमाल किया जाए तो यही तकनीक रिश्तों को मजबूत भी कर सकती है। दूर रहने वाले कपल्स वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए जुड़े रह सकते हैं। समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है। रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए कई विशेषज्ञ "नो फोन टाइम" की सलाह देते हैं। जैसे खाना खाते समय फोन दूर रखना, सोने से पहले कुछ समय सिर्फ बातचीत के लिए निकालना और हफ्ते में एक दिन बिना ज्यादा स्क्रीन टाइम के साथ बिताना रिश्ते को बेहतर बना सकता है। कपल्स के लिए जरूरी है कि वे एक-दूसरे की मौजूदगी को महत्व दें। कई बार पार्टनर को महंगे गिफ्ट या बड़े सरप्राइज से ज्यादा जरूरत होती है कि सामने वाला उसकी बात ध्यान से सुने। रिश्ते छोटे-छोटे पलों से मजबूत होते हैं और इन पलों की जगह अगर हमेशा मोबाइल ले ले तो दूरी बढ़ना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज मोबाइल हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन रिश्तों में उसकी जगह तय करना जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए होना चाहिए, रिश्तों के बीच दीवार बनाने के लिए नहीं। एक-दूसरे के साथ बिताया गया समय ही किसी भी रिश्ते की असली ताकत होता है। बदलते समय में सवाल यह नहीं है कि मोबाइल रखना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम मोबाइल को इतना समय दे रहे हैं कि अपने करीबी रिश्तों के लिए समय कम पड़ जाए। अगर जवाब हां है, तो शायद रिश्तों को बचाने के लिए स्क्रीन से थोड़ा दूरी बनाना जरूरी हो गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:39:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सोशल मीडिया की दुनिया में खोती नई पीढ़ी</title>
                                    <description><![CDATA[डिजिटल लाइफस्टाइल बढ़ने से युवाओं का रुझान आभासी दुनिया की ओर बढ़ा, वास्तविक जीवन की चुनौतियों से दूरी और मानसिक दबाव की स्थिति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/new-generation-getting-lost-in-the-world-of-social-media/article-57581"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/social-media-impact.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज अगर किसी भी सार्वजनिक जगह पर कुछ मिनट रुककर लोगों को देखा जाए तो एक बात साफ नजर आती है। बस स्टैंड हो, कॉलेज का कैंपस, मेट्रो, पार्क, कैफे या फिर घर का ड्राइंग रूम—अधिकांश लोगों की नजर मोबाइल स्क्रीन पर होती है। खासकर युवाओं की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा अब सोशल मीडिया के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम है। यह जानकारी, शिक्षा, रोजगार और संवाद का भी बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर क्यों आज की युवा पीढ़ी वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के बजाय सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में ज्यादा समय बिताना पसंद कर रही है?</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस सवाल का जवाब केवल तकनीक में नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक माहौल, पारिवारिक परिस्थितियों और मानसिक दबावों में भी छिपा है। आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाओं और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन, अच्छी नौकरी, आर्थिक स्थिरता और सफल करियर का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया उसे कुछ समय के लिए इस तनाव से बाहर निकलने का आसान रास्ता देता है। कुछ मिनटों के लिए वीडियो देखना या दोस्तों की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देना उसे वास्तविक समस्याओं से दूर ले जाता है। धीरे-धीरे यही अस्थायी राहत आदत बन जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सोशल मीडिया का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि यहां हर व्यक्ति अपनी पसंद की दुनिया बना सकता है। वह वही देखता है जो उसे अच्छा लगता है। उसकी टाइमलाइन पर वही कंटेंट आता है जिससे उसे खुशी, मनोरंजन या रोमांच मिलता है। वास्तविक जीवन में जहां असफलता, आलोचना और संघर्ष का सामना करना पड़ता है, वहीं सोशल मीडिया पर सब कुछ अधिक आकर्षक और नियंत्रित दिखाई देता है। शायद यही वजह है कि कई युवा वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के बजाय आभासी दुनिया में अधिक सहज महसूस करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण कारण तुलना की संस्कृति है। सोशल मीडिया पर लोग अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे पल साझा करते हैं। महंगी कार, विदेशी यात्रा, नई नौकरी, शानदार कपड़े और खुशहाल तस्वीरें देखकर देखने वाले को लगता है कि बाकी सभी लोग उससे बेहतर जीवन जी रहे हैं। यह तुलना कई युवाओं में हीन भावना और असंतोष पैदा करती है। फिर वे भी वैसी ही तस्वीरें और वीडियो साझा करने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें भी सराहना मिले। धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से ज्यादा महत्व ऑनलाइन छवि को मिलने लगता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">'लाइक', 'कमेंट' और 'फॉलोअर्स' भी एक तरह का मनोवैज्ञानिक पुरस्कार बन चुके हैं। जब किसी पोस्ट पर अधिक प्रतिक्रिया मिलती है तो खुशी महसूस होती है, जबकि अपेक्षा से कम प्रतिक्रिया मिलने पर निराशा होती है। यह स्थिति बताती है कि कई लोगों का आत्मविश्वास अब वास्तविक