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                <title>Supreme Court - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Supreme Court RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>राम मंदिर दान विवाद में नया मोड़: 23 कर्मचारियों का सामूहिक इस्तीफा, सुप्रीम कोर्ट में 13 जुलाई को होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[दान गिनने वाले कर्मचारियों ने बढ़े कार्यभार और बदली व्यवस्था पर जताई नाराजगी, दान प्रबंधन और कथित गड़बड़ी मामले में CBI जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/new-twist-in-ram-temple-donation-dispute-mass-resignation-of/article-58425"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bhopal-master-plan-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार चर्चा श्रद्धालुओं की आस्था या धार्मिक आयोजन को लेकर नहीं, बल्कि मंदिर में आने वाले दान की गिनती और उससे जुड़े प्रशासनिक विवाद को लेकर हो रही है। दान की गिनती का जिम्मा संभाल रहे 23 कर्मचारियों ने एक साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि दान चोरी का मामला सामने आने के बाद दान की प्रकृति बदल गई है, जिससे उनका कार्यभार पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। इसी बीच इस पूरे मामले से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को सुनवाई करेगा, जिससे इस विवाद पर सभी की नजरें टिक गई हैं। मंदिर में आने वाले दान की गिनती का कार्य बैंक कर्मचारियों की टीम करती थी। पहले दान में बड़ी संख्या में 500 रुपये के नोट आते थे, जिससे गिनती का काम अपेक्षाकृत तेजी से पूरा हो जाता था। कर्मचारियों के मुताबिक पहले प्रतिदिन 500 रुपये के नोटों के 70 से 80 बंडल तैयार हो जाते थे। लेकिन दान चोरी की खबरें सामने आने के बाद श्रद्धालुओं के दान देने के तरीके में बदलाव देखने को मिला है। अब मंदिर में 10 और 20 रुपये के नोटों की संख्या काफी बढ़ गई है, जबकि 500 रुपये के नोटों की संख्या पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कर्मचारियों का कहना है कि छोटे मूल्य के नोटों की गिनती में अधिक समय लगता है। पहले जहां दो शिफ्टों में काम होता था और प्रत्येक कर्मचारी लगभग छह घंटे की ड्यूटी करता था, वहीं अब पूरी व्यवस्था बदल दी गई है। नई व्यवस्था के तहत कर्मचारियों को सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक लगातार काम करना पड़ रहा है। इसके बावजूद उनके वेतन में किसी प्रकार की बढ़ोतरी नहीं की गई। बढ़े हुए कार्यभार और लंबी ड्यूटी के कारण कर्मचारियों में असंतोष बढ़ता गया और अंततः 23 कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। बताया जा रहा है कि इस्तीफों के बाद अब केवल 13 कर्मचारी ही दान गिनने का काम संभाल रहे हैं। ऐसे में मंदिर में प्रतिदिन आने वाले दान की गिनती और रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है। यदि जल्द ही नई नियुक्तियां नहीं की गईं या कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में दान प्रबंधन की व्यवस्था और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उधर, राम मंदिर दान प्रबंधन से जुड़े कथित अनियमितताओं के मामले ने कानूनी मोड़ भी ले लिया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में दान चोरी के आरोपों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने, विशेष जांच दल (SIT) गठित करने और मंदिर में दान प्रबंधन की पूरी व्यवस्था की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग की गई है। इन सभी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ 13 जुलाई को सुनवाई करेगी। इस सुनवाई को पूरे देश में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे आगे की जांच और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर दिशा तय हो सकती है। दान विवाद पर देश ही नहीं बल्कि पड़ोसी नेपाल से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। नेपाल के जनकपुर स्थित प्रसिद्ध जानकी मंदिर के महंत रोशन दास ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भगवान राम के किसी मंदिर में दान से जुड़ी ऐसी घटना पहले कभी सुनने या देखने को नहीं मिली। उनके अनुसार, जब से उन्हें अयोध्या में दान से जुड़े विवाद की जानकारी मिली है, तब से वे बेहद दुखी और चिंतित हैं। उन्होंने दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। राम मंदिर देशभर के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में मंदिर की दान व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। श्रद्धालु यह उम्मीद कर रहे हैं कि दान की राशि का पूरी पारदर्शिता के साथ उपयोग हो और उसकी गिनती एवं प्रबंधन की प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित तथा विश्वसनीय बनी रहे। अब सभी की निगाहें 13 जुलाई को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के निर्देशों के आधार पर इस पूरे मामले में आगे की कार्रवाई तय होगी। यदि जांच एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी जाती है या दान प्रबंधन प्रणाली में बदलाव के निर्देश दिए जाते हैं, तो इसका असर भविष्य में मंदिर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी दिखाई दे सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 17:11:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हंगामा, अभद्र व्यवहार पर याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[सुनवाई के दौरान वकील ने कोर्ट की गरिमा का उल्लंघन किया, सुरक्षा कर्मियों ने बाहर निकाला; अदालत ने अवमानना की कार्रवाई से परहेज करते हुए याचिका खारिज की]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/uproar-during-hearing-in-supreme-court-petition-on-indecent-behavior/article-58413"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत में शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने कुछ समय के लिए कोर्ट रूम का माहौल पूरी तरह बदल दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने अदालत में अभद्र व्यवहार किया। सुनवाई के दौरान उन्होंने न केवल आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया बल्कि अदालत की कार्यवाही के बीच फाइल भी उछाल दी। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा और संबंधित वकील को कोर्ट रूम से बाहर ले जाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के समक्ष आया जिसमें जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे सुनवाई कर रहे थे। याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई थी और याचिकाकर्ता स्वयं अधिवक्ता के रूप में अपना पक्ष रख रहे थे। शुरुआत से ही उनका रवैया आक्रामक बताया गया। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने लगातार ऊंची आवाज में अपनी बात रखी और न्यायालय की प्रक्रिया पर असंतोष जताया। सुनवाई के दौरान स्थिति तब गंभीर हो गई जब उन्होंने अदालत में आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और गुस्से में केस से जुड़े दस्तावेज हवा में उछाल दिए। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से कुछ क्षणों के लिए कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। न्यायिक कार्यवाही के दौरान इस तरह के व्यवहार को देखते हुए सुरक्षा कर्मी तुरंत सक्रिय हुए और संबंधित वकील को अदालत कक्ष से बाहर ले गए, जिससे आगे की कार्यवाही शांतिपूर्वक जारी रह सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वकील ने सुनवाई के दौरान न्यायालय से एक विशेष आदेश जारी करने की मांग की थी। उन्होंने कथित रूप से कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि क्या वे अदालत को आदेश दे रहे हैं। इसके बाद माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। वकील ने अपनी बात दोहराने के बाद दस्तावेज फेंक दिए और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। घटना के दौरान कोर्ट रूम में मौजूद कई अधिवक्ता और अन्य लोग कुछ समय के लिए असहज हो गए। अचानक हुए इस घटनाक्रम के कारण कार्यवाही कुछ देर के लिए प्रभावित हुई, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय रहने से स्थिति जल्द सामान्य हो गई। अदालत ने शांति बनाए रखते हुए सुनवाई आगे बढ़ाई।