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                <title>global economy - दैनिक जागरण</title>
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                <title>प्रधानमंत्री मोदी अगले सप्ताह करेंगे न्यूजीलैंड की पहली आधिकारिक यात्रा, द्विपक्षीय संबंधों को मिलेगी नई गति</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले सप्ताह पहली बार आधिकारिक दौरे पर न्यूजीलैंड जाएंगे। यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के क्रियान्वयन और आर्थिक सहयोग को नई दिशा देने पर व्यापक चर्चा होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/prime-minister-modi-will-make-his-first-official-visit-to/article-57766"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/pm-modi-new-zealand-visit.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">भारत और न्यूजीलैंड के संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले सप्ताह अपनी पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा पर जाएंगे। इस यात्रा की घोषणा न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का दौरा दोनों देशों के रणनीतिक, आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण साबित होगा। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी बयान में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार आधिकारिक दौरे पर न्यूजीलैंड आ रहे हैं। उन्होंने इस यात्रा को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और मजबूत होते सहयोग का प्रतीक बताया।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा अप्रैल 2026 में भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement-FTA) के बाद पहला बड़ा उच्चस्तरीय दौरा होगी। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, सेवा क्षेत्र, कृषि, शिक्षा, पर्यटन और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देना है। दोनों देशों की सरकारों का मानना है कि इस समझौते से व्यापारिक बाधाएं कम होंगी और कंपनियों के लिए नए अवसर खुलेंगे। साथ ही निवेश बढ़ाने और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की भी उम्मीद है।</p>
<p class="isSelectedEnd">न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और न्यूजीलैंड की आर्थिक समृद्धि के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण साझेदार है। उन्होंने कहा कि मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने से न्यूजीलैंड के उत्पादों और सेवाओं को 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले भारतीय बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी। इससे निर्यात बढ़ेगा, नए रोजगार पैदा होंगे और न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">न्यूजीलैंड सरकार ने अगले 15 वर्षों में भारत में लगभग 20 अरब डॉलर तक का निवेश बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस निवेश को सुगम बनाने के लिए भारत सरकार ने न्यूजीलैंड के निवेशकों के लिए विशेष "सिंगल डेस्क" या "वन-स्टॉप सुविधा" स्थापित करने पर सहमति दी है। इस व्यवस्था के तहत निवेश से जुड़े अनुमोदनों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को तेज़ी से पूरा किया जाएगा, जिससे दोनों देशों के निवेशकों को आसानी होगी। न्यूजीलैंड के व्यापार एवं निवेश मंत्री टॉड मैक्ले ने पहले भी कहा था कि भारत में निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार हो रहा है और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। इसमें कृषि उत्पादकता, निवेश, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (MSME), महिला उद्यमिता, खेल, पर्यटन, शिक्षा, कौशल विकास और प्रतिभा आदान-प्रदान जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसके अलावा दोनों देश छात्रों, शोधकर्ताओं और कुशल पेशेवरों के लिए भी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे। इससे दोनों देशों के युवाओं को शिक्षा और रोजगार के नए अवसर मिलने की संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd">दोनों देशों के बीच होने वाला सहयोग कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देगा। न्यूजीलैंड डेयरी, पशुपालन और आधुनिक कृषि तकनीकों के लिए विश्वभर में जाना जाता है, जबकि भारत कृषि उत्पादन और विशाल उपभोक्ता बाजार के कारण एक महत्वपूर्ण साझेदार है। सेवा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, पर्यटन और खेल सहयोग भी इस यात्रा के प्रमुख एजेंडों में शामिल रहने की संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत और न्यूजीलैंड के बीच पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, मुक्त व्यापार और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर भी साझा दृष्टिकोण रखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक, व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों के साथ चर्चा और कई महत्वपूर्ण समझौतों पर आगे की कार्ययोजना तय होने की उम्मीद है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। मुक्त व्यापार समझौते के बाद यह दौरा आर्थिक सहयोग, निवेश, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क को नई गति देने का अवसर प्रदान करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 12:30:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>जेट फ्यूल महंगा होने से हवाई यात्रा पर असर, किराए बढ़ने के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[मैकिंजी की रिपोर्ट में दावा, वैश्विक सप्लाई दबाव और बढ़ती ईंधन लागत के चलते आने वाले महीनों में एयर टिकट 25% तक महंगे हो सकते हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/6a3ccd1c3b033/article-56883"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/air-travel-cost.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आने वाले समय में हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों को अपनी जेब कुछ ज्यादा ढीली करनी पड़ सकती है। वैश्विक कंसल्टिंग फर्म मैकिंजी की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के कारण एयर टिकटों के दाम में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कई हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव, रिफाइनरियों की सीमित उत्पादन क्षमता और ईंधन भंडारों को फिर से भरने की कोशिशों ने जेट फ्यूल बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका सीधा असर एयरलाइंस कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है और यदि हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो इसका बोझ यात्रियों तक पहुंच सकता है। एविएशन इंडस्ट्री में ईंधन सबसे बड़ा खर्च माना जाता है। आमतौर पर किसी भी हवाई टिकट की कुल कीमत में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा केवल फ्यूल कॉस्ट का होता है। ऐसे में जेट फ्यूल के दाम बढ़ने का असर एयरलाइंस के परिचालन खर्च पर तुरंत दिखाई देता है। एयरलाइंस कंपनियां लगातार बढ़ती लागत को लंबे समय तक खुद वहन नहीं कर सकतीं, इसलिए अंततः किराए में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों को लेकर होने वाला हर बदलाव एयर ट्रैवल सेक्टर के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मैकिंजी की रिपोर्ट में ‘क्रैक स्प्रेड’ को भी प्रमुख कारण बताया गया है। क्रैक स्प्रेड वह अंतर होता है जो कच्चे तेल और उससे तैयार होने वाले रिफाइंड उत्पादों की कीमतों के बीच होता है। सामान्य परिस्थितियों में जेट फ्यूल का क्रैक स्प्रेड 20 डॉलर प्रति बैरल या उससे कम रहता है। हालांकि रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2026 के दौरान यह औसतन 50 डॉलर प्रति बैरल से अधिक तक पहुंच सकता है। यदि ऐसा होता है तो एयरलाइंस कंपनियों के लिए ईंधन खरीदना काफी महंगा हो जाएगा और परिचालन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। खाड़ी क्षेत्र और प्रमुख एशियाई देशों से जेट फ्यूल की आपूर्ति में कमी भी बाजार को प्रभावित कर रही है। वैश्विक जेट फ्यूल सप्लाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों से आता है। हाल के महीनों में कई देशों ने अपने रणनीतिक ईंधन भंडार को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात पर सीमित नियंत्रण लगाए हैं। