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                <title>health news - दैनिक जागरण</title>
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                <title>सुबह उठते ही पानी पीने की आदत बदल सकती है आपकी सेहत, जानिए इसके बड़े फायदे</title>
                                    <description><![CDATA[दिन की शुरुआत पानी से करने पर शरीर को मिलता है हाइड्रेशन, मेटाबॉलिज्म होता है सक्रिय और पूरे दिन बनी रहती है ताजगी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/the-habit-of-drinking-water-as-soon-as-you-wake/article-58303"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/morning-water-benefits.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सुबह उठते ही अधिकांश लोग अपनी दिनचर्या की शुरुआत चाय या कॉफी से करते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दिन की शुरुआत एक या दो गिलास सादे पानी से की जाए तो इसका असर पूरे शरीर पर सकारात्मक रूप से दिखाई देता है। रातभर करीब 6 से 8 घंटे की नींद के दौरान शरीर को पानी नहीं मिलता, जिससे हल्का डिहाइड्रेशन होना सामान्य बात है। ऐसे में सुबह उठते ही पानी पीना शरीर में पानी की कमी को पूरा करने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका माना जाता है।  रात के समय शरीर लगातार कई जैविक प्रक्रियाओं से गुजरता है। इस दौरान सांस लेने, पसीना आने और अन्य प्राकृतिक क्रियाओं के कारण शरीर से पानी की थोड़ी-बहुत मात्रा निकलती रहती है। सुबह उठने पर सबसे पहले पानी पीने से शरीर दोबारा हाइड्रेट होता है और दिनभर बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह पानी पीने से मेटाबॉलिज्म भी सक्रिय होने लगता है। मेटाबॉलिज्म वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलता है। यदि दिन की शुरुआत पर्याप्त पानी से होती है तो शरीर ऊर्जा का बेहतर उपयोग करता है। यही वजह है कि फिटनेस एक्सपर्ट भी सुबह खाली पेट पानी पीने की सलाह देते हैं। कई लोग सुबह उठते ही थकान, भारीपन या सुस्ती महसूस करते हैं। इसका एक कारण शरीर में पानी की कमी भी हो सकती है। सुबह पानी पीने से शरीर को ताजगी मिलती है और दिमाग भी अधिक सतर्क महसूस करता है। इससे दिनभर काम करने की क्षमता बेहतर हो सकती है। पाचन तंत्र के लिए भी सुबह पानी पीना फायदेमंद माना जाता है। पर्याप्त पानी पेट और आंतों की कार्यप्रणाली को सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। जिन लोगों को कब्ज की समस्या रहती है, उनके लिए सुबह खाली पेट पानी पीने की आदत लाभदायक हो सकती है। नियमित रूप से ऐसा करने पर पाचन संबंधी कई छोटी समस्याओं में राहत मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पानी शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किडनी शरीर के अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती है और इसके लिए पर्याप्त मात्रा में पानी जरूरी होता है। सुबह पानी पीने से शरीर की प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया को भी सहायता मिलती है। त्वचा की सेहत के लिए भी यह आदत लाभकारी मानी जाती है। शरीर में पर्याप्त पानी रहने पर त्वचा में नमी बनी रहती है, जिससे चेहरा अधिक ताजा और चमकदार दिखाई दे सकता है। हालांकि केवल पानी पीना ही पर्याप्त नहीं है, लेकिन संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के साथ यह अच्छी त्वचा बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है। जो लोग वजन नियंत्रित करना चाहते हैं, उनके लिए भी सुबह पानी पीना उपयोगी माना जाता है। कई बार शरीर प्यास और भूख के संकेतों में भ्रम पैदा करता है। सुबह पानी पीने से अनावश्यक भूख कम महसूस हो सकती है और भोजन की मात्रा पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा सक्रिय मेटाबॉलिज्म भी वजन प्रबंधन में सहायक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सलाह देते हैं कि सुबह पानी धीरे-धीरे और आराम से पीना चाहिए। एक साथ बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने की बजाय एक या दो गिलास पानी पर्याप्त माना जाता है। पानी सामान्य तापमान का हो तो बेहतर रहता है। बहुत अधिक ठंडा पानी सुबह खाली पेट पीने से कुछ लोगों को असहजता महसूस हो सकती है। कुछ लोग सुबह गुनगुना पानी पीना पसंद करते हैं। आयुर्वेद में भी गुनगुने पानी को पाचन के लिए लाभकारी बताया गया है। हालांकि सामान्य तापमान का साफ पानी भी शरीर को समान रूप से हाइड्रेट करता है। यदि किसी व्यक्ति को किडनी, हृदय या अन्य गंभीर बीमारी है, तो उसे पानी की मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही तय करनी चाहिए। इस बात पर भी जोर देते हैं कि केवल सुबह पानी पी लेना ही पर्याप्त नहीं है। पूरे दिन नियमित अंतराल पर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है। गर्मी के मौसम, अधिक शारीरिक मेहनत या व्यायाम करने वाले लोगों को सामान्य से अधिक पानी की आवश्यकता हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में छोटी-छोटी अच्छी आदतें लंबे समय तक स्वास्थ्य पर बड़ा असर डालती हैं। सुबह उठते ही पानी पीना भी ऐसी ही एक आदत है, जिसे अपनाने में न तो अधिक समय लगता है और न ही कोई अतिरिक्त खर्च आता है। फिर भी इसके लाभ शरीर के कई अंगों और संपूर्ण स्वास्थ्य पर देखने को मिल सकते हैं। यदि आप अपनी दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं, तो सुबह की शुरुआत एक गिलास पानी से करना एक आसान और प्रभावी कदम हो सकता है। नियमित रूप से इस आदत को अपनाने से शरीर बेहतर तरीके से हाइड्रेट रहता है, पाचन तंत्र को सहारा मिलता है, मेटाबॉलिज्म सक्रिय होता है और दिनभर ऊर्जा व ताजगी महसूस हो सकती है। हालांकि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी सलाह को अपनाने से पहले अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय परामर्श लेना भी जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 15:39:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रायपुर में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं, डायबिटीज मरीजों को विशेषज्ञ इलाज का इंतजार</title>
                                    <description><![CDATA[डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में शासन की मंजूरी के बावजूद एंडोक्राइनोलॉजी विभाग अब तक शुरू नहीं हो सका। आंबेडकर अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होने के बावजूद डायबिटीज और हार्मोनल बीमारियों के मरीजों को अलग विशेषज्ञ सेवाएं नहीं मिल रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/endocrinology-department-not-started-in-raipur-diabetes-patients-wait-for/article-57779"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/dks-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय और डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डायबिटीज और हार्मोन से जुड़ी बीमारियों के मरीजों को अब तक विशेषज्ञ उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। राज्य सरकार की मंजूरी मिलने के बाद भी डीकेएस अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं हो सका है, जबकि आंबेडकर अस्पताल में सुपर स्पेशलिटी डिग्रीधारी डॉक्टर होने के बावजूद मरीजों को इस विशेषज्ञता का लाभ नहीं मिल रहा। इससे प्रतिदिन सैकड़ों मरीज सामान्य विभागों में इलाज कराने को मजबूर हैं। मधुमेह और हार्मोनल रोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इसके बावजूद राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा शुरू नहीं होना मरीजों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आंबेडकर अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 2,500 से अधिक मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। इनमें करीब 20 प्रतिशत यानी 500 से अधिक मरीज डायबिटीज, थायरॉयड, हार्मोन असंतुलन, पिट्यूटरी और अन्य अंतःस्रावी (एंडोक्राइन) रोगों से पीड़ित होते हैं। विशेषज्ञ विभाग नहीं होने के कारण इन मरीजों का इलाज फिलहाल मेडिसिन, जिरियाट्रिक और पीडियाट्रिक विभागों के चिकित्सकों द्वारा किया जा रहा है। हालांकि जटिल मामलों में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट की विशेषज्ञ सलाह की जरूरत महसूस की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य शासन ने डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग स्थापित करने की मंजूरी पहले ही दे दी थी। इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जा चुकी हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं होने के कारण विभाग आज तक शुरू नहीं हो पाया। अस्पताल प्रबंधन नियमित रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित कर रहा है, लेकिन अब तक कोई योग्य चिकित्सक स्थायी रूप से नियुक्त नहीं हुआ है। इसका सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। आंबेडकर अस्पताल में डीएम एंडोक्राइनोलॉजी की डिग्री प्राप्त एक विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं। इसके बावजूद वे एंडोक्राइनोलॉजी विभाग में सेवाएं नहीं दे रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी वर्तमान पदस्थापना पीडियाट्रिक विभाग में है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डॉक्टर का तर्क है कि उन्हें उनकी सुपर स्पेशलिटी योग्यता के अनुरूप पद और वेतनमान नहीं मिला है। इसी कारण वे अपनी विशेषज्ञता के अनुरूप सेवाएं नहीं दे रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक जानकारी के अनुसार उन्हें डीएम डिग्री के आधार पर तीन अतिरिक्त वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) का लाभ दिया जा चुका है। सरकारी प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) के तहत सुपर स्पेशलिटी की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को निर्धारित अवधि तक उसी विषय में सरकारी सेवा देना अनिवार्य होता है। इसके लिए बांड भी भरवाया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी डॉक्टर ने सरकारी खर्च पर एंडोक्राइनोलॉजी की पढ़ाई की है तो उनकी विशेषज्ञता का उपयोग उसी विभाग में क्यों नहीं हो रहा। उनका मानना है कि इससे सरकारी संसाधनों का पूरा लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा है। डायबिटीज केवल रक्त में शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है। यदि समय पर उचित इलाज और निगरानी न मिले तो यह हृदय, किडनी, आंखों, नसों और मस्तिष्क पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी वजह से कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विभागों में भी बड़ी संख्या में ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी मूल समस्या डायबिटीज से जुड़ी होती है। एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ इन जटिलताओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डायबिटीज के अलावा थायरॉयड विकार, मोटापा, हार्मोन असंतुलन, बच्चों में ग्रोथ संबंधी समस्याएं, महिलाओं में हार्मोनल विकार और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों के मामलों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। इन सभी बीमारियों के लिए एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है। लेकिन विशेषज्ञ विभाग उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां इलाज का खर्च काफी अधिक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डीकेएस अस्पताल प्रशासन का कहना है कि विभाग शुरू करने की पूरी तैयारी है। अस्पताल के उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा के अनुसार हर महीने एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किए जा रहे हैं। जैसे ही योग्य डॉक्टर उपलब्ध होंगे, विभाग की शुरुआत कर दी जाएगी। प्रशासन का कहना है कि राज्य सरकार भी इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है ताकि मरीजों को जल्द से जल्द विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।रायपुर जैसे बड़े चिकित्सा केंद्र में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग का संचालन समय की आवश्यकता है। इससे न केवल राजधानी बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा। वर्तमान में कई मरीजों को रायपुर से बाहर अन्य राज्यों के बड़े अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त लागत आती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:25:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>डॉक्टर्स डे पर रीवा में उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल बोले- डॉक्टरों का पेशा जीवन को सार्थक बनाने वाला, समाज में भगवान जैसा सम्मान</title>
                                    <description><![CDATA[श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ चिकित्सकों का सम्मान, दो पुस्तकों का हुआ विमोचन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/vindhya-rewa/on-doctors-day-deputy-chief-minister-rajendra-shukla-said-in/article-57537"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm-(2).mp4" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">डॉक्टर्स डे के अवसर पर रीवा स्थित श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में चिकित्सा सेवा, मानवता और समाज के प्रति डॉक्टरों के समर्पण को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किया गया, जिसमें मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री <strong>राजेंद्र शुक्ल</strong> ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का पेशा केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि मानव जीवन को बचाने और उसे नई उम्मीद देने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि समाज में डॉक्टरों को भगवान के समान सम्मान इसलिए मिलता है क्योंकि वे कठिन परिस्थितियों में भी लोगों के जीवन की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करते हैं।</p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer"></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm-(2).mp4" controls=""></video>
<p>उप मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि हर व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी रूप में डॉक्टरों की सेवाओं का लाभ लेता है। जब कोई व्यक्ति बीमारी, दुर्घटना या गंभीर स्वास्थ्य संकट से जूझता है, तब सबसे पहले डॉक्टर ही उसकी उम्मीद बनते हैं। यही कारण है कि चिकित्सा सेवा को समाज में सबसे सम्मानजनक और जिम्मेदारी भरा कार्य माना जाता है। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों का दायित्व केवल उपचार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे मरीजों और उनके परिवारों में विश्वास और आत्मबल भी जगाते हैं।</p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.20-pm.mp4" controls=""></video>
<p>कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों <strong>"दिल की बात"</strong> और <strong>"बच्चों में बढ़ता दृष्टि दोष"</strong> का विधिवत विमोचन किया गया। इन पुस्तकों का लेखन वरिष्ठ चिकित्सक <strong>डॉ. बी.डी. त्रिपाठी</strong> और <strong>डॉ. नेहा त्रिपाठी</strong> ने किया है। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने इन पुस्तकों को चिकित्सा जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि सरल भाषा में तैयार की गई ऐसी पुस्तकें आम लोगों को स्वास्थ्य संबंधी विषयों की बेहतर समझ विकसित करने में मदद करेंगी। <strong>"दिल की बात"</strong> पुस्तक में हृदय रोगों, उनके कारणों, बचाव और स्वस्थ जीवनशैली से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। वहीं <strong>"बच्चों में बढ़ता दृष्टि दोष"</strong> पुस्तक में वर्तमान समय में बच्चों में तेजी से बढ़ रही आंखों की समस्याओं, डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग, समय पर जांच और उचित देखभाल के बारे में उपयोगी जानकारी दी गई है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पुस्तकें जनजागरूकता अभियान को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।</p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm-(1).mp4" controls=""></video>
<p>कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण चिकित्सा क्षेत्र में लंबे समय से उत्कृष्ट सेवाएं देने वाले वरिष्ठ चिकित्सकों का सम्मान समारोह भी रहा। विभिन्न विशेषज्ञताओं से जुड़े डॉक्टरों को उनकी उल्लेखनीय सेवाओं, चिकित्सा अनुसंधान, मरीजों के प्रति समर्पण और समाज में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। सम्मान प्राप्त करने वाले चिकित्सकों ने इसे अपने पूरे चिकित्सा जीवन के लिए प्रेरणादायक बताया और भविष्य में भी सेवा कार्य को उसी समर्पण के साथ जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया। अपने संबोधन में उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन डॉक्टरों की संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण आज भी चिकित्सा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि नई तकनीक, आधुनिक उपकरण और उन्नत उपचार पद्धतियां तभी प्रभावी होती हैं जब उनके पीछे सेवा भाव और मरीज के प्रति समर्पण की भावना हो। उन्होंने युवाओं से भी चिकित्सा क्षेत्र को सेवा का माध्यम मानकर आगे आने का आह्वान किया। उनका कहना था कि डॉक्टर बनना केवल एक पेशा चुनना नहीं बल्कि समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वीकार करना है। आने वाले समय में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रशिक्षित और संवेदनशील डॉक्टरों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।</p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/whatsapp-video-2026-07-01-at-3.00.19-pm.mp4" controls=""></video>
