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                <title>Defence - दैनिक जागरण</title>
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                <title>भारत-न्यूजीलैंड के बीच 18 बड़े समझौते, FTA और निवेश पर बनी सहमति</title>
                                    <description><![CDATA[रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विशाखापट्टनम में प्रोजेक्ट-17A के छठे स्टेल्थ फ्रिगेट INS महेंद्रगिरि को नौसेना में शामिल किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/18-major-agreements-fta-and-investment-agreed-between-india-and/article-58483"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/ins-mahendragiri.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को शुक्रवार को एक और बड़ी मजबूती मिली, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम स्थित नेवल डॉकयार्ड में अत्याधुनिक स्टेल्थ युद्धपोत INS महेंद्रगिरि को औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल किया। यह प्रोजेक्ट-17A के तहत तैयार किया गया नीलगिरि श्रेणी का छठा स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। इस युद्धपोत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी उपकरण, तकनीक और प्रणालियों का उपयोग किया गया है। इससे देश की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को नई मजबूती मिली है। समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक विकसित करने वाला देश बन रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि INS महेंद्रगिरि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा, रणनीतिक क्षमता और परिचालन दक्षता को नई ऊंचाई देगा। कार्यक्रम में नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी, रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि और रक्षा उद्योग से जुड़े कई विशेषज्ञ भी मौजूद रहे। इस अवसर पर राजनाथ सिंह ने आंध्र प्रदेश के कुरनूल में विकसित किए जा रहे ड्रोन क्लस्टर का भी उल्लेख किया और कहा कि आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र देश का प्रमुख ड्रोन हब बनकर उभरेगा। उन्होंने कहा कि जिस तरह सूरत अपनी हीरा उद्योग और बेंगलुरु सूचना प्रौद्योगिकी के लिए पहचाना जाता है, उसी तरह कुरनूल ड्रोन निर्माण और नवाचार का राष्ट्रीय केंद्र बनेगा।</p>
<p>INS महेंद्रगिरि को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है, जबकि इसका निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने किया है। इसके निर्माण में देशभर की अनेक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) इकाइयों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना से घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित हुए हैं। यह युद्धपोत अत्याधुनिक सरफेस-टू-सरफेस और सरफेस-टू-एयर मिसाइल प्रणालियों, उन्नत सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता से लैस है। इसमें इंटीग्रेटेड कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह हवा, समुद्र की सतह और समुद्र के भीतर मौजूद खतरों का एक साथ प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है। जहाज में स्टेल्थ तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे रडार पर इसकी पहचान करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा इसमें कम्बाइंड डीजल एंड गैस (CODOG) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जो इसे लंबी दूरी तक तेज गति से संचालन करने में सक्षम बनाता है। भारतीय नौसेना का मानना है कि यह युद्धपोत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री स्थिरता बनाए रखने और राष्ट्रीय हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल और समुद्री चुनौतियों को देखते हुए इस तरह के अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और मजबूत करेंगे।</p>
<p>INS महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट-17A के तहत तैयार किए जा रहे कुल सात स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स में से एक है। इस परियोजना के अंतर्गत चार युद्धपोतों का निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड, मुंबई और तीन युद्धपोतों का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स, कोलकाता द्वारा किया जा रहा है। प्रोजेक्ट-17A को पहले के शिवालिक श्रेणी (प्रोजेक्ट-17) का उन्नत संस्करण माना जाता है। इसमें पहली बार बड़े स्तर पर इंटीग्रेटेड ब्लॉक कंस्ट्रक्शन तकनीक का उपयोग किया गया है। इस तकनीक में जहाज के विभिन्न हिस्सों का निर्माण अलग-अलग किया जाता है और बाद में उन्हें जोड़कर पूरा युद्धपोत तैयार किया जाता है। इससे निर्माण प्रक्रिया अधिक तेज, सटीक और गुणवत्ता के अनुरूप होती है। INS महेंद्रगिरि का नाम ओडिशा के प्रसिद्ध महेंद्रगिरि पर्वत के नाम पर रखा गया है, जिसका भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपरा में विशेष महत्व है। