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                <title>International Relations - दैनिक जागरण</title>
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                <description>International Relations RSS Feed</description>
                
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                <title>राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने छह देशों के राजदूतों और उच्चायुक्तों के परिचय-पत्र स्वीकार किए</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रपति भवन में आयोजित औपचारिक समारोह में मोज़ाम्बिक, निकारागुआ, सूरीनाम, गैबॉन, मंगोलिया और बहामास के प्रतिनिधियों ने भारत की राष्ट्रपति को अपने परिचय-पत्र सौंपे, द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a4cb7fe37a09/article-58096"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/droupadi-murmu.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक औपचारिक समारोह में छह देशों के राजदूतों और उच्चायुक्तों से उनके परिचय-पत्र स्वीकार किए। इस अवसर पर मोज़ाम्बिक, निकारागुआ, सूरीनाम, गैबॉन गणराज्य, मंगोलिया और बहामास के राजनयिक प्रतिनिधियों ने भारत में अपने आधिकारिक दायित्वों की शुरुआत करते हुए राष्ट्रपति को अपने-अपने परिचय-पत्र प्रस्तुत किए। इस प्रक्रिया को किसी भी राजदूत या उच्चायुक्त के कार्यकाल की औपचारिक शुरुआत माना जाता है और इसके बाद वे अपने देश का आधिकारिक प्रतिनिधित्व भारत में कर सकते हैं। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस समारोह में पारंपरिक गरिमा और राजनयिक शिष्टाचार का पालन किया गया। परिचय-पत्र स्वीकार करने की यह प्रक्रिया भारत और संबंधित देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण औपचारिक कदम मानी जाती है। समारोह के दौरान सभी प्रतिनिधियों का स्वागत किया गया और उन्हें भारत में अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए शुभकामनाएं दी गईं। समारोह में सबसे पहले मोज़ाम्बिक गणराज्य के उच्चायुक्त महामहिम अरमांडो पेड्रो म्वीवाने जूनियर ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को अपना परिचय-पत्र सौंपा। इसके बाद निकारागुआ गणराज्य की राजदूत महामहिम नदेस्का इमारा कथबर्ट कार्लसन ने अपना परिचय-पत्र प्रस्तुत किया। सूरीनाम गणराज्य की राजदूत महामहिम हनीशा जयराम ने भी राष्ट्रपति को अपने परिचय-पत्र सौंपते हुए भारत में अपने राजनयिक दायित्वों की औपचारिक शुरुआत की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके अलावा गैबॉन गणराज्य के उच्चायुक्त महामहिम ऑरेलियन-मार्सेल मिंत्सा एंगेमा, मंगोलिया के राजदूत डॉ. उल्ज़ीत लुव्सानजाव तथा बहामास कॉमनवेल्थ के उच्चायुक्त महामहिम पीटर निकोलस साइमोनेट ने भी राष्ट्रपति के समक्ष अपने परिचय-पत्र प्रस्तुत किए। इन सभी प्रतिनिधियों ने अपने-अपने देशों की ओर से भारत के साथ संबंधों को और अधिक मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। किसी भी विदेशी राजदूत या उच्चायुक्त के लिए परिचय-पत्र प्रस्तुत करना एक अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रिया होती है। जब तक संबंधित प्रतिनिधि राष्ट्रपति को अपना परिचय-पत्र प्रस्तुत नहीं करता, तब तक वह आधिकारिक रूप से अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इस औपचारिक प्रक्रिया के पूरा होने के बाद राजदूत और उच्चायुक्त दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत लंबे समय से दुनिया के विभिन्न देशों के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को लगातार मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। हाल के वर्षों में भारत ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियाई देशों और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ सहयोग को नई गति दी है। ऐसे में इन छह देशों के नए राजनयिक प्रतिनिधियों की नियुक्ति को द्विपक्षीय संबंधों के विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मोज़ाम्बिक और भारत के बीच ऊर्जा, खनन, कृषि, स्वास्थ्य और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। वहीं निकारागुआ और भारत के बीच विकास सहयोग, क्षमता निर्माण और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आपसी समर्थन को लेकर संबंध मजबूत रहे हैं। सूरीनाम के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध विशेष महत्व रखते हैं, क्योंकि वहां भारतीय मूल की बड़ी आबादी निवास करती है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध भी काफी गहरे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गैबॉन के साथ भारत के आर्थिक और व्यापारिक संबंध लगातार विस्तार की ओर बढ़ रहे हैं। ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधनों और निवेश के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। दूसरी ओर मंगोलिया भारत का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार माना जाता है। दोनों देशों के बीच बौद्ध सांस्कृतिक विरासत, शिक्षा, रक्षा सहयोग और आर्थिक विकास से जुड़े कई क्षेत्रों में साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। बहामास के साथ भी भारत के संबंध विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग और साझा हितों के आधार पर विकसित हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, सतत विकास और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे विषयों पर दोनों देशों के बीच लगातार संवाद बना हुआ है। नए उच्चायुक्त की नियुक्ति से इन संबंधों को और गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस तरह के औपचारिक समारोह केवल संवैधानिक प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि वे भारत की सक्रिय विदेश नीति और वैश्विक साझेदारी के विस्तार का भी प्रतीक होते हैं। नए राजदूतों और उच्चायुक्तों के कार्यभार संभालने के बाद व्यापार, निवेश, शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, संस्कृति और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना भी मजबूत होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 14:47:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>खामेनेई के अंतिम संस्कार में जुटे 100 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि, कई बड़े देशों ने नहीं भेजे शीर्ष नेता</title>
                                    <description><![CDATA[तेहरान में कड़ी सुरक्षा के बीच अंतिम विदाई की रस्में शुरू, ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने दी श्रद्धांजलि, भारत सहित कई देशों ने मंत्री स्तर के प्रतिनिधिमंडल भेजे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/6a4892cddd218/article-57814"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/khamenei-funeral-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने का सिलसिला तेहरान में शुरू हो गया है। राजधानी के इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला में शनिवार सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग पहुंचने लगे। श्रद्धांजलि समारोह में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए नागरिकों के साथ विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की भी मौजूदगी रही। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, चीफ जस्टिस गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई, संसद के स्पीकर बाघेर गालिबाफ और सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री समारोह में शामिल हुए और खामेनेई को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इस कार्यक्रम में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि पहुंचे, लेकिन रूस, चीन, भारत और तुर्किये जैसे प्रभावशाली देशों ने अपने सर्वोच्च नेताओं को नहीं भेजा। इन देशों की ओर से मंत्री स्तर या अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बताया जा रहा है कि सुरक्षा कारणों से खामेनेई के बेटे मुजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से समारोह में मौजूद नहीं रहे। इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी काफी चर्चा देखने को मिली। हालांकि ईरान की ओर से कई देशों के शीर्ष नेताओं को औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था, लेकिन मौजूदा क्षेत्रीय हालात और सुरक्षा कारणों को देखते हुए अधिकांश देशों ने अपने प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। भारत की ओर से विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनकर श्रद्धांजलि दी। वहीं पाकिस्तान, इराक, आर्मेनिया, ताजिकिस्तान और जॉर्जिया के शीर्ष नेता स्वयं समारोह में शामिल हुए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अलग-अलग देशों की मौजूदगी और प्रतिनिधित्व का स्तर मौजूदा कूटनीतिक समीकरणों को भी दर्शाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रद्धांजलि समारोह के दौरान तेहरान में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए। राजधानी की प्रमुख सड़कों, सरकारी भवनों और संवेदनशील इलाकों में सेना, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के जवान तैनात रहे। कई प्रमुख मार्गों पर सैन्य वाहनों की लगातार गश्त देखने को मिली। अधिकारियों के अनुसार समारोह में बड़ी भीड़ जुटने की संभावना को देखते हुए कई स्तर की सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई थी। इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला में प्रवेश करने वाले लोगों की अलग-अलग सुरक्षा जांच की गई और पूरे परिसर की निगरानी आधुनिक उपकरणों के जरिए की गई। आम लोगों की सुविधा के लिए सरकार ने राजधानी में मेट्रो और सरकारी बस सेवाओं को नि:शुल्क रखा। दूसरे शहरों से आने वाले लोगों के लिए विशेष ट्रेनें चलाई गईं, जबकि कई स्कूलों, मस्जिदों और सामुदायिक भवनों में अस्थायी ठहरने की व्यवस्था की गई। कुछ होटलों ने भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों के लिए किराए में विशेष छूट दी। प्रशासन का कहना है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य दूर-दराज से आने वाले नागरिकों को किसी प्रकार की असुविधा न होने देना था। सुबह से ही लोगों की लंबी कतारें दिखाई दीं और बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा हाथों में खामेनेई की तस्वीरें लेकर श्रद्धांजलि देने पहुंचे। कई लोग लाल झंडे लिए भी नजर आए। समारोह के दौरान कुछ समूहों ने अमेरिका विरोधी नारे लगाए और क्षेत्रीय घटनाओं को लेकर अपनी नाराजगी भी जाहिर की। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे कार्यक्रम के दौरान हालात पर पूरी तरह नियंत्रण बनाए रखा और किसी अप्रिय घटना की सूचना सामने नहीं आई। कई महिलाओं को भावुक होकर रोते हुए भी देखा गया, जबकि लोगों ने शांतिपूर्वक अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p style="text-align:justify;">खामेनेई का ताबूत इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला पहुंचने के बाद अंतिम श्रद्धांजलि की औपचारिक रस्में शुरू हुईं। अधिकारियों के अनुसार परिवार के सदस्यों ने भी उन्हें अंतिम विदाई दी। पूरे समारोह का सीधा प्रसारण देश के कई समाचार माध्यमों पर किया गया, जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने देखा। समारोह में मौजूद नेताओं ने खामेनेई के लंबे सार्वजनिक जीवन और ईरान की राजनीति में उनकी भूमिका को याद किया। हालांकि कार्यक्रम के दौरान किसी प्रकार का औपचारिक राजनीतिक संबोधन नहीं हुआ, लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें देश के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक बताया। इस बीच दुनिया की नजर भी तेहरान पर बनी रही, क्योंकि खामेनेई के निधन के बाद ईरान की राजनीति, क्षेत्रीय रणनीति और भविष्य के नेतृत्व को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में ईरान की आंतरिक राजनीति और उसकी विदेश नीति को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से जारी है और प्रशासन लगातार सुरक्षा व्यवस्था पर नजर बनाए हुए है। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बावजूद पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम संस्कार से जुड़े सभी कार्यक्रम तय कार्यक्रम के अनुसार पूरे किए जाएंगे। वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी ईरान में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है, क्योंकि इसका असर पश्चिम एशिया के व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ सकता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:12 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कतर में अमेरिका-ईरान वार्ता तेज, जमी संपत्ति और MoU क्रियान्वयन पर अहम चर्चा</title>
                                    <description><![CDATA[दोहा में अप्रत्यक्ष वार्ता के दौरान जमी संपत्ति, हॉटलाइन व्यवस्था, होर्मुज जलडमरूमध्य और क्षेत्रीय सुरक्षा समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a463522a604b/article-57668"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/america-iran-talks.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर अहम अप्रत्यक्ष वार्ता हुई, जिसमें दोनों देशों के बीच पहले हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के क्रियान्वयन, ईरान की जमी हुई संपत्तियों के उपयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में लगातार तनाव बना हुआ है और दोनों देशों के बीच भरोसा बहाल करने की कोशिशें जारी हैं। बातचीत में प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधि आमने-सामने नहीं बैठे, बल्कि कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए संवाद आगे बढ़ाया गया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक दोनों पक्षों ने वार्ता जारी रखने पर सहमति जताई है और कई प्रस्तावों पर आगे भी विचार किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने बताया कि इस दौर की बातचीत समाप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि बैठक के दौरान समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक विशेष संचार व्यवस्था यानी हॉटलाइन स्थापित करने पर भी चर्चा हुई। प्रस्ताव है कि गुरुवार तक ऐसी प्रणाली तैयार की जाए जिसके जरिए यदि किसी भी पक्ष की ओर से MoU का उल्लंघन होता है तो उसकी जानकारी तुरंत साझा की जा सके। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था भविष्य में विवादों को बढ़ने से रोकने और संवाद को जारी रखने में मददगार साबित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक का सबसे अहम विषय ईरान की विदेशों में जमी हुई संपत्ति रहा। कतर में रखी गई ईरान की अरबों डॉलर की राशि के उपयोग को लेकर दोनों पक्षों के बीच विस्तार से बातचीत हुई। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि इस राशि का इस्तेमाल सीधे नकद भुगतान के बजाय आवश्यक वस्तुओं की खरीद के लिए किया जाएगा। इन वस्तुओं को बाद में ईरान भेजा जाएगा ताकि प्रतिबंधों के बीच भी जरूरी जरूरतें पूरी की जा सकें। बताया गया कि शुरुआती छह अरब डॉलर की राशि में से एक हिस्से के उपयोग के तौर-तरीकों पर भी कतर के अधिकारियों और वहां के केंद्रीय बैंक के साथ चर्चा हुई। ईरान का कहना है कि वह इस धनराशि का इस्तेमाल मानवीय जरूरतों और जरूरी सामान की खरीद तक सीमित रखना चाहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वार्ता के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधी बातचीत नहीं हुई। सभी संदेश और प्रस्ताव मध्यस्थ देशों के माध्यम से साझा किए गए। कतर लंबे समय से दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इस बार पाकिस्तान की भी मध्यस्थता में भागीदारी रही, जिससे वार्ता को आगे बढ़ाने में मदद मिली। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष बातचीत भले ही नहीं हुई हो, लेकिन अप्रत्यक्ष संवाद भी दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोहा में हुई बैठकों के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी प्रमुखता से उठाए गए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ईरान, कतर और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय बैठक में लेबनान की स्थिति, इजरायल की सैन्य गतिविधियों और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े हालात पर विस्तार से विचार किया गया। ईरान ने आरोप लगाया कि लेबनान में इजरायल की सैन्य मौजूदगी समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन रही है। इसके साथ ही ईरान ने दोहराया कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान और ओमान की संप्रभुता है और इस क्षेत्र से जुड़े किसी भी निर्णय में उनकी भूमिका सर्वोपरि रहनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक में ओमान की ओर से दिए गए नए प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा और जहाजों की आवाजाही को लेकर भविष्य की रणनीति पर बातचीत जारी रहेगी। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल अब अपने-अपने देशों में इस प्रस्ताव का अध्ययन करेंगे और आवश्यक परामर्श के बाद अगली बैठक में अपना रुख स्पष्ट करेंगे। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान ने वार्ता के दौरान यह भी मांग रखी कि MoU के पांच प्रमुख प्रावधानों को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाए। अधिकारियों का कहना है कि समझौते के सभी बिंदुओं पर समान गति से काम होना जरूरी है ताकि किसी भी पक्ष को असंतोष का मौका न मिले। दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष की ओर से सार्वजनिक रूप से ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि वह भी चरणबद्ध तरीके से समझौते को आगे बढ़ाने के पक्ष में है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि दोहा में हुई यह वार्ता भविष्य की कूटनीतिक प्रक्रिया के लिए अहम साबित हो सकती है। हालांकि अभी कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं, लेकिन बातचीत जारी रहने की सहमति अपने आप में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। आने वाले दिनों में यदि जमी हुई संपत्तियों के उपयोग, हॉटलाइन व्यवस्था और समझौते के अन्य प्रावधानों पर ठोस प्रगति होती है तो इससे दोनों देशों के संबंधों में कुछ हद तक नरमी आ सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 16:06:57 +0530</pubDate>
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                <title>भारत-पाक की 117 हस्तियों ने पीएम मोदी और शहबाज शरीफ को लिखा पत्र</title>
                                    <description><![CDATA[दोनों देशों के प्रमुख लोगों ने संवाद, शांति और आपसी रिश्तों को मजबूत करने की अपील की, युवाओं के भविष्य और क्षेत्रीय विकास पर दिया जोर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/117-celebrities-from-india-and-pakistan-wrote-letters-to-pm/article-57509"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/india-pakistan-relations.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच दोनों देशों की 117 प्रमुख हस्तियों ने एक संयुक्त पहल करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखा है। इस पत्र में दोनों नेताओं से आपसी संवाद को आगे बढ़ाने, बातचीत का रास्ता अपनाने और दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने की अपील की गई है। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों का कहना है कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति और विकास तभी संभव है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़े और दोनों देश आपसी मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रयास करें। इस संयुक्त पत्र में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ते तनाव का असर केवल सरकारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं के भविष्य पर पड़ता है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि लंबे समय से जारी तनाव के कारण विकास, व्यापार, शिक्षा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और क्षेत्रीय सहयोग जैसी कई संभावनाएं प्रभावित हुई हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने दोनों प्रधानमंत्रियों से आग्रह किया है कि वे भविष्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे कदम उठाएं, जिनसे विश्वास का माहौल बने और दोनों देशों के बीच संवाद की नई शुरुआत हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">इस संयुक्त पहल में भारत और पाकिस्तान के कुल 117 प्रमुख लोगों ने भाग लिया है। इनमें पूर्व नौकरशाह, पूर्व राजनयिक, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, राजनीतिक हस्तियां और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े वरिष्ठ लोग शामिल हैं। भारत की ओर से 61 लोगों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, मीरवाइज उमर फारूक और राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा सहित कई प्रमुख नाम शामिल हैं। वहीं पाकिस्तान की ओर से 56 लोगों ने इस पहल का समर्थन किया है, जिनमें पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी समेत कई पूर्व अधिकारी और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग शामिल हैं। पत्र में यह भी कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और ऐसे में किसी भी प्रकार का तनाव पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। हस्ताक्षरकर्ताओं का मानना है कि संवाद और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का हिस्सा होता है। उनका कहना है कि बातचीत का उद्देश्य मतभेदों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने का रास्ता तैयार करना होता है। पत्र में दोनों देशों के बीच लोगों के आपसी संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक सहयोग, खेल प्रतियोगिताओं और नागरिक स्तर पर संवाद को बढ़ावा देने की बात कही गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं का मानना है कि जब आम लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा तो आपसी विश्वास भी मजबूत होगा और लंबे समय से चली आ रही दूरियां कम करने में मदद मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस पत्र पर अभी तक भारत या पाकिस्तान की सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। दोनों देशों के संबंध पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न मुद्दों को लेकर चुनौतीपूर्ण रहे हैं। इसके बावजूद समय-समय पर अलग-अलग मंचों से शांति और संवाद की पहल की मांग उठती रही है। इस बार भी दोनों देशों की प्रमुख हस्तियों ने साझा रूप से यह संदेश देने की कोशिश की है कि क्षेत्र में स्थिरता और विकास के लिए संवाद का रास्ता खुला रहना जरूरी है। इस तरह की नागरिक पहलें सरकारों के बीच औपचारिक बातचीत का विकल्प नहीं होतीं, लेकिन वे सकारात्मक माहौल बनाने में अपनी भूमिका निभा सकती हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 13:43:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ट्रम्प की नीतियों से भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर, रो खन्ना का बड़ा दावा</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने कहा कि टैरिफ नीति और सहयोगी देशों से बिना सलाह लिए लिए गए फैसलों ने दोनों देशों के बीच भरोसे को कमजोर किया, जबकि अमेरिकी राजदूत ने मजबूत साझेदारी का भरोसा जताया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/ro-khannas-big-claim-on-trumps-policies-affecting-india-us-relations/article-57414"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indore-municipal-corporation-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">भारतीय मूल के अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद रो खन्ना ने भारत और अमेरिका के संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों की वजह से दोनों देशों के रिश्ते पिछले करीब 30 वर्षों में सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। वॉशिंगटन में आयोजित यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप फोरम (USISPF) लीडरशिप समिट 2026 में बोलते हुए खन्ना ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति, सहयोगी देशों से बिना चर्चा किए लिए गए फैसले और ईरान को लेकर अपनाया गया रुख अमेरिका की विश्वसनीयता पर असर डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे करीबी सहयोगी देशों के साथ विश्वास बनाए रखना किसी भी रणनीतिक साझेदारी की सबसे बड़ी जरूरत होती है, लेकिन हाल के वर्षों में इस भरोसे को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, इसी कार्यक्रम में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बताते हुए कहा कि रणनीतिक साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है और एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है।</p>
