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                <title>Geopolitics - दैनिक जागरण</title>
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                <title>ईरान पर फिर बरसे अमेरिकी हमले, होर्मुज में जहाजों पर हमले के बाद बढ़ा तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[सीजफायर खत्म होने के बाद अमेरिका ने ईरान के कई शहरों और सैन्य ठिकानों पर एयरस्ट्राइक तेज की, ट्रम्प ने आगे भी कड़ी कार्रवाई के दिए संकेत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/american-attacks-again-on-iran-tension-increased-after-attack-on/article-58239"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/us-iran-conflict-(3).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हाल के दिनों में बना तनाव अब एक बार फिर खुले सैन्य टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच लागू सीजफायर खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के कई शहरों में एयरस्ट्राइक शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक कोनारक, चाबहार और बंदर अब्बास समेत कई इलाकों में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में कई स्थानों पर धुएं के बड़े गुबार उठने की बात कही गई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का कहना है कि यह कार्रवाई होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई है। लगातार हो रहे इन हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव को और बढ़ा दिया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता भी गहरी हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी सेना ने इससे पहले मंगलवार को भी ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। अधिकारियों के अनुसार ताजा अभियान उसी कार्रवाई का विस्तार माना जा रहा है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है जिनका इस्तेमाल क्षेत्र में हमलों के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर ईरान की ओर से अभी तक सभी हमलों के नुकसान का आधिकारिक ब्योरा जारी नहीं किया गया है, लेकिन कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है और राहत एजेंसियां भी सक्रिय हो गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका पहले ही ईरान पर जोरदार हमला कर चुका है और जरूरत पड़ने पर आगे भी बड़े सैन्य अभियान चलाए जा सकते हैं। ट्रम्प ने कहा कि ईरान लंबे समय से मध्य पूर्व में दबाव बनाने और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। उनके इस बयान के कुछ समय बाद ही ईरान में नई एयरस्ट्राइक की खबरें सामने आने लगीं, जिससे माना जा रहा है कि अमेरिका ने अपनी चेतावनी पर तुरंत अमल किया।</p>
<p style="text-align:justify;">तनाव की शुरुआत होर्मुज जलडमरूमध्य में हुए जहाजों पर हमलों के बाद और तेज हुई। ईरान ने मंगलवार को तीन जहाजों को निशाना बनाने की पुष्टि करते हुए दावा किया कि संबंधित जहाज उसके निर्धारित समुद्री मार्गों का पालन नहीं कर रहे थे। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई की गई, जबकि अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नौवहन की स्वतंत्रता पर हमला बताया। अमेरिका का कहना है कि दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल होर्मुज में किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक जवाबी अभियान के तहत ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। बंदर अब्बास स्थित शाहिद हक्कानी पोर्ट पर भी एयरस्ट्राइक की गई, जिसके बाद वहां से धुएं का बड़ा गुबार उठता देखा गया। यह बंदरगाह ईरान के प्रमुख समुद्री केंद्रों में गिना जाता है और इसकी सामरिक अहमियत भी काफी अधिक मानी जाती है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और आम लोगों की आवाजाही सीमित कर दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि दोनों देशों के बीच यही स्थिति बनी रही तो इसका असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और गैस गुजरती है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी असर डाल सकता है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और शिपिंग लागत बढ़ने की आशंका पहले से ही जताई जा रही है। कई देशों ने अपने जहाजों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हालात पर नजर रखी जा रही है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। हालांकि मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए तत्काल तनाव कम होने की संभावना कम दिखाई दे रही है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहा तो यह संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है, जिससे पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति प्रभावित होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 11:04:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>चीन के मिसाइल परीक्षण ने बढ़ाई हिंद-प्रशांत की चिंता, परमाणु पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च के बाद भारत भी सतर्क</title>
                                    <description><![CDATA[चीन की समुद्र आधारित परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण बदलने की आशंका, भारत के लिए समुद्री निगरानी और रक्षा तैयारियों को मजबूत करना होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/chinas-missile-test-increases-the-concern-of-indo-pacific-india-also/article-58131"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/china-missile-test.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक बार फिर रणनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। चीन ने परमाणु ऊर्जा से संचालित अपनी पनडुब्बी से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस परीक्षण को चीन ने नियमित सैन्य अभ्यास का हिस्सा बताया है, लेकिन अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत कई देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर संकेत माना है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक सैन्य परीक्षण नहीं, बल्कि चीन की बदलती रणनीति और समुद्र आधारित परमाणु शक्ति को मजबूत करने का स्पष्ट संदेश भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारों के अनुसार इस परीक्षण में चीन ने अपनी नई पीढ़ी की सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का इस्तेमाल किया है, जिसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम माना जाता है। माना जा रहा है कि यह मिसाइल हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्य भेदने की क्षमता रखती है। इसका सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि ऐसी मिसाइलें समुद्र में गहराई तक मौजूद परमाणु पनडुब्बियों से दागी जा सकती हैं, जिससे दुश्मन के लिए उनका पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है। चीन लंबे समय से अपनी समुद्री परमाणु क्षमता को मजबूत करने पर काम कर रहा है। पहले उसका सैन्य फोकस मुख्य रूप से दक्षिण चीन सागर और ताइवान के आसपास देखा जाता था, लेकिन अब उसकी गतिविधियां हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैल चुकी हैं। इसी वजह से भारत सहित कई देशों की रणनीतिक चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में चीनी नौसेना की पनडुब्बियां कई बार हिंद महासागर क्षेत्र में देखी गई हैं। इसके अलावा जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में उसकी सक्रियता और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर बढ़ता प्रभाव पहले से ही भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यदि चीन अधिक आधुनिक, कम शोर वाली और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ाता