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध आपूर्ति घट गई है। भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की नीतियों का असर भी वैश्विक ईंधन व्यापार पर पड़ता है, क्योंकि ये देश ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मौजूदा स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कई बड़ी रिफाइनरियां पहले से ही अपनी अधिकतम क्षमता के करीब काम कर रही हैं। ऐसे में मांग बढ़ने पर उत्पादन को तुरंत बढ़ा पाना आसान नहीं है। सप्लाई और मांग के बीच पैदा हो रहा यह असंतुलन कीमतों को ऊपर बनाए रख सकता है। फिलहाल कई देशों और कंपनियों द्वारा पुराने ईंधन भंडार का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि बाजार में तत्काल कमी न दिखाई दे, लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं मानी जा रही। हालांकि बाजार में कुछ राहत के संकेत भी दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य होने से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के दाम हाल के दिनों में नीचे आए हैं, जिससे ऊर्जा क्षेत्र को कुछ राहत मिली है। जानकारों का मानना है कि यदि तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है और बड़े भू-राजनीतिक संकट नहीं उभरते हैं तो जेट फ्यूल की कीमतों पर दबाव कुछ कम हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके बावजूद विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि केवल कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। जेट फ्यूल की कीमतें केवल क्रूड ऑयल पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि रिफाइनिंग क्षमता, लॉजिस्टिक्स, भंडारण और वैश्विक मांग जैसे कई कारकों से प्रभावित होती हैं। इसलिए निकट भविष्य में कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना बनी हुई है। एयरलाइंस कंपनियां भी बाजार की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और लागत प्रबंधन के लिए अलग-अलग रणनीतियों पर काम कर रही हैं। भारत जैसे तेजी से बढ़ते एविएशन बाजार के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देश में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि एयर टिकट महंगे होते हैं तो इसका असर पर्यटन, व्यापारिक यात्राओं और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। खासतौर पर त्योहारी सीजन और छुट्टियों के दौरान यात्रा की योजना बनाने वाले लोगों को अधिक खर्च का सामना करना पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 12:16:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरान जंग के बीच वैश्विक तेल संकट गहराया, 115 करोड़ बैरल सप्लाई गायब</title>
                                    <description><![CDATA[होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी पूरी तरह राहत नहीं, तेल भंडार 36 साल के निचले स्तर पर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/global-oil-crisis-deepens-amid-iran-war-115-crore-barrel/article-56437"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/iran-oil-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दुनिया के ऊर्जा बाजार में ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच बड़ा झटका सामने आया है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले चार महीनों में वैश्विक तेल सप्लाई से करीब 115 करोड़ बैरल कच्चा तेल गायब हो गया है। यह आंकड़ा एनालिटिक्स फर्म केपलर की रिपोर्ट में सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुलने के बाद बाजार में थोड़ी राहत जरूर देखी गई है, लेकिन स्थिति अभी भी सामान्य नहीं मानी जा रही है। मिडिल ईस्ट में युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति लगभग बाधित रही, जिससे दुनिया के रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार पर भारी दबाव पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान करीब 19 करोड़ बैरल तेल स्टॉक से निकाल लिया गया, जिससे वैश्विक रिजर्व तेजी से घटे हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक स्ट्रेटजिक रिजर्व 1990 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जबकि अमेरिका का इमरजेंसी रिजर्व 43 साल के न्यूनतम स्तर पर दर्ज किया गया है। हालात इतने गंभीर रहे कि कई देशों को अपने दैनिक ईंधन उपयोग को संतुलित करने के लिए आपातकालीन खरीदारी करनी पड़ी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में वर्साय में G7 बैठक के दौरान कहा कि अगर युद्ध लंबा चलता, तो अमेरिका के तेल भंडार करीब चार हफ्तों में खत्म हो जाते। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान के साथ समझौते के बाद स्थिति नियंत्रण में आई है, लेकिन अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बयान ऊर्जा संकट की गंभीरता को दर्शाता है, क्योंकि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तेल आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भर हैं। सीजफायर और समझौते के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। युद्ध के दौरान जहां कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, वहीं अब यह 80 डॉलर से नीचे आ चुकी हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट केवल अस्थायी राहत है, क्योंकि सप्लाई चेन अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हुई है। समुद्री रास्तों से संभावित बारूदी खतरे हटाने, खाली टैंकरों की वापसी और उत्पादन सामान्य करने में अभी लंबा समय लग सकता है। बाजार फिलहाल जरूरत से ज्यादा आशावादी हो गया है। RBC कैपिटल मार्केट्स की विश्लेषक हेलिमा क्रॉफ्ट का कहना है कि संकट खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी, क्योंकि तेल आपूर्ति को सामान्य स्थिति में आने में कई महीनों का समय लग सकता है। वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल एडवाइजर्स के CEO जे हैटफील्ड का मानना है कि OPEC देश उत्पादन बढ़ाकर बाजार में स्थिरता ला सकते हैं, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मैक्वेरी ग्रुप के ग्लोबल ऑयल एंड गैस स्ट्रैटेजिस्ट विकास द्विवेदी के अनुसार युद्ध से पहले दुनिया के पास पर्याप्त तेल स्टॉक था, इसी कारण इतनी बड़ी सप्लाई बाधा के बावजूद बाजार पूरी तरह नहीं टूटा। उन्होंने यह भी बताया कि डीजल और पेट्रोल के भंडार में गिरावट जरूर आई है, लेकिन स्थिति अभी नियंत्रण में है और आने वाले हफ्तों में सप्लाई चैन में सुधार देखा जा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में इस समय प्रतिदिन लगभग 10.