<p class="isSelectedEnd">रो खन्ना ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय फैसलों में अपने पारंपरिक सहयोगी देशों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया। उनके मुताबिक, ईरान को लेकर हुई सैन्य कार्रवाई जैसे फैसलों में भारत, यूरोप और कनाडा जैसे देशों से पहले चर्चा नहीं की गई। उन्होंने कहा कि जब सहयोगी देशों को विश्वास में नहीं लिया जाता तो इससे लंबे समय में रिश्तों पर असर पड़ता है। खन्ना का कहना था कि किसी भी वैश्विक साझेदारी की मजबूती केवल आर्थिक या सैन्य सहयोग से नहीं बल्कि आपसी भरोसे और संवाद से तय होती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया गया तो भविष्य में संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिकी सांसद ने ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति की भी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि हाल ही में चीन की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक भारतीय राजनयिक से हुई थी। बातचीत के दौरान उस राजनयिक ने उनसे कहा कि अमेरिका की मौजूदा व्यापारिक नीतियों ने वर्षों से बना भरोसा कमजोर कर दिया है। खन्ना ने कहा कि व्यापारिक साझेदारी में अचानक लगाए गए टैरिफ और एकतरफा फैसले केवल आर्थिक प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उनका असर कूटनीतिक संबंधों पर भी दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले तीन दशकों में जो विश्वास बना था, उसे बनाए रखना दोनों देशों के हित में है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अपने संबोधन के दौरान रो खन्ना ने अमेरिकी घरेलू राजनीति का भी जिक्र किया। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प को "लेम डक" राष्ट्रपति बताते हुए दावा किया कि आने वाले मिड-टर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर सकती है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में वापसी करेगी। खन्ना के मुताबिक, नई पीढ़ी के नेताओं के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना नहीं होगी, बल्कि दुनिया के प्रमुख सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करना भी होगा। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी विदेश नीति सहयोग और साझेदारी पर आधारित थी तथा उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति भी सकारात्मक रुख दिखाया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि, कार्यक्रम में मौजूद भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अलग तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत हैं और दोनों देश कई अहम क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है और जल्द इस दिशा में सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सकती है। गोर ने कहा कि अमेरिका भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का सम्मान करता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लेकर प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा तथा निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले वर्षों में यह रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">सर्जियो गोर ने अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले मियामी में आयोजित एक यूएफसी कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने अचानक प्रधानमंत्री मोदी को फोन करने की इच्छा जताई थी। गोर के अनुसार, जब उन्होंने ट्रम्प को बताया कि भारत में उस समय सुबह के करीब छह बजे हैं, तब भी ट्रम्प ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी शायद जाग चुके होंगे। हालांकि कार्यक्रम की व्यस्तता के कारण उस समय बातचीत नहीं हो सकी और बाद में दोनों नेताओं की बातचीत तय हुई। गोर ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत विश्वास और सहज संवाद का उदाहरण है। उनके मुताबिक, जब दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर मजबूत संबंध होते हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव दोनों देशों के व्यापक रिश्तों पर भी पड़ता है।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान गोर ने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक साझेदार हैं और दोनों देशों के संबंध किसी एक मुद्दे या एक सरकार तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि बदलते वैश्विक हालात के बावजूद दोनों देशों के बीच आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग आगे भी जारी रहेगा। वहीं, रो खन्ना के बयान ने इस बात पर नई बहस जरूर छेड़ दी है कि वैश्विक राजनीति, व्यापारिक नीतियां और कूटनीतिक फैसले किस तरह लंबे समय से बने रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते और रणनीतिक सहयोग को लेकर बातचीत जारी है, जिससे आने वाले समय में संबंधों की दिशा और अधिक स्पष्ट होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:17:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर फिर दी चेतावनी, पानी रोकने पर भारत को धमकी</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर भारत के फैसले का विरोध दोहराया, जल अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज तेज की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pakistan-again-warns-on-indus-water-treaty-threatens-india-if/article-57359"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/pakistan-india.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">पाकिस्तानी जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश हुई तो उसका जवाब दिया जाएगा। वहीं इस्लामाबाद ने दावा किया कि सिंधु जल संधि अब भी पूरी तरह प्रभावी है और भारत इसे एकतरफा समाप्त नहीं कर सकता। पाकिस्तान ने एक बार फिर सिंधु जल संधि को लेकर भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने सोमवार को इस्लामाबाद में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यदि किसी ने पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश की तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह को प्रभावित करना चाहता है। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच जल विवाद एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई होने तक सिंधु जल संधि को बहाल करने का कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।<br /><img alt="9k="></img></p>
<p>प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि सिंधु जल संधि अंतरराष्ट्रीय समझौता है और यह कानूनी रूप से अब भी लागू है। उनके अनुसार भारत इस संधि को न तो एकतरफा स्थगित कर सकता है, न समाप्त कर सकता है और न ही इसकी शर्तों में बदलाव कर सकता है। पाकिस्तानी मंत्रियों ने यह भी बताया कि मंगलवार को इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर पहला अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जाएगा। इसमें जल विशेषज्ञ, कानूनी विशेषज्ञ और विभिन्न देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। सेमिनार में संधि के कानूनी, तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसके जल अधिकार सुरक्षित हैं। अधिकारियों के मुताबिक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पहले भी कई बार कह चुके हैं कि पानी पाकिस्तान की जीवनरेखा है और इस मुद्दे पर कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान इस विषय को वैश्विक स्तर पर उठाने की भी तैयारी कर रहा है।<br /><br /></p>
