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                <title>Indore High Court Abortion Rights India Pregnancy Rights MTP Act 1971 Women's Reproductive Rights Husband Consent Abortion Article 21 Constitution Madhya Pradesh High Court - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Indore High Court Abortion Rights India Pregnancy Rights MTP Act 1971 Women's Reproductive Rights Husband Consent Abortion Article 21 Constitution Madhya Pradesh High Court RSS Feed</description>
                
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                <title>इंदौर हाईकोर्ट का अहम फैसला, गर्भ जारी रखना है या नहीं इसका अंतिम अधिकार महिला का</title>
                                    <description><![CDATA[13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को गर्भसमापन की अनुमति देते हुए अदालत ने कहा कि कानून की तय सीमा के भीतर पति की सहमति अनिवार्य नहीं, महिला की शारीरिक स्वायत्तता सर्वोपरि है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/important-decision-of-indore-high-court-woman-has-the-final/article-57984"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/indore-high-court-verdict.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) कानून की निर्धारित समय सीमा के भीतर है, तो गर्भ को जारी रखना है या उसका समापन कराना है, इसका निर्णय लेने का अधिकार महिला के पास है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पति की सहमति को अनिवार्य शर्त नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत गर्भसमापन की अनुमति दे दी।</p>
<p>जानकारी के मुताबिक मामला इंदौर संभाग के एक दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी करीब दो वर्ष पहले हुई थी। शुरुआती समय के बाद दोनों के बीच पारिवारिक मतभेद बढ़ते गए और रिश्ते में लगातार तनाव बना रहा। इसी दौरान महिला गर्भवती हुई, लेकिन हालात ऐसे बने कि दोनों अलग-अलग रहने लगे। महिला ने अदालत में कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में गर्भावस्था जारी रखना उसके लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से बेहद कठिन हो गया है। उसने यह भी बताया कि दांपत्य जीवन को आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लगभग तय हो चुका था, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई।</p>
<p>महिला की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि विवाह टूटने की स्थिति बन चुकी है और ऐसे माहौल में बच्चे का जन्म उसके जीवन पर गंभीर असर डाल सकता है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि गर्भावस्था जारी रखने का दबाव उसकी मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है। अदालत से अनुरोध किया गया कि कानून के प्रावधानों को देखते हुए उसे गर्भसमापन की अनुमति दी जाए।</p>
<p>सुनवाई के दौरान महिला की ओर से अधिवक्ता जीपी सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की गर्भावस्था 13 सप्ताह की है और यह अवधि एमटीपी एक्ट के दायरे में आती है। उन्होंने यह भी कहा कि महिला अपने भविष्य, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थितियों को देखते हुए यह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। याचिका में यह भी बताया गया कि पति के साथ संबंध सामान्य नहीं रह गए हैं और दोनों के बीच विवाद लगातार बढ़े हैं।</p>
<p>अदालत ने मामले में पति को नोटिस जारी किया था। रिकॉर्ड के अनुसार नोटिस की तामील भी हो चुकी थी, लेकिन निर्धारित तारीख पर वह कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। राज्य सरकार की ओर से पेश पक्ष ने भी महिला की याचिका पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। इसके बाद अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, कानूनी प्रावधानों और दोनों पक्षों की स्थिति का परीक्षण करते हुए सुनवाई आगे बढ़ाई।</p>
<p>अपने आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने कहा कि गर्भधारण और मातृत्व से जुड़े निर्णय का सबसे अधिक प्रभाव महिला के शरीर, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन पर पड़ता है। इसलिए कानून की सीमा के भीतर गर्भावस्था को जारी रखना है या नहीं, इसका अंतिम फैसला उसी का होना चाहिए।</p>
<p>सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण फैसले का भी उल्लेख किया जिसमें महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को मौलिक अधिकारों से जोड़कर देखा गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका पहले भी यह स्पष्ट कर चुकी है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत गरिमा, निजता और शारीरिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार हैं और इनकी रक्षा करना न्यायालय की जिम्मेदारी है।</p>
<p>अदालत ने यह भी माना कि केवल चिकित्सकीय कारण ही नहीं, बल्कि वैवाहिक संबंधों में गंभीर बदलाव, पति-पत्नी का अलग रहना, विवाह टूटने की स्थिति या भविष्य को लेकर असुरक्षा जैसी परिस्थितियां भी गर्भसमापन की अनुमति देने के दौरान विचार योग्य आधार हो सकती हैं। न्यायालय ने कहा कि हर मामले का मूल्यांकन उसकी परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए और महिला की मानसिक स्थिति को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना उसके शारीरिक स्वास्थ्य को।</p>
<p>कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित और कानूनी तरीके से स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। यदि गर्भावस्था निर्धारित समय सीमा के भीतर है और कानून की अन्य शर्तें पूरी होती हैं, तो अधिकृत चिकित्सक नियमों के अनुसार गर्भसमापन कर सकते हैं। ऐसे मामलों में अनावश्यक कानूनी या सामाजिक बाधाएं खड़ी करना कानून की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।</p>
<p>आदेश में अदालत ने चिकित्सकों को भी निर्देश दिया कि गर्भसमापन की पूरी प्रक्रिया स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों और मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार पूरी सावधानी, गोपनीयता और संवेदनशीलता के साथ की जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि महिला को उपचार के दौरान आवश्यक चिकित्सकीय सुविधा और परामर्श उपलब्ध कराया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने महिला की व्यक्तिगत परिस्थितियों, गर्भावस्था की अवधि और कानून में उपलब्ध प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए याचिका पर फैसला सुनाया।</p>
<p>---</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 10:37:16 +0530</pubDate>
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