है तो हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत हो सकती है। समुद्र आधारित परमाणु हथियार किसी भी देश की रणनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। पनडुब्बी से छोड़ी गई बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाना बेहद मुश्किल होता है और यही कारण है कि दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियां अपनी नौसेना में इस क्षमता को लगातार विकसित कर रही हैं। चीन का हालिया परीक्षण इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की परमाणु नीति "क्रेडिबल मिनिमम डेटेरेंस" और "नो फर्स्ट यूज" के सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे में यदि चीन अपनी समुद्र आधारित परमाणु क्षमता तेजी से बढ़ाता है तो भारत को भी अपने रणनीतिक प्रतिरोधक तंत्र को और मजबूत करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत को अधिक परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण, लंबी दूरी की K-4 और K-5 बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास तथा समुद्री निगरानी प्रणाली के विस्तार पर और अधिक ध्यान देना होगा। चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता का असर केवल सैन्य संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति पर भी पड़ सकता है। भारत पहले से उत्तरी सीमा पर चीन और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। यदि समुद्री क्षेत्र में भी चीन की मौजूदगी लगातार बढ़ती है तो भारत को भूमि, वायु और समुद्र—तीनों मोर्चों पर अपनी रक्षा तैयारियों को संतुलित तरीके से मजबूत करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बदलते परिदृश्य में अंडमान एवं निकोबार कमांड की रणनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। यह कमांड मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं। यदि चीन की पनडुब्बियों की गतिविधियां इस क्षेत्र में बढ़ती हैं तो भारत को पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता, समुद्री निगरानी ड्रोन, आधुनिक सोनार सिस्टम और P-8I समुद्री निगरानी विमानों की तैनाती और बढ़ानी पड़ सकती है। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों का एक और बड़ा प्रभाव QUAD समूह पर भी पड़ सकता है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त और सुरक्षित समुद्री मार्ग बनाए रखने के लिए सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में समुद्री सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों की संख्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है। मालाबार जैसे संयुक्त अभ्यास इस सहयोग को और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर ताइवान पर दबाव बनाए रखना चाहता है। साथ ही वह प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने और वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश भी कर रहा है। समुद्र आधारित परमाणु क्षमता को मजबूत करना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर भारत भी अपनी समुद्री शक्ति को लगातार मजबूत कर रहा है। भारतीय नौसेना के पास पहले से परमाणु पनडुब्बियां, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, आधुनिक समुद्री निगरानी विमान और मजबूत नौसैनिक कमांड मौजूद हैं। इसके अलावा मित्र देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग और हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक निगरानी भारत की सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुका है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 10:12:49 +0530</pubDate>
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                <title>खामेनेई की अंतिम यात्रा के बीच होर्मुज में फिर हमले, तीन टैंकर बने निशाना</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान ने कमर्शियल जहाजों के तय समुद्री मार्ग छोड़ने पर जताई चिंता, अंतिम यात्रा में लाखों लोगों की मौजूदगी के बीच क्षेत्रीय तनाव और गहराया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/three-tankers-targeted-again-in-hormuz-amid-khameneis-last-visit/article-58127"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/iran.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा के बीच पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। मंगलवार को होर्मुज जलडमरूमध्य में तीन तेल टैंकरों पर हमलों की खबर सामने आने के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि कतर के तेल टैंकर अल-रकायत को निशाना बनाया गया, जबकि यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) के अनुसार ओमान तट के पास दो अन्य वाणिज्यिक जहाज भी हमलों की चपेट में आए। घटनाओं के बाद समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। ईरान ने कहा है कि कुछ व्यावसायिक जहाज उसके द्वारा निर्धारित समुद्री मार्गों का पालन नहीं कर रहे हैं और ऐसी स्थिति में उनकी सुरक्षा की गारंटी देना संभव नहीं होगा। अधिकारियों का यह भी कहना है कि होर्मुज की स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और हालात पहले की तरह स्थिर नहीं माने जा सकते।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हमलों की खबर ऐसे समय सामने आई है जब ईरान में पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा जारी है। मंगलवार को उनका पार्थिव शरीर शिया समुदाय के प्रमुख धार्मिक शहर कोम पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने अंतिम श्रद्धांजलि दी। शहर की सड़कों पर सुबह से ही लोगों की भीड़ उमड़ने लगी थी और लाखों समर्थकों की मौजूदगी के बीच धार्मिक रस्में पूरी की गईं। अंतिम यात्रा के दौरान कई लोगों के हाथों में लाल झंडे दिखाई दिए। शिया परंपरा में लाल झंडा अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध और बदले की मांग का प्रतीक माना जाता है। पार्थिव शरीर पर ईरान का राष्ट्रीय ध्वज ओढ़ाया गया था, जबकि ताबूत पर उनकी काली पगड़ी भी रखी गई, जो उच्च धार्मिक विद्वानों की पहचान मानी जाती है। सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी रखी गई और पूरे मार्ग पर बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सरकारी सूत्रों के अनुसार इससे पहले तेहरान में निकली अंतिम यात्रा में भी लाखों लोग शामिल हुए। भारी भीड़ के कारण कई स्थानों पर शव वाहन की रफ्तार धीमी करनी पड़ी और कुछ जगहों पर यात्रा थोड़ी देर के लिए रुक भी गई। इसके बाद पार्थिव शरीर को धार्मिक परंपराओं के अनुसार कोम ले जाया गया। बताया गया है कि आगे की रस्मों के बाद उन्हें उनके गृह नगर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। अंतिम यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में धार्मिक नेता, राजनीतिक प्रतिनिधि और आम नागरिक मौजूद रहे। कई लोगों ने नारे लगाए और खामेनेई की विरासत को आगे बढ़ाने की बात कही।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इधर समुद्री मोर्चे पर बढ़े तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या हमले का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है। ईरान ने कहा है कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए जहाजों को निर्धारित समुद्री मार्गों का पालन करना जरूरी है। यदि जहाज तय रास्तों से अलग होकर आवाजाही करेंगे तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल होगा। हालांकि हमलों को लेकर स्वतंत्र स्तर पर विस्तृत पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है और संबंधित एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान के भीतर भी इस दौरान राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। देश के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने अंतिम यात्रा के दौरान कहा कि देश खामेनेई के बताए रास्ते पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराता है। वहीं सेना प्रमुख अमीर हातमी ने कहा कि जिम्मेदार लोगों को उनके किए का जवाब देना होगा और उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। दूसरी ओर क्षेत्रीय राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अंतिम यात्रा में जुटी भीड़ पूरे ईरान की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करती। वहीं इराक के प्रमुख शिया नेता अम्मार अल-हकीम ने लोगों से बड़ी संख्या में अंतिम यात्रा में शामिल होने की अपील की। अंतिम यात्रा के साथ-साथ समुद्री क्षेत्र में बढ़ी गतिविधियां पश्चिम एशिया की पहले से संवेदनशील स्थिति को और जटिल बना सकती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद अहम माना जाता है और यहां किसी भी प्रकार का तनाव कई देशों की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। यही कारण है कि दुनिया की कई सरकारें और समुद्री सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 10:12:09 +0530</pubDate>