<p>कार्यक्रम में उपस्थित चिकित्सा विशेषज्ञों ने भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने, समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराने, संतुलित आहार अपनाने और नियमित व्यायाम करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कई गंभीर बीमारियों से केवल जागरूकता और समय पर जांच के माध्यम से बचा जा सकता है। लोगों को स्वास्थ्य संबंधी छोटी समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के प्रतिनिधियों ने भी डॉक्टरों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि चिकित्सा सेवा केवल शरीर का उपचार नहीं करती, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी लोगों को नई ऊर्जा प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि सेवा, करुणा और सकारात्मक सोच किसी भी डॉक्टर की सबसे बड़ी पहचान होती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में चिकित्सक, मेडिकल कॉलेज के शिक्षक, मेडिकल छात्र, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। पूरे आयोजन के दौरान डॉक्टरों की सेवा भावना, चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धियों और स्वास्थ्य जागरूकता को लेकर सार्थक चर्चा हुई। उपस्थित लोगों ने भी वरिष्ठ चिकित्सकों का सम्मान कर उनके प्रति आभार व्यक्त किया। डॉक्टर्स डे के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम चिकित्सा सेवा के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ-साथ समाज में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बना। डॉक्टरों के अनुभव और आमजन की जागरूकता मिलकर ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं। ऐसे आयोजन चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले चिकित्सकों का उत्साह बढ़ाने के साथ नई पीढ़ी को भी सेवा और समर्पण की प्रेरणा देते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>विंध्य/रीवा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:51:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रात में चावल खाना सही या नहीं? जानिए खिचड़ी बेहतर विकल्प है या नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[रात के भोजन को लेकर लोगों में कई तरह की धारणाएं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार चावल पूरी तरह नुकसानदायक नहीं, लेकिन मात्रा, समय और खाने का तरीका आपकी सेहत पर बड़ा असर डालता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/is-it-right-to-eat-rice-at-night-or-not/article-57241"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/rice-at-night.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिनभर की भागदौड़ के बाद रात का खाना शरीर के लिए सबसे अहम भोजन में से एक माना जाता है। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या रात में चावल खाना चाहिए या नहीं। कई लोग मानते हैं कि रात में चावल खाने से वजन बढ़ता है, पेट निकलने लगता है और पाचन खराब हो जाता है। वहीं कुछ लोग बिना चावल के खाना अधूरा मानते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि सच्चाई क्या है और यदि रात में चावल नहीं खाना चाहिए तो क्या खिचड़ी बेहतर विकल्प हो सकती है। रात में चावल खाना पूरी तरह गलत नहीं है। असल फर्क इस बात से पड़ता है कि आप कितनी मात्रा में चावल खाते हैं, उसके साथ क्या खाते हैं और आपका रोजाना का शारीरिक गतिविधि स्तर कितना है। यदि कोई व्यक्ति दिनभर पर्याप्त मेहनत करता है या नियमित व्यायाम करता है तो सीमित मात्रा में चावल खाना उसके लिए सामान्य हो सकता है। दूसरी ओर जो लोग लंबे समय तक बैठे रहकर काम करते हैं और रात का खाना खाने के तुरंत बाद सो जाते हैं, उन्हें चावल की मात्रा पर ध्यान देना चाहिए।सफेद चावल जल्दी पच जाते हैं और इनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। अगर इन्हें अधिक मात्रा में खाया जाए और शरीर को ऊर्जा खर्च करने का मौका न मिले तो अतिरिक्त कैलोरी वसा के रूप में जमा हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति के लिए रात में चावल नुकसानदायक हैं। संतुलित भोजन के साथ सीमित मात्रा में चावल लेने से आमतौर पर कोई बड़ी समस्या नहीं होती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यदि रात के खाने में चावल के साथ दाल, हरी सब्जियां, सलाद और दही जैसी चीजें शामिल की जाएं तो भोजन अधिक संतुलित बन जाता है। इससे पाचन भी बेहतर रहता है और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी मिलते हैं। केवल बड़ी मात्रा में चावल खाना या तली-भुनी चीजों के साथ खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता। कई लोग रात में वजन कम करने के उद्देश्य से चावल पूरी तरह छोड़ देते हैं। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि केवल चावल छोड़ देने से वजन कम नहीं होता। वजन घटाने के लिए पूरे दिन की कुल कैलोरी, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और संतुलित आहार ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि पूरे दिन असंतुलित भोजन लिया जाए और केवल रात में चावल न खाया जाए तो इससे विशेष लाभ नहीं मिलता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अब बात खिचड़ी की करें तो इसे हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन माना जाता है। दाल और चावल से बनने वाली खिचड़ी में कार्बोहाइड्रेट के साथ प्रोटीन भी मिलता है। यदि इसमें हरी सब्जियां, हल्दी, जीरा और थोड़ा घी मिलाया जाए तो इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है। बीमारी के दौरान या पाचन संबंधी परेशानी होने पर डॉक्टर भी अक्सर खिचड़ी खाने की सलाह देते हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि खिचड़ी भी चावल से ही बनती है। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि खिचड़ी खाने से कैलोरी बिल्कुल नहीं बढ़ती। यदि बहुत अधिक मात्रा में घी या मक्खन डालकर खिचड़ी खाई जाए तो उसकी कैलोरी भी बढ़ सकती है। इसलिए खिचड़ी का सेवन भी संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को मधुमेह, मोटापा या फैटी लिवर जैसी समस्या है तो उसे अपने डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के अनुसार भोजन चुनना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए ब्राउन राइस, मिलेट्स या मल्टीग्रेन विकल्प अधिक लाभकारी हो सकते हैं। वहीं स्वस्थ व्यक्ति सप्ताह में कई दिन रात के भोजन में सीमित मात्रा में चावल या खिचड़ी आराम से खा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">रात का भोजन हमेशा सोने से कम से कम दो से तीन घंटे पहले कर लेना चाहिए। खाना खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर जाने की आदत पाचन को प्रभावित कर सकती है। भोजन के बाद कुछ देर टहलना भी फायदेमंद माना जाता है। इससे पाचन बेहतर होता है और शरीर भोजन का सही उपयोग कर पाता है। भोजन को लेकर किसी एक नियम को सभी पर लागू नहीं किया जा सकता। हर व्यक्ति की उम्र, वजन, स्वास्थ्य, दिनचर्या और शारीरिक गतिविधि अलग होती है। इसलिए किसी भी भोजन को पूरी तरह अच्छा या बुरा कहना उचित नहीं है। सही मात्रा, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है। आप स्वस्थ हैं और संतुलित मात्रा में खाते हैं तो रात में चावल खाना नुकसानदायक नहीं माना जाता। वहीं यदि हल्का भोजन करना चाहते हैं तो दाल और सब्जियों से बनी खिचड़ी एक अच्छा विकल्प हो सकती है। सबसे जरूरी बात यह है कि भोजन संतुलित हो, समय पर किया जाए और उसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि भी बनी रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 16:56:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>शिशुकुंज स्कूल मामला: बच्चों की तबीयत बिगड़ने के बाद घर-घर पहुंची डॉक्टरों की टीम</title>
