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                <title>modern relationships - दैनिक जागरण</title>
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                <title>क्या मोबाइल फोन कपल्स के बीच सबसे बड़ा तीसरा व्यक्ति बन गया है? रिश्तों में बढ़ती दूरी पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[एक ही कमरे में साथ रहने के बावजूद स्क्रीन में खोए रहते हैं लोग, क्या स्मार्टफोन रिश्तों की गर्माहट कम कर रहा है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/has-mobile-phone-become-the-biggest-third-person-among-couples/article-58117"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/relationship-advice.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">आज के दौर में मोबाइल फोन जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक ज्यादातर लोगों का समय किसी न किसी स्क्रीन के साथ गुजरता है। फोन ने जहां लोगों के काम आसान किए हैं, वहीं रिश्तों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। खासकर कपल्स के बीच अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है, जहां एक ही घर में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से ज्यादा समय मोबाइल स्क्रीन के साथ बिताने लगे हैं। कई रिश्तों में अब शिकायत यह नहीं होती कि पार्टनर समय नहीं देता, बल्कि यह होती है कि पार्टनर साथ होकर भी मौजूद नहीं रहता। बातचीत के बीच बार-बार फोन देखना, खाने की टेबल पर मोबाइल चलाना या सोने से पहले घंटों सोशल मीडिया पर लगे रहना धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी पैदा कर सकता है।  किसी भी रिश्ते की मजबूती बातचीत, ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करती है। जब मोबाइल लगातार ध्यान खींचता रहता है तो पार्टनर के साथ बिताया जाने वाला समय कम होने लगता है। यह छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर बड़े मतभेद का कारण बन सकती हैं। पहले कपल्स अपने खाली समय में एक-दूसरे से बातें करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे और साथ में समय बिताते थे। लेकिन अब कई बार दोनों लोग एक ही जगह बैठे होते हैं और अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर रिश्ते में भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल फोन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है। शुरुआत में कुछ मिनट के लिए फोन देखना सामान्य लगता है, लेकिन कब यह घंटों में बदल जाता है, इसका पता नहीं चलता। सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन इंसान का ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचते हैं। कई कपल्स में यह भी देखा गया है कि फोन को लेकर शक और असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी है। पार्टनर ज्यादा समय मोबाइल पर बिताता है तो दूसरा व्यक्ति खुद को नजरअंदाज महसूस कर सकता है। कभी-कभी फोन की प्राइवेसी को लेकर भी रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल फोन रिश्तों का दुश्मन है। सही इस्तेमाल किया जाए तो यही तकनीक रिश्तों को मजबूत भी कर सकती है। दूर रहने वाले कपल्स वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए जुड़े रह सकते हैं। समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है। रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए कई विशेषज्ञ "नो फोन टाइम" की सलाह देते हैं। जैसे खाना खाते समय फोन दूर रखना, सोने से पहले कुछ समय सिर्फ बातचीत के लिए निकालना और हफ्ते में एक दिन बिना ज्यादा स्क्रीन टाइम के साथ बिताना रिश्ते को बेहतर बना सकता है। कपल्स के लिए जरूरी है कि वे एक-दूसरे की मौजूदगी को महत्व दें। कई बार पार्टनर को महंगे गिफ्ट या बड़े सरप्राइज से ज्यादा जरूरत होती है कि सामने वाला उसकी बात ध्यान से सुने। रिश्ते छोटे-छोटे पलों से मजबूत होते हैं और इन पलों की जगह अगर हमेशा मोबाइल ले ले तो दूरी बढ़ना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज मोबाइल हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन रिश्तों में उसकी जगह तय करना जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए होना चाहिए, रिश्तों के बीच दीवार बनाने के लिए नहीं। एक-दूसरे के साथ बिताया गया समय ही किसी भी रिश्ते की असली ताकत होता है। बदलते समय में सवाल यह नहीं है कि मोबाइल रखना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम मोबाइल को इतना समय दे रहे हैं कि अपने करीबी रिश्तों के लिए समय कम पड़ जाए। अगर जवाब हां है, तो शायद रिश्तों को बचाने के लिए स्क्रीन से थोड़ा दूरी बनाना जरूरी हो गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:39:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>लिव-इन रिलेशनशिप पर समाज का बदलता नजरिया: परंपरा और आधुनिक सोच के बीच नई जीवनशैली</title>