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना के बाद जस्टिस के. वी. विश्वनाथन ने कहा कि संबंधित व्यक्ति स्पष्ट रूप से मानसिक और भावनात्मक दबाव में दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा कि अदालत को उनके प्रति सहानुभूति है और इस पूरे घटनाक्रम को हताशा के रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से दंडित करना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और संतुलित बनाए रखना है। महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने इस मामले में वकील के खिलाफ तत्काल अवमानना की कार्रवाई करने का निर्णय नहीं लिया। हालांकि, पीठ ने याचिका के गुण-दोष पर विचार करने के बाद स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। इसी कारण विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 16:32:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राजा रघुवंशी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट में सोनम का जवाबी हलफनामा, खुद को बताया बेगुनाह</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले सोनम रघुवंशी ने कहा- झूठे आरोपों में फंसाया गया, जांच और ट्रायल में लगातार कर रही हूं सहयोग।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/raja-raghuvanshi-murder-case-sonams-counter-affidavit-in-supreme-court/article-58261"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/raja-raghuvanshi-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देशभर में चर्चा का विषय बने राजा रघुवंशी हत्याकांड में एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। मामले की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल करते हुए खुद को पूरी तरह बेगुनाह बताया है। उसने अदालत से कहा है कि उसे इस मामले में झूठे आरोपों के आधार पर फंसाया गया है और वह शुरुआत से ही जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करती रही है। सोनम ने अपने हलफनामे में यह भी कहा कि वह ट्रायल की प्रक्रिया में भी पूरी तरह शामिल है और अदालत की हर शर्त का पालन कर रही है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई को लेकर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस फैसले का असर आगे की कानूनी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट में 9 जुलाई को इस मामले की अहम सुनवाई प्रस्तावित है। सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार की ओर से दायर उस याचिका पर विचार किया जाएगा, जिसमें सोनम रघुवंशी को मिली जमानत को चुनौती दी गई है। अदालत के सामने यह सवाल भी रहेगा कि मौजूदा परिस्थितियों में सोनम की जमानत बरकरार रहेगी या नहीं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इस सुनवाई को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से यह केस लगातार सुर्खियों में बना हुआ है और हर सुनवाई के साथ इसमें नए कानूनी पहलू सामने आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सोनम रघुवंशी ने अपने जवाबी हलफनामे में दावा किया है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। उसने कहा कि जांच एजेंसियों ने उसे गलत तरीके से इस मामले में आरोपी बनाया है। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि वह जांच अधिकारियों के बुलाने पर हर बार उपस्थित हुई है और अदालत की ओर से तय की गई सभी शर्तों का पालन कर रही है। उसके अनुसार वह किसी भी स्तर पर जांच में बाधा नहीं डाल रही और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए पूरा सहयोग कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि इस मामले में अभी 94 गवाहों के बयान दर्ज होने बाकी हैं। उन्होंने अदालत को जानकारी दी थी कि मुकदमा फिलहाल ट्रायल के महत्वपूर्ण चरण में है और बड़ी संख्या में गवाहों की गवाही शेष है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी जांच की प्रगति और ट्रायल की गति को लेकर कई सवाल पूछे थे। इसके बाद अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 9 जुलाई की तारीख तय की थी। माना जा रहा है कि इस बार अदालत मामले की प्रगति और जमानत से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से विचार कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अन्य आरोपियों की बात करें तो राज कुशवाह और उसके तीन साथी फिलहाल शिलांग जेल में बंद हैं। वहीं सोनम रघुवंशी को पहले ही सशर्त जमानत मिल चुकी है। इसके अलावा इस मामले में तीन अन्य आरोपियों और एक मकान मालिक को भी अदालत से जमानत मिली हुई है। हालांकि मुख्य साजिश और हत्या से जुड़े आरोपों की जांच और ट्रायल अभी जारी है। यही वजह है कि इस मामले में हर नई कानूनी कार्रवाई पर लोगों की नजर बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला पिछले वर्ष उस समय चर्चा में आया था जब इंदौर के ट्रांसपोर्ट कारोबारी राजा रघुवंशी की शादी 11 मई 2025 को सोनम रघुवंशी से हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद दोनों हनीमून मनाने के लिए मेघालय गए। 23 मई को दोनों के अचानक लापता होने की खबर सामने आई, जिसके बाद पुलिस ने बड़े स्तर पर तलाश अभियान शुरू किया। कई दिनों तक खोजबीन के बाद 3 जून 2025 को मेघालय की एक गहरी खाई से राजा रघुवंशी का शव बरामद किया गया। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">शव मिलने के बाद जांच एजेंसियों ने घटनास्थल, मोबाइल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया। पुलिस के अनुसार जांच के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिनसे यह मामला सामान्य गुमशुदगी नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या का प्रतीत हुआ। इसके बाद पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया और पूछताछ के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर सोनम रघुवंशी को भी मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में अदालत से उसे सशर्त जमानत मिल गई थी, जबकि अन्य आरोपी अब भी न्यायिक हिरासत में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले जून महीने में सोनम रघुवंशी ने मीडिया से बातचीत में उन आरोपों का भी खंडन किया था, जिनमें कहा गया था कि वह जमानत मिलने के बाद नेपाल भाग गई है। उसने स्पष्ट कहा था कि वह कहीं नहीं गई और शिलांग में ही मौजूद है। सोनम ने कहा था कि उसके बारे में झूठी अफवाहें फैलाई जा रही हैं और लोगों को ऐसी बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उसने यह भी दोहराया था कि वह जांच एजेंसियों और अदालत की कार्यवाही में लगातार सहयोग करती रही है और आगे भी करती रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 12:07:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटा के नियम सख्त, सुप्रीम कोर्ट की शर्तें होंगी अनिवार्य</title>