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                <title>लीबिया में मध्यस्थता की कोशिशों में पाकिस्तान की एंट्री, विरोधी गुटों के बीच संवाद बढ़ाने की पहल</title>
                                    <description><![CDATA[रिपोर्टों और सूत्रों के दावों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज, अमेरिका और सऊदी अरब के समर्थन की भी चर्चा; लीबिया संकट के समाधान पर टिकी नजरें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/pakistans-entry-in-mediation-efforts-in-libya-initiative-to-increase/article-58118"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/libya.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया में लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता और गृहसंघर्ष के बीच एक बार फिर कूटनीतिक गतिविधियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। पाकिस्तान विरोधी गुटों के बीच संवाद स्थापित कराने और समझौते की दिशा में मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इन दावों ने क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि पाकिस्तान की कोशिश दोनों प्रमुख पक्षों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने और राजनीतिक समाधान का रास्ता तलाशने पर केंद्रित है। यदि यह पहल सफल होती है तो पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हो सकती है। वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि लीबिया जैसा जटिल संकट केवल एक देश की पहल से हल नहीं होगा, बल्कि इसके लिए कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। अमेरिका और सऊदी अरब इस पूरी प्रक्रिया से अवगत हैं और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सकारात्मक रुख रखते हैं। हालांकि, इन दावों पर संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ऐसे में इन सूचनाओं को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के महीनों में पाकिस्तान ने खुद को क्षेत्रीय कूटनीति में अधिक सक्रिय दिखाने का प्रयास किया है। कुछ रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की प्रक्रिया में पाकिस्तान ने संपर्क सूत्र की भूमिका निभाई थी। इसी पृष्ठभूमि में अब लीबिया को लेकर उसकी सक्रियता को देखा जा रहा है। हालांकि, इस विषय पर भी अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लीबिया पिछले कई वर्षों से राजनीतिक विभाजन, सशस्त्र संघर्ष और सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। देश में अलग-अलग क्षेत्रों पर विभिन्न गुटों का प्रभाव रहा है, जिससे स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर कई दौर की वार्ताएं भी हो चुकी हैं, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। लीबिया में किसी भी शांति समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सभी प्रमुख पक्ष एक साझा राजनीतिक ढांचे पर सहमत हों। इसके साथ ही चुनाव प्रक्रिया, सत्ता के बंटवारे, सुरक्षा व्यवस्था और तेल संसाधनों से होने वाली आय के निष्पक्ष वितरण जैसे मुद्दों पर भी व्यापक सहमति बनाना जरूरी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"> लीबिया केवल आंतरिक संघर्ष का मामला नहीं है, बल्कि इसमें कई बाहरी देशों के रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि वहां किसी भी नई पहल को सफल बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी। पाकिस्तान और लीबिया के बीच रक्षा क्षेत्र में भी संपर्क बढ़ा है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सैन्य सहयोग को लेकर बातचीत होने की जानकारी पहले भी सामने आ चुकी है। ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संबंध इस नई कूटनीतिक पहल में सहायक हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि सभी संबंधित पक्ष बातचीत की प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हैं तो लीबिया में स्थिरता की दिशा में सकारात्मक प्रगति संभव है। हालांकि, अतीत में कई बार वार्ता शुरू होने के बावजूद राजनीतिक मतभेद और क्षेत्रीय हितों के कारण समझौते आगे नहीं बढ़ पाए। इसलिए इस बार भी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सभी पक्ष कितनी गंभीरता से समाधान की दिशा में आगे बढ़ते हैं। लीबिया में स्थायी शांति केवल राजनीतिक समझौते से नहीं आएगी। इसके लिए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना, सरकारी संस्थाओं को प्रभावी बनाना, आर्थिक पुनर्निर्माण और आम नागरिकों का भरोसा जीतना भी उतना ही आवश्यक होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:39:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बयान बना विवाद, ईरान में शोक तो अमेरिका में सियासी हमला</title>
                                    <description><![CDATA[तेहरान में भारी भीड़ के बीच अंतिम विदाई की प्रक्रिया जारी, वहीं डोनाल्ड ट्रंप के भाषण की टिप्पणी ने दोनों देशों के बीच तनाव और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trumps-statement-becomes-controversy-amid-khameneis-funeral-mourning-in-iran/article-57842"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/ketan-agrawal-murder-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">ईरान में शनिवार को पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए बड़ी संख्या में लोग राजधानी तेहरान की सड़कों पर जुटे। सुबह से ही शहर के कई हिस्सों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे और प्रमुख मार्गों पर आम वाहनों की आवाजाही रोक दी गई। काले कपड़ों में पहुंचे हजारों लोग हाथों में खामेनेई की तस्वीरें और बैनर लेकर ग्रैंड मोसाला की ओर बढ़ते दिखाई दिए। पूरे शहर में शोक का माहौल रहा। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। अपने संबोधन में ट्रंप ने ईरान को लेकर तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका ने अंतिम संस्कार के लिए एक सप्ताह की मोहलत दी, क्योंकि "हम अच्छे लोग हैं।" उनके इस बयान के बाद नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई और दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव फिर सुर्खियों में आ गया।</p>
