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                <title>Shankargarh Pear Farming Balrampur Chhattisgarh Pear Farming India Mango Orchard NABARD Wadi Project Horticulture Chhattisgarh Farmer Success Story Fruit Farming - दैनिक जागरण</title>
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                <title>बलरामपुर का शंकरगढ़ बना नाशपाती की नई पहचान, बंजर जमीन पर फलों की खेती से बदली किसानों की तस्वीर</title>
                                    <description><![CDATA[करीब 1000 एकड़ में तैयार हुए आम और नाशपाती के बगीचे, हजार से अधिक किसान बागवानी से जोड़ रहे नई आय; कई परिवारों ने खेती की कमाई से खरीदे ट्रैक्टर और पिकअप]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/shankargarh-of-balrampur-becomes-the-new-identity-of-pear-cultivation/article-57997"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/shankargarh-pear-farming.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले का शंकरगढ़ क्षेत्र अब अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ फल उत्पादन के लिए भी नई पहचान बना रहा है। कुछ साल पहले तक जहां पथरीली और कम उपजाऊ जमीन पर पारंपरिक खेती से किसानों का गुजारा मुश्किल से हो पाता था, वहीं अब वही इलाका आम और नाशपाती की बागवानी के लिए जाना जाने लगा है। खेतों में फैले हरे-भरे बगीचे न केवल इलाके की तस्वीर बदल रहे हैं, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति में भी बड़ा बदलाव लेकर आए हैं। वर्तमान में शंकरगढ़ और आसपास के गांवों में करीब एक हजार एकड़ क्षेत्र में फलदार पौधों की खेती की जा रही है, जिससे बड़ी संख्या में किसान परिवारों को नियमित आय का नया स्रोत मिला है।</p>
<p>स्थानीय किसानों के अनुसार पहले इस क्षेत्र की अधिकांश जमीन वर्षा पर आधारित खेती के भरोसे थी। बारिश अच्छी हुई तो फसल ठीक निकलती थी, लेकिन मौसम खराब होने पर पूरे साल की मेहनत पर असर पड़ जाता था। खेती से होने वाली आय सीमित थी और कई परिवारों को अतिरिक्त रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। ऐसे हालात में जब किसानों को बागवानी अपनाने की सलाह दी गई तो शुरुआत में अधिकांश लोग इस प्रयोग को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। फलदार पौधों से आय आने में समय लगता है, इसलिए किसानों के मन में जोखिम को लेकर कई सवाल भी थे।</p>
<p>करीब एक दशक पहले क्षेत्र में वाड़ी विकास कार्यक्रम के तहत किसानों को फलदार पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया गया। इस अभियान में रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसाइटी ने किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दिया, जबकि राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के सहयोग से परियोजना को आगे बढ़ाया गया। किसानों को पौधरोपण, बागों की देखरेख, सिंचाई, पौध संरक्षण और उत्पादन बढ़ाने की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। शुरुआती वर्षों में लगातार निगरानी और प्रशिक्षण के कारण किसानों का भरोसा भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा।</p>
<p>शुरुआत में लगाए गए पौधों ने जब चार से पांच साल बाद फल देना शुरू किया तो किसानों की मेहनत का परिणाम दिखाई देने लगा। वर्ष 2018-19 के बाद नाशपाती और आम का उत्पादन लगातार बढ़ता गया। आज शंकरगढ़ विकासखंड के देवसरा, लारंगी, भगवतपुर, भुवनेश्वरपुर, जारहाडीह सहित कई गांवों में बड़े पैमाने पर नाशपाती की खेती हो रही है। सीजन के दौरान यहां से बड़ी मात्रा में फल आसपास के बाजारों के साथ दूसरे जिलों तक भेजे जाते हैं। स्थानीय स्तर पर भी खरीदार सीधे बागों तक पहुंचकर फलों की खरीद कर रहे हैं।</p>
<p>किसानों का कहना है कि बागवानी ने उनकी आय का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहां सालभर की खेती के बाद सीमित आमदनी होती थी, वहीं अब फल उत्पादन से हर सीजन में अच्छी कमाई हो रही है। कई किसान बताते हैं कि एक एकड़ में तैयार बगीचे से उन्हें सालाना 50 हजार रुपए से लेकर एक लाख रुपए तक की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है। उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ बाजार भी लगातार विकसित हुआ है, जिससे फलों की बिक्री पहले की तुलना में आसान हो गई है।</p>
<p>बागवानी के साथ किसानों ने खेती के नए तरीके भी अपनाए हैं। केवल आम और नाशपाती के पेड़ों पर निर्भर रहने के बजाय वे पेड़ों के बीच खाली बची जमीन में मौसमी सब्जियां, दलहन और दूसरी फसलें भी उगा रहे हैं। इससे उन्हें पूरे साल अलग-अलग स्रोतों से आय मिल रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मिश्रित खेती का यह मॉडल किसानों के लिए अधिक लाभकारी साबित हो रहा है क्योंकि इससे भूमि का बेहतर उपयोग होता है और जोखिम भी कम होता है।</p>
<p>फलों की खेती से बढ़ी आमदनी का असर ग्रामीण जीवन में भी दिखाई देने लगा है। कई किसानों ने अपनी कमाई से कृषि उपकरण खरीदे हैं, जबकि कुछ परिवारों ने ट्रैक्टर, पिकअप वाहन और सिंचाई के आधुनिक साधनों में निवेश किया है। इससे खेती का दायरा भी बढ़ा है और परिवहन की सुविधा मिलने से फल सीधे मंडियों तक पहुंचाना आसान हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले जिन संसाधनों को खरीदना मुश्किल लगता था, अब वे धीरे-धीरे उनकी पहुंच में आ रहे हैं।</p>
<p>क्षेत्र में फल उत्पादन बढ़ने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। बगीचों की देखरेख, सिंचाई, कटाई, पैकिंग और परिवहन जैसे कामों में गांव के लोगों को रोजगार मिल रहा है। नाशपाती की तुड़ाई के मौसम में बड़ी संख्या में श्रमिकों की जरूरत पड़ती है, जिससे आसपास के ग्रामीणों को भी अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है। फल पैकिंग और लोडिंग का काम भी स्थानीय स्तर पर होने लगा है।</p>
<p>कृषि विभाग और परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आने वाले समय में शंकरगढ़ क्षेत्र को बागवानी के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है। इसके लिए किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले पौधे, उन्नत कृषि तकनीक, सिंचाई प्रबंधन और बाजार से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही फल प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज और मूल्य संवर्धन जैसी सुविधाओं पर भी चर्चा चल रही है ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।</p>
<p>शंकरगढ़ में विकसित हो रहा यह बागवानी मॉडल अब आसपास के अन्य इलाकों के किसानों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है। कई गांवों के किसान यहां आकर बगीचों का निरीक्षण कर रहे हैं और फलदार पौधों की खेती के बारे में जानकारी ले रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह तकनीकी सहायता, बाजार और सिंचाई सुविधाएं मिलती रहीं तो आने वाले वर्षों में बलरामपुर जिला नाशपाती और अन्य फल उत्पादन के क्षेत्र में प्रदेश के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।</p>
<p>----</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 11:34:43 +0530</pubDate>
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