                                    <description><![CDATA[लंच के बाद 150 से अधिक छात्रों में दिखे बीमारी के लक्षण, किचन सील; स्वास्थ्य विभाग ने शुरू की निगरानी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/shishu-kunj-school-case-team-of-doctors-reached-door-to/article-56784"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/shishukunj-school-indore.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंदौर के प्रतिष्ठित शिशुकुंज स्कूल में छात्रों की तबीयत बिगड़ने की घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है। स्कूल में लंच करने के बाद 150 से अधिक बच्चों के बीमार पड़ने के मामले ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। घटना के बाद अब डॉक्टरों की टीमें प्रभावित बच्चों के घर-घर जाकर उनकी स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी कर रही हैं। शुरुआती जांच में कई बच्चों में गैस्ट्रोएंटेराइटिस और डिहाइड्रेशन जैसे लक्षण पाए गए हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि फिलहाल किसी भी बच्चे की हालत गंभीर नहीं बताई जा रही है और सभी को चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है।मामला सामने आने के बाद मंगलवार को स्कूल का माहौल सामान्य दिनों से अलग नजर आया। बड़ी संख्या में अभिभावकों ने अपने बच्चों को घर से टिफिन देकर स्कूल भेजा। कई छात्रों ने स्कूल का भोजन लेने के बजाय घर का बना खाना ही खाना उचित समझा। वहीं कुछ अभिभावकों ने एहतियात के तौर पर बच्चों को स्कूल नहीं भेजा, जिसके चलते उपस्थिति भी अपेक्षाकृत कम रही। स्कूल प्रबंधन ने भी अभिभावकों को ई-मेल भेजकर फिलहाल बच्चों के लिए घर से भोजन भेजने का अनुरोध किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह पूरा मामला शनिवार को सामने आया था। स्कूल में दोपहर का भोजन करने के कुछ समय बाद कई बच्चों ने पेट दर्द, उल्टी, कमजोरी, घबराहट और बेचैनी की शिकायत की। धीरे-धीरे प्रभावित बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। अभिभावकों को सूचना मिलने के बाद वे बच्चों को अस्पताल और क्लीनिक लेकर पहुंचे। देखते ही देखते यह मामला पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया। प्रभावित छात्रों में बड़ी संख्या चौथी कक्षा तक के बच्चों की बताई जा रही है। घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल सक्रियता दिखाई। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव हसानी के निर्देश पर डॉक्टरों की टीम गठित की गई। मंगलवार को टीम ने करीब 30 बच्चों के घर पहुंचकर स्वास्थ्य परीक्षण किया। डॉक्टरों ने बच्चों की स्थिति का आकलन किया और अभिभावकों से बीमारी के लक्षणों तथा वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी ली। अधिकारियों के अनुसार आने वाले दिनों में अन्य प्रभावित बच्चों के घर भी जाकर जांच की जाएगी ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि अधिकांश बच्चों में गैस्ट्रोएंटेराइटिस और डिहाइड्रेशन के लक्षण दिखाई दिए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक दूषित भोजन या पानी के सेवन से ऐसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। हालांकि बीमारी की वास्तविक वजह का पता जांच रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा। फिलहाल डॉक्टर बच्चों को पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ देने और स्वास्थ्य पर नजर रखने की सलाह दे रहे हैं। इस घटना के बाद सोमवार को अभिभावकों का गुस्सा भी देखने को मिला। बड़ी संख्या में अभिभावक स्कूल पहुंचे और पूरे मामले को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि बच्चों की सुरक्षा और भोजन की गुणवत्ता को लेकर किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। कई अभिभावकों ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की। स्कूल प्रबंधन ने अभिभावकों को भरोसा दिलाया है कि मामले की निष्पक्ष जांच में पूरा सहयोग किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग ने भी मामले को गंभीरता से लिया है। सोमवार को दोनों विभागों की संयुक्त टीम ने स्कूल परिसर का विस्तृत निरीक्षण किया। करीब चार घंटे तक चली जांच के दौरान किचन और खाद्य भंडारण व्यवस्था की पड़ताल की गई। निरीक्षण के दौरान कुछ खाद्य सामग्री और मसालों की एक्सपायरी डेट समाप्त होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद प्रशासन ने एहतियाती कदम उठाते हुए स्कूल के किचन को सील कर दिया। जांच दल ने किचन से विभिन्न खाद्य पदार्थों और पेय सामग्री के नमूने भी एकत्र किए हैं। इनमें पनीर, दूध, आइसक्रीम, दाल, तैयार भोजन, मसाले और पानी के नमूने शामिल हैं। कुल 23 नमूनों को प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि बच्चों की तबीयत बिगड़ने की असली वजह क्या थी। यदि किसी प्रकार की लापरवाही या खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित पक्षों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी ने बताया कि विभाग को अब तक कई अभिभावकों की ओर से शिकायतें और जानकारी प्राप्त हुई हैं। स्कूल प्रशासन ने भी अस्वस्थ महसूस करने वाले करीब 85 विद्यार्थियों को एहतियातन घर भेजा था। फिलहाल किसी भी बच्चे को अस्पताल में भर्ती रखने की आवश्यकता नहीं पड़ी है और सभी की स्थिति स्थिर बताई जा रही है। अभिभावक, प्रशासन और स्कूल प्रबंधन यह जानना चाहते हैं कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की तबीयत अचानक क्यों बिगड़ी। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही इस घटना के पीछे की वास्तविक वजह सामने आ सकेगी। तब तक स्वास्थ्य विभाग बच्चों की निगरानी जारी रखेगा और एहतियाती कदम उठाता रहेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 12:17:20 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>रीवा संभाग में एनीमिया का बढ़ता संकट, 2 हजार से ज्यादा गर्भवती महिलाएं गंभीर रक्ताल्पता की शिकार</title>
                                    <description><![CDATA[रीवा, सतना, सीधी और सिंगरौली में सामने आए चिंताजनक आंकड़े, डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ने कहा- स्वास्थ्य विभाग को प्रभावी कार्रवाई के निर्देश दिए जाएंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/vindhya-rewa/increasing-crisis-of-anemia-in-rewa-division-more-than-2/article-55896"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/rewa-anemia-cases.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रीवा संभाग में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। स्वास्थ्य विभाग के हालिया आंकड़ों के अनुसार संभाग के चार जिलों रीवा, सतना, सीधी और सिंगरौली में 2 हजार से अधिक गर्भवती महिलाएं गंभीर एनीमिया यानी रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। इन महिलाओं के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर 7 ग्राम प्रति डेसीलीटर से भी कम पाया गया है, जो चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अत्यंत गंभीर स्थिति मानी जाती है। यह न केवल गर्भवती महिला के स्वास्थ्य के लिए खतरा है बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास और जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। रीवा जिले में सबसे अधिक 884 गर्भवती महिलाओं में गंभीर रक्ताल्पता की समस्या पाई गई है। इसके बाद सतना जिले में 567, सीधी जिले में 303 और सिंगरौली जिले में 246 महिलाओं को गंभीर एनीमिया से ग्रसित पाया गया है। इन आंकड़ों ने स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश स्तर पर तैयार की गई रिपोर्ट में भी रीवा संभाग को गंभीर एनीमिया के मामलों के उपचार और प्रबंधन के मामले में सबसे कमजोर क्षेत्रों में शामिल बताया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चिकित्सकों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को सामान्य से अधिक पोषण और आयरन की आवश्यकता होती है। यदि समय पर पर्याप्त पोषण नहीं मिलता या नियमित जांच नहीं होती तो शरीर में खून की कमी तेजी से बढ़ सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, संतुलित आहार का अभाव और स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर पहुंच न होना भी इस समस्या को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं। कई मामलों में महिलाएं गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच नहीं करातीं, जिसके कारण बीमारी का पता देर से चलता है। गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं में अत्यधिक कमजोरी, चक्कर आना, सांस फूलना, लगातार थकान, सिरदर्द और त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। हालांकि कई बार महिलाएं इन लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देती हैं। यही वजह है कि बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप ले लेती है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में महिलाओं को अपनी स्थिति की जानकारी तब मिलती है जब वे प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचती हैं। ऐसे समय पर स्थिति काफी जटिल हो जाती है और डॉक्टरों को अतिरिक्त चिकित्सा प्रबंधन करना पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">गर्भावस्था के दौरान गंभीर रक्ताल्पता मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकती है। इससे समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले बच्चे का जन्म, प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव और मातृ मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। कई बार नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी इसका दीर्घकालिक असर देखा