<p style="text-align:justify;">तेहरान में आयोजित अंतिम संस्कार के दौरान सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क रहीं। अधिकारियों के अनुसार, बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए। शहर के कई इलाकों में विशेष निगरानी रखी गई और हवाई क्षेत्र पर भी सख्त नियंत्रण किया गया। ग्रैंड मोसाला परिसर के आसपास सुबह से ही लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। शिया परंपरा के अनुसार कई लोग शोक व्यक्त करते हुए अपनी छाती पीटते नजर आए, जबकि महिलाओं और बुजुर्गों सहित बड़ी संख्या में नागरिक अपने नेता को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे। पूरे इलाके में खामेनेई के बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर लगाए गए थे, जिससे माहौल पूरी तरह शोकमय दिखाई दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">उधर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने माउंट रशमोर में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए ईरान पर तीखा हमला बोला। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाया है और यदि भविष्य में कोई समझौता होता है तो उसे अमेरिकी शर्तों पर ही होना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि ईरान को अंतिम संस्कार के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया क्योंकि अमेरिका "अच्छे लोगों" का देश है। ट्रंप के इस बयान पर सभा में मौजूद समर्थकों ने तालियां बजाईं और हंसी के साथ प्रतिक्रिया दी। हालांकि इस टिप्पणी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद कूटनीतिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान में अंतिम संस्कार के दौरान लोगों की भावनाएं स्पष्ट रूप से दिखाई दीं। राजधानी ही नहीं बल्कि दूसरे शहरों से भी बड़ी संख्या में लोग तेहरान पहुंचे। कई नागरिकों ने इसे देश के लिए भावुक क्षण बताया। जनाजे में शामिल होने आए लोगों का कहना था कि वे अपने नेता को अंतिम सम्मान देने और राष्ट्रीय एकजुटता दिखाने के लिए यहां पहुंचे हैं। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि मौजूदा हालात में देश को एकजुट रहने की जरूरत है। शोक समारोह के दौरान धार्मिक परंपराओं का पालन किया गया और सुरक्षा एजेंसियों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष व्यवस्था की।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया गया कि ग्रैंड मोसाला परिसर में तैयार किया गया मंच उसी शैली में बनाया गया, जहां खामेनेई अपने सार्वजनिक संबोधन किया करते थे। समारोह में शामिल कई लोगों ने इसे उनके सार्वजनिक जीवन की यादों से जोड़कर देखा। दूर-दराज के शहरों से आए नागरिकों ने कहा कि वे इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनना चाहते थे। कई परिवार सुबह से ही समारोह स्थल के बाहर मौजूद रहे और श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें भी इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी रहीं। पश्चिम एशिया पहले से ही राजनीतिक और सैन्य तनाव का सामना कर रहा है। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच बयानबाजी ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक मंचों से दिए गए बयान दोनों देशों के संबंधों पर असर डाल सकते हैं। यदि आने वाले दिनों में कूटनीतिक संवाद आगे बढ़ता है तो दोनों पक्षों के आधिकारिक रुख पर भी दुनिया की नजर रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 12:53:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तेहरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने दी श्रद्धांजलि</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम दर्शन के लिए तेहरान में हजारों लोग पहुंचे। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भी ग्रैंड मोसल्ला परिसर में श्रद्धांजलि अर्पित की, जबकि युद्धविराम के बीच अंतिम संस्कार की तैयारियां पूरी की गईं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/indian-delegation-bids-final-farewell-to-ayatollah-ali-khamenei-in/article-57767"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/ayatollah-ali-khamenei.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान की राजधानी तेहरान शुक्रवार को उस समय भावुक माहौल का गवाह बनी, जब देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए ग्रैंड मोसल्ला धार्मिक परिसर लाया गया। सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग परिसर के बाहर एकत्र होने लगे थे। देशभर से आए नागरिकों, धार्मिक नेताओं, राजनीतिक हस्तियों और विदेशी प्रतिनिधिमंडलों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान भारत के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल ने भी ग्रैंड मोसल्ला पहुंचकर दिवंगत नेता के प्रति सम्मान व्यक्त किया। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न कराई जा रही है। हाल के क्षेत्रीय संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए प्रशासन ने तेहरान के कई हिस्सों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए हैं। ग्रैंड मोसल्ला परिसर में प्रवेश करने वाले सभी लोगों की सघन जांच की गई और पूरे कार्यक्रम की निगरानी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत के प्रतिनिधिमंडल ने अंतिम दर्शन के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई के पार्थिव शरीर के समक्ष श्रद्धासुमन अर्पित किए और कुछ क्षणों का मौन रखकर सम्मान प्रकट किया। इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल ने ईरान के अधिकारियों से भी मुलाकात की और शोक संवेदनाएं व्यक्त कीं। भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध लंबे समय से रहे हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, समुद्री संपर्क, क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साझेदारी रही है। ऐसे में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति को द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अयातुल्ला खामेनेई का अंतिम संस्कार पहले आयोजित किया जाना था, लेकिन हालिया सैन्य संघर्ष के चलते कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। सुरक्षा कारणों और युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण अंतिम संस्कार को कुछ समय के लिए टाल दिया गया था। अब जब संघर्ष के बाद प्रारंभिक युद्धविराम लागू हुआ है, तब प्रशासन ने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू की है। हालांकि क्षेत्र में अभी भी तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा है और हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान की संसद के अध्यक्ष और प्रमुख वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अंतिम संस्कार से एक दिन पहले देशवासियों से बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि यह केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता और संकल्प प्रदर्शित करने का भी समय है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि देश की जनता की एकजुटता दुनिया तक स्पष्ट रूप से पहुंचनी चाहिए। उनके अनुसार, बड़ी जनभागीदारी ईरान की सामूहिक शक्ति और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुबह से ही हजारों लोग ग्रैंड मोसल्ला परिसर पहुंचने लगे थे। लोगों के हाथों में ईरानी झंडे और धार्मिक प्रतीक दिखाई दिए। कई लोग अपने परिवारों के साथ अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे, जबकि बड़ी संख्या में धार्मिक छात्र और सामाजिक संगठनों के सदस्य भी मौजूद रहे। परिसर के भीतर धार्मिक अनुष्ठान किए गए और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम विदाई की तैयारियां पूरी की गईं। प्रशासन ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग बनाए ताकि व्यवस्था सुचारू बनी रहे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालिया क्षेत्रीय घटनाक्रम को देखते हुए ईरानी प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। राजधानी के संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। ड्रोन निगरानी, सीसीटीवी कैमरों और विशेष सुरक्षा इकाइयों की मदद से पूरे कार्यक्रम पर नजर रखी गई। विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की मौजूदगी