                                    <description><![CDATA[नीट-यूजी और पीजी काउंसलिंग 2026-27 में वैधानिक अभिभावक का प्रमाण जरूरी, फर्जी एनआरआई प्रमाणपत्रों पर रोक लगाने की तैयारी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/strict-rules-of-nri-quota-in-medical-colleges-supreme-courts/article-58055"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/nri-quota.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई (नॉन-रेजिडेंट इंडियन) कोटा के तहत प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिए इस वर्ष नियम पहले की तुलना में काफी सख्त कर दिए गए हैं। मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (एमसीसी) ने सभी राज्यों और मेडिकल कॉलेजों को निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 की नीट-यूजी और नीट-पीजी काउंसलिंग में केवल वही अभ्यर्थी एनआरआई कोटे का लाभ ले सकेंगे, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरी तरह पूरा करेंगे। अधिकारियों के अनुसार इस कदम का उद्देश्य एनआरआई कोटे के दुरुपयोग पर रोक लगाना और केवल वास्तविक पात्र उम्मीदवारों को ही इसका लाभ सुनिश्चित करना है। पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों से फर्जी एनआरआई प्रमाणपत्रों के जरिए मेडिकल सीट हासिल करने की शिकायतें सामने आने के बाद यह फैसला लिया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नए दिशा-निर्देशों के तहत अब केवल किसी एनआरआई रिश्तेदार का नाम बताकर प्रवेश लेना संभव नहीं होगा। अभ्यर्थी को यह भी साबित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति उसका वैधानिक अभिभावक है। इसके लिए गार्जियन एंड वाड्र्स एक्ट, 1890 के तहत जारी अभिभावक होने का वैध प्रमाण और शपथ-पत्र जमा करना अनिवार्य रहेगा। यह नियम केवल एनआरआई श्रेणी के छात्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) और वे अभ्यर्थी भी इसके दायरे में आएंगे जिन्होंने भारतीय नागरिकता से एनआरआई श्रेणी में बदलाव किया है। अधिकारियों का कहना है कि दस्तावेजों की जांच पहले की तुलना में अधिक सख्ती से की जाएगी और किसी भी तरह की कमी पाए जाने पर एनआरआई कोटे का लाभ नहीं दिया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मेडिकल काउंसलिंग कमेटी ने राज्यों से कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाए और केवल उन्हीं अभ्यर्थियों को पात्र माना जाए जिनके माता-पिता वास्तव में एनआरआई हों, विदेश में निवास करते हों या फिर कोई निकट संबंधी कानूनी रूप से वैधानिक अभिभावक घोषित किया गया हो। अदालत ने पहले भी अपने फैसलों में स्पष्ट किया था कि एनआरआई कोटे का उद्देश्य विदेश में रहने वाले भारतीय परिवारों के बच्चों को अवसर देना है, न कि इसे सामान्य प्रवेश प्रक्रिया से बचने के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाए। इसी आधार पर अब दस्तावेजों की जांच और पात्रता का सत्यापन अधिक विस्तृत तरीके से किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश में इन नए नियमों को लागू करने को लेकर फिलहाल स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार राज्य में अभी भी वर्ष 2018 के नियमों के आधार पर मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया संचालित की जाती है। ऐसे में यदि केंद्र के नए दिशा-निर्देशों को लागू करना है तो पहले राज्य सरकार को संबंधित नियमों में संशोधन कर राजपत्र (गजट) में अधिसूचना जारी करनी होगी। उसके बाद ही नई व्यवस्था प्रभावी हो सकेगी। जब तक राज्य सरकार औपचारिक संशोधन नहीं करती, तब तक पुराने नियमों के आधार पर प्रक्रिया चलने की संभावना बनी हुई है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अधिकांश राज्यों को अपने नियमों में बदलाव करना ही पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में ऐसे मामले सामने आए, जिनमें मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए फर्जी एनआरआई प्रमाणपत्रों और गलत दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। जांच के दौरान कई प्रवेश रद्द भी किए गए थे। इन्हीं घटनाओं को देखते हुए मेडिकल काउंसलिंग कमेटी ने इस बार दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया को और मजबूत करने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि नए नियम लागू होने के बाद केवल वास्तविक पात्र उम्मीदवार ही एनआरआई कोटे का लाभ उठा सकेंगे और फर्जीवाड़े की संभावनाएं काफी हद तक कम होंगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे के तहत लगभग 15 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। राज्य के छह निजी मेडिकल कॉलेजों में कुल मिलाकर करीब 100 से 110 सीटें इस श्रेणी के लिए निर्धारित हैं। इन सीटों की वार्षिक फीस लगभग 30 लाख रुपये तक पहुंचती है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में अभ्यर्थी इस कोटे के माध्यम से प्रवेश लेने का प्रयास करते हैं। अब नए नियम लागू होने पर उन छात्रों और अभिभावकों पर सीधा असर पड़ेगा जो एनआरआई कोटे के तहत आवेदन करने की तैयारी कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 12:00:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>MP के 70 हजार शिक्षकों को TET से राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार, नई याचिका की तैयारी</title>
                                    <description><![CDATA[2005 से 2009 के बीच भर्ती शिक्षकों को पात्रता परीक्षा से छूट दिलाने की कवायद तेज, स्कूल शिक्षा विभाग ने कानूनी राय लेने के बाद नई याचिका दायर करने की तैयारी शुरू की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/government-will-go-to-supreme-court-to-get-relief-from/article-57917"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mp-tet,.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कार्यरत करीब 70 हजार शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (Teacher Eligibility Test-TET) की अनिवार्यता से राहत दिलाने के लिए राज्य सरकार एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख करने जा रही है। स्कूल शिक्षा विभाग ने इस संबंध में नई कानूनी रणनीति तैयार कर ली है और उम्मीद जताई जा रही है कि अगले एक सप्ताह के भीतर शीर्ष अदालत में नई याचिका दायर की जा सकती है। यह मामला वर्ष 2005 से 2009 के बीच भर्ती हुए शिक्षकों से जुड़ा है। सरकार का कहना है कि इन शिक्षकों का चयन तत्कालीन व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से हुआ था। ऐसे में वर्षों से सेवाएं दे रहे इन शिक्षकों को दोबारा शिक्षक पात्रता परीक्षा देने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं होगा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span><strong>विधि विभाग से ली गई कानूनी सलाह</strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">स्कूल शिक्षा विभाग ने इस मामले में विधि एवं विधायी कार्य विभाग के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से भी विस्तृत कानूनी राय ली है। कानूनी विशेषज्ञों से चर्चा के बाद विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि नए तथ्यों और तर्कों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में राहत की मांग की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि विभाग नई याचिका में उन सभी कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं को शामिल करेगा, जिनके आधार पर इन शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से छूट मिल सके। सरकार की प्रस्तावित याचिका का सबसे महत्वपूर्ण आधार यह होगा कि वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त हुए शिक्षकों ने पहले ही एक कठिन और प्रतिस्पर्धात्मक चयन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इन शिक्षकों की नियुक्ति व्यापमं द्वारा आयोजित लिखित परीक्षा और निर्धारित चयन प्रक्रिया के आधार पर हुई थी। सरकार का कहना है कि जब उम्मीदवार पहले ही योग्यता सिद्ध कर चुके हैं और वर्षों से सफलतापूर्वक शिक्षण कार्य कर रहे हैं, तब उन्हें दोबारा पात्रता परीक्षा देने के लिए कहना व्यावहारिक नहीं है। विभाग का मानना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के अनुभव और कार्यक्षमता को भी कानूनी प्रक्रिया में महत्व मिलना चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;"><span><strong>70 हजार शिक्षकों पर टिकी हैं उम्मीदें</strong></span></h2>