जाता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की रोकथाम और उपचार को प्राथमिकता देते हैं। रीवा संभाग में सामने आए इन आंकड़ों के बाद स्वास्थ्य विभाग ने स्थिति की समीक्षा शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं की पहचान कर उन्हें आयरन सप्लीमेंट, पोषण संबंधी सलाह और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज की जाएगी। आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से भी गर्भवती महिलाओं की निगरानी बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है। इसके अलावा नियमित स्वास्थ्य जांच शिविरों के आयोजन पर भी जोर दिया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मुद्दे पर मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने भी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि एनीमिया की समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता और यह सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के एनीमिया मुक्त भारत अभियान के तहत पहले से कई कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं और अब रीवा संभाग के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को प्रभावी कार्रवाई के निर्देश देने की बात कही है ताकि गर्भवती महिलाओं को समय पर उपचार और पोषण संबंधी सहायता मिल सके। केवल सरकारी योजनाओं से ही इस समस्या का समाधान संभव नहीं है, बल्कि समाज और परिवार की भागीदारी भी जरूरी है। किशोरावस्था से ही लड़कियों को संतुलित आहार, आयरन युक्त भोजन और स्वास्थ्य जांच के प्रति जागरूक करना होगा। यदि शुरुआती उम्र में ही खून की कमी पर नियंत्रण कर लिया जाए तो गर्भावस्था के दौरान गंभीर एनीमिया के मामलों में काफी कमी लाई जा सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>विंध्य/रीवा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 14:30:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मानसून में फंगल संक्रमण से बचाएगा एंटी-फंगल साबुन, त्वचा विशेषज्ञों ने दी जरूरी सलाह</title>
                                    <description><![CDATA[बारिश के मौसम में नमी और पसीने से बढ़ता है स्किन इंफेक्शन का खतरा, सही स्किनकेयर अपनाकर कई समस्याओं से बचा जा सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/anti-fungal-soap-will-protect-against-fungal-infection-in-monsoon-dermatologists/article-55857"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/monsoon-skin-care.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बारिश का मौसम गर्मी से राहत और हरियाली लेकर आता है, लेकिन इसी मौसम में त्वचा संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ जाती हैं। बढ़ी हुई नमी, लगातार पसीना आना और लंबे समय तक गीले कपड़े पहनकर रहने की आदत कई लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। त्वचा विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून में फंगल संक्रमण के मामले सामान्य दिनों की तुलना में अधिक देखने को मिलते हैं। ऐसे में एंटी-फंगल साबुन या बॉडी वॉश का इस्तेमाल त्वचा को सुरक्षित रखने में मददगार साबित हो सकता है। मानसून के दौरान वातावरण में नमी का स्तर काफी बढ़ जाता है। शरीर के जिन हिस्सों में हवा का प्रवाह कम होता है, वहां फंगस तेजी से पनप सकता है। बगल, गर्दन, जांघों के बीच का हिस्सा, पैर की उंगलियों के बीच की जगह और त्वचा की सिलवटें संक्रमण के लिए सबसे संवेदनशील मानी जाती हैं। शुरुआत में खुजली, लालिमा, जलन या छोटे चकत्तों के रूप में दिखने वाली यह समस्या समय के साथ गंभीर रूप ले सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल सामान्य साबुन से सफाई करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। एंटी-फंगल गुणों वाले साबुन में मौजूद तत्व संक्रमण पैदा करने वाले फंगस और बैक्टीरिया को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। बाजार में उपलब्ध कई उत्पादों में टी ट्री ऑयल, नीम, तुलसी और एलोवेरा जैसे प्राकृतिक तत्व शामिल होते हैं। टी ट्री ऑयल अपने एंटीसेप्टिक और एंटी-फंगल गुणों के लिए जाना जाता है, जबकि नीम त्वचा को संक्रमण से बचाने और खुजली कम करने में सहायक माना जाता है। बारिश के मौसम में सबसे बड़ी समस्या गीले कपड़ों और जूतों को लंबे समय तक पहने रखना है। ऑफिस, कॉलेज या यात्रा के दौरान भीगने के बाद कई लोग कपड़े नहीं बदलते, जिससे त्वचा लंबे समय तक नमी के संपर्क में रहती है। यही स्थिति फंगल संक्रमण के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। इसी तरह गीले मोजे और जूते पहनने से पैरों में संक्रमण, दुर्गंध और एथलीट फुट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉक्टर सलाह देते हैं कि बारिश में भीगने के बाद जल्द से जल्द सूखे कपड़े पहनने चाहिए। स्नान के दौरान एंटी-फंगल साबुन का उपयोग करना लाभकारी हो सकता है। नहाने के बाद शरीर को अच्छी तरह सुखाना भी बेहद जरूरी है। त्वचा पर बची थोड़ी सी नमी भी संक्रमण को बढ़ावा दे सकती है। खासतौर पर पैरों और त्वचा की सिलवटों को सूखा रखना चाहिए। मानसून में पसीना अधिक आने की समस्या भी आम है। पसीना और नमी मिलकर फंगस के विकास के लिए आदर्श स्थिति बनाते हैं। इसलिए इस मौसम में सूती कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है। सूती कपड़े पसीना आसानी से सोख लेते हैं और त्वचा को सांस लेने का मौका देते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना सही उत्पाद का चयन करना। तौलिया, कपड़े और जूते किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा नहीं करने चाहिए। यदि परिवार में किसी सदस्य को पहले से फंगल संक्रमण है तो उसकी निजी वस्तुओं के उपयोग से बचना चाहिए, ताकि संक्रमण दूसरों तक न फैले। बच्चों, बुजुर्गों और मधुमेह के मरीजों को मानसून में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। इन लोगों में संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत अधिक होता है। ऐसे में त्वचा की नियमित सफाई और उचित देखभाल बेहद जरूरी मानी जाती है। यदि खुजली, लाल चकत्ते, त्वचा का छिलना या जलन जैसी समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">संतुलित आहार भी त्वचा को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्याप्त पानी पीना, हरी सब्जियां और ताजे फल खाना शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है, जिसका सकारात्मक असर त्वचा पर भी दिखाई देता है।  मानसून में स्किनकेयर रूटीन में छोटे-छोटे बदलाव बड़े फायदे दे सकते हैं। एंटी-फंगल साबुन का इस्तेमाल, गीले कपड़ों से बचाव, नियमित सफाई और त्वचा को सूखा रखने जैसी आदतें फंगल संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकती हैं। इसलिए बारिश के मौसम में त्वचा की देखभाल को नजरअंदाज करने के बजाय उसे दैनिक दिनचर्या का जरूरी हिस्सा बनाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 17:42:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>100 साल तक स्वस्थ जीवन चाहते हैं? आज ही छोड़ दें ये 10 बुरी आदतें</title>
                                    <description><![CDATA[ कुछ आदतें बदलकर बढ़ाई जा सकती है उम्र और बेहतर बनाया जा सकता है स्वास्थ्य।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/if-you-want-a-healthy-life-for-100-years-leave/article-55757"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/longevity.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हर व्यक्ति लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहता है। केवल अच्छी चिकित्सा सुविधाएं या बेहतर जीन ही लंबी उम्र की गारंटी नहीं होते। हमारी रोजमर्रा की आदतें भी यह तय करती हैं कि हम कितने समय तक स्वस्थ, सक्रिय और ऊर्जावान बने रहेंगे। दुनिया के कई शोध बताते हैं कि कुछ सामान्य लेकिन नुकसानदायक आदतें समय के साथ शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती हैं। यदि आप भी 100 साल तक स्वस्थ जीवन जीने का सपना देखते हैं, तो इन 10 आदतों को छोड़ना आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1. अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड खाना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">प्रोसेस्ड और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में अक्सर अधिक मात्रा में नमक, चीनी, ट्रांस फैट और कृत्रिम रसायन होते हैं। लगातार ऐसे भोजन का सेवन मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकता है। विशेषज्ञ ताजा फल, सब्जियां, साबुत अनाज और घर का बना भोजन खाने की सलाह देते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>2. धूम्रपान करना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">धूम्रपान को दुनिया भर में समय से पहले मृत्यु के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। यह फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और सांस संबंधी कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। धूम्रपान छोड़ने के बाद शरीर धीरे-धीरे खुद को सुधारना शुरू कर देता है और स्वास्थ्य जोखिम कम होने लगते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>3. लंबे समय तक बैठे रहना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक जीवनशैली में घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना आम हो गया है। लेकिन लगातार बैठे रहने से मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञ हर 30 से 60 मिनट में कुछ देर टहलने या हल्की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>4. मन में नाराजगी और गुस्सा रखना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">किसी के प्रति लंबे समय तक गुस्सा या नाराजगी रखने से मानसिक तनाव बढ़ सकता है। इससे रक्तचाप बढ़ने, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। माफ करना और सकारात्मक सोच विकसित करना मानसिक शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>5. खुद को सामाजिक रूप से अलग रखना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">अकेलापन सिर्फ भावनात्मक नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि सामाजिक संबंध मजबूत होने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है और जीवन संतुष्टि बढ़ती है। परिवार, मित्रों और समुदाय से जुड़े रहना लंबी उम्र के लिए लाभदायक माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>6. यह सोचना कि केवल बड़े बदलाव ही मायने रखते हैं</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोग मानते हैं कि स्वास्थ्य सुधारने के लिए बड़े और कठिन बदलाव जरूरी हैं। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी-छोटी सकारात्मक आदतें भी समय के साथ बड़ा प्रभाव डाल सकती हैं। रोजाना 15 मिनट की वॉक, अतिरिक्त पानी पीना या जंक फूड कम करना भी महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>7. डर या लापरवाही के कारण स्वास्थ्य जांच से बचना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोग बीमारी के डर से नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं करवाते। कुछ लोग लक्षणों को नजरअंदाज करते रहते हैं। इससे कई बीमारियां गंभीर अवस्था में पहुंच जाती हैं। समय पर जांच और उपचार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मदद कर सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>8. पर्याप्त नींद नहीं लेना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नींद शरीर और मस्तिष्क की मरम्मत का सबसे महत्वपूर्ण समय होती है। लगातार कम नींद लेने से प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है और हृदय रोग, मोटापा तथा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। अधिकांश वयस्कों के लिए प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की नींद जरूरी मानी जाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>9. लगातार तनाव में रहना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">तनाव जीवन का हिस्सा है, लेकिन लगातार तनाव में रहना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। इससे रक्तचाप बढ़ सकता है, नींद प्रभावित हो सकती है और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। योग, ध्यान, व्यायाम और समय प्रबंधन जैसी तकनीकें तनाव कम करने में मददगार साबित हो सकती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>10. हर चीज के लिए जीन को जिम्मेदार ठहराना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बहुत से लोग मानते हैं कि उनकी सेहत पूरी तरह जीन पर निर्भर करती है। जीवनशैली और पर्यावरण भी स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव डालते हैं। स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम और सकारात्मक आदतें कई आनुवंशिक जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबी उम्र का कोई जादुई फार्मूला नहीं है। लेकिन संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण और मजबूत सामाजिक संबंध स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव बन सकते हैं। छोटी-छोटी अच्छी आदतें समय के साथ बड़े बदलाव लाती हैं और जीवन को अधिक खुशहाल व सक्रिय बना सकती हैं। स्वस्थ और लंबा जीवन जीने का लक्ष्य केवल वर्षों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि उन वर्षों को बेहतर स्वास्थ्य, ऊर्जा और मानसिक संतुलन के साथ जीना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि आप अपने भविष्य को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आज से ही इन 10 बुरी आदतों को छोड़ने की शुरुआत कर सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 16:51:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मऊगंज सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर, डॉक्टर गायब, कर्मचारी करते मिले इलाज</title>
                                    <description><![CDATA[वायरल वीडियो के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप, आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों को इंजेक्शन लगाने व दवाइयां देने के आरोप, अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/poor-arrangement-of-mauganj-civil-hospital-exposed-doctors-missing-staff/article-55718"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mauganj-civil-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के सिविल अस्पताल से सामने आई तस्वीरों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें डॉक्टरों की अनुपस्थिति के बीच आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने के आरोप सामने आए हैं। वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और पूरे मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि अस्पताल में इन दिनों मरीजों की संख्या लगातार बढ़ी हुई है। सुबह से लेकर दोपहर तक ओपीडी और वार्डों में मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। लेकिन इसी बीच कई डॉक्टरों के ड्यूटी पर मौजूद नहीं रहने की शिकायतें भी सामने आई हैं। मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, जबकि कई बार डॉक्टर अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं होते। ऐसे हालात में अस्पताल की व्यवस्था अन्य कर्मचारियों के भरोसे चलती दिखाई देती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वायरल वीडियो में कुछ ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। वीडियो में कथित तौर पर डॉक्टर के निजी सहायक मरीजों को देखते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं मल्टी स्किल्ड ग्रुप-डी के आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों को दवाइयां देते और इंजेक्शन लगाते दिखाई दे रहे हैं। यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि चिकित्सा से जुड़े ऐसे कार्य केवल प्रशिक्षित और अधिकृत स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा किए जाने चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अस्पताल की स्थिति को लेकर एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। वार्डों में मरीजों की संख्या क्षमता से अधिक होने के कारण कई बेड पर दो-दो मरीजों को भर्ती किए जाने की बात कही जा रही है। भीषण गर्मी के बीच मरीजों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाने की शिकायत भी सामने आई है। कुछ परिजनों का कहना है कि स्ट्रेचर और अन्य बुनियादी संसाधनों की कमी के कारण उन्हें मरीजों को खुद उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना पड़ता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वीडियो में एक बुजुर्ग मरीज को कुर्सी पर बैठाकर इंजेक्शन लगाया जाता दिखाई देता है। आरोप है कि इंजेक्शन लगाने वाला व्यक्ति प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का सदस्य नहीं था। वीडियो में कई बार सुई लगाने की कोशिश होती दिखती है, जिससे मरीज को असुविधा होती नजर आती है। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं और तेज कर दी हैं। कई लोगों ने इसे मरीजों की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मरीजों के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में पहले भी डॉक्टरों और स्टाफ की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों का कहना है कि यदि प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभा रहा होता, तो गैर-चिकित्सकीय कर्मचारियों को इस तरह की भूमिका निभाने की जरूरत नहीं पड़ती। मरीजों को दवा देना, इंजेक्शन लगाना और उपचार से जुड़े अन्य कार्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इन कार्यों के लिए उचित प्रशिक्षण और चिकित्सकीय योग्यता आवश्यक होती है। यदि इन प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की चूक होती है तो मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि अस्पतालों में जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वीडियो वायरल होने के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही अस्पताल में डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी अस्पतालों में संसाधनों, मानवबल और जवाबदेही की स्थिति पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सरकारी अस्पताल ही इलाज का प्रमुख माध्यम होते हैं। ऐसे में यदि वहां भी आवश्यक चिकित्सा सेवाएं समय पर उपलब्ध नहीं हों तो मरीजों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। वायरल वीडियो की जांच और तथ्यों की पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मामले की समीक्षा किए जाने की बात कही जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:00:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>डायबिटीज मरीजों के लिए क्यों खास है जामुन? ब्लड शुगर कंट्रोल से लेकर दिल की सेहत तक पहुंचाता फायदे</title>