को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने विशेष प्रोटोकॉल लागू किए। कार्यक्रम स्थल के आसपास यातायात व्यवस्था में भी बदलाव किया गया ताकि भीड़ और सुरक्षा दोनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अंतिम संस्कार ऐसे समय हो रहा है जब ईरान और अमेरिका के बीच हालिया संघर्ष के बाद प्रारंभिक युद्धविराम लागू है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलने की संभावनाओं पर नजर बनाए हुए है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत और ईरान के बीच व्यापार, ऊर्जा, चाबहार बंदरगाह परियोजना और क्षेत्रीय संपर्क जैसे कई महत्वपूर्ण विषय सहयोग के प्रमुख आधार रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते भू-राजनीतिक हालात के बावजूद दोनों देश आपसी सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे। भारतीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी इस बात का संकेत भी मानी जा रही है कि भारत पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को महत्व देता है और क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता का समर्थक बना हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/indian-delegation-bids-final-farewell-to-ayatollah-ali-khamenei-in/article-57767</link>
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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 12:30:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर फिर दी चेतावनी, पानी रोकने पर भारत को धमकी</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर भारत के फैसले का विरोध दोहराया, जल अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज तेज की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pakistan-again-warns-on-indus-water-treaty-threatens-india-if/article-57359"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/pakistan-india.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">पाकिस्तानी जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश हुई तो उसका जवाब दिया जाएगा। वहीं इस्लामाबाद ने दावा किया कि सिंधु जल संधि अब भी पूरी तरह प्रभावी है और भारत इसे एकतरफा समाप्त नहीं कर सकता। पाकिस्तान ने एक बार फिर सिंधु जल संधि को लेकर भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने सोमवार को इस्लामाबाद में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यदि किसी ने पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश की तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह को प्रभावित करना चाहता है। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच जल विवाद एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई होने तक सिंधु जल संधि को बहाल करने का कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।<br /><img alt="9k="></img></p>
<p>प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि सिंधु जल संधि अंतरराष्ट्रीय समझौता है और यह कानूनी रूप से अब भी लागू है। उनके अनुसार भारत इस संधि को न तो एकतरफा स्थगित कर सकता है, न समाप्त कर सकता है और न ही इसकी शर्तों में बदलाव कर सकता है। पाकिस्तानी मंत्रियों ने यह भी बताया कि मंगलवार को इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर पहला अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जाएगा। इसमें जल विशेषज्ञ, कानूनी विशेषज्ञ और विभिन्न देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। सेमिनार में संधि के कानूनी, तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसके जल अधिकार सुरक्षित हैं। अधिकारियों के मुताबिक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पहले भी कई बार कह चुके हैं कि पानी पाकिस्तान की जीवनरेखा है और इस मुद्दे पर कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान इस विषय को वैश्विक स्तर पर उठाने की भी तैयारी कर रहा है।<br /><br /></p>
<p>इससे पहले 21 जून को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी इसी मुद्दे पर भारत को चेतावनी दी थी। एक पाकिस्तानी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि यदि पाकिस्तान को अपनी जल सुरक्षा पर खतरा महसूस हुआ तो स्थिति गंभीर हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत पानी को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि हाल के महीनों में इस मामले में हुए सभी घटनाक्रमों की उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। उस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद भारत सरकार ने कहा था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा। भारत का यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ाने वाला माना गया।<br /><br /><img alt="Z"></img></p>
<p>सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल के उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए थे। सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल पाकिस्तान को मिला, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज का उपयोग भारत के हिस्से में आया। पिछले छह दशकों से अधिक समय तक यह संधि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार बनी रही। पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। वहां की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि को इसी नदी तंत्र से पानी मिलता है। कृषि क्षेत्र पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। यदि पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है तो इसका असर खेती, बिजली उत्पादन, उद्योग और ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ सकता है। पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय और जलविद्युत परियोजनाएं भी इसी नदी प्रणाली पर आधारित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 11:09:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अफगानिस्तान में पाकिस्तानी हवाई हमलों का दावा, 36 नागरिकों की मौत; सीमा पर फिर बढ़ा तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[तालिबान सरकार ने महिलाओं और बच्चों समेत 36 लोगों के मारे जाने का दावा किया, पाकिस्तान बोला- हालिया आतंकी हमलों के जवाब में की गई कार्रवाई]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a423786ad3d6/article-57312"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/afghanistan-pakistan-conflict.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर एक बार फिर तनाव गहरा गया है। तालिबान सरकार ने सोमवार को आरोप लगाया कि पाकिस्तान की ओर से किए गए सीमा-पार हवाई हमलों में महिलाओं और बच्चों समेत 36 नागरिकों की मौत हो गई, जबकि 163 लोग घायल हुए हैं। तालिबान प्रशासन का कहना है कि पक्तिया, पक्तिका और कुनर प्रांतों में कई रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया, जिससे भारी जनहानि और संपत्ति का नुकसान हुआ। दूसरी ओर पाकिस्तान ने इन आरोपों के बीच अपनी कार्रवाई को हाल के आतंकी हमलों के जवाब में चलाया गया खुफिया-आधारित सैन्य अभियान बताया है। तालिबान सरकार के उप-प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत ने सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार बीती रात हुए हमलों में 36 नागरिकों की मौत हुई है और 163 लोग घायल हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि हमलों में तीन रिहायशी मकान पूरी तरह नष्ट हो गए। उनके मुताबिक मरने वालों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। अफगान प्रशासन ने इस घटना को नागरिक आबादी पर सीधा हमला बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है।<br /><img alt="2Q=="></img></p>