                                    <description><![CDATA[शादी से पहले साथ रहने की बढ़ती स्वीकार्यता, सोच और संस्कारों की नई परीक्षा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/69859daa82616/article-45497"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/lifestyel--(91).jpg" alt=""></a><br /><p>भारत में रिश्तों की परिभाषा तेज़ी से बदल रही है। शादी से पहले साथ रहने की अवधारणा, जिसे लिव-इन रिलेशनशिप कहा जाता है, अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही। पढ़े-लिखे युवा, कामकाजी पेशेवर और यहां तक कि छोटे शहरों में भी यह जीवनशैली धीरे-धीरे स्वीकार की जाने लगी है। कभी सामाजिक वर्जना माने जाने वाले लिव-इन रिश्तों को लेकर अब बहस नैतिकता से आगे बढ़कर व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सहमति और व्यावहारिकता तक पहुंच चुकी है।</p>
<p>लिव-इन रिलेशनशिप का मतलब है बिना शादी के दो वयस्कों का आपसी सहमति से साथ रहना। युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसे शादी से पहले एक-दूसरे को समझने का बेहतर तरीका मानता है। उनका मानना है कि साथ रहकर ही किसी रिश्ते की असल चुनौतियां, जिम्मेदारियां और भावनात्मक तालमेल समझा जा सकता है। बढ़ती तलाक दरों के बीच कई लोग लिव-इन को भावनात्मक जोखिम कम करने वाला विकल्प भी मान रहे हैं।</p>
<p>समाज के नजरिए में यह बदलाव अचानक नहीं आया है। शहरीकरण, शिक्षा का विस्तार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और वैश्विक संस्कृति के प्रभाव ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। खासतौर पर महिलाएं अब रिश्तों में अपनी शर्तें रखने लगी हैं। करियर, आत्मसम्मान और निजी स्पेस को प्राथमिकता देने वाली महिलाएं शादी से पहले किसी रिश्ते को परखना चाहती हैं। यह बदलाव पारंपरिक सोच को चुनौती देता है, जहां रिश्तों को सामाजिक स्वीकृति और विवाह से जोड़ा जाता रहा है।</p>
<p>हालांकि, लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज में अब भी एकरूपता नहीं है। बुजुर्ग पीढ़ी और रूढ़िवादी सोच रखने वाले वर्ग इसे पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं। उनके अनुसार इससे सामाजिक ढांचा कमजोर होता है और रिश्तों की स्थायित्व पर सवाल उठते हैं। वहीं युवा पीढ़ी इसे निजी फैसला बताती है, जिसमें बाहरी दखल की जरूरत नहीं होनी चाहिए।</p>
<p>कानूनी स्तर पर भी भारत में लिव-इन रिश्तों को धीरे-धीरे मान्यता मिली है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि सहमति से साथ रह रहे वयस्कों का रिश्ता गैरकानूनी नहीं है। घरेलू हिंसा कानून के तहत लंबे समय तक साथ रह चुकी महिलाओं को कुछ अधिकार भी दिए गए हैं। इससे लिव-इन रिलेशनशिप को सामाजिक ही नहीं, बल्कि कानूनी आधार भी मिला है।</p>
<p>बदलते नजरिए के बावजूद लिव-इन रिश्तों की अपनी चुनौतियां हैं। सामाजिक दबाव, परिवार की असहमति, असुरक्षा और भावनात्मक अनिश्चितता ऐसे मुद्दे हैं, जिनका सामना कई जोड़ों को करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता, स्पष्ट संवाद और आपसी सम्मान के बिना कोई भी रिश्ता, चाहे वह शादी हो या लिव-इन, टिकाऊ नहीं हो सकता।</p>
<p>कुल मिलाकर, लिव-इन रिलेशनशिप आज के समाज में एक उभरती हुई जीवनशैली है, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन तलाश रही है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि रिश्तों को अब सामाजिक दबाव से ज्यादा व्यक्तिगत समझ और सहमति के आधार पर देखा जाने लगा है। आने वाले समय में समाज इस बदलाव को किस हद तक स्वीकार करता है, यह भविष्य की सामाजिक दिशा तय करेगा।</p>
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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 14:07:59 +0530</pubDate>
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