उपलब्धियों के बजाय डिजिटल स्वीकार्यता पर निर्भर होने लगा है। यह प्रवृत्ति लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि पूरी जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर डाल देना भी उचित नहीं होगा। परिवार और समाज की बदलती भूमिका भी इसके लिए जिम्मेदार है। पहले संयुक्त परिवारों में बातचीत, सामूहिक गतिविधियां और रिश्तों में अधिक समय दिया जाता था। अब अधिकांश परिवारों में सभी सदस्य अपने-अपने काम और स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। जब घर में संवाद कम हो जाता है तो युवा अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए ऑनलाइन दुनिया का सहारा लेने लगते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई और घर से काम करने की व्यवस्था ने भी डिजिटल जीवन को सामान्य बना दिया। उस समय सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने का काम किया, लेकिन महामारी खत्म होने के बाद भी कई लोग उसी डिजिटल जीवनशैली से बाहर नहीं निकल पाए। यह आदत अब रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह भी सच है कि सोशल मीडिया के कई सकारात्मक पहलू हैं। आज हजारों युवा इसी माध्यम से नए कौशल सीख रहे हैं, अपना व्यवसाय बढ़ा रहे हैं, रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं और सामाजिक मुद्दों पर अपनी आवाज उठा रहे हैं। कई छोटे कारोबार सोशल मीडिया की मदद से बड़े बने हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और करियर से जुड़ी उपयोगी जानकारी भी अब कुछ ही सेकंड में उपलब्ध हो जाती है। इसलिए समस्या सोशल मीडिया नहीं, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जरूरत इस बात की है कि युवा डिजिटल और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाना सीखें। परिवारों को भी बच्चों और युवाओं के साथ अधिक समय बिताना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता के साथ मानसिक स्वास्थ्य और समय प्रबंधन पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए। युवाओं को खेल, पढ़ाई, सामाजिक गतिविधियों और प्रत्यक्ष संवाद के लिए भी समय निकालना होगा। वास्तविक रिश्ते, अनुभव और संघर्ष ही व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं, न कि केवल ऑनलाइन पहचान।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिरकार सोशल मीडिया एक साधन है, जीवन नहीं। इसका उपयोग ज्ञान, संवाद और अवसरों के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन यदि यही हमारी दुनिया बन जाए तो हम धीरे-धीरे वास्तविक अनुभवों से दूर होते चले जाते हैं। नई पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसका समझदारी और संतुलन के साथ उपयोग करना है। जो युवा इस संतुलन को समझ लेंगे, वे डिजिटल दुनिया का लाभ भी उठा सकेंगे और वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना भी अधिक आत्मविश्वास के साथ कर पाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 00:36:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>क्या युवा अब दोस्तों से ज्यादा ChatGPT पर करने लगे हैं भरोसा?</title>
                                    <description><![CDATA[AI चैटबॉट्स से बढ़ती बातचीत केवल तकनीक का प्रभाव नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, अकेलेपन, गोपनीयता और बिना जजमेंट के सुने जाने की चाह का भी संकेत है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/have-youth-now-started-trusting-chatgpt-more-than-friends/article-57470"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/ai-and-youth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने लोगों के काम करने, सीखने और जानकारी हासिल करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन अब एक नया बदलाव भी तेजी से देखने को मिल रहा है। कई युवा केवल पढ़ाई, नौकरी या जानकारी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भावनाएं, उलझनें, रिश्तों की समस्याएं और जीवन से जुड़े सवाल भी ChatGPT जैसे AI चैटबॉट्स से साझा कर रहे हैं। यह सवाल अब अक्सर उठने लगा है कि क्या आज की युवा पीढ़ी इंसानों से ज्यादा AI के साथ अपने मन की बात करने में सहज महसूस करती है? इसका जवाब पूरी तरह "हां" या "नहीं" में देना आसान नहीं है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि AI ने युवाओं के लिए संवाद का एक नया माध्यम तैयार किया है। इसके पीछे कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी कारण हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बिना जजमेंट के अपनी बात कहने की आजादी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज का युवा सबसे ज्यादा जिस चीज की तलाश में है, वह है ऐसा व्यक्ति या माध्यम जो उसकी बात बिना टोके, बिना आलोचना किए और बिना किसी पूर्वाग्रह के सुने। कई बार परिवार, दोस्त या रिश्तेदार सलाह देने से पहले ही निर्णय सुना देते हैं। इससे कई युवा अपनी भावनाएं दबाकर रखना बेहतर समझते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">AI के साथ बातचीत में उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनकी बात को बिना किसी व्यक्तिगत राय के सुना जा रहा है। यही कारण है कि वे कई बार ऐसी बातें भी लिख देते हैं, जो शायद किसी करीबी से कहने में हिचकिचाते।