<p class="isSelectedEnd">फितरत ने आरोप लगाया कि पक्तिया प्रांत के चमकनी जिले के मंडोखेल गांव में पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने एक नागरिक के घर को निशाना बनाया। इस हमले में एक बुजुर्ग और एक बच्चे की मौत हो गई। उन्होंने कहा कि जब गांव के लोग घायलों की मदद के लिए मौके पर पहुंचे तो उसी स्थान पर दूसरी बार भी बमबारी की गई। तालिबान प्रशासन का दावा है कि इस दूसरी कार्रवाई में 28 ग्रामीणों की मौत हो गई और 158 लोग घायल हो गए। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है। तालिबान सरकार ने यह भी कहा कि पक्तिका प्रांत के गियान जिले के वालुस्त गांव में भी एक घर पर हमला किया गया। इस घटना में छह लोगों की मौत होने का दावा किया गया है, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे बताए गए हैं। वहीं कुनर प्रांत के मनोगई जिले के बारोलो गांव में भी एक रिहायशी मकान को नुकसान पहुंचा। इस हमले में किसी की मौत नहीं हुई, लेकिन मकान पूरी तरह तबाह हो गया और परिवार को भारी नुकसान उठाना पड़ा। दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय आतंकी समूहों के खिलाफ की गई। पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों को खुफिया जानकारी मिली थी, जिसके आधार पर सीमावर्ती क्षेत्र में सुनियोजित सैन्य अभियान चलाया गया। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और कराची में हुए आतंकी हमलों के बाद यह कार्रवाई आवश्यक हो गई थी। पाकिस्तान का दावा है कि उसका निशाना केवल आतंकी ठिकाने थे, न कि आम नागरिक।</p>
<p class="isSelectedEnd"><img alt="Z"></img></p>
<p class="isSelectedEnd">सीमा पर बढ़े तनाव की एक बड़ी वजह हाल में पाकिस्तान के कराची शहर में हुआ हमला भी माना जा रहा है। कराची के गुलिस्तान-ए-जौहर इलाके में स्थित सिंध रेंजर्स के प्रांतीय मुख्यालय पर शनिवार रात हमला हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार हमलावरों ने एक वाहन से मुख्य द्वार को टक्कर मारी, जिसके बाद गोलीबारी और विस्फोट हुए। इस हमले में तीन अर्द्धसैनिक जवान और तीन हमलावर मारे गए थे। पाकिस्तान ने इस हमले को गंभीर सुरक्षा चुनौती बताया था। कराची हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से अलग हुए एक संगठन ने ली है। पाकिस्तान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि अफगानिस्तान की सीमा से संचालित आतंकी संगठन उसके भीतर हमलों को अंजाम दे रहे हैं। वहीं तालिबान सरकार इन आरोपों को लगातार खारिज करती रही है और कहती है कि वह किसी भी देश के खिलाफ अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद, आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियों को लेकर तनाव लगातार बना हुआ है। दोनों देशों के बीच कई बार सीमा पार गोलीबारी और सैन्य कार्रवाई की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसी घटनाओं का सबसे अधिक असर सीमावर्ती गांवों में रहने वाले आम नागरिकों पर पड़ता है, जिन्हें बार-बार विस्थापन और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यदि दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया मजबूत नहीं हुई तो सीमा पर हालात और जटिल हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी पहले कई मौकों पर दोनों पक्षों से संयम बरतने और विवादों का समाधान बातचीत के जरिए निकालने की अपील कर चुका है। फिलहाल दोनों देशों की ओर से अपने-अपने दावों पर कायम रहने के कारण स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। अफगानिस्तान में हुए इन हमलों ने एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तालिबान सरकार नागरिकों के मारे जाने की बात कह रही है, जबकि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का दावा कर रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 16:55:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईरान ने NATO देशों पर लगाए गंभीर आरोप, होर्मुज में जहाज पर हमला</title>
                                    <description><![CDATA[तेहरान का दावा—अमेरिका-इजराइल के साथ कुछ NATO देशों ने दिया सैन्य समर्थन, होर्मुज स्ट्रेट में कॉमर्शियल जहाज पर हमला, ब्रिज को नुकसान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/iran-makes-serious-allegations-against-nato-countries-attack-on-ship/article-57064"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/iran-nato-conflict.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। Iran ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजराइल के साथ मिलकर उसके खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई में कुछ NATO सदस्य देशों ने भी समर्थन दिया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में NATO की भूमिका की गंभीर जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार देशों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और एक बार फिर पश्चिमी देशों और ईरान के बीच तनाव की स्थिति बनती दिख रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान की ओर से यह दावा ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कूटनीतिक मंच पर पहले से ही कई मुद्दों को लेकर असहमति बनी हुई है। बघई ने अपने बयान में कहा कि NATO प्रमुख मार्क रूट ने खुद इस बात की ओर इशारा किया है कि इटली और रोमानिया ने ईरान के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई में अमेरिका का समर्थन किया था। हालांकि इस दावे पर अभी तक स्वतंत्र रूप से किसी भी देश ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। ईरान ने सवाल उठाते हुए कहा है कि इन देशों को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर और किस उद्देश्य से इस तरह के सैन्य सहयोग में हिस्सा लिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि अगर किसी भी NATO देश ने इस प्रकार की कार्रवाई में भाग लिया है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। तेहरान ने यह भी मांग की है कि इन देशों को न केवल अपने नागरिकों को बल्कि पूरी दुनिया को जवाब देना चाहिए कि उन्होंने अमेरिका और इजराइल के साथ मिलकर इस तरह की कार्रवाई का समर्थन क्यों किया। ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए कड़े शब्दों में निंदा की है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच समुद्री सुरक्षा से जुड़ा एक और बड़ा मामला सामने आया है। Strait of Hormuz में एक कॉमर्शियल जहाज पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ है। ब्रिटेन की यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने इस घटना की पुष्टि की है। जहाज ओमान के तट के पास था, जब अचानक एक प्रोजेक्टाइल आकर जहाज के दाहिने हिस्से से टकरा गया। इस हमले से जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा है, जहां से जहाज का संचालन किया जाता है। हालांकि राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी भी क्रू सदस्य को चोट नहीं आई है। घटना के बाद समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है और यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति श्रृंखला को भी प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान और पश्चिमी देशों के बीच पहले से ही कई मुद्दों पर तनाव बना हुआ है, और इस नए विवाद ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। NATO की भूमिका को लेकर उठे सवालों ने कूटनीतिक हलकों में नई बहस शुरू कर दी है। हालांकि अभी तक NATO की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं अमेरिका और इजराइल की ओर से भी इन आरोपों पर चुप्पी बनी हुई है। ईरान का यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जबकि पश्चिमी देश इसे खारिज कर सकते हैं। लेकिन जिस तरह से होर्मुज क्षेत्र में हमला हुआ है, उसने एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब वैश्विक समुदाय की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा और व्यापार बाजारों पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 17:08:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरान युद्ध खर्च पर ट्रम्प ने मांगे ₹8.3 लाख करोड़, संसद में बढ़ा विरोध</title>