<p>इससे पहले 21 जून को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी इसी मुद्दे पर भारत को चेतावनी दी थी। एक पाकिस्तानी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि यदि पाकिस्तान को अपनी जल सुरक्षा पर खतरा महसूस हुआ तो स्थिति गंभीर हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत पानी को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि हाल के महीनों में इस मामले में हुए सभी घटनाक्रमों की उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। उस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद भारत सरकार ने कहा था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा। भारत का यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ाने वाला माना गया।<br /><br /><img alt="Z"></img></p>
<p>सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल के उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए थे। सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल पाकिस्तान को मिला, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज का उपयोग भारत के हिस्से में आया। पिछले छह दशकों से अधिक समय तक यह संधि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार बनी रही। पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। वहां की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि को इसी नदी तंत्र से पानी मिलता है। कृषि क्षेत्र पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। यदि पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है तो इसका असर खेती, बिजली उत्पादन, उद्योग और ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ सकता है। पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय और जलविद्युत परियोजनाएं भी इसी नदी प्रणाली पर आधारित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 11:09:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरान का कुवैत–बहरीन में 8 अमेरिकी ठिकानों पर हमला, तनाव बढ़ा</title>
                                    <description><![CDATA[खामेनेई का अमेरिका-इजराइल पर तीखा बयान, हर हमले का जवाब देने की चेतावनी, पश्चिम एशिया में हालात बेहद तनावपूर्ण]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/irans-attack-on-8-american-bases-in-kuwait-bahrain-increases-tension/article-57260"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/iran-attack-kuwait-bahrain-us-bases.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े तनाव की चपेट में आता दिख रहा है। रविवार को ईरान की ओर से दावा किया गया कि उसने कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिका के 8 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर हमला किया है और उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया गया है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने बयान जारी कर कहा कि यह कार्रवाई अमेरिका की तरफ से ईरान के ठिकानों पर की गई “दूसरी बड़ी सैन्य कार्रवाई” के जवाब में की गई है। हालांकि अभी तक अमेरिका या कुवैत और बहरीन की सरकारों की ओर से इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन क्षेत्र में सुरक्षा अलर्ट जरूर बढ़ा दिया गया है। इन हमलों के बाद कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और सैन्य गतिविधियों पर अतिरिक्त निगरानी रखी जा रही है। स्थानीय प्रशासन ने भी हालात को देखते हुए संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी है। बताया जा रहा है कि हमले के बाद कुछ इलाकों में हलचल और दहशत जैसा माहौल देखने को मिला, हालांकि अभी तक किसी बड़े नुकसान या हताहतों की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि मामला तेजी से बढ़ते टकराव की ओर इशारा कर रहा है।</p>
<p>ईरान की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि यह हमला एक जवाबी कार्रवाई थी और इसका मकसद अमेरिका की सैन्य गतिविधियों का प्रतिकार करना था। ईरानी सेना ने दावा किया कि यह ऑपरेशन पूरी तरह योजनाबद्ध था और इसमें रणनीतिक ठिकानों को टारगेट किया गया। ईरान का यह भी कहना है कि अगर आगे भी उसकी सुरक्षा और संप्रभुता पर हमला हुआ तो वह और सख्त जवाब देगा। इस बयान के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है और कूटनीतिक स्तर पर चिंता जताई जा रही है। इस बीच ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई ने अमेरिका और इजराइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि दोनों देशों के नेताओं ने हालिया हमलों को लेकर जिस तरह सार्वजनिक रूप से बयान दिए हैं और उन पर गर्व जताया है, वह अपने आप में अपराध स्वीकार करने जैसा है। खामेनेई ने कहा कि ईरान पर हुए हर हमले, हर मौत और हर नुकसान का हिसाब लिया जाएगा और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय और घरेलू अदालतों में कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उनका यह बयान काफी आक्रामक माना जा रहा है और इसके बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। खामेनेई पहले भी अमेरिका और इजराइल पर गंभीर आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन इस बार उनका बयान ज्यादा तीखा और सीधा माना जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि वह पहले हुए एक कथित अमेरिका-इजराइल हमले में घायल हुए थे, जिसके बाद से वे किसी सुरक्षित और गुप्त स्थान पर रह रहे हैं। हालांकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ईरान के अंदर सुरक्षा व्यवस्था और सतर्कता बढ़ा दी गई है।</p>
<p>दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर सावधानी भरी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक स्थिति पर नजर रखी जा रही है और क्षेत्र में मौजूद सभी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को और मजबूत किया गया है। कुवैत और बहरीन में भी सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। पश्चिम एशिया में पहले से ही कई तरह के तनाव मौजूद हैं और ऐसे में यह नया घटनाक्रम स्थिति को और जटिल बना सकता है। अगर ईरान और अमेरिका के बीच इस तरह के हमले और जवाबी कार्रवाई का सिलसिला बढ़ता रहा तो यह एक बड़े क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकता है। पहले से ही इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष और ईरान-अमेरिका तनाव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना रखा है। ऐसे में यह नया टकराव वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी असर डाल सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 10:33:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरान ने NATO देशों पर लगाए गंभीर आरोप, होर्मुज में जहाज पर हमला</title>