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गोपनीयता का एहसास</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल युग में प्राइवेसी एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। युवाओं को अक्सर यह चिंता रहती है कि कहीं उनकी निजी बातें किसी और तक न पहुंच जाएं। AI के साथ बातचीत करते समय उन्हें अपेक्षाकृत अधिक गोपनीयता का अनुभव होता है। यही वजह है कि वे रिश्तों, करियर, आत्मविश्वास, तनाव या भविष्य से जुड़े सवाल खुलकर पूछते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, यह भी जरूरी है कि उपयोगकर्ता किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक संवेदनशील या व्यक्तिगत जानकारी साझा करते समय सावधानी बरतें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हर समय उपलब्ध रहने की सुविधा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इंसानी रिश्तों की अपनी सीमाएं होती हैं। हर दोस्त, परिवार का सदस्य या सलाहकार हर समय उपलब्ध नहीं हो सकता। लेकिन AI दिन हो या रात, किसी भी समय बातचीत के लिए तैयार रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">रात के दो बजे अगर कोई छात्र परीक्षा के तनाव में हो या कोई युवा अपने करियर को लेकर परेशान हो, तो उसे तुरंत बातचीत का अवसर मिल जाता है। यही सुविधा AI को अलग बनाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>डिजिटल पीढ़ी की नई आदतें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज की पीढ़ी बचपन से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बड़ी हुई है। उनके लिए चैट करके अपनी बात कहना कई बार आमने-सामने बातचीत से भी आसान होता है। यही वजह है कि AI के साथ संवाद उन्हें स्वाभाविक लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह केवल तकनीक की आदत नहीं, बल्कि बदलती संचार शैली का भी हिस्सा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या AI सचमुच दोस्त बन सकता है?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। AI बातचीत कर सकता है, जानकारी दे सकता है, विचारों को व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है और कई बार प्रेरित भी कर सकता है। लेकिन वह इंसान की तरह भावनाओं को महसूस नहीं करता।</p>
<p style="text-align:justify;">AI के पास न व्यक्तिगत अनुभव होते हैं और न ही वास्तविक संवेदनाएं। वह आपके शब्दों को समझने की कोशिश करता है, लेकिन आपके जीवन को उसी तरह महसूस नहीं कर सकता, जैसे कोई करीबी मित्र या परिवार का सदस्य कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए AI को एक सहायक संवाद माध्यम माना जा सकता है, लेकिन वास्तविक रिश्तों का विकल्प नहीं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में AI</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। कई लोग शुरुआती स्तर पर अपनी चिंता, तनाव या भावनात्मक उलझनों को समझने के लिए AI से बातचीत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आत्मचिंतन और अपनी भावनाओं को शब्द देने में मददगार हो सकता है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से अवसाद, अत्यधिक चिंता, आत्महत्या के विचार या गंभीर मानसिक परेशानी हो, तो केवल AI पर निर्भर रहना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या भरोसेमंद व्यक्ति से संपर्क करना आवश्यक होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या युवा रिश्तों से दूर हो रहे हैं?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोगों का मानना है कि AI के बढ़ते उपयोग से इंसानी रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। लेकिन इसे पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">असल में युवा ऐसे माहौल की तलाश में हैं जहां उन्हें बिना डर, बिना शर्म और बिना आलोचना के अपनी बात रखने का अवसर मिले। यदि परिवार, मित्र और समाज ऐसा सुरक्षित वातावरण प्रदान करें, तो शायद AI केवल एक सहायक माध्यम बनकर रह जाएगा, मुख्य सहारा नहीं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भविष्य में क्या होगा?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आने वाले समय में AI और इंसानी रिश्ते एक-दूसरे के विरोधी नहीं होंगे। AI जानकारी, मार्गदर्शन, योजना बनाने और शुरुआती भावनात्मक सहायता में उपयोगी साबित हो सकता है। वहीं, जीवन की वास्तविक खुशियां, अपनापन, विश्वास, प्रेम और कठिन समय में साथ केवल इंसानी रिश्ते ही दे सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तकनीक जितनी भी विकसित हो जाए, एक सच्चे दोस्त की मुस्कान, माता-पिता का स्नेह, भाई-बहन का साथ या किसी प्रिय व्यक्ति का हौसला आज भी किसी मशीन से कहीं अधिक मूल्यवान है।</p>
<p style="text-align:justify;">AI ने युवाओं को अपनी बात कहने का एक नया और सुविधाजनक मंच दिया है। बिना जजमेंट के बातचीत, हर समय उपलब्धता और डिजिटल सहजता इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि AI इंसानी भावनाओं का विकल्प नहीं बन सकता। सबसे बेहतर रास्ता यही है कि AI का उपयोग सीखने, समझने और आत्मचिंतन के लिए किया जाए, जबकि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों को भी उतना ही समय और महत्व दिया जाए। आखिरकार, तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन अपनापन, विश्वास और सच्चा साथ आज भी इंसानों से ही मिलता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/have-youth-now-started-trusting-chatgpt-more-than-friends/article-57470</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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