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन हो रहा है। इसमें अमेरिका, सऊदी अरब, रूस, कनाडा और इराक जैसे देश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जो मिलकर वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा देते हैं। ऐसे में इन देशों में किसी भी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या युद्ध सीधे तौर पर वैश्विक बाजार और ईंधन कीमतों को प्रभावित करती है। युद्ध के दौरान गायब हुए 115 करोड़ बैरल तेल की भरपाई आसान नहीं होगी। यदि उत्पादन मांग से 50 लाख बैरल प्रतिदिन अधिक भी बढ़ाया जाए, तब भी इस कमी को पूरा करने में लगभग एक साल का समय लग सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:24:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>G7 शिखर सम्मेलन में बोले प्रधानमंत्री मोदी, संतुलित और समावेशी विकास के लिए वैश्विक साझेदारी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[फ्रांस के एवियन में आयोजित G7 समिट के आउटरीच सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ के हितों की जोरदार पैरवी की। उन्होंने IMPACT पहल, वैश्विक कौशल साझेदारी और विकासशील देशों के लिए आर्थिक सुरक्षा तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/prime-minister-modi-said-in-g7-summit-that-global-partnership/article-56292"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/narendra-modi-(2).jpg" alt=""></a><br /><p>फ्रांस के एवियन में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के सामने साझा, संतुलित और टिकाऊ आर्थिक विकास का विजन प्रस्तुत किया। “Reviving a Balanced, Shared and Sustainable Economic Growth for All” विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जब दुनिया अनिश्चितताओं, संघर्षों और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है, तब विकास का अर्थ केवल GDP वृद्धि या व्यापारिक आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए। विकास का वास्तविक उद्देश्य लोगों का कल्याण, समावेशिता और अवसरों की समान उपलब्धता होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने पिछले वर्षों में समावेशी विकास का जो मॉडल अपनाया है, वह “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के सिद्धांत पर आधारित है। इसी सोच के कारण भारत ने करोड़ों लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में सफलता हासिल की है। उन्होंने कहा कि यही दृष्टिकोण भारत की अंतरराष्ट्रीय नीतियों में भी दिखाई देता है और G20 की अध्यक्षता के दौरान “One Earth, One Family, One Future” का संदेश इसी सोच का विस्तार था।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए देशों के बीच सहयोग, विश्वास और साझेदारी आवश्यक है। उन्होंने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह परियोजना केवल एक परिवहन या व्यापार मार्ग नहीं है, बल्कि यह निवेश, रोजगार, नवाचार और मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण का माध्यम बनेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसे और भी संपर्क एवं व्यापार गलियारों की आवश्यकता है, जो विभिन्न क्षेत्रों को आर्थिक रूप से जोड़ सकें। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ के देशों की चुनौतियों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और भू-राजनीतिक संकटों का सबसे अधिक असर विकासशील देशों पर पड़ता है। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, ईंधन कीमतों और निवेश पर पड़ने वाले प्रभाव का बोझ अक्सर गरीब और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को उठाना पड़ता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह इन देशों को अकेला न छोड़े। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से अपील की कि वे ऐसे सहायता तंत्र विकसित करें जो विकासशील देशों को आर्थिक झटकों से उबरने और उनकी आर्थिक मजबूती बनाए रखने में मदद कर सकें। उन्होंने कहा कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था तभी टिकाऊ होगी, जब कमजोर देशों को भी समान अवसर और सुरक्षा मिलेगी।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने एक नई पहल “International Mobilization Partnership for Accelerating Connectivity and Trade” यानी IMPACT का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने बताया कि इस पहल के माध्यम से G7 देशों की पूंजी, भारत की प्रतिभा और ग्लोबल साउथ के देशों की भागीदारी को एक मंच पर लाया जा सकता है। इसका उद्देश्य संपर्क, व्यापार, तकनीक और ऊर्जा के क्षेत्र में नए अवसर पैदा करना होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि IMEC की तर्ज पर अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत द्वीपीय देशों को जोड़ने वाली नई परियोजनाओं पर भी काम किया जाना चाहिए। इससे विकासशील क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी और वैश्विक स्तर पर संतुलित विकास को बढ़ावा मिलेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी परियोजनाओं में स्थानीय स्वामित्व, पारदर्शी वित्तपोषण और दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रधानमंत्री ने विकसित देशों के सामने मौजूद जनसंख्या संबंधी चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कई विकसित देश वृद्ध होती आबादी की समस्या का सामना कर रहे हैं, जबकि भारत और ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के पास युवा प्रतिभा, कौशल और उद्यमशीलता की अपार क्षमता है। इस प्राकृतिक पूरकता का लाभ उठाने के लिए उन्होंने “Global Skills Partnership” स्थापित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इस साझेदारी के तहत देशों के बीच कौशल मानचित्रण, प्रशिक्षण और विश्वसनीय कुशल मानव संसाधन की आवाजाही को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे विकसित देशों को आवश्यक कार्यबल मिलेगा और विकासशील देशों के युवाओं को वैश्विक अवसर प्राप्त होंगे। प्रधानमंत्री ने इसे भविष्य की आर्थिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बताया।</p>
<p>अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की आर्थिक नीतियों और वैश्विक व्यापार के प्रति प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ने G7 देशों सहित दुनिया के कई प्रमुख देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत संरक्षणवाद की बजाय साझेदारी और एकीकरण में विश्वास रखता है। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य केवल अपनी आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक स्थिर, भरोसेमंद और समृद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि यदि दुनिया सहयोग, विश्वास और साझा विकास के सिद्धांतों पर आगे बढ़ेगी तो आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत, समावेशी और टिकाऊ बन सकेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 15:04:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>G7 में पीएम मोदी का बयान, वैश्विक संकटों का बोझ अकेले न उठाए ग्लोबल साउथ</title>
                                    <description><![CDATA[ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति संकट पर चिंता जताई, स्किल पार्टनरशिप और IMPACT ढांचे का दिया प्रस्ताव]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pm-modis-statement-in-g7-global-south-should-not-bear/article-56252"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/pm-modi-g7-speech-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G7 आउटरीच सत्र में वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूती से उठाते हुए कहा कि दुनिया में चल रहे संकटों का बोझ केवल विकासशील देशों पर नहीं डाला जा सकता। उन्होंने खास तौर पर पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक आपूर्ति श्रृंखलाओं का जिक्र किया और कहा कि इन व्यवधानों का असर लंबे समय तक कमजोर देशों पर पड़ता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी बनती है कि वह सुनिश्चित करे कि संवेदनशील और विकासशील देश अकेले इन संकटों का भार न उठाएं। पीएम मोदी ने साझा और संतुलित विकास पर बोलते हुए कहा कि आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां सप्लाई चेन में अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ता है, जो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि वैश्विक एकजुटता को मजबूत करना है तो सबसे कमजोर देशों को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने वैश्विक कौशल साझेदारी (Global Skills Partnership) का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों में प्रतिभा और उद्यमिता की कोई कमी नहीं है, लेकिन उसे सही अवसर और वैश्विक मंच की जरूरत है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्किल मैपिंग और भरोसेमंद स्किल मोबिलिटी को बढ़ावा देने की बात कही, जिससे विकसित देशों की उम्रदराज होती आबादी और विकासशील देशों की युवा शक्ति के बीच संतुलन बनाया जा सके। पीएम मोदी ने इसके साथ ही IMPACT यानी “International Mobilisation Partnership for Accelerating Connectivity and Trade” ढांचे का भी सुझाव दिया। इस पहल का उद्देश्य व्यापार, तकनीक और ऊर्जा के नए कॉरिडोर विकसित करना है, जिसमें G7 देशों की पूंजी, भारत की प्रतिभा और ग्लोबल साउथ की भागीदारी को जोड़ा जा सके। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहलें स्थानीय स्वामित्व, पारदर्शी वित्तपोषण और दीर्घकालिक स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए ताकि वास्तविक विकास संभव हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह के कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को और आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत द्वीप क्षेत्रों के साथ भी इसी तरह की कनेक्टिविटी योजनाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे न केवल व्यापार को बढ़ावा मिलेगा बल्कि रोजगार, निवेश और नवाचार के नए अवसर भी पैदा होंगे। अपने संबोधन में पीएम मोदी ने यह भी कहा कि भारत की वैश्विक आर्थिक नीति केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीनी स्तर पर दिखाई देती है। उन्होंने बताया कि भारत ने G7 में शामिल कई देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं, जो इस बात का संकेत है कि भारत संरक्षणवाद की बजाय साझेदारी और एकीकरण में विश्वास रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज दुनिया दो बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है—एक तरफ विकसित देशों में उम्रदराज आबादी की समस्या है, तो दूसरी तरफ विकासशील देशों में युवा और कुशल जनशक्ति की प्रचुरता है। इस असंतुलन को अवसर में बदलने की जरूरत है। इसी के तहत उन्होंने एक ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप की परिकल्पना रखी, जिससे देशों के बीच कौशल का आदान-प्रदान और भरोसेमंद श्रम गतिशीलता को बढ़ावा दिया जा सके। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत हमेशा से वैश्विक सहयोग और साझा समृद्धि का समर्थक रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की नीति “विभाजन नहीं, एकीकरण”, “संरक्षणवाद नहीं, साझेदारी” और “अनिश्चितता नहीं, साझा समृद्धि” पर आधारित है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से भी अपील की कि वे विकासशील देशों को आर्थिक झटकों से निपटने के लिए मजबूत समर्थन तंत्र विकसित करें। G7 मंच पर पीएम मोदी का यह संदेश वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में संतुलन, सहयोग और समावेशी विकास की दिशा में एक मजबूत अपील के रूप में देखा जा रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 11:36:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान 14 सूत्रीय डील का खुलासा, होर्मुज और परमाणु मुद्दे अहम</title>
                                    <description><![CDATA[शांति समझौते में 60 दिन की समयसीमा, प्रतिबंधों में राहत और ईरान को आर्थिक पैकेज का प्रावधान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-iran-14-point-deal-revealed-hormuz-and-nuclear-issues-important/article-56251"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/hormuz-strait-agreement-2026.jpg" alt=""></a><br /><div class="qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot">
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<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद अब 14 सूत्रीय डील की पूरी जानकारी सामने आ गई है। इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने डिजिटल हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद यह तुरंत प्रभाव में आ गया। पेरिस के वर्साय पैलेस में हुए इस घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है क्योंकि इसमें युद्धविराम से लेकर परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों तक कई अहम मुद्दे शामिल हैं। इस डील का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 60 दिनों की समयसीमा है, जिसके भीतर दोनों देशों को अंतिम समझौते तक पहुंचना होगा। इस दौरान न तो कोई सैन्य कार्रवाई होगी और न ही कोई बड़ा राजनीतिक या आर्थिक दबाव बढ़ाया जाएगा। इसी समयसीमा के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को 60 दिनों के लिए शुल्क-मुक्त खोले जाने का प्रावधान भी शामिल है। यह फैसला वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि होर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और व्यापारिक सामान गुजरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित और निगरानी योग्य दायरे में रखेगा। इसके बदले अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ईरान के लिए लगभग 300 अरब डॉलर यानी करीब 28 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पुनर्निर्माण पैकेज का संकेत दिया है। हालांकि यह फंड तुरंत जारी नहीं होगा और इसे अंतिम समझौते की शर्तों से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे प्रतिबंधों से बाहर निकालना बताया जा रहा है। डील के तहत अमेरिका ने ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का भी वादा किया है। इसमें तेल निर्यात, बैंकिंग, बीमा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कई प्रतिबंध शामिल हैं। इसके हटने से ईरान को वैश्विक बाजार में दोबारा प्रवेश मिलने की संभावना है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है। लंबे समय से प्रतिबंधों के कारण ईरान की आर्थिक स्थिति दबाव में रही है और यह समझौता उसके लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते का एक और अहम पहलू अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी हटाना है। इसके बाद ईरान के बंदरगाहों से व्यापारिक गतिविधियां दोबारा शुरू हो सकेंगी। तेल और अन्य निर्यात वस्तुओं के लिए रास्ता खुलने से ईरान को विदेशी मुद्रा प्राप्त होने लगेगी, जिससे उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है। हालांकि इस कदम से अमेरिका का क्षेत्रीय दबाव बनाए रखने का एक बड़ा साधन खत्म हो जाएगा। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी बड़ा फैसला लिया गया है। समझौते के अनुसार ईरान ने अगले 60 दिनों तक इस मार्ग से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लेने का वादा किया है। इस अवधि में वैश्विक व्यापार बिना किसी रुकावट के जारी रहेगा। लेकिन 60 दिन के बाद स्थिति बदल सकती है और ईरान शुल्क लगाने का निर्णय ले सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की लागत प्रभावित हो सकती है। डील में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर भी कड़ा लेकिन संतुलित रुख अपनाया गया है। समझौते के अनुसार ईरान अपने पास मौजूद लगभग 11 टन संवर्धित यूरेनियम को कम घनत्व में बदलेगा, ताकि उसका उपयोग हथियार निर्माण में न हो सके। यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में होगी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान अपने यूरेनियम भंडार को विदेश भेजेगा या देश के भीतर ही उसका रूपांतरण करेगा, जिससे कई सवाल अभी भी अनसुलझे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते में यह भी तय किया गया है कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान करेंगे। यह बिंदु अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना कम हो सकती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे रणनीतिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं, जिससे अमेरिका का क्षेत्रीय प्रभाव सीमित हो सकता है। इसके अलावा दोनों देशों ने एक संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने पर सहमति जताई है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि समझौते की सभी शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं। यह प्रणाली पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाई जाएगी। साथ ही अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी दिलाने का भी प्रावधान है, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता मिल सके। अंततः यह 14 सूत्रीय समझौता केवल युद्ध समाप्ति का दस्तावेज नहीं बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।</p>