                                    <description><![CDATA[कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स, एंटीऑक्सीडेंट्स और प्राकृतिक यौगिकों से भरपूर जामुन को विशेषज्ञ मधुमेह नियंत्रण में सहायक मानते हैं, लेकिन इसे दवा का विकल्प नहीं माना जाता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/6a2aa41c675a5/article-55674"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jamun-benefits.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गर्मियों के मौसम में बाजारों में नजर आने वाला जामुन केवल स्वाद और ताजगी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने कई स्वास्थ्य लाभों के कारण भी लोगों के बीच लोकप्रिय है। गहरे बैंगनी रंग का यह फल वर्षों से आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। खासतौर पर डायबिटीज यानी मधुमेह के मरीजों के लिए जामुन को काफी फायदेमंद माना जाता है। जामुन में मौजूद कई प्राकृतिक तत्व रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं, हालांकि इसे किसी भी स्थिति में दवा का विकल्प नहीं समझना चाहिए। डायबिटीज आज दुनिया भर में तेजी से बढ़ने वाली बीमारियों में शामिल है। बदलती जीवनशैली, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में ऐसे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है जो प्राकृतिक रूप से ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकें। जामुन उन्हीं फलों में से एक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन का सबसे महत्वपूर्ण गुण इसका कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स है। ग्लाइसेमिक इंडेक्स यह बताता है कि कोई खाद्य पदार्थ शरीर में जाकर रक्त शर्करा को कितनी तेजी से बढ़ाता है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे पचते हैं और ब्लड शुगर में अचानक वृद्धि नहीं होने देते। यही कारण है कि जामुन को मधुमेह रोगियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित फल माना जाता है। जामुन में जंबोलिन और जंबोसिन जैसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं। कई शोधों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इन तत्वों को ब्लड शुगर नियंत्रण से जोड़ा गया है। माना जाता है कि ये यौगिक शरीर में कार्बोहाइड्रेट के ग्लूकोज में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं। इससे रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित रखने में सहायता मिल सकती है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ये तत्व इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स भी इसे स्वास्थ्य के लिए बेहद उपयोगी बनाते हैं। इसका गहरा बैंगनी रंग एंथोसायनिन नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट के कारण होता है। डायबिटीज के मरीजों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन की समस्या अधिक देखी जाती है। एंटीऑक्सीडेंट शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं और कई दीर्घकालिक बीमारियों के जोखिम को कम कर सकते हैं। जामुन का नियमित और संतुलित सेवन शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में योगदान दे सकता है। केवल जामुन का फल ही नहीं, बल्कि इसके बीज भी काफी उपयोगी माने जाते हैं। आयुर्वेद में जामुन के बीजों का विशेष महत्व बताया गया है। बीजों को सुखाकर तैयार किया गया पाउडर कई लोग ब्लड शुगर नियंत्रण के लिए इस्तेमाल करते हैं। माना जाता है कि सीमित मात्रा में इसका सेवन उपवास के दौरान बढ़े हुए शुगर स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है। हालांकि डॉक्टरों की सलाह के बिना किसी भी हर्बल उत्पाद का नियमित उपयोग नहीं करना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन का फायदा केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं है। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। फाइबर लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराता है, जिससे बार-बार भूख लगने की समस्या कम हो सकती है। यही वजह है कि वजन नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए भी जामुन एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इसके अलावा जामुन में पोटैशियम, आयरन और विटामिन सी जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। पोटैशियम रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जबकि आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाए रखने में सहायक माना जाता है। विटामिन सी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है और शरीर में आयरन के अवशोषण को बेहतर करने में मदद करता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हृदय स्वास्थ्य के लिहाज से भी जामुन को लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं। चूंकि डायबिटीज और हृदय रोगों का आपस में गहरा संबंध होता है, इसलिए ऐसे खाद्य पदार्थों का महत्व और बढ़ जाता है जो दोनों स्थितियों में लाभ पहुंचा सकें। जामुन का सेवन संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर मौसम के दौरान प्रतिदिन 8 से 10 ताजे जामुन खाना पर्याप्त माना जाता है। इसे सुबह और दोपहर के भोजन के बीच या शाम के हल्के नाश्ते के रूप में खाया जा सकता है। वहीं बीजों के पाउडर का सेवन करने से पहले डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">केवल जामुन खाने से डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकती। इसके लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी जरूरी है। जामुन को एक सहायक खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाना चाहिए, जो स्वस्थ जीवनशैली को और बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। गर्मियों में उपलब्ध यह छोटा सा फल स्वाद के साथ-साथ कई स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करता है। यही वजह है कि जामुन को प्राकृतिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक फलों की श्रेणी में शामिल किया जाता है और विशेषज्ञ भी इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाने की सलाह देते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:53:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंदौर में आवारा कुत्ते का आतंक</title>
                                    <description><![CDATA[बाणगंगा और सांवेर रोड क्षेत्र में एक खूंखार आवारा कुत्ते ने मचाया आतंक, अस्पताल से लेकर गांव और कॉलेज तक लोगों पर हमला, नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/stray-dog-terror-in-indore/article-55078"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indore-dog-attack.