                                    <description><![CDATA[तेहरान का दावा—अमेरिका-इजराइल के साथ कुछ NATO देशों ने दिया सैन्य समर्थन, होर्मुज स्ट्रेट में कॉमर्शियल जहाज पर हमला, ब्रिज को नुकसान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/iran-makes-serious-allegations-against-nato-countries-attack-on-ship/article-57064"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/iran-nato-conflict.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। Iran ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजराइल के साथ मिलकर उसके खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई में कुछ NATO सदस्य देशों ने भी समर्थन दिया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में NATO की भूमिका की गंभीर जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार देशों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और एक बार फिर पश्चिमी देशों और ईरान के बीच तनाव की स्थिति बनती दिख रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान की ओर से यह दावा ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कूटनीतिक मंच पर पहले से ही कई मुद्दों को लेकर असहमति बनी हुई है। बघई ने अपने बयान में कहा कि NATO प्रमुख मार्क रूट ने खुद इस बात की ओर इशारा किया है कि इटली और रोमानिया ने ईरान के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई में अमेरिका का समर्थन किया था। हालांकि इस दावे पर अभी तक स्वतंत्र रूप से किसी भी देश ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। ईरान ने सवाल उठाते हुए कहा है कि इन देशों को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर और किस उद्देश्य से इस तरह के सैन्य सहयोग में हिस्सा लिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि अगर किसी भी NATO देश ने इस प्रकार की कार्रवाई में भाग लिया है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। तेहरान ने यह भी मांग की है कि इन देशों को न केवल अपने नागरिकों को बल्कि पूरी दुनिया को जवाब देना चाहिए कि उन्होंने अमेरिका और इजराइल के साथ मिलकर इस तरह की कार्रवाई का समर्थन क्यों किया। ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए कड़े शब्दों में निंदा की है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच समुद्री सुरक्षा से जुड़ा एक और बड़ा मामला सामने आया है। Strait of Hormuz में एक कॉमर्शियल जहाज पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ है। ब्रिटेन की यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने इस घटना की पुष्टि की है। जहाज ओमान के तट के पास था, जब अचानक एक प्रोजेक्टाइल आकर जहाज के दाहिने हिस्से से टकरा गया। इस हमले से जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा है, जहां से जहाज का संचालन किया जाता है। हालांकि राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी भी क्रू सदस्य को चोट नहीं आई है। घटना के बाद समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है और यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति श्रृंखला को भी प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान और पश्चिमी देशों के बीच पहले से ही कई मुद्दों पर तनाव बना हुआ है, और इस नए विवाद ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। NATO की भूमिका को लेकर उठे सवालों ने कूटनीतिक हलकों में नई बहस शुरू कर दी है। हालांकि अभी तक NATO की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं अमेरिका और इजराइल की ओर से भी इन आरोपों पर चुप्पी बनी हुई है। ईरान का यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जबकि पश्चिमी देश इसे खारिज कर सकते हैं। लेकिन जिस तरह से होर्मुज क्षेत्र में हमला हुआ है, उसने एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब वैश्विक समुदाय की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा और व्यापार बाजारों पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 17:08:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा तनाव, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बड़ा बयान</title>
                                    <description><![CDATA[ख्वाजा आसिफ ने जल सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि पाकिस्तान अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठा सकता है। संधि निलंबन के बाद दोनों देशों के बीच विवाद गहराता नजर आ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/tension-increases-again-on-indus-water-treaty-big-statement-of/article-56609"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indus-water-treaty-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनावपूर्ण बयानबाजी सामने आई है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि यदि पाकिस्तान को यह महसूस होता है कि उसकी जल सुरक्षा को खतरा पहुंच रहा है तो स्थिति गंभीर हो सकती है और देश अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रही बहस फिर चर्चा में आ गई है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान पहले से ही पानी की कमी और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तानी मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह में दखल देने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि पानी किसी भी देश के लिए जीवनरेखा की तरह होता है और यदि इस पर असर पड़ता है तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। हालांकि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि हाल के महीनों में इस विषय पर हुए सभी तकनीकी घटनाक्रमों की उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। इसके बावजूद उनका बयान पाकिस्तान में जल संकट को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दरअसल अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। उस हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी। भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा। भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और आतंकवाद से जुड़े मामलों पर किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती। सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में तैयार इस समझौते को दुनिया के सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों में गिना जाता रहा है। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए थे। इनमें सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश जल पाकिस्तान को दिया गया, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियों पर भारत को अधिकार मिला। कई युद्धों और राजनीतिक तनावों के बावजूद यह संधि दशकों तक लागू रही।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पाकिस्तान की जल व्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। देश की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि को पानी इसी नदी तंत्र से मिलता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है और ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है। ऐसे में पानी की उपलब्धता में किसी भी प्रकार की कमी का असर सीधे खाद्य उत्पादन, रोजगार और ग्रामीण आय पर पड़ सकता है। पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में पानी की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कई प्रमुख नहरों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे पहुंच चुका है। नॉर्थ वेस्ट कैनाल में 64 प्रतिशत से अधिक पानी की कमी दर्ज की गई है, जबकि राइस कैनाल और दादू कैनाल में भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। किसानों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले मौसम में फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जल संकट का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान के कई बड़े बांध और हाइड्रोपावर परियोजनाएं भी नदी के जल प्रवाह पर निर्भर करती हैं। मंगल और तारबेला जैसे प्रमुख जलाशयों में पानी की उपलब्धता कम होने की आशंका जताई जा रही है। यदि जल स्तर में लगातार गिरावट आती है तो बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे औद्योगिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है और पहले से दबाव झेल रही अर्थव्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि को लेकर उसका रुख स्पष्ट है। भारत लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित होने वाले आतंकी ढांचे के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं करता। इसी कारण भारत ने पहलगाम हमले के बाद कड़ा रुख अपनाया। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि जल संसाधनों का मुद्दा आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाला है। दक्षिण एशिया में बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और सीमित जल स्रोतों के कारण पानी को लेकर चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए जल प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता एक बड़ा विषय बना रहेगा। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी इस मुद्दे को और जटिल बना रही है। सिंधु जल संधि को लेकर बयानबाजी का दौर जारी है। पाकिस्तान अपनी जल सुरक्षा को लेकर चिंता जता रहा है, जबकि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख पर कायम है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 11:38:33 +0530</pubDate>