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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 11:35:55 +0530</pubDate>
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                <title>यूएस-ईरान डील पर ट्रंप का बड़ा दावा, शुक्रवार तक समझौता जारी हो सकता है</title>
                                    <description><![CDATA[वेस्ट एशिया युद्ध खत्म करने के लिए वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सहमति, वेंस बोले—परमाणु निरीक्षकों की वापसी तय मानी जा रही है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/trumps-big-claim-on-us-iran-deal-agreement-may-be-finalized/article-56039"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-deal-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव और संघर्ष के बीच अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को संकेत दिया कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच हुआ नया समझौता शुक्रवार तक सार्वजनिक किया जा सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच कई हफ्तों से चली आ रही कूटनीतिक बातचीत और तनावपूर्ण हालात के बाद वेस्ट एशिया में शांति की उम्मीदें बढ़ी हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो रही है और यह अहम तेल मार्ग शुक्रवार तक पूरी तरह “खुला” हो सकता है। यह समझौता कई दौर की कठिन वार्ताओं के बाद तैयार हुआ है, जिसमें सैन्य तनाव, क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। हालांकि अभी तक इस डील के सभी बिंदु सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, जिससे कई सवाल बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की वास्तविक शर्तें सामने आने के बाद ही यह साफ होगा कि दोनों देशों ने किन मुद्दों पर समझौता किया है और किन पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस पूरे घटनाक्रम पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि उनके देश का इतिहास टूटे हुए वादों और अधूरे समझौतों से भरा रहा है, इसलिए वे किसी भी समझौते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकते। अराघची ने कहा कि पिछले अनुभवों को देखते हुए ईरान सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहा है और किसी भी जल्दबाजी से बचना चाहता है। उनके बयान से यह साफ संकेत मिला है कि ईरान अभी भी पूरी तरह भरोसे की स्थिति में नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने भी इस समझौते को लेकर अहम जानकारी दी है। उन्होंने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा कि इस डील के तहत परमाणु निरीक्षकों को ईरान में दोबारा प्रवेश की अनुमति दी जाएगी। वेंस के अनुसार यह कदम पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे युद्ध और तनाव को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। यह पूरा घटनाक्रम कई हफ्तों की कूटनीतिक बातचीत, दबाव और क्षेत्रीय तनाव के बाद सामने आया है। इस दौरान कई बार ऐसी आशंका जताई गई थी कि स्थिति और बिगड़ सकती है और सैन्य टकराव दोबारा शुरू हो सकता है। लेकिन अचानक हुए इस समझौते ने हालात को काफी हद तक बदल दिया है। हालांकि अभी भी  इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जब तक आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं आते, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। सबसे अहम मुद्दों में होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना शामिल है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ट्रंप के अनुसार, इस रूट से जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो चुकी है और आने वाले दिनों में यह पूरी तरह सामान्य हो जाएगी। अगर यह स्थिति स्थिर रहती है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है, जहां पिछले कुछ समय से अस्थिरता बनी हुई थी। अमेरिका और ईरान के बीच इस संभावित समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी नजर बनाए हुए है। कई देशों का मानना है कि यदि यह डील सफल रहती है तो वेस्ट एशिया में शांति की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। यह समझौता कितना टिकाऊ होगा, यह आने वाले समय में दोनों देशों के व्यवहार और प्रतिबद्धताओं पर निर्भर करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 11:19:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईरान-अमेरिका जंग खत्म, कच्चे तेल में बड़ी गिरावट; पेट्रोल-डीजल पर टिकी निगाहें</title>
                                    <description><![CDATA[107 दिन बाद शांति समझौते पर सहमति, क्रूड ऑयल 4 फीसदी से ज्यादा टूटा; भारत में ईंधन कीमतों में राहत की उम्मीद बढ़ी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/iran-america-war-ends-big-fall-in-crude-oil-eyes-on/article-55974"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-peace-deal.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लगातार तीन महीने से अधिक समय तक दुनिया की नजरें जिस अमेरिका-ईरान संघर्ष पर टिकी थीं, उसे लेकर सोमवार को बड़ी राहत भरी खबर सामने आई। दोनों देशों ने करीब 107 दिन तक चले तनाव और सैन्य कार्रवाई के बाद शांति समझौते पर सहमति जता दी है। इस घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई। तेल बाजार में आई इस नरमी ने दुनिया भर के निवेशकों के साथ-साथ भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को भी राहत दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई इस गिरावट का फायदा भारत के आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी देखने को मिलेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सोमवार सुबह एशियाई बाजार खुलते ही कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 4.39 प्रतिशत गिरकर 81.15 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। वहीं ब्रेंट क्रूड भी करीब 4 प्रतिशत टूटकर 84 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया। कुछ दिन पहले तक ब्रेंट क्रूड 87 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था। युद्ध समाप्त होने की खबर के बाद तेल आपूर्ति को लेकर बना डर लगभग खत्म हो गया है, जिसके कारण निवेशकों ने तेजी से बिकवाली की और कीमतों में नरमी आई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">युद्ध के दौरान सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर थी। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। अगर यह मार्ग बंद होता या लंबे समय तक बाधित रहता तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता था। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि ईरान के साथ समझौता पूरा हो चुका है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से सामान्य रूप से खोला जाएगा। इसके साथ ही अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने का भी फैसला लिया गया है। इस घोषणा ने तेल बाजार में राहत का माहौल पैदा कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई इस गिरावट का असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब भी वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है, उसका असर घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर देखने को मिलता है। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका-ईरान तनाव के कारण तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई थी। इसका असर भारतीय उपभोक्ताओं पर भी पड़ा और पेट्रोल-डीजल के दामों में कई बार बढ़ोतरी की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मई महीने में ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार संशोधन किया गया था। 15 मई के बाद दो सप्ताह के भीतर ईंधन के दामों में लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। उस समय तेल कंपनियों का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिसके कारण लागत बढ़ गई है। अब जब हालात सामान्य होने लगे हैं और तेल की कीमतें नीचे आ रही हैं, तो आम लोगों को भी राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। 15 जून को जारी ताजा दरों के अनुसार दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। मुंबई में पेट्रोल 111.21 रुपये और डीजल 97.83 रुपये प्रति लीटर है। कोलकाता में पेट्रोल 113.51 रुपये और डीजल 99.02 रुपये प्रति लीटर पर बना हुआ है। वहीं चेन्नई में पेट्रोल 107.77 रुपये और डीजल 99.55 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने हाल ही में कहा था कि घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों का फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के रुख को देखते हुए किया जाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में यदि क्रूड ऑयल की कीमतें इसी तरह नीचे बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियां कीमतों की समीक्षा कर सकती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 18:22:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>SpaceX IPO के बाद Elon Musk बने दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर</title>
                                    <description><![CDATA[SpaceX शेयरों में 11% उछाल के बाद $150 पर ट्रेडिंग, 75 अरब डॉलर से अधिक की ब्लॉकबस्टर IPO ने टेक दुनिया में मचाई हलचल]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/6a2cf255a3be4/article-55791"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/elon-musk-trillionaire-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एलन मस्क एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में हैं क्योंकि उनकी कंपनी SpaceX के शेयरों में भारी उछाल के बाद वे दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन गए हैं। शुक्रवार, 12 जून 2026 को SpaceX के शेयरों ने अपने पहले दिन की ट्रेडिंग में 11% की बढ़त दर्ज की और $150 के स्तर पर पहुंच गए। इस तेजी ने न केवल निवेशकों का ध्यान खींचा बल्कि वैश्विक टेक और फाइनेंशियल मार्केट में एक नया इतिहास भी रच दिया। यह IPO अब तक की सबसे बड़ी प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश मानी जा रही है, जिसमें 75 अरब डॉलर से अधिक की पूंजी जुटाई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल SpaceX के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक टेक उद्योग के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। इस IPO के बाद आने वाले महीनों में कई बड़ी AI कंपनियों के भी बाजार में उतरने की उम्मीद जताई जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">शेयर बाजार में लिस्टिंग के बाद SpaceX के वैल्यूएशन में तेजी से बढ़ोतरी हुई, जिससे एलन मस्क की कुल संपत्ति में भारी इजाफा हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस उछाल के बाद मस्क की नेटवर्थ ने ऐतिहासिक स्तर को छू लिया और वे दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन गए। हालांकि, इस आंकड़े को लेकर अलग-अलग विश्लेषकों के बीच चर्चा भी जारी है, लेकिन बाजार में इस खबर का प्रभाव बेहद मजबूत रहा है। एलन मस्क ने इस मौके पर एक बार फिर अपने लंबे समय के मिशन का जिक्र किया और कहा कि उनका लक्ष्य मानवता को मंगल ग्रह तक पहुंचाना है। उन्होंने SpaceX को केवल एक कंपनी नहीं बल्कि एक “multi-planetary future” की दिशा में कदम बताया। निवेशकों के बीच भी इस विज़न को लेकर उत्साह देखा गया, जिसने शेयरों की मांग को और बढ़ा दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस IPO को टेक इंडस्ट्री के इतिहास में एक “ब्लॉकबस्टर ऑपरेशन” कहा जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर फंड जुटाना और साथ ही मजबूत मार्केट डेब्यू करना यह दर्शाता है कि निवेशक अभी भी एयरोस्पेस और AI आधारित कंपनियों में भारी भरोसा रखते हैं। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बनी हुई है, SpaceX का प्रदर्शन इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है। इस IPO का असर केवल SpaceX तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में यह अन्य टेक और AI कंपनियों के लिए भी रास्ता खोल सकता है। कई कंपनियां पहले से ही पब्लिक लिस्टिंग की तैयारी में हैं और SpaceX की सफलता ने उनके आत्मविश्वास को और बढ़ा दिया है।  इतनी तेज वैल्यूएशन ग्रोथ के साथ जोखिम भी जुड़ा हुआ है। शेयरों में शुरुआती तेजी के बाद वोलैटिलिटी बढ़ सकती है और निवेशकों को सावधानी बरतने की जरूरत होगी। खासकर जब कंपनी का फोकस अभी भी दीर्घकालिक मिशन जैसे मंगल मिशन और स्पेस टेक्नोलॉजी पर केंद्रित है, तब रेवेन्यू मॉडल को लेकर सवाल बने रह सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> इसके बावजूद बाजार का मूड फिलहाल बेहद सकारात्मक है। SpaceX की तकनीकी उपलब्धियां, रॉकेट लॉन्च सिस्टम और भविष्य की अंतरिक्ष परियोजनाएं निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं। इस IPO ने यह भी साबित किया है कि हाई-टेक कंपनियां अब केवल प्रयोगात्मक स्तर पर नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रही हैं। एलन मस्क पहले ही टेस्ला, स्पेसएक्स और अन्य कंपनियों के जरिए टेक दुनिया में बड़ा प्रभाव बना चुके हैं, लेकिन इस नए मील के पत्थर ने उनकी स्थिति को और मजबूत कर दिया है। ट्रिलियनेयर बनने की यह उपलब्धि उन्हें वैश्विक आर्थिक इतिहास में एक अलग स्थान देती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 11:39:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्पेसएक्स IPO के बाद ट्रिलियन डॉलर क्लब के करीब पहुंचे एलन मस्क</title>