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने इसी पर्वत पर तपस्या की थी और रामायण में भी इसका उल्लेख मिलता है। भारतीय नौसेना अपनी कई युद्धपोतों के नाम देश के ऐतिहासिक पर्वतों, नदियों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े स्थलों पर रखती है, जिससे आधुनिक सैन्य शक्ति के साथ भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का भी सम्मान बना रहता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 14:44:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ऑस्ट्रेलिया में पीएम मोदी बोले- भारत और ऑस्ट्रेलिया की मजबूत साझेदारी दोनों देशों के भविष्य के लिए जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[मेलबर्न में भारत-ऑस्ट्रेलिया CEO फोरम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने निवेश, व्यापार, स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर दिया जोर, आज 40 हजार से अधिक भारतवंशियों से करेंगे मुलाकात।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pm-modi-said-in-australia-strong-partnership-between-india/article-58242"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/_narendra-modi-australia-visit.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन देशों के दौरे के तहत इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में हैं। गुरुवार को उन्होंने मेलबर्न में आयोजित भारत-ऑस्ट्रेलिया CEO फोरम और इकोनॉमिक रोडमैप बिजनेस रिसेप्शन में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच आर्थिक, रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत और ऑस्ट्रेलिया का भरोसेमंद साझेदार के रूप में साथ आगे बढ़ना दोनों देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रही है। वैश्विक अनिश्चितता, सप्लाई चेन में रुकावट, ऊर्जा संकट और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के बीच भरोसेमंद साझेदारों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे समय में भारत और ऑस्ट्रेलिया का सहयोग दोनों देशों को नए अवसरों तक पहुंचाने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों ने विश्वास और सहयोग के आधार पर मजबूत साझेदारी की नींव रखी है, जिसे अब और आगे बढ़ाने का समय है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने स्वच्छ ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने और वर्ष 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रहा है। इस दिशा में ऑस्ट्रेलिया की तकनीक, खनिज संसाधन और विशेष रूप से यूरेनियम की उपलब्धता दोनों देशों के सहयोग को नई मजबूती दे सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने निवेश के क्षेत्र में भी ऑस्ट्रेलियाई उद्योग जगत को भारत आने का न्योता दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में बंदरगाह, हवाई अड्डे, सड़क, रेलवे, लॉजिस्टिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है। इन क्षेत्रों में ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों के लिए निवेश के बड़े अवसर मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि भारत लगातार व्यापार और निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर रहा है, जिसका लाभ वैश्विक निवेशकों को मिल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के राज्यों, विश्वविद्यालयों, छोटे शहरों और उद्योगों के बीच प्रत्यक्ष साझेदारी बढ़ाने का भी सुझाव दिया। उनका कहना था कि यदि राज्य-से-राज्य और सेक्टर-से-सेक्टर सहयोग को बढ़ावा दिया जाए तो इसका सीधा फायदा व्यापार, शिक्षा, कौशल विकास और नवाचार के क्षेत्र में देखने को मिलेगा। इससे स्थानीय स्तर पर भी आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौतों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ECTA) के लागू होने के बाद ऑस्ट्रेलिया को भारत का निर्यात लगभग दोगुना हो गया है। यह दोनों देशों के मजबूत आर्थिक संबंधों का प्रमाण है। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि व्यापक व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ने से दोनों देशों के कारोबारियों और निवेशकों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। कार्यक्रम के बाद ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आत्मीय मुलाकात की। दोनों नेताओं ने एक साथ सेल्फी भी खिंचवाई, जिसकी तस्वीरें चर्चा का विषय बनीं। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर अनौपचारिक बातचीत भी हुई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे का सबसे बड़ा आकर्षण मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में आयोजित भारतीय समुदाय का कार्यक्रम माना जा रहा है। यहां करीब 40 हजार से अधिक भारतवंशियों के शामिल होने की संभावना है। प्रधानमंत्री इस कार्यक्रम को संबोधित करेंगे और भारतीय समुदाय से संवाद करेंगे। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीयों के बीच इस कार्यक्रम को लेकर काफी उत्साह देखा जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के बीच औपचारिक द्विपक्षीय बैठक भी होगी। इस बैठक में व्यापार, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, शिक्षा, तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई अहम विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है। इसके अलावा दोनों देशों के प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी प्रतिनिधियों के साथ भी बैठकें प्रस्तावित हैं, जिनमें निवेश और आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री के स्वागत के दौरान मेलबर्न में भारतीय संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। भारतीय समुदाय की ओर से पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं। कथक नृत्य, तबला वादन और ऑर्केस्ट्रा के माध्यम से अतिथियों का स्वागत किया गया। कार्यक्रम में "वंदे मातरम्" की प्रस्तुति ने विशेष आकर्षण पैदा किया। प्रधानमंत्री ने भी भारतीय समुदाय की गर्मजोशी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सराहना की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। ऐसे में इस यात्रा से व्यापार, निवेश, रक्षा और ऊर्जा जैसे कई क्षेत्रों में नए समझौतों और साझेदारी की संभावनाएं बढ़ गई हैं। ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरे के अगले चरण में न्यूजीलैंड रवाना होंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 11:04:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चीन के मिसाइल परीक्षण ने बढ़ाई हिंद-प्रशांत की चिंता, परमाणु पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च के बाद भारत भी सतर्क</title>
                                    <description><![CDATA[चीन की समुद्र आधारित परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण बदलने की आशंका, भारत के लिए समुद्री निगरानी और रक्षा तैयारियों को मजबूत करना होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/chinas-missile-test-increases-the-concern-of-indo-pacific-india-also/article-58131"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/china-missile-test.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक बार फिर रणनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। चीन ने परमाणु ऊर्जा से संचालित अपनी पनडुब्बी से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस परीक्षण को चीन ने नियमित सैन्य अभ्यास का हिस्सा बताया है, लेकिन अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत कई देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर संकेत माना है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक सैन्य परीक्षण नहीं, बल्कि चीन की बदलती रणनीति और समुद्र आधारित परमाणु शक्ति को मजबूत करने का स्पष्ट संदेश भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारों के अनुसार इस परीक्षण में चीन ने अपनी नई पीढ़ी की सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का इस्तेमाल किया है, जिसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम माना जाता है। माना जा रहा है कि यह मिसाइल हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्य भेदने की क्षमता रखती है। इसका सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि ऐसी मिसाइलें समुद्र में गहराई तक मौजूद परमाणु पनडुब्बियों से दागी जा सकती हैं, जिससे दुश्मन के लिए उनका पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है। चीन लंबे समय से अपनी समुद्री परमाणु क्षमता को मजबूत करने पर काम कर रहा है। पहले उसका सैन्य फोकस मुख्य रूप से दक्षिण चीन सागर और ताइवान के आसपास देखा जाता था, लेकिन अब उसकी गतिविधियां हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैल चुकी हैं। इसी वजह से भारत सहित कई देशों की रणनीतिक चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में चीनी नौसेना की पनडुब्बियां कई बार हिंद महासागर क्षेत्र में देखी गई हैं। इसके अलावा जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में उसकी सक्रियता और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर बढ़ता प्रभाव पहले से ही भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यदि चीन अधिक आधुनिक, कम शोर वाली और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ाता है तो हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत हो सकती है। समुद्र आधारित परमाणु हथियार किसी भी देश की रणनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। पनडुब्बी से छोड़ी गई बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाना बेहद मुश्किल होता है और यही कारण है कि दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियां अपनी नौसेना में इस क्षमता को लगातार विकसित कर रही हैं। चीन का हालिया परीक्षण इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की परमाणु नीति "क्रेडिबल मिनिमम डेटेरेंस" और "नो फर्स्ट यूज" के सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे में यदि चीन अपनी समुद्र आधारित