<p style="text-align:justify;">इस मामले का असर प्रदेश के करीब 70 हजार शिक्षकों पर पड़ने वाला है। यदि सुप्रीम कोर्ट सरकार की दलीलों को स्वीकार कर लेता है तो इन शिक्षकों को TET परीक्षा से स्थायी राहत मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं यदि राहत नहीं मिलती है तो संबंधित शिक्षकों को भविष्य में पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि प्रदेशभर के शिक्षक इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span><strong>कई वर्षों से चल रहा है विवाद</strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा को लेकर विवाद नया नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से TET को अनिवार्य बनाया गया था। हालांकि, इससे पहले भर्ती हो चुके हजारों शिक्षकों के मामले में लगातार यह सवाल उठता रहा कि क्या पहले से चयनित और लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों पर भी यह नियम समान रूप से लागू होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर पहले भी न्यायालयों में कानूनी लड़ाई लड़ी गई थी और अब राज्य सरकार फिर से इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाने की तैयारी कर रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span><strong>शिक्षकों का पक्ष भी मजबूत माना जा रहा</strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">शिक्षक संगठनों का कहना है कि संबंधित शिक्षकों ने पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्ति प्राप्त की थी। इसके बाद वर्षों तक उन्होंने सरकारी स्कूलों में सेवाएं दी हैं और लाखों विद्यार्थियों को शिक्षित किया है। शिक्षकों का तर्क है कि सेवा के इतने लंबे अनुभव के बाद दोबारा पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता उनके साथ अन्याय होगा। उनका यह भी कहना है कि भर्ती के समय लागू नियमों के आधार पर ही उनकी नियुक्ति हुई थी।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span><strong>शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है असर</strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">यदि इतने बड़े स्तर पर शिक्षकों को TET से जुड़ा विवाद झेलना पड़ता है तो इसका असर स्कूल शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। प्रदेश में पहले से ही कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में शिक्षकों की सेवा पर कानूनी अनिश्चितता बनी रहती है तो शिक्षण कार्य प्रभावित हो सकता है। इसी कारण सरकार भी इस विवाद का स्थायी समाधान चाहती है ताकि शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था दोनों में स्थिरता बनी रहे।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span><strong>एक सप्ताह में दायर हो सकती है नई याचिका</strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार नई याचिका लगभग तैयार है। कानूनी दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। उम्मीद है कि अगले सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट में इसे दायर कर दिया जाएगा। याचिका में व्यापमं की चयन प्रक्रिया, शिक्षकों की सेवा अवधि, अनुभव, भर्ती नियमों और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 15:41:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोनम रघुवंशी की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, मेघालय सरकार ने दी चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[मेघालय सरकार ने हाई कोर्ट के जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार का दावा है कि गिरफ्तारी दस्तावेज में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा लिखने में हुई टाइपिंग त्रुटि के कारण आरोपी सोनम रघुवंशी को जमानत मिली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/hearing-on-sonam-raghuvanshis-bail-today-in-supreme-court-meghalaya/article-57750"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/raja-raghuvanshi-murder-case-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में आरोपी पत्नी सोनम रघुवंशी को मिली जमानत पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होगी। मेघालय सरकार ने हाई कोर्ट द्वारा बरकरार रखे गए जमानत आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। सरकार का कहना है कि गिरफ्तारी से जुड़े एक दस्तावेज में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा लिखने में हुई टाइपिंग त्रुटि का लाभ आरोपी को मिला, जबकि मामले के अन्य सभी रिकॉर्ड और जांच दस्तावेज हत्या के आरोपों की पुष्टि करते हैं। सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि यह केवल एक तकनीकी त्रुटि थी, जिसे हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में मेघालय पुलिस इस मामले से जुड़े दस्तावेज, फोरेंसिक रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के साथ अपना पक्ष मजबूती से रखने की तैयारी में है।</p>
<p class="isSelectedEnd">मेघालय सरकार के अनुसार गिरफ्तारी के समय तैयार किए गए एक दस्तावेज में हत्या से संबंधित धारा 103 बीएनएस दर्ज की जानी थी, लेकिन टाइपिंग की गलती के कारण वहां धारा 403 बीएनएस लिख दी गई। सरकार का कहना है कि केवल एक दस्तावेज में यह त्रुटि हुई थी, जबकि गिरफ्तारी से जुड़े अन्य दस्तावेजों और केस डायरी में हत्या सहित संबंधित धाराओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। याचिका में कहा गया है कि आरोपी और अन्य सह-आरोपियों के हस्ताक्षर वाले कई दस्तावेजों में सही धाराएं दर्ज हैं। ऐसे में एक तकनीकी त्रुटि के आधार पर जमानत मिलना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना जा सकता। सोनम रघुवंशी को ट्रायल कोर्ट से मिली जमानत को मेघालय सरकार ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि हाई कोर्ट ने 29 जून 2026 को ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और जमानत बरकरार रखी।</p>
<p class="isSelectedEnd">अब राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करते हुए कहा है कि हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। सरकार का कहना है कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में केवल दस्तावेजी त्रुटि के आधार पर आरोपी को राहत देना उचित नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह मामला वर्ष 2025 में सामने आया था, जब मध्य प्रदेश निवासी राजा रघुवंशी अपनी पत्नी सोनम रघुवंशी के साथ मेघालय घूमने गए थे। दोनों के हनीमून के दौरान राजा अचानक लापता हो गए थे। करीब दस दिन बाद 2 जून 2025 को सोहरा क्षेत्र के पास एक गहरी खाई से राजा रघुवंशी का शव बरामद हुआ था। जांच अधिकारियों के अनुसार शव पर धारदार हथियार से किए गए हमले के निशान पाए गए थे। मामले की जांच के बाद पुलिस ने हत्या की साजिश का दावा करते हुए सोनम रघुवंशी सहित कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">जांच एजेंसियों के अनुसार इस मामले में सोनम रघुवंशी के अलावा उसके कथित प्रेमी राज कुशवाहा और अन्य आरोपी विशाल सिंह चौहान, आकाश सिंह राजपूत तथा आनंद कुर्मी को भी गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का दावा है कि जांच के दौरान एकत्र किए गए डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों से आरोपियों की गतिविधियों और घटनाक्रम के बीच संबंध स्थापित हुए हैं। मामले की जांच अभी भी न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">मेघालय सरकार ने अपनी याचिका में यह भी उल्लेख किया है कि सोनम रघुवंशी की ओर से पहले तीन बार जमानत के लिए आवेदन किया गया था, लेकिन उन सुनवाइयों के दौरान गिरफ्तारी दस्तावेज में दर्ज धारा संबंधी त्रुटि का कोई उल्लेख नहीं किया गया। सरकार का कहना है कि चौथी बार जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान इस तकनीकी गलती को आधार बनाया गया, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने जमानत मंजूर कर दी। राज्य सरकार का तर्क है कि इस तरह की तकनीकी चूक को हत्या जैसे गंभीर अपराध में आरोपी को राहत देने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मेघालय सरकार ने फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) और केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) की रिपोर्टों का भी उल्लेख किया है। सरकार का दावा है कि वैज्ञानिक जांच से प्राप्त निष्कर्ष मामले की जांच को मजबूत करते हैं। इसके अलावा सीसीटीवी फुटेज, जब्त सामग्री और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का भी हवाला दिया गया है। जांच एजेंसियों का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों की गतिविधियों और घटनाक्रम के क्रम को स्पष्ट करते हैं। राज्य सरकार का तर्क है कि इन साक्ष्यों को देखते हुए जमानत आदेश पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 10:53:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, AI के फर्जी कानूनी उदाहरणों को बताया न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीएलटी का फैसला रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किए गए झूठे कानूनी उदाहरण अदालतों में पेश करना न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डाल सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-courts-strict-comment-calls-fake-legal-examples-of-ai/article-57706"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए फर्जी कानूनी उदाहरणों के इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है। अदालत ने कहा कि AI तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन यदि उससे तैयार की गई गलत या मनगढ़ंत जानकारी को असली कानूनी मिसाल बताकर अदालत के सामने पेश किया जाता है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। कोर्ट ने इस खतरे की गंभीरता समझाने के लिए भोपाल गैस त्रासदी में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह जहरीली गैस का प्रभाव दूरगामी और विनाशकारी था, उसी तरह न्यायिक प्रक्रिया में झूठी कानूनी जानकारी का प्रवेश भी बेहद नुकसानदायक हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) मुंबई के एक आदेश को रद्द करते हुए की। मामला एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और पूजा रमेश सिंह से जुड़े दिवालियापन विवाद का था। एनसीएलटी ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा-7 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए अपने फैसले में कई ऐसे कानूनी मामलों का हवाला दिया था, जिनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था। जांच के दौरान सामने आया कि आदेश में जिन फैसलों का उल्लेख किया गया, उनमें कुछ पूरी तरह मनगढ़ंत थे और उनकी कानूनी साइटेशन भी वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों में किसी भी फैसले का आधार केवल प्रमाणिक और सत्यापित कानूनी सामग्री होनी चाहिए। यदि किसी आदेश में ऐसे मामलों का हवाला दिया जाए जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं, तो यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की चूक लोगों के न्यायपालिका पर भरोसे को कमजोर कर सकती है और भविष्य के मामलों में भी गलत कानूनी आधार तैयार कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का पूरा ढांचा सत्य, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर आधारित है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की फर्जी जानकारी के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड ने शपथपत्र दाखिल कर कहा कि उसके वकीलों ने अपने तर्कों में इन कथित मामलों का कोई उल्लेख नहीं किया था। बैंक के अनुसार, एनसीएलटी ने अपने स्तर पर की गई कानूनी रिसर्च के दौरान इन उदाहरणों को आदेश में शामिल किया। इस दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा की और पाया कि आदेश में शामिल कुछ कानूनी संदर्भ वास्तविक न्यायिक अभिलेखों में उपलब्ध ही नहीं थे। इसके बाद अदालत ने एनसीएलटी का आदेश रद्द कर दिया और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि वह AI तकनीक के उपयोग के खिलाफ नहीं है। अदालत ने कहा कि आधुनिक तकनीक न्यायिक शोध और दस्तावेजों की तैयारी में उपयोगी हो सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की ही रहेगी। यदि कोई वकील बिना तथ्य जांचे AI से प्राप्त जानकारी को अदालत में पेश करता है, तो यह उसकी गंभीर पेशेवर लापरवाही मानी जाएगी। इसी तरह यदि कोई न्यायिक अधिकारी या न्यायाधीश बिना सत्यापन के ऐसी सामग्री पर भरोसा करता है, तो यह भी न्यायिक जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि तकनीक केवल सहायक हो सकती है, लेकिन निर्णय और तथ्य सत्यापन का दायित्व मानव विवेक पर ही आधारित रहना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या लापरवाही से अदालत में फर्जी AI-आधारित कानूनी सामग्री प्रस्तुत करता है, तो उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अदालत ने इस मुद्दे को भविष्य की न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समय रहते स्पष्ट नियम बनाना आवश्यक है ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि अदालतों में प्रस्तुत हर कानूनी संदर्भ का स्वतंत्र सत्यापन किया जाए। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की सिफारिश की है। अदालत का कहना है कि यह समिति अदालतों में AI के जिम्मेदार उपयोग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वकील या पक्षकार द्वारा फर्जी अथवा भ्रामक AI सामग्री प्रस्तुत न की जाए। यदि ऐसे मामलों में नियमों का उल्लंघन होता है तो उसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान होना चाहिए। अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग स्वागतयोग्य है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में सत्य और प्रमाणिकता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 06:06:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, आपसी सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिगों के मामले में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, कहा- केवल शादी से इनकार करना दुष्कर्म नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/important-comment-of-chhattisgarh-high-court-consensual-relationship-is-not/article-57417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने हैं, तो बाद में पुरुष द्वारा शादी से इनकार करने मात्र से उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का निर्णय केवल किसी एक बयान या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे संबंध की प्रकृति, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यह फैसला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे। अदालत ने सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले बालिग व्यक्तियों के बीच बने शारीरिक संबंधों को सामान्य परिस्थितियों में सहमति से बना संबंध माना जा सकता है, जब तक कि उपलब्ध साक्ष्य इसके विपरीत स्पष्ट रूप से संकेत न दें। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत थीं। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि वर्ष 2019 में रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। दोनों के बीच निकटता बढ़ी और बाद में वे लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उनसे शादी करने का वादा किया था और इसी भरोसे पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायत में महिला ने आगे कहा कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी ने शादी की बात टालनी शुरू कर दी। बाद में उसने कथित रूप से यह कहा कि उसके परिवार वाले इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि महिला उम्र में उससे बड़ी हैं, तलाकशुदा हैं और ईसाई समुदाय से संबंध रखती हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को जब वह शादी की बात करने आरोपी के घर पहुंचीं तो वहां उनके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए। इसी आधार पर उन्होंने दुष्कर्म और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया। मामले की सुनवाई पहले सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल यह तथ्य कि दोनों विवाह करना चाहते थे, इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण ही स्थापित हुए थे। अदालत ने कहा कि जब दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो यह माना जा सकता है कि वे अपने संबंधों और उनके संभावित परिणामों से पूरी तरह परिचित थे। ऐसे मामलों में प्रत्येक परिस्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन करना आवश्यक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि न्यायालयों को इस प्रकार के मामलों को केवल तकनीकी या संकीर्ण कानूनी दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। किसी भी मामले में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का व्यवहार, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि लंबे समय तक दोनों की सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में विवाह न होने की स्थिति को स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। फैसले के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के एक निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कैनी राजन बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि सहमति का अर्थ केवल मौन स्वीकृति या आत्मसमर्पण नहीं होता, बल्कि यह सोच-समझकर लिया गया स्वतंत्र निर्णय होता है। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह देखना आवश्यक है कि सहमति किन परिस्थितियों में दी गई थी और क्या उसके पीछे किसी प्रकार का छल या दबाव था। हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध चिकित्सकीय रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिपोर्ट में दर्ज चोटों और कथित घटना के समय के बीच भी स्पष्ट सामंजस्य नहीं पाया गया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:41:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राम मंदिर चढ़ावा मामले में सुप्रीम कोर्ट की तत्काल सुनवाई से इनकार, छुट्टियों के बाद होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[चढ़ावे में कथित गड़बड़ी की जांच के लिए सीबीआई जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- इतनी जल्द सुनवाई की जरूरत क्या है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-court-refuses-to-give-immediate-hearing-in-ram-temple/article-57320"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/ram-mandir-donation-case-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे में कथित गड़बड़ी और हेरफेर के आरोपों से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता की जल्द सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की और स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई अब न्यायालय की छुट्टियां समाप्त होने के बाद नियमित प्रक्रिया के तहत होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल इस मामले में किसी प्रकार की तत्काल न्यायिक कार्रवाई नहीं होगी। याचिका में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर मंदिर में आने वाले चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता का दावा है कि चढ़ावे की राशि और उससे जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड में कथित अनियमितताएं हुई हैं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई कि मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अगुवाई में गठित विशेष जांच दल से कराई जाए। साथ ही यह भी अनुरोध किया गया कि पूरी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तय समय सीमा के भीतर पूरी कराई जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से इस मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग की गई। उनका तर्क था कि मामला सार्वजनिक आस्था और करोड़ों श्रद्धालुओं से जुड़ा है, इसलिए इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति नहीं जताई। अदालत ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि आखिर इस मामले में इतनी जल्द सुनवाई की आवश्यकता क्या है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद तत्काल सुनवाई की मांग खारिज कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का मतलब यह नहीं है कि याचिका खारिज कर दी गई है। अदालत ने केवल तत्काल सुनवाई से इनकार किया है। अब यह मामला न्यायालय की नियमित प्रक्रिया के अनुसार सूचीबद्ध होने के बाद सुना जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय आमतौर पर उन्हीं मामलों में तत्काल सुनवाई करता है, जहां किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर तत्काल प्रभाव पड़ रहा हो या स्थिति अत्यंत आपातकालीन हो। अन्य मामलों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सूचीबद्ध किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिका में यह भी मांग की गई है कि यदि प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही मंदिर में चढ़ावे के संग्रह, लेखा-जोखा और उपयोग की पूरी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की पारदर्शिता संबंधी शंका न रहे। हालांकि इन आरोपों पर अभी तक अदालत की ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई है और न ही आरोपों की सत्यता पर कोई न्यायिक निष्कर्ष सामने आया है।मामले को लेकर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से भी अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं आई है। कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही ट्रस्ट की ओर से अदालत में जवाब दाखिल किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय करती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राम मंदिर देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परियोजनाओं में से एक है और यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर निर्माण के बाद से चढ़ावे की राशि में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में चढ़ावे के प्रबंधन और लेखा प्रणाली को लेकर समय-समय पर सार्वजनिक चर्चा भी होती रही है। हालांकि किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता का आरोप तभी कानूनी रूप से स्थापित माना जाएगा, जब जांच एजेंसियां या अदालत उसके संबंध में कोई निष्कर्ष दें। अदालत का तत्काल सुनवाई से इनकार करना किसी पक्ष के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं माना जा सकता। यह केवल न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। यदि अदालत को सुनवाई के दौरान प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता महसूस होती है तो वह संबंधित एजेंसियों को निर्देश दे सकती है। फिलहाल ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। इस बीच याचिका को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि बिना जांच पूरी हुए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है ताकि किसी तरह की भ्रम की स्थिति पैदा न हो।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 16:57:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>छत्तीसगढ़ में UCC लागू करने की तैयारी तेज, 5 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित</title>