                                    <description><![CDATA[व्हाइट हाउस ने अतिरिक्त रक्षा फंडिंग की मांग को सैन्य तैयारी और हथियार भंडार से जोड़ा, जबकि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में सैन्य कार्रवाई को लेकर सवाल तेज हो गए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trump-demands-%E2%82%B983-lakh-crore-on-iran-war-expenditure-opposition/article-56869"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(5).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अपनी विदेश नीति और रक्षा रणनीति को लेकर घरेलू राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी संसद से 87.6 अरब डॉलर यानी करीब 8.3 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त फंडिंग मंजूर करने की मांग की है। सरकार का कहना है कि यह रकम ईरान के खिलाफ हालिया सैन्य अभियानों, सेना की तैयारियों और हथियारों के भंडार को दोबारा मजबूत करने के लिए जरूरी है। हालांकि संसद में इस प्रस्ताव को लेकर विरोध बढ़ता दिखाई दे रहा है और कई सांसद इसे सैन्य खर्च बढ़ाने की दिशा में एक विवादित कदम मान रहे हैं। व्हाइट हाउस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक यह अतिरिक्त फंडिंग पहले से स्वीकृत रक्षा बजट का हिस्सा नहीं है। पिछले साल अमेरिकी कांग्रेस करीब 1 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट को मंजूरी दे चुकी थी, जबकि अगले वित्तीय वर्ष के लिए लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर की नई मांग पहले से ही रखी जा चुकी है। इसके बावजूद ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि ईरान के साथ बढ़े तनाव और सैन्य अभियानों के कारण अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता पैदा हुई है। अधिकारियों के अनुसार इस राशि का इस्तेमाल सैन्य ऑपरेशनों की लागत पूरी करने, आधुनिक हथियारों की खरीद, गोला-बारूद के भंडार को फिर से भरने और कुछ गोपनीय रक्षा कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि हाल के महीनों में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। ईरान और उसके समर्थक समूहों के साथ तनाव के बीच अमेरिका ने कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। इन अभियानों में बड़ी मात्रा में मिसाइलों, रक्षा प्रणालियों और अन्य सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल हुआ है। प्रशासन का तर्क है कि यदि समय रहते अतिरिक्त धन उपलब्ध नहीं कराया गया तो सेना की परिचालन क्षमता और भविष्य की तैयारियों पर असर पड़ सकता है। रक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई महत्वपूर्ण सैन्य भंडार अपेक्षा से अधिक तेजी से खर्च हुए हैं, जिनकी भरपाई जरूरी है। हालांकि संसद में इस मांग को लेकर माहौल पूरी तरह सरकार के पक्ष में नहीं दिख रहा। मंगलवार को अमेरिकी सीनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर ट्रम्प प्रशासन से ईरान के खिलाफ आगे की सैन्य कार्रवाई रोकने का आग्रह किया। इससे पहले प्रतिनिधि सभा यानी लोअर हाउस भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। इन प्रस्तावों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना स्पष्ट संसदीय मंजूरी के किसी बड़े सैन्य संघर्ष में अमेरिका की भागीदारी न बढ़े। दिलचस्प बात यह रही कि कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट सांसदों का समर्थन किया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह मामला सिर्फ रक्षा बजट तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रपति और संसद के बीच अधिकारों की बहस भी इससे जुड़ी हुई है। अमेरिका में युद्ध और सैन्य कार्रवाई से जुड़े फैसलों पर लंबे समय से विवाद रहा है। कई सांसदों का तर्क है कि बड़े सैन्य अभियानों से पहले कांग्रेस की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर ट्रम्प समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में राष्ट्रपति को तेजी से फैसले लेने की जरूरत होती है और ऐसे समय में राजनीतिक मतभेदों को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए। आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रस्ताव चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिका पहले से ही बड़े बजट घाटे और बढ़ते सरकारी कर्ज की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में अतिरिक्त 87.6 अरब डॉलर की मांग को लेकर वित्तीय विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाए हैं। रक्षा खर्च लगातार बढ़ने से अन्य घरेलू योजनाओं पर दबाव पड़ सकता है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर खर्च को कम नहीं किया जा सकता और वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सेना को पर्याप्त संसाधन देना जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 11:42:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सिंधु जल संधि पर फिर बढ़ा तनाव, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बड़ा बयान</title>
                                    <description><![CDATA[ख्वाजा आसिफ ने जल सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि पाकिस्तान अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठा सकता है। संधि निलंबन के बाद दोनों देशों के बीच विवाद गहराता नजर आ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/tension-increases-again-on-indus-water-treaty-big-statement-of/article-56609"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indus-water-treaty-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनावपूर्ण बयानबाजी सामने आई है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि यदि पाकिस्तान को यह महसूस होता है कि उसकी जल सुरक्षा को खतरा पहुंच रहा है तो स्थिति गंभीर हो सकती है और देश अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रही बहस फिर चर्चा में आ गई है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान पहले से ही पानी की कमी और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तानी मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह में दखल देने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि पानी किसी भी देश के लिए जीवनरेखा की तरह होता है और यदि इस पर असर पड़ता है तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। हालांकि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि हाल के महीनों में इस विषय पर हुए सभी तकनीकी घटनाक्रमों की उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। इसके बावजूद उनका बयान पाकिस्तान में जल संकट को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दरअसल अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। उस हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी। भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा। भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और आतंकवाद से जुड़े मामलों पर किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती। सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में तैयार इस समझौते को दुनिया के सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों में गिना जाता रहा है। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए थे। इनमें सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश जल पाकिस्तान को दिया गया, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियों पर भारत को अधिकार मिला। कई युद्धों और राजनीतिक तनावों के बावजूद यह संधि दशकों तक लागू रही।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पाकिस्तान की जल व्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। देश की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि को पानी इसी नदी तंत्र से मिलता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है और ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है। ऐसे में पानी की उपलब्धता में किसी भी प्रकार की कमी का असर सीधे खाद्य उत्पादन, रोजगार और ग्रामीण आय पर पड़ सकता है। पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में पानी की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कई प्रमुख नहरों में पानी का स्तर सामान्य से काफी नीचे पहुंच चुका है। नॉर्थ वेस्ट कैनाल में 64 प्रतिशत से अधिक पानी की कमी दर्ज की गई है, जबकि राइस कैनाल और दादू कैनाल में भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। किसानों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले मौसम में फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जल संकट का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान के कई बड़े बांध और हाइड्रोपावर परियोजनाएं भी नदी के जल प्रवाह पर निर्भर करती हैं। मंगल और तारबेला जैसे प्रमुख जलाशयों में पानी की उपलब्धता कम होने की आशंका जताई जा रही है। यदि जल स्तर में लगातार गिरावट आती है तो बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे औद्योगिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है और पहले से दबाव झेल रही अर्थव्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि को लेकर उसका रुख स्पष्ट है। भारत लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित होने वाले आतंकी ढांचे के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं करता। इसी कारण भारत ने पहलगाम हमले के बाद कड़ा रुख अपनाया। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि जल संसाधनों का मुद्दा आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाला है। दक्षिण एशिया में बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और सीमित जल स्रोतों के कारण पानी को लेकर चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए जल प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता एक बड़ा विषय बना रहेगा। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी इस मुद्दे को और जटिल बना रही है। सिंधु जल संधि को लेकर बयानबाजी का दौर जारी है। पाकिस्तान अपनी जल सुरक्षा को लेकर चिंता जता रहा है, जबकि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख पर कायम है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 11:38:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ईरान जंग के बीच वैश्विक तेल संकट गहराया, 115 करोड़ बैरल सप्लाई गायब</title>
                                    <description><![CDATA[होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी पूरी तरह राहत नहीं, तेल भंडार 36 साल के निचले स्तर पर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/global-oil-crisis-deepens-amid-iran-war-115-crore-barrel/article-56437"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/iran-oil-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दुनिया के ऊर्जा बाजार में ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच बड़ा झटका सामने आया है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले चार महीनों में वैश्विक तेल सप्लाई से करीब 115 करोड़ बैरल कच्चा तेल गायब हो गया है। यह आंकड़ा एनालिटिक्स फर्म केपलर की रिपोर्ट में सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुलने के बाद बाजार में थोड़ी राहत जरूर देखी गई है, लेकिन स्थिति अभी भी सामान्य नहीं मानी जा रही है। मिडिल ईस्ट में युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति लगभग बाधित रही, जिससे दुनिया के रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार पर भारी दबाव पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान करीब 19 करोड़ बैरल तेल स्टॉक से निकाल लिया गया, जिससे वैश्विक रिजर्व तेजी से घटे हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक स्ट्रेटजिक रिजर्व 1990 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जबकि अमेरिका का इमरजेंसी रिजर्व 43 साल के न्यूनतम स्तर पर दर्ज किया गया है। हालात इतने गंभीर रहे कि कई देशों को अपने दैनिक ईंधन उपयोग को संतुलित करने के लिए आपातकालीन खरीदारी करनी पड़ी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में वर्साय में G7 बैठक के दौरान कहा कि अगर युद्ध लंबा चलता, तो अमेरिका के तेल भंडार करीब चार हफ्तों में खत्म हो जाते। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान के साथ समझौते के बाद स्थिति नियंत्रण में आई है, लेकिन अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बयान ऊर्जा संकट की गंभीरता को दर्शाता है, क्योंकि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तेल आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भर हैं। सीजफायर और समझौते के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। युद्ध के दौरान जहां कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, वहीं अब यह 80 डॉलर से नीचे आ चुकी हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट केवल अस्थायी राहत है, क्योंकि सप्लाई चेन अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हुई है। समुद्री रास्तों से संभावित बारूदी खतरे हटाने, खाली टैंकरों की वापसी और उत्पादन सामान्य करने में अभी लंबा समय लग सकता है। बाजार फिलहाल जरूरत से ज्यादा आशावादी हो गया है। RBC कैपिटल मार्केट्स की विश्लेषक हेलिमा क्रॉफ्ट का कहना है कि संकट खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी, क्योंकि तेल आपूर्ति को सामान्य स्थिति में आने में कई महीनों का समय लग सकता है। वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल एडवाइजर्स के CEO जे हैटफील्ड का मानना है कि OPEC देश उत्पादन बढ़ाकर बाजार में स्थिरता ला सकते हैं, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मैक्वेरी ग्रुप के ग्लोबल ऑयल एंड गैस स्ट्रैटेजिस्ट विकास द्विवेदी के अनुसार युद्ध से पहले दुनिया के पास पर्याप्त तेल स्टॉक था, इसी कारण इतनी बड़ी सप्लाई बाधा के बावजूद बाजार पूरी तरह नहीं टूटा। उन्होंने यह भी बताया कि डीजल और पेट्रोल के भंडार में गिरावट जरूर आई है, लेकिन स्थिति अभी नियंत्रण में है और आने वाले हफ्तों में सप्लाई चैन में सुधार देखा जा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में इस समय प्रतिदिन लगभग 10.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन हो रहा है। इसमें अमेरिका, सऊदी अरब, रूस, कनाडा और इराक जैसे देश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जो मिलकर वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा देते हैं। ऐसे में इन देशों में किसी भी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या युद्ध सीधे तौर पर वैश्विक बाजार और ईंधन कीमतों को प्रभावित करती है। युद्ध के दौरान गायब हुए 115 करोड़ बैरल तेल की भरपाई आसान नहीं होगी। यदि उत्पादन मांग से 50 लाख बैरल प्रतिदिन अधिक भी बढ़ाया जाए, तब भी इस कमी को पूरा करने में लगभग एक साल का समय लग सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:24:03 +0530</pubDate>
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