परमाणु क्षमता तेजी से बढ़ाता है तो भारत को भी अपने रणनीतिक प्रतिरोधक तंत्र को और मजबूत करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत को अधिक परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण, लंबी दूरी की K-4 और K-5 बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास तथा समुद्री निगरानी प्रणाली के विस्तार पर और अधिक ध्यान देना होगा। चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता का असर केवल सैन्य संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति पर भी पड़ सकता है। भारत पहले से उत्तरी सीमा पर चीन और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। यदि समुद्री क्षेत्र में भी चीन की मौजूदगी लगातार बढ़ती है तो भारत को भूमि, वायु और समुद्र—तीनों मोर्चों पर अपनी रक्षा तैयारियों को संतुलित तरीके से मजबूत करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बदलते परिदृश्य में अंडमान एवं निकोबार कमांड की रणनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। यह कमांड मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं। यदि चीन की पनडुब्बियों की गतिविधियां इस क्षेत्र में बढ़ती हैं तो भारत को पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता, समुद्री निगरानी ड्रोन, आधुनिक सोनार सिस्टम और P-8I समुद्री निगरानी विमानों की तैनाती और बढ़ानी पड़ सकती है। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों का एक और बड़ा प्रभाव QUAD समूह पर भी पड़ सकता है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त और सुरक्षित समुद्री मार्ग बनाए रखने के लिए सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में समुद्री सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों की संख्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है। मालाबार जैसे संयुक्त अभ्यास इस सहयोग को और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर ताइवान पर दबाव बनाए रखना चाहता है। साथ ही वह प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने और वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश भी कर रहा है। समुद्र आधारित परमाणु क्षमता को मजबूत करना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर भारत भी अपनी समुद्री शक्ति को लगातार मजबूत कर रहा है। भारतीय नौसेना के पास पहले से परमाणु पनडुब्बियां, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, आधुनिक समुद्री निगरानी विमान और मजबूत नौसैनिक कमांड मौजूद हैं। इसके अलावा मित्र देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग और हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक निगरानी भारत की सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुका है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 10:12:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मोदी बोले- भारत और इंडोनेशिया साथ आएं तो ‘कुछ-कुछ’ नहीं, ‘बहुत कुछ’ होता है, जकार्ता में रिश्तों को मिली नई मजबूती</title>
                                    <description><![CDATA[20 अहम समझौतों पर हस्ताक्षर, ब्रह्मोस मिसाइल की अतिरिक्त यूनिट देगा भारत; राष्ट्रपति प्रबोवो ने कहा- मैं मोदी के नेतृत्व और योजनाओं से सीख लेता हूं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/modi-said-if-india-and-indonesia-come-together-not/article-58129"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/narendra-modi-(5).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों को नई दिशा देने वाले दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जकार्ता में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की बात कही। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने लोकप्रिय बॉलीवुड फिल्म के गीत का जिक्र करते हुए कहा कि इंडोनेशिया में भारत का गाना ‘कुछ-कुछ होता है’ काफी पसंद किया जाता है, लेकिन जब भारत और इंडोनेशिया मिलकर आगे बढ़ते हैं तो सिर्फ ‘कुछ-कुछ’ नहीं बल्कि ‘बहुत कुछ’ होता है। प्रधानमंत्री के इस बयान पर वहां मौजूद भारतीय समुदाय ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और इंडोनेशिया के बीच केवल कूटनीतिक संबंध ही नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुराना सांस्कृतिक और सभ्यतागत जुड़ाव भी है। उन्होंने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके भीतर भारत का डीएनए है। मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति की यह बात भारत के लोगों के दिलों को छू गई। उन्होंने आगे कहा कि दोनों देशों का असली डीएनए आपसी विश्वास, साझेदारी और पारस्परिक सम्मान से बना है। यही भरोसा दोनों देशों को भविष्य में और मजबूत सहयोग की ओर लेकर जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इससे पहले इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री मोदी की खुले मंच से जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और कार्यशैली से काफी प्रभावित हैं। प्रबोवो ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक करियर और उनकी कई योजनाओं को कॉपी करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत सरकार की अनेक योजनाएं बेहद सफल रही हैं और वे चाहते हैं कि इंडोनेशिया भी उनसे सीख लेकर अपने यहां लागू करे। राष्ट्रपति ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अच्छी बात यह है कि इन योजनाओं पर कोई कॉपीराइट नहीं है, इसलिए उन्हें अपनाने में कोई परेशानी नहीं होगी। उनके इस बयान पर समारोह में मौजूद लोगों ने जोरदार तालियां बजाईं। प्रधानमंत्री मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कुल 20 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों में रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग, व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और तकनीकी साझेदारी जैसे कई अहम क्षेत्र शामिल हैं। दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने पर भी सहमति जताई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दौरे की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रक्षा सहयोग को लेकर हुआ समझौता माना जा रहा है। भारत ने इंडोनेशिया को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की अतिरिक्त यूनिट उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है। इसके साथ ही इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के बाद ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला तीसरा देश बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध और अधिक मजबूत होंगे तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक सहयोग को नई मजबूती मिलेगी। प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा केवल राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अपने कार्यक्रम के तहत वह इंडोनेशिया के सबसे बड़े और विश्व प्रसिद्ध हिंदू मंदिर प्रम्बानन भी जाएंगे। एक हजार वर्ष से अधिक पुराने इस मंदिर को दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की जीवंत पहचान माना जाता है। प्रधानमंत्री का यह दौरा दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत को और मजबूत करने का संदेश भी देगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंडोनेशिया सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी सम्मानित किया। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने विशेष समारोह में यह सम्मान प्रदान किया। इसे भारत और इंडोनेशिया के मजबूत होते संबंधों तथा क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका का प्रतीक माना जा रहा है। जकार्ता स्थित राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया गया। राष्ट्रपति प्रबोवो ने स्वयं उन्हें गले लगाकर स्वागत किया। इसके बाद प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस दौरान उन्होंने वहां मौजूद भारतीय मूल के बच्चों और प्रवासी भारतीयों से मुलाकात भी की। भारतीय समुदाय ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से प्रधानमंत्री का स्वागत किया और दोनों देशों की मित्रता का संदेश दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी सोमवार को इंडोनेशिया पहुंचे थे। उनके विमान के इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते ही वहां की वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने विशेष एस्कॉर्ट प्रदान किया। इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और सम्मान का प्रतीक माना गया। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। चीन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत कर रहा है। चीन लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इसके अलग-अलग हिस्सों पर अपना अधिकार जताते हैं। चीन ने कई कृत्रिम द्वीप बनाकर वहां सैन्य ढांचा तैयार किया है, जिससे क्षेत्रीय देशों की चिंता बढ़ी है। ऐसे माहौल में भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा को लेकर बढ़ती साझेदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देश स्वतंत्र, सुरक्षित और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के पक्षधर हैं। समुद्री व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 10:12:27 +0530</pubDate>
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                <title>भारत दौरे पर जापान की पीएम सानाए ताकाइची, राष्ट्रपति भवन में भव्य स्वागत</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सानाए ताकाइची आज व्यापार, निवेश, रक्षा, सेमीकंडक्टर, सप्लाई चेन और इंडो-पैसिफिक सहयोग पर चर्चा करेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/grand-welcome-at-rashtrapati-bhavan-for-japanese-pm-sanae-takaichi/article-57629"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sanae-takaichi-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची के तीन दिवसीय भारत दौरे की औपचारिक शुरुआत गुरुवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में