                                    <description><![CDATA[स्पेसएक्स की रिकॉर्ड वैल्यूएशन और शेयर बाजार में धमाकेदार एंट्री ने एलन मस्क की कुल संपत्ति को 971 अरब डॉलर तक पहुंचाया, अब दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बनने से सिर्फ कुछ कदम दूर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/6a2ba244b9219/article-55699"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/elon-musk-net-worth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क एक और ऐतिहासिक उपलब्धि के बेहद करीब पहुंच गए हैं। उनकी अंतरिक्ष कंपनी स्पेसएक्स के शेयर बाजार में उतरने के बाद उनकी कुल संपत्ति में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है। नई वैल्यूएशन के अनुसार मस्क की कुल नेटवर्थ करीब 971 अरब डॉलर तक पहुंच गई है, जिससे वह दुनिया के पहले ट्रिलियन डॉलर यानी एक लाख करोड़ डॉलर से अधिक संपत्ति वाले व्यक्ति बनने की दहलीज पर खड़े नजर आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पेसएक्स के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) की कीमत 135 डॉलर प्रति शेयर तय की गई। इस मूल्यांकन के आधार पर एलन मस्क की स्पेसएक्स में हिस्सेदारी का मूल्य लगभग 688 अरब डॉलर आंका गया है। यह उनकी कुल संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि अगर स्पेसएक्स के शेयरों में शुरुआती कारोबार के दौरान मामूली बढ़त भी दर्ज होती है, तो मस्क ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को छू सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पेसएक्स के बाजार में उतरने से पहले भी एलन मस्क दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति थे। उनकी संपत्ति का बड़ा हिस्सा पहले से ही स्पेसएक्स, टेस्ला, न्यूरालिंक और द बोरिंग कंपनी जैसी कंपनियों में हिस्सेदारी से जुड़ा हुआ था। हालांकि स्पेसएक्स की नई वैल्यूएशन ने उनकी संपत्ति में सबसे बड़ा इजाफा किया है। बताया जा रहा है कि कंपनी की वैल्यू पिछले एक साल में तेजी से बढ़ी है और निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत हुआ है। यदि स्पेसएक्स का शेयर मूल्य 140.71 डॉलर तक पहुंच जाता है तो एलन मस्क की कुल संपत्ति एक ट्रिलियन डॉलर के स्तर को पार कर सकती है। मौजूदा स्थिति में वह इस लक्ष्य से करीब 29 अरब डॉलर दूर हैं। यह अंतर सुनने में बड़ा लगता है, लेकिन मस्क की कुल संपत्ति के मुकाबले यह केवल लगभग तीन प्रतिशत की वृद्धि के बराबर है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पेसएक्स की सफलता के पीछे कंपनी की लगातार बढ़ती व्यावसायिक उपलब्धियां हैं। अंतरिक्ष प्रक्षेपण सेवाओं, उपग्रह इंटरनेट नेटवर्क और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में मजबूत पकड़ बनाई है। निवेशकों का मानना है कि आने वाले समय में स्पेसएक्स वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग की सबसे प्रभावशाली कंपनियों में शामिल रह सकती है। इसी उम्मीद ने कंपनी की वैल्यूएशन को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाने में मदद की है। एलन मस्क की संपत्ति में पिछले एक वर्ष के दौरान लगभग 163 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह उछाल मुख्य रूप से स्पेसएक्स की बढ़ती कीमत और उसके कारोबारी विस्तार का परिणाम माना जा रहा है। वर्ष 2025 के दौरान कंपनी की वैल्यू में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई थी और बाद में एआई क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों ने भी निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया। इससे कंपनी के प्रति बाजार का भरोसा और मजबूत हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">मस्क की दूसरी प्रमुख कंपनी टेस्ला ने भी इस दौरान अच्छा प्रदर्शन किया है। इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी के शेयरों में बीते एक साल में करीब 22 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। टेस्ला में मस्क की हिस्सेदारी का मूल्य अब लगभग 165 अरब डॉलर बताया जा रहा है। हालांकि यह बढ़ोतरी स्पेसएक्स जितनी तेज नहीं रही, लेकिन फिर भी उनकी कुल संपत्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा। दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में एलन मस्क अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे निकल चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार, गूगल के सह-संस्थापक लैरी पेज लगभग 310 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर हैं। यह अंतर दिखाता है कि मस्क फिलहाल संपत्ति के मामले में किस स्तर पर पहुंच चुके हैं। यदि वह ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर लेते हैं, तो यह वैश्विक वित्तीय इतिहास में एक अभूतपूर्व उपलब्धि होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रिलियन डॉलर की व्यक्तिगत संपत्ति केवल एक प्रतीकात्मक उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि यह तकनीक, अंतरिक्ष उद्योग और नवाचार आधारित कंपनियों की बढ़ती ताकत को भी दर्शाएगी। पिछले दशक में तकनीकी कंपनियों की तेजी से बढ़ती वैल्यूएशन ने दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची को पूरी तरह बदल दिया है और मस्क इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरे हैं। दुनिया की निगाहें स्पेसएक्स के शेयर प्रदर्शन पर टिकी हुई हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:19:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>आरबीआई की रिपोर्ट में भरोसा, वैश्विक संकट के बीच भी भारत की विकास दर मजबूत</title>
                                    <description><![CDATA[वित्त वर्ष 2026-27 में 6.9% जीडीपी ग्रोथ का अनुमान, महंगाई नियंत्रित रहने की उम्मीद; भू-राजनीतिक तनाव को बताया सबसे बड़ा जोखिम]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/confidence-in-rbi-report-that-indias-growth-rate-remains-strong/article-54571"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/india-gdp-growth-2026-27.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक सकारात्मक तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में देश की रियल जीडीपी ग्रोथ 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ऐसे समय में जब दुनिया के कई बड़े देश आर्थिक सुस्ती, बढ़ती महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, भारत की विकास दर को लेकर यह अनुमान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत घरेलू मांग, स्थिर आर्थिक नीतियां और अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता भारत को वैश्विक संकटों के असर से बचाने में मदद कर रही हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी रफ्तार बनाए रखने की स्थिति में दिखाई दे रही है। आरबीआई का मानना है कि आने वाले समय में भी देश की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर लगातार नजर रखने की जरूरत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट में दुनिया के मौजूदा हालात को लेकर भी चिंता जताई गई है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक वर्ष 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा खतरा भू-राजनीतिक तनाव है। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर के आर्थिक अनुमानों को प्रभावित किया है। ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, सप्लाई चेन में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर दबाव के कारण कई देशों की विकास दर प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक विकास दर 3.3 प्रतिशत से घटकर 3.1 प्रतिशत तक आ सकती है। इसी तरह वैश्विक व्यापार की रफ्तार भी धीमी पड़ने का अनुमान है। आरबीआई ने चेतावनी दी है कि यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव और बढ़ता है तो दुनिया की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है। इसका असर वित्तीय बाजारों, निवेश और व्यापार गतिविधियों पर भी दिखाई दे सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक महंगाई का दबाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और ऊर्जा क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता नए जोखिम पैदा कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बावजूद भारत के लिए तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। आरबीआई ने चार प्रमुख कारणों का उल्लेख करते हुए कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है। पहला कारण कॉर्पोरेट सेक्टर और बैंकिंग प्रणाली की मजबूत बैलेंस शीट है। दूसरा, सरकार द्वारा लगातार बढ़ाया जा रहा पूंजीगत व्यय है जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार को समर्थन मिल रहा