                                    <description><![CDATA[विवाह, तलाक, उत्तराधिकार सहित सभी पर्सनल लॉ का होगा अध्ययन, सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना देसाई को समिति की अध्यक्षता सौंपी गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/preparations-intensified-to-implement-ucc-in-chhattisgarh-5-member-high/article-57042"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-elephants-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। साय सरकार ने इस मुद्दे पर स्टडी, सुझाव और ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 5 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से गुरुवार को आधिकारिक आदेश जारी किया गया। सरकार का कहना है कि यह कदम राज्य में कानून व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को समान आधार पर मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार द्वारा गठित इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई करेंगी। उनके साथ समिति में शत्रुघ्न सिंह, एमके राउत, मोहन पवार और ज्योति रानी सिंह को सदस्य बनाया गया है। समिति को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह राज्य में लागू विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन करे और UCC लागू करने की संभावनाओं पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे। समिति का मुख्य कार्य विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेने (दत्तक ग्रहण) और अन्य नागरिक मामलों से जुड़े मौजूदा पर्सनल लॉ की समीक्षा करना होगा। वर्तमान में देश में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, जिनके आधार पर पारिवारिक और सामाजिक मामलों का निपटारा होता है। सरकार का मानना है कि इन कानूनों के बीच अंतर कई बार कानूनी और सामाजिक असमानताओं को जन्म देता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य सरकार ने समिति को यह भी निर्देश दिया है कि वह केवल कानूनी अध्ययन तक सीमित न रहे, बल्कि विभिन्न समुदायों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सुझाव भी प्राप्त करे। इसके लिए जन संवाद और परामर्श प्रक्रिया अपनाई जाएगी ताकि सभी वर्गों की राय को रिपोर्ट में शामिल किया जा सके। इसके अलावा समिति उन राज्यों के अनुभवों का भी अध्ययन करेगी जहां पहले से UCC लागू है या इस दिशा में कदम उठाए गए हैं। समिति को यह भी जांच करनी होगी कि यदि छत्तीसगढ़ में UCC लागू किया जाता है तो इससे सामाजिक, कानूनी और प्रशासनिक ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सरकार चाहती है कि किसी भी निर्णय से पहले सभी पहलुओं पर विस्तृत अध्ययन हो ताकि भविष्य में किसी तरह की व्यावहारिक समस्या न आए। समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की विधायी प्रक्रिया तय की जाएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पहले ही संकेत दिए थे कि सरकार सभी वर्गों और समुदायों से विचार-विमर्श के बाद ही इस दिशा में आगे बढ़ेगी। अब समिति के गठन के बाद यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस कदम को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसे राज्य में बड़े विधायी बदलाव की दिशा में शुरुआती प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। प्रस्तावित समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद राज्य में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था लागू होने की संभावना है, चाहे उनका धर्म, जाति या समुदाय कुछ भी हो। वर्तमान में विवाह, तलाक, संपत्ति अधिकार, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून लागू हैं। UCC लागू होने के बाद इन सभी मामलों में एक समान कानूनी ढांचा लागू किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी भी समुदाय की परंपराओं को खत्म करना नहीं है, बल्कि कानूनी समानता सुनिश्चित करना है। विशेषकर महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और समानता को इस प्रस्ताव का एक प्रमुख उद्देश्य बताया जा रहा है। कई बार अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण कानूनी प्रक्रिया में असमानता देखने को मिलती है, जिसे दूर करने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश में वर्तमान स्थिति की बात करें तो उत्तराखंड पहला राज्य है जिसने UCC को लागू किया है। इसके अलावा कुछ अन्य राज्यों में इस दिशा में विधायी या प्रारंभिक प्रक्रिया जारी है। गोवा में पहले से ही एक सिविल कोड लागू है, जो ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली शासन के समय से चला आ रहा है। हालांकि उसे पूर्ण आधुनिक UCC का मॉडल नहीं माना जाता, लेकिन वह एक समान नागरिक कानून व्यवस्था का उदाहरण जरूर है। छत्तीसगढ़ में गठित यह समिति आने वाले महीनों में विभिन्न स्तरों पर अध्ययन और परामर्श करेगी। रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे राज्य सरकार को सौंपा जाएगा, जिसके बाद विधानसभा में इसे प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 16:19:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>राज्यसभा उम्मीदवारी पर सुप्रीम कोर्ट से मीनााक्षी नटराजन को झटका</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में नामांकन खारिज होने के खिलाफ दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज, चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप से किया इनकार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a2bcf22157b3/article-55735"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/meenakshi-natarajan-(4).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीटों को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र रद्द किए जाने को चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित है और ऐसे मामलों में चुनावी प्रक्रिया के दौरान दखल नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब किसी उम्मीदवार का नामांकन रिटर्निंग अधिकारी द्वारा खारिज कर दिया जाता है, तब संविधान के प्रावधानों को देखते हुए अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि पहले भी कई मामलों में चुनाव प्रक्रिया के बीच अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए न्यायालयों ने हस्तक्षेप से परहेज किया है। सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि नामांकन पत्र खारिज करने में स्पष्ट और गंभीर त्रुटि हुई है। उनके अनुसार यह ऐसा मामला था जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी था। सिंघवी ने यह भी सवाल उठाया कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में था, तब भी चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने अदालत में कहा कि उनकी मुवक्किल केवल चुनाव लड़ने का अवसर चाहती थीं। उनका तर्क था कि किसी उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतरने का मौका मिलना चाहिए और अंतिम फैसला मतदाताओं या निर्वाचन प्रक्रिया पर छोड़ दिया जाना चाहिए। सिंघवी ने यह भी कहा कि कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष की गई शिकायत पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था, इसके बावजूद परिणाम घोषित कर दिए गए। हालांकि अदालत ने इस दलील पर सहमति नहीं जताई। पीठ ने पूछा कि क्या ऐसा कोई उदाहरण मौजूद है जिसमें नामांकन खारिज होने के बाद चुनाव प्रक्रिया के बीच सर्वोच्च अदालत ने हस्तक्षेप किया हो। अदालत ने कहा कि चाहे रिटर्निंग अधिकारी का निर्णय गलत ही क्यों न हो, लेकिन कानून ने इसके लिए अलग उपचार का प्रावधान किया है और चुनाव प्रक्रिया के दौरान सीधे न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान भाजपा उम्मीदवारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी भी उपस्थित रहे। उन्होंने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत के कई पुराने फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि चुनाव लड़ने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता। मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटों में से एक के लिए मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया था, लेकिन भाजपा नेताओं ने उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में हैदराबाद की एक अदालत से जुड़े मामले का पूरा विवरण नहीं दिया। आपत्तियों पर विचार करने के बाद रिटर्निंग अधिकारी और मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा ने नटराजन का नामांकन पत्र खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया कि उनके द्वारा दाखिल किया गया फॉर्म-26 अधूरा था और उसमें एक न्यायिक नोटिस का उल्लेख नहीं किया गया था। रिटर्निंग अधिकारी ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने की श्रेणी में माना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस निर्णय के बाद कांग्रेस ने इसे राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चुनौती दी। पार्टी का कहना था कि मीनाक्षी नटराजन किसी आपराधिक मामले में आरोपी नहीं हैं। कांग्रेस के अनुसार जिस मामले का हवाला दिया गया, उसमें उनका नाम केवल एक अलग निजी शिकायत में आया था और उनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। पार्टी ने यह भी तर्क दिया कि प्रारंभिक नोटिस को लंबित आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता, इसलिए उसका खुलासा करना आवश्यक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इन दलीलों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की। अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश का असर भविष्य में दायर की जाने वाली किसी चुनाव याचिका पर नहीं पड़ेगा। यानी यदि मीनाक्षी नटराजन या कांग्रेस इस मामले को आगे चुनाव याचिका के रूप में संबंधित उच्च न्यायालय में ले जाना चाहें तो उनके लिए रास्ता खुला रहेगा। उधर, राज्यसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं। नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद चुनावी मुकाबले की संभावना लगभग समाप्त हो गई थी और भाजपा उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय माना जा रहा था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>चुनाव</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:20:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने के निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[जमानत मामलों में देरी पर नाराजगी, सुप्रीम कोर्ट बोला- आदेश उसी दिन या अगले दिन जारी करें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-court-gives-strict-instructions-to-the-high-court-to/article-54493"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/supreme-court-order.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">देशभर की अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। अगर तय समय में फैसला नहीं आता है तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को उस मामले की जानकारी चीफ जस्टिस के सामने रखनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर जमानत याचिकाओं में देरी पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे मामलों में आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने यह टिप्पणी झारखंड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामले में आरोप लगाया गया था कि हाईकोर्ट में 2022 से फैसला सुरक्षित रखा गया है, लेकिन अब तक फैसला सुनाया नहीं गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया था। उनका कहना था कि समय पर न्याय मिलना भी मौलिक अधिकार का हिस्सा है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कुल 12 अहम दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जमानत, अग्रिम जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट को विशेष तेजी दिखानी चाहिए। अदालत ने कहा कि जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आदेश उसी दिन सुनाया और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जारी करना अनिवार्य होगा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत या सजा पर रोक से जुड़े आदेश की जानकारी तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचाई जाए ताकि आरोपी को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जा सके। हालांकि यह शर्त रहेगी कि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित न हो और उसने जमानत की शर्तों का उल्लंघन न किया हो। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि फैसलों में अनावश्यक देरी कई बार लोगों की स्वतंत्रता और न्याय प्रक्रिया दोनों को प्रभावित करती है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अपने अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी किसी मामले में फैसला लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी लोगों का भरोसा कमजोर करती है और इसे सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि न्याय की कीमत पर देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए भी कई निर्देश दिए हैं। अब हर महीने हाईकोर्ट की वेबसाइट से एक ऑटोमैटिक ई-मेल संबंधित चीफ जस्टिस को भेजा जाएगा, जिसमें उन मामलों की जानकारी होगी जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसकी कॉपी संबंधित बेंच को भी भेजी जाएगी। यदि फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाए जाने के 15 दिन बाद तक विस्तृत आदेश अपलोड नहीं होता है, तो रजिस्ट्रार जनरल को इसकी जानकारी चीफ जस्टिस को देनी होगी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने बाद भी आदेश जारी नहीं होता है, तो संबंधित पक्षकार अदालत में आवेदन देकर फैसला सुनाने की मांग कर सकता है। ऐसे आवेदन पर दो दिन के भीतर सुनवाई करना जरूरी होगा। वहीं यदि तीन महीने और अतिरिक्त एक महीने यानी कुल चार महीने तक फैसला नहीं आता है, तो पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग कर सकता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">फैसलों की कॉपी और वेबसाइट पर जानकारी अपडेट करने को लेकर भी कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं। अब हर फैसले की सर्टिफाइड कॉपी में यह साफ लिखा जाएगा कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, कब सुनाया गया और वेबसाइट पर कब अपलोड हुआ। हाईकोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा फैसला अपलोड होते ही पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल के जरिए सूचना भेजी जाएगी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट में लंबित एक आपराधिक अपील से जुड़ा था। अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े चार दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि उनकी अपील वर्षों से लंबित है और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बावजूद सुनाया नहीं गया। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की न्यायिक व्यवस्था पर व्यापक टिप्पणी करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 142 उसे विशेष अधिकार देता है, जिसके तहत अदालत पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश जारी कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता बेहद जरूरी है। देश में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट में ही इस समय 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। वहीं देशभर की अदालतों में कुल लंबित मामलों का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 15:20:29 +0530</pubDate>
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