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंदौर शहर में शुक्रवार को एक ऐसी घटना सामने आई जिसने लोगों को दहशत में डाल दिया। शहर के बाणगंगा क्षेत्र और सांवेर रोड इलाके में एक आवारा कुत्ते ने महज 10 घंटे के भीतर 42 लोगों को काटकर घायल कर दिया। घायलों में दो महिला डॉक्टर, नर्स, अस्पताल कर्मचारी, सुरक्षा गार्ड, छात्र और ग्रामीण शामिल बताए जा रहे हैं। घटना के बाद पूरे इलाके में भय का माहौल बन गया और लोग अपने घरों से निकलने में भी सतर्कता बरतते नजर आए। सबसे अधिक चिंता की बात यह रही कि कुत्ते का आतंक अस्पताल परिसर से शुरू होकर गांवों और शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंच गया। लगभग आठ किलोमीटर के दायरे में हुए हमलों ने प्रशासन और नगर निगम की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रारंभिक जानकारी के अनुसार यह सिलसिला शुक्रवार सुबह करीब 9 बजे शुरू हुआ। बताया जा रहा है कि आवारा कुत्ता सबसे पहले अरबिंदो अस्पताल परिसर में पहुंचा। यहां उसने अचानक लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। अस्पताल परिसर में मौजूद मरीज, उनके परिजन, नर्सिंग स्टाफ, डॉक्टर और सुरक्षा कर्मी उसके निशाने पर आ गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुत्ता बेहद आक्रामक व्यवहार कर रहा था और सामने आने वाले हर व्यक्ति पर झपट रहा था। कुछ ही देर में अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई। लोग खुद को बचाने के लिए इधर-उधर भागते दिखाई दिए। कई लोग कमरों और भवनों के भीतर छिप गए जबकि कुछ ने डंडों और अन्य वस्तुओं की मदद से खुद का बचाव करने की कोशिश की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अस्पताल में हमला करने के बाद कुत्ता कैंसर अस्पताल की दिशा में पहुंचा और वहां भी कई लोगों को घायल कर दिया। हमले में दो महिला डॉक्टरों के साथ नर्सें, मरीज, मेडिकल छात्र और अटेंडर्स भी शामिल बताए जा रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अस्पताल प्रशासन को तत्काल चिकित्सा सहायता की व्यवस्था बढ़ानी पड़ी। घायल लोगों को तुरंत एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगाए गए और जिन मरीजों के घाव गंभीर श्रेणी के पाए गए, उन्हें विशेष जीवन रक्षक सीरम भी दिया गया। अस्पताल सूत्रों के अनुसार कई घायलों की स्थिति स्थिर है, लेकिन उन्हें निगरानी में रखा गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अस्पताल क्षेत्र से निकलने के बाद यह कुत्ता ग्राम बरदरी और रेवती रेंज की ओर पहुंच गया। यहां उसने ग्रामीणों पर हमला किया और कई लोगों को घायल कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार नगर निगम और संबंधित विभागों को आवारा कुत्तों की समस्या के बारे में सूचना दी थी, लेकिन समय रहते कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। हालात ऐसे बन गए कि लोगों को खुद ही लाठियां लेकर कुत्ते से बचाव करना पड़ा। कई जगह ग्रामीण समूह बनाकर निगरानी करते रहे ताकि बच्चों और बुजुर्गों को सुरक्षित रखा जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटना यहीं नहीं रुकी। बताया जा रहा है कि कुत्ता करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित रेनेसां कॉलेज परिसर तक पहुंच गया, जहां उसने तीन अन्य लोगों को घायल कर दिया। कॉलेज परिसर में अचानक हुए हमले के बाद छात्रों के बीच भी दहशत फैल गई। कुछ समय के लिए परिसर में सामान्य गतिविधियां प्रभावित हुईं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार किसी को समझ नहीं आ रहा था कि कुत्ता किस दिशा से आएगा और किस पर हमला करेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटना के बाद नगर निगम की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों और पीड़ितों का आरोप है कि समय पर कार्रवाई होती तो इतने लोग घायल नहीं होते। देर शाम नगर निगम की डॉग स्क्वाड टीम सक्रिय हुई और अरबिंदो अस्पताल तथा आसपास के क्षेत्रों में अभियान चलाया गया। अधिकारियों के अनुसार कुल 23 आवारा कुत्तों को पकड़कर सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है ताकि आगे किसी प्रकार की घटना न हो। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि हमला करने वाला वही कुत्ता इनमें शामिल है या नहीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस घटना के बीच हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आवारा कुत्तों को लेकर की गई टिप्पणी भी चर्चा में है। सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ सप्ताह पहले कहा था कि देशभर में बढ़ रही डॉग बाइट की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्थानीय निकायों को नसबंदी, टीकाकरण और शेल्टर होम की व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। न्यायालय ने यह भी कहा था कि रेबीज संक्रमित कुत्तों को खुले में वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए। बावजूद इसके कई शहरों में इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इंदौर की यह घटना एक बार फिर शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आवारा कुत्तों की समस्या को सामने लेकर आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रेस्क्यू अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दीर्घकालिक समाधान के लिए नसबंदी, टीकाकरण और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना होगा। शहर में घायल लोगों का इलाज जारी है और प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। वहीं स्थानीय लोग उम्मीद कर रहे हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 12:45:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ में आज 18 हजार मेडिकल स्टोर रहेंगे बंद, ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ हड़ताल</title>
                                    <description><![CDATA[ऑनलाइन दवा बिक्री के विरोध में छत्तीसगढ़ के 18 हजार मेडिकल स्टोर बंद। केमिस्ट हड़ताल को CAIT और चेंबर ऑफ कॉमर्स का समर्थन मिला।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/18-thousand-medical-stores-will-remain-closed-today-in-chhattisgarh/article-53817"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/chhattisgarh-raipur-medical-stores-strike.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बुधवार को छत्तीसगढ़ में ऑनलाइन दवा बिक्री के खिलाफ हड़ताल का असर देखा जा रहा है। राज्य के लगभग 18 हजार मेडिकल स्टोर बंद हैं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें थोक और रिटेल दोनों तरह की दुकानें शामिल हैं। राजधानी रायपुर में तो 3 हजार से ज्यादा स्टोर बंद रहने की खबर है। केमिस्ट संगठनों का कहना है कि ऑनलाइन कंपनियां भारी छूट देकर स्थानीय मेडिकल स्टोर्स को नुकसान पहुंचा रही हैं। इसी मुद्दे पर देशभर में यह हड़ताल की जा रही है। छत्तीसगढ़ में चेंबर ऑफ कॉमर्स</span>, CAIT <span lang="hi" xml:lang="hi">और कांग्रेस के चिकित्सा प्रकोष्ठ ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है। सुबह से कई इलाकों में मेडिकल दुकानें बंद नजर आईं और दवा कारोबारी प्रदर्शन करते दिखे।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दवा व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में ऑनलाइन दवा कंपनियों का कारोबार तेजी से बढ़ा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे छोटे और मध्यम स्तर के मेडिकल स्टोर्स पर सीधा असर पड़ा है। डिस्ट्रिक्ट केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय कृपलानी ने बताया कि ऑनलाइन कंपनियां भारी छूट देकर बाजार को बिगाड़ रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और छोटे दुकानदार इस मुकाबले में नहीं टिक पा रहे हैं। </span>CAIT <span lang="hi" xml:lang="hi">के राष्ट्रीय वाइस चेयरमैन अमर पारवानी ने भी हड़ताल के संदर्भ में कहा कि यह केवल दवा व्यापार का मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्थानीय बाजार व्यवस्था और छोटे कारोबारियों के अस्तित्व से जुड़ा है। कांग्रेस चिकित्सा प्रकोष्ठ ने भी सरकार से इस मसले पर ठोस कदम उठाने की मांग की है। प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता ने बताया कि विदेशी और बड़ी ऑनलाइन कंपनियों की वजह से स्थानीय कारोबार प्रभावित हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हड़ताल को देखते हुए खाद्य एवं औषधि प्रशासन अलर्ट मोड पर है। अधिकारियों ने कहा है कि मरीजों को जरूरी दवाओं की कमी नहीं होने दी जाएगी। इसके लिए सरकारी जनऔषधि केंद्र</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन्वंतरी मेडिकल स्टोर्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी अस्पताल और कुछ अन्य मेडिकल सुविधाएं तैयार रखी गई हैं। प्रशासन ने केमिस्ट एसोसिएशन से भी अनुरोध किया है कि गंभीर मरीजों और नियमित दवा लेने वालों की परेशानी का ख्याल रखा जाए। लोगों से भी अपील की गई है कि वे ज़रूरत से ज्यादा दवाइयां जमा न करें। अधिकारियों का कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरत पर अतिरिक्त इंतजाम किए जाएंगे। हालाँकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हड़ताल के कारण कई शहरों में मरीजों और उनके परिजनों को दवाइयों के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। खासकर सुबह के समय कई लोगों ने बंद मेडिकल स्टोर्स देखकर वापस लौटते हुए देखा गया। फिलहाल दवा कारोबारी कहते हैं कि जब तक ऑनलाइन दवा बिक्री पर स्पष्ट और सख्त नीति नहीं बनाई जाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका विरोध जारी रहेगा।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 May 2026 11:05:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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