है। तीसरा, देश में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है जो महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद करेगा। चौथा, कृषि उत्पादन का स्थिर रहना है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती रहेगी। रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक हालात ज्यादा नहीं बिगड़ते हैं तो भारत के लिए 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल करना संभव है। हालांकि बाहरी परिस्थितियों में अचानक बदलाव की स्थिति में जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महंगाई को लेकर भी केंद्रीय बैंक ने संतुलित दृष्टिकोण पेश किया है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर लगभग 4.6 प्रतिशत रह सकती है। यह आरबीआई के लक्ष्य दायरे के भीतर मानी जा रही है। मजबूत खाद्यान्न उपलब्धता और कृषि उत्पादन को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में झटके और रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव महंगाई पर दबाव बना सकते हैं। यही कारण है कि केंद्रीय बैंक ने ऊपर की तरफ जोखिम बने रहने की बात भी कही है। दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर महंगाई दर 4.4 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जो पहले के अनुमान से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि दुनिया के कई देशों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखना अभी भी चुनौती बना रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि क्षेत्र को लेकर रिपोर्ट में मॉनसून की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। भारत की खेती अब भी काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। आरबीआई ने कहा है कि अल नीनो की स्थिति इस वर्ष बारिश को प्रभावित कर सकती है, जिससे कृषि उत्पादन पर दबाव बन सकता है। हालांकि वर्ष के उत्तरार्ध में इंडियन ओशन डिपोल के अनुकूल रहने की संभावना से राहत मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा नए लेबर कोड को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार श्रम सुधारों से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं और उत्पादकता में सुधार आने की संभावना है। इससे लोगों की आय और खर्च करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा लाभ अर्थव्यवस्था को मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र के बारे में भी रिपोर्ट आश्वस्त करने वाली है। आरबीआई का कहना है कि सेवाओं के निर्यात, विदेशों से आने वाली रेमिटेंस और विभिन्न देशों के साथ हुए व्यापार समझौते भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती देंगे। बैंकिंग सिस्टम को लेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय बैंक पर्याप्त पूंजी और मजबूत वित्तीय स्थिति के साथ काम कर रहे हैं। यही वजह है कि किसी संभावित वैश्विक वित्तीय झटके का सामना करने की उनकी क्षमता पहले की तुलना में अधिक मजबूत मानी जा रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता और निवेशकों की बदलती धारणा निकट भविष्य में कुछ चुनौतियां जरूर पैदा कर सकती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 14:57:17 +0530</pubDate>
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                <title>आज स्टॉक मार्केट में आई बड़ी गिरावट, जानें किन कंपनियों के शेयर हुए क्रैश</title>
                                    <description><![CDATA[सोमवार को ज्वेलरी स्टॉक्स में भारी गिरावट आई। पीएम मोदी की सोना खरीद टालने की अपील और ग्लोबल टेंशन से सेंसेक्स-निफ्टी भी टूटे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/there-was-a-big-fall-in-the-market-after-pm/article-53120"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-11t135202.641.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"><strong>Jewellery Stock Crash:</strong> इस सप्ताह की शुरुआत भारतीय शेयर बाजार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रही। जैसे ही सोमवार को बाजार खुला</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में भारी गिरावट देखी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पूरे ट्रेडिंग सेशन में बनी रही। ज्वेलरी सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां टाइटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेनको गोल्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कल्याण ज्वेलर्स जैसे प्रमुख स्टॉक्स अचानक गिर गए। यह गिरावट तब आई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सोने की खरीदारी टालने की अपील की। उन्होंने वैश्विक तनाव और मध्य पूर्व की स्थिति का जिक्र करते हुए लोगों से एक साल तक सोने की खरीद से बचने और ऊर्जा की बचत पर ध्यान देने को कहा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जैसे ही बाजार खुला</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">टाइटन के शेयर में तेज गिरावट आई। कंपनी का स्टॉक पिछले बंद 4517 रुपये से गिरकर 4350 रुपये पर खुला और कुछ ही समय में यह 4150 रुपये तक चला गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी करीब 7 प्रतिशत की कमी आई। इस गिरावट का असर कंपनी की मार्केट वैल्यू पर भी पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो घटकर लगभग 3.75 लाख करोड़ रुपये हो गई। केवल टाइटन ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ज्वेलरी क्षेत्र की लगभग सभी कंपनियों ने इस दबाव का सामना किया। सेनको गोल्ड के शेयर ने ओपनिंग के साथ ही 10 फीसदी तक की गिरावट दिखाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कल्याण ज्वेलर्स के स्टॉक में लगभग 8 फीसदी की कमी देखी गई। पीसी ज्वेलर का शेयर भी कारोबार के दौरान 5 प्रतिशत तक टूट गया। गोल्डियम इंटरनेशनल के शेयर में भी दबाव रहा और यह 5 फीसदी से अधिक गिरकर 408 रुपये के स्तर पर आ गया। निवेशकों में इस अचानक गिरावट को लेकर चिंता का माहौल था और कई ट्रेडर्स ने शुरुआती घंटों में ही बिकवाली कर दी।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अगर पूरे बाजार पर नजर डालें</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारतीय शेयर बाजार सोमवार को भारी दबाव में नजर आया। मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने और अमेरिका-ईरान के बीच होर्मुज स्ट्रेट पर शांति समझौते की अनिश्चितता ने कच्चे तेल की कीमतों को फिर से बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 4.5 फीसदी बढ़कर 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि </span>WTI <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रूड में भी 5 प्रतिशत से अधिक की तेजी देखी गई। तेल की कीमतों में इस उछाल ने वैश्विक महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सीधा असर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर पड़ा। एशियाई बाजारों में भी कमजोरी देखी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां जापान से लेकर हांगकांग तक के इंडेक्स गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। भारतीय बाजार में भी इसका असर साफ दिखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सेंसेक्स खुलते ही 900 अंक से ज्यादा टूट गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि निफ्टी करीब 275 अंक फिसल गया। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और सोने की मांग से जुड़े भावनात्मक संकेतों ने मिलकर निवेशकों के मूड को कमजोर किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसका असर सीधे ज्वेलरी स्टॉक्स पर पड़ा है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 15:03:54 +0530</pubDate>
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