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                <title>भारत सरकार के सचिव विवेक अग्रवाल FATF के उपाध्यक्ष बने</title>
                                    <description><![CDATA[मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था में भारत को मिली बड़ी जिम्मेदारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/vivek-aggarwal-secretary-to-the-government-of-india-became-the/article-56489"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/fatf-vice-president.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। भारत सरकार में सचिव और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विवेक अग्रवाल को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) का उपाध्यक्ष चुना गया है। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब दुनिया भर में आतंकवाद की फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध वित्तीय गतिविधियों को लेकर निगरानी बढ़ाई जा रही है। विदेश मंत्रालय ने इस चयन को भारत के लिए बड़ी सफलता बताते हुए कहा है कि इससे वैश्विक वित्तीय सुरक्षा के क्षेत्र में देश की भूमिका और मजबूत होगी। साथ ही आतंकवाद के खिलाफ भारत द्वारा वर्षों से उठाए जा रहे मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अधिक मजबूती मिलेगी। विवेक अग्रवाल 1994 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय में सचिव के पद पर कार्यरत हैं। प्रशासनिक सेवा में उन्हें तीन दशक से अधिक का अनुभव है। अपने लंबे करियर में उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। वित्तीय प्रशासन, कर व्यवस्था, आर्थिक अपराध और नीतिगत मामलों में उनकी गहरी समझ मानी जाती है। इससे पहले वह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। सरकारी तंत्र में उनकी पहचान एक अनुभवी और प्रभावी अधिकारी के रूप में रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">FATF को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अंतर-सरकारी संस्थाओं में गिना जाता है। यह संस्था वैश्विक स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद की फंडिंग और अन्य वित्तीय अपराधों पर निगरानी रखने का काम करती है। FATF विभिन्न देशों के लिए मानक और दिशा-निर्देश तय करती है ताकि वित्तीय प्रणाली का दुरुपयोग रोका जा सके। संस्था समय-समय पर सदस्य देशों और अन्य देशों की व्यवस्थाओं का मूल्यांकन भी करती है। जिन देशों की व्यवस्था कमजोर पाई जाती है, उन्हें ग्रे लिस्ट या ब्लैक लिस्ट में शामिल किया जा सकता है। FATF के फैसलों का असर वैश्विक निवेश, बैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ता है। विदेश मंत्रालय के अनुसार विवेक अग्रवाल का उपाध्यक्ष चुना जाना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख और प्रभाव का भी प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आतंकवाद की फंडिंग रोकने और अवैध वित्तीय गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाता रहा है कि आतंकवाद को आर्थिक मदद पहुंचाने वाले नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। इसी कारण FATF जैसी संस्था में भारत की सक्रिय भूमिका लगातार बढ़ती गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विवेक अग्रवाल का FATF से जुड़ाव नया नहीं है। वह पहले भी FATF में भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर चुके हैं। इसके अलावा वह फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND) के निदेशक भी रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की निगरानी, आर्थिक अपराधों की जांच और वित्तीय खुफिया तंत्र को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। अधिकारियों का मानना है कि FATF के कामकाज की गहरी समझ और अंतरराष्ट्रीय अनुभव उनकी नई जिम्मेदारी में काफी मददगार साबित होगा। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब दुनिया तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है। डिजिटल पेमेंट, ऑनलाइन बैंकिंग, क्रिप्टोकरेंसी और वर्चुअल एसेट्स के बढ़ते उपयोग ने वित्तीय सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कई देशों में डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर अवैध लेनदेन और धन शोधन के मामले सामने आए हैं। FATF इन नए जोखिमों से निपटने के लिए लगातार नए मानक तैयार कर रही है। भारत भी डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। ऐसे में FATF के नेतृत्व में भारत की भागीदारी बढ़ने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत पिछले कई वर्षों से सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठाता रहा है। भारत का कहना है कि आतंकवादी संगठनों को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी संदर्भ में FATF की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। जून 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद FATF ने भी इस घटना की निंदा की थी और सभी देशों से आतंकवाद की फंडिंग रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की थी। उसके बाद भारत ने FATF के समक्ष पाकिस्तान को दोबारा ग्रे लिस्ट में शामिल करने का औपचारिक अनुरोध भी किया था। भारत का आरोप रहा है कि सीमा पार से संचालित आतंकी नेटवर्क को आर्थिक सहायता मिलती है और इस पर प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है। ऐसे में FATF के नेतृत्व ढांचे में भारत की बढ़ती भूमिका को रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संस्कृति मंत्रालय ने भी विवेक अग्रवाल को मिली इस जिम्मेदारी पर खुशी जताई है। मंत्रालय का कहना है कि दुनिया के 200 से अधिक देशों और क्षेत्रों के बीच भारत की विश्वसनीयता लगातार बढ़ रही है। यह चयन इस बात का संकेत है कि वैश्विक संस्थाओं में भारत की भागीदारी अब पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हो चुकी है। आने वाले समय में FATF के मंच पर भारत की सक्रिय भूमिका वैश्विक वित्तीय पारदर्शिता, मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कार्रवाई और आतंकवाद की फंडिंग रोकने के प्रयासों को नई दिशा दे सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 14:55:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>G7 शिखर सम्मेलन में मोदी को मैक्रों का हिंदी में भावुक संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[फ्रांस के राष्ट्रपति ने वीडियो संदेश में ‘प्रिय मित्र नरेंद्र’ कहकर भारत–फ्रांस दोस्ती को बताया अमर, द्विपक्षीय संबंधों को मिली नई गर्माहट]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/macrons-emotional-message-in-hindi-to-modi-at-g7-summit/article-56355"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/g7-summit-modi-macron.