हुई, जहां उनका पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे और उन्होंने जापान की प्रधानमंत्री का स्वागत किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद सानाए ताकाइची की यह पहली भारत यात्रा है, जिसे भारत और जापान के बीच रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/_japan-pm.jpg" alt="_Japan PM" width="1366" height="900"></img></p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">अपने दौरे के दूसरे दिन सानाए ताकाइची प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगी। दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता में निवेश, व्यापार, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, सेमीकंडक्टर निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, ऑटोमोबाइल उद्योग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग जैसे कई अहम विषयों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और मजबूत बनाने के लिए कई नए समझौतों पर भी बातचीत हो सकती है।= इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा आर्थिक सहयोग को नई गति देना माना जा रहा है। भारत और जापान के बीच व्यापार और निवेश लगातार बढ़ रहा है और दोनों देश अब इसे अगले स्तर तक ले जाने की तैयारी में हैं। इसी उद्देश्य से जापान के 150 से अधिक उद्योगपति भारत-जापान बिजनेस फोरम में हिस्सा लेंगे। इस मंच पर दोनों देशों के उद्योग जगत के प्रतिनिधि नए निवेश, औद्योगिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी पर चर्चा करेंगे। माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद कई नई निवेश परियोजनाओं का रास्ता साफ हो सकता है। इस यात्रा के दौरान सबसे अधिक चर्चा भारत और जापान के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की संभावित व्यवस्था को लेकर हो रही है। दोनों देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए भारतीय रुपए और जापानी येन में सीधे भुगतान की व्यवस्था विकसित करने पर काम कर रहे हैं। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो पहली बार दोनों देशों के बीच व्यापार का भुगतान बिना अमेरिकी डॉलर के सीधे स्थानीय मुद्राओं में किया जा सकेगा। इससे विदेशी मुद्रा विनिमय की लागत कम होगी और व्यापारिक लेनदेन पहले की तुलना में अधिक तेज और आसान हो जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत जापानी कंपनियां भारत के बैंकों में विशेष खाते खोल सकेंगी और उन्हीं के माध्यम से रुपए और येन में लेनदेन कर पाएंगी। इससे अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए तीसरे देश की बैंकिंग प्रणाली या अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता नहीं होगी।</p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/japan-pm-india-visit.jpg" alt="JAPAN PM INDIA VISIT" width="1366" height="1002"></img></p>
<p style="text-align:justify;">भारत और जापान के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की दिशा में पहले भी सहमति बन चुकी है। वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अगले दस वर्षों के साझा विजन दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। उसी दौरान भुगतान प्रणाली को मजबूत करने और स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी सहमति बनी थी। अब दोनों देश उस योजना को व्यावहारिक रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर जापान भारत के सबसे महत्वपूर्ण निवेशकों में शामिल है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच व्यापार 27.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसी अवधि में जापान ने भारत में अरबों डॉलर का निवेश किया है और अगले दस वर्षों में 61 अरब डॉलर से अधिक निवेश का लक्ष्य तय किया गया है। यह निवेश मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, हाई-टेक रक्षा उद्योग, डिजिटल तकनीक और विनिर्माण क्षेत्र में किया जाएगा। वर्तमान में भारत में लगभग 1400 जापानी कंपनियां सक्रिय हैं। इनमें से बड़ी संख्या विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी हुई है। मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना दोनों देशों के सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है, जिसमें जापानी शिनकानसेन तकनीक और वित्तीय सहयोग का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, डिजिटल टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्रों में भी जापानी कंपनियां भारत में तेजी से निवेश बढ़ा रही हैं। दोनों देश क्वाड समूह के सदस्य हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा नियम आधारित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, संयुक्त सैन्य अभ्यास और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने जैसे विषय भी इस यात्रा के दौरान प्रमुख एजेंडे में शामिल रहेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 12:16:38 +0530</pubDate>
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