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G7 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और फ्रांस के बीच कूटनीतिक रिश्तों में एक अनोखा और भावनात्मक पल देखने को मिला, जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदी में संबोधित करते हुए एक विशेष वीडियो संदेश भेजा। यह संदेश न केवल राजनीतिक मंच पर चर्चा का विषय बना, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरी होती दोस्ती का प्रतीक भी माना जा रहा है। मैक्रों ने अपने संदेश की शुरुआत “प्रिय मित्र नरेंद्र” शब्दों से की और हिंदी में भारत–फ्रांस संबंधों को अमर रहने की कामना की। यह वीडियो संदेश G7 बैठक के समापन के अवसर पर रिकॉर्ड किया गया, जिसमें मैक्रों ने हल्के-फुल्के अंदाज में हिंदी बोलने की कोशिश की और बाद में मुस्कुराते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उनका उच्चारण सही रहा होगा। उनके इस प्रयास ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान खींचा और माहौल को बेहद अनौपचारिक और सौहार्दपूर्ण बना दिया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी में आगे कहा कि पीएम मोदी की यात्रा बहुत “फलदायी” रही और दोनों देशों के बीच साझेदारी और मजबूत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह घटना ऐसे समय में हुई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस दौरे पर थे और उन्होंने कई महत्वपूर्ण बैठकों में भाग लिया। पेरिस के निकट विला केरीलोस में हुई द्विपक्षीय बैठक में दोनों नेताओं ने रक्षा सहयोग, अंतरिक्ष साझेदारी और तकनीकी विकास जैसे अहम क्षेत्रों पर विस्तार से चर्चा की। दोनों पक्षों ने इस बात पर संतोष जताया कि भारत और फ्रांस के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ रहा है और इसे सह-निर्माण, सह-विकास और उन्नत तकनीक के साझा उपयोग की दिशा में और आगे बढ़ाया जाएगा। कूटनीतिक बातचीत के दौरान अंतरिक्ष क्षेत्र को भी प्रमुख एजेंडा में रखा गया। दोनों नेताओं ने मानव अंतरिक्ष उड़ान, स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर सहमति जताई। यह संकेत माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत और फ्रांस अंतरिक्ष अनुसंधान और तकनीकी नवाचार में एक साथ बड़े कदम उठा सकते हैं। यह सहयोग वैश्विक स्तर पर दोनों देशों की स्थिति को और मजबूत करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी यात्रा के दौरान पीएम मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों ने वीवा टेक 2026 कार्यक्रम में स्टार्टअप्स के साथ बातचीत की और नई तकनीकों तथा नवाचारों का अवलोकन किया। इस दौरान दोनों नेताओं ने युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित किया और डिजिटल अर्थव्यवस्था, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की।  मैक्रों द्वारा हिंदी में दिया गया यह संदेश केवल एक औपचारिक शिष्टाचार नहीं था, बल्कि यह दोनों देशों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर मजबूत होते संबंधों का संकेत है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इस तरह के भावनात्मक और भाषाई प्रयास बहुत कम देखने को मिलते हैं, जिससे यह घटना और भी खास बन जाती है। इस पूरे घटनाक्रम ने G7 शिखर सम्मेलन में भारत–फ्रांस संबंधों को एक नया आयाम दिया है। जहां एक ओर वैश्विक मंच पर रणनीतिक साझेदारी को मजबूती मिली है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्तर पर दोनों नेताओं के बीच आपसी सम्मान और मित्रता भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 10:33:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>G7 में पीएम मोदी का बयान, वैश्विक संकटों का बोझ अकेले न उठाए ग्लोबल साउथ</title>
                                    <description><![CDATA[ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति संकट पर चिंता जताई, स्किल पार्टनरशिप और IMPACT ढांचे का दिया प्रस्ताव]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pm-modis-statement-in-g7-global-south-should-not-bear/article-56252"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/pm-modi-g7-speech-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G7 आउटरीच सत्र में वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूती से उठाते हुए कहा कि दुनिया में चल रहे संकटों का बोझ केवल विकासशील देशों पर नहीं डाला जा सकता। उन्होंने खास तौर पर पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति श्रृंखलाओं का जिक्र किया और कहा कि इन व्यवधानों का असर लंबे समय तक कमजोर देशों पर पड़ता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी बनती है कि वह सुनिश्चित करे कि संवेदनशील और विकासशील देश अकेले इन संकटों का भार न उठाएं। पीएम मोदी ने साझा और संतुलित विकास पर बोलते हुए कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां सप्लाई चेन में अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ता है, जो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि वैश्विक एकजुटता को मजबूत करना है तो सबसे कमजोर देशों को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने वैश्विक कौशल साझेदारी (Global Skills Partnership) का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों में प्रतिभा और उद्यमिता की कोई कमी नहीं है, लेकिन उसे सही अवसर और वैश्विक मंच की जरूरत है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्किल मैपिंग और भरोसेमंद स्किल मोबिलिटी को बढ़ावा देने की बात कही, जिससे विकसित देशों की उम्रदराज होती आबादी और विकासशील देशों की युवा शक्ति के बीच संतुलन बनाया जा सके। पीएम मोदी ने इसके साथ ही IMPACT यानी “International Mobilisation Partnership for Accelerating Connectivity and Trade” ढांचे का भी सुझाव दिया। इस पहल का उद्देश्य व्यापार, तकनीक और ऊर्जा के नए कॉरिडोर विकसित करना है, जिसमें G7 देशों की पूंजी, भारत की प्रतिभा और ग्लोबल साउथ की भागीदारी को जोड़ा जा सके। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहलें स्थानीय स्वामित्व, पारदर्शी वित्तपोषण और दीर्घकालिक स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए ताकि वास्तविक विकास संभव हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह के कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को और आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत द्वीप क्षेत्रों के साथ भी इसी तरह की कनेक्टिविटी योजनाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे न केवल व्यापार को बढ़ावा मिलेगा बल्कि रोजगार, निवेश और नवाचार के नए अवसर भी पैदा होंगे। अपने संबोधन में पीएम मोदी ने यह भी कहा कि भारत की वैश्विक आर्थिक नीति केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीनी स्तर पर दिखाई देती है। उन्होंने बताया कि भारत ने G7 में शामिल कई देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं, जो इस बात का संकेत है कि भारत संरक्षणवाद की बजाय साझेदारी और एकीकरण में विश्वास रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज दुनिया दो बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है—एक तरफ विकसित देशों में उम्रदराज आबादी की समस्या है, तो दूसरी तरफ विकासशील देशों में युवा और कुशल जनशक्ति की प्रचुरता है। इस असंतुलन को अवसर में बदलने की जरूरत है। इसी के तहत उन्होंने एक ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप की परिकल्पना रखी, जिससे देशों के बीच कौशल का आदान-प्रदान और भरोसेमंद श्रम गतिशीलता को बढ़ावा दिया जा सके। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत हमेशा से वैश्विक सहयोग और साझा समृद्धि का समर्थक रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की नीति “विभाजन नहीं, एकीकरण”, “संरक्षणवाद नहीं, साझेदारी” और “अनिश्चितता नहीं, साझा समृद्धि” पर आधारित है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से भी अपील की कि वे विकासशील देशों को आर्थिक झटकों से निपटने के लिए मजबूत समर्थन तंत्र विकसित करें। G7 मंच पर पीएम मोदी का यह संदेश वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में संतुलन, सहयोग और समावेशी विकास की दिशा में एक मजबूत अपील के रूप में देखा जा रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 11:36:07 +0530</pubDate>
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