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                <title>Religious Festival - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Religious Festival RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>गुरु पूर्णिमा 2026: 5 जुलाई, रविवार को मनाया जाएगा गुरु श्रद्धा और ज्ञान का महापर्व</title>
                                    <description><![CDATA[5 जुलाई 2026, रविवार को देशभर में गुरु पूर्णिमा श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाएगी। इस दिन गुरु पूजन, दान, सत्संग और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व माना जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/festival-festival/guru-purnima-2026-the-great-festival-of-guru-shraddha-and/article-57455"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/guru-purnima-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक भी होता है। इसी गुरु परंपरा को सम्मान देने के लिए हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई, रविवार को मनाई जाएगी। इस अवसर पर देशभर के मंदिरों, आश्रमों, मठों और धार्मिक स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन और गुरु वंदना के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लाखों श्रद्धालु अपने गुरु का आशीर्वाद लेने के लिए विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पहुंचेंगे और ज्ञान, सेवा तथा संस्कार की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। सनातन धर्म में गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध श्लोक <em>"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः"</em> गुरु की महिमा का वर्णन करता है। मान्यता है कि गुरु ही वह शक्ति हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु के बिना जीवन अधूरा माना जाता है, क्योंकि सही मार्गदर्शन ही व्यक्ति को सफलता, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की और अठारह पुराणों का संपादन किया। भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप देने में उनका योगदान अतुलनीय माना जाता है। इसलिए इस दिन उन्हें आदिगुरु के रूप में भी याद किया जाता है और श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। गुरु पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से भी बहुत बड़ा है। इस दिन विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं और उनसे जीवन में आगे बढ़ने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कई स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में गुरु सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद व्यक्त करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देशभर के प्रमुख आश्रमों और आध्यात्मिक केंद्रों में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष आयोजन किए जाते हैं। सुबह से ही श्रद्धालु स्नान कर पूजा की तैयारी करते हैं। भगवान विष्णु, महर्षि वेदव्यास और अपने गुरु का पूजन किया जाता है। फूल, फल, दीपक, धूप और प्रसाद अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत भी रखते हैं और जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामग्री का दान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा पर किया गया दान और सेवा विशेष पुण्य प्रदान करता है। बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने इसी दिन सारनाथ में अपने प्रथम पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। इसे धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है। इसलिए बौद्ध अनुयायी इस दिन ध्यान, प्रार्थना और धर्म उपदेश के कार्यक्रम आयोजित करते हैं। जैन धर्म में भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आचार्यों और साधु-संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आधुनिक समय में गुरु पूर्णिमा का स्वरूप कुछ बदला जरूर है, लेकिन इसकी भावना आज भी वैसी ही बनी हुई है। आज लोग अपने गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक को सोशल मीडिया, वीडियो कॉल और डिजिटल माध्यमों से भी शुभकामनाएं भेजते हैं। कई धार्मिक संस्थाएं ऑनलाइन प्रवचन और लाइव सत्संग का आयोजन करती हैं, जिनमें देश-विदेश से श्रद्धालु जुड़ते हैं। इससे यह पर्व नई पीढ़ी तक भी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है। गुरु पूर्णिमा केवल पूजा-पाठ का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सीखने का अवसर भी है। यह पर्व हमें विनम्रता, अनुशासन, सेवा और ज्ञान का महत्व समझाता है। गुरु का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा मानी जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा के दिन कई लोग नए कार्यों की शुरुआत भी करते हैं। आध्यात्मिक साधना, योग, ध्यान और धार्मिक अध्ययन प्रारंभ करने के लिए भी यह दिन शुभ माना जाता है। कई आश्रमों में नए शिष्यों को दीक्षा दी जाती है और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत कराई जाती है। इस दिन किए गए संकल्पों को विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा पर पीले वस्त्र पहनना, भगवान विष्णु की पूजा करना, केले के पेड़ की पूजा करना और ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, फल और दक्षिणा का दान करना शुभ माना जाता है। साथ ही अपने गुरु या शिक्षकों का सम्मान करना और उनका आशीर्वाद लेना भी इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">5 जुलाई 2026, रविवार को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा एक बार फिर पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का संदेश लेकर आएगी। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में सफलता पाने के लिए केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी उतना ही आवश्यक है। गुरु का सम्मान, उनके प्रति कृतज्ञता और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प ही इस पर्व की वास्तविक भावना है। भारतीय संस्कृति में सदियों से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा आज भी समाज को संस्कार, नैतिकता और ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है और गुरु पूर्णिमा इसी अमूल्य परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संकष्टी चतुर्थी 2026: 4 जून को रखा जाएगा गणेश जी का पावन व्रत</title>
                                    <description><![CDATA[भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने और जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए श्रद्धालु 4 जून 2026 को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखेंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/sankashti-chaturthi-2026-the-holy-fast-of-lord-ganesha-will/article-54815"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sankashti-chaturthi-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है और प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी 4 जून, गुरुवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के संकट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि देशभर में लाखों श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर विघ्नहर्ता गणेश की आराधना करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि का आरंभ 3 जून 2026 को रात 9 बजकर 21 मिनट पर होगा और इसका समापन 4 जून 2026 को रात 11 बजकर 30 मिनट पर होगा। चूंकि उदया तिथि के आधार पर व्रत और पर्व निर्धारित किए जाते हैं, इसलिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत 4 जून को रखा जाएगा। इस दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखकर शाम को भगवान गणेश की पूजा करते हैं और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी को कई स्थानों पर संकटहारा चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत भाषा में "संकष्टी" का अर्थ होता है संकटों से मुक्ति और "चतुर्थी" का अर्थ चौथा दिन। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली परेशानियां, बाधाएं और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि गणपति बप्पा की कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी सफल हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित देश के कई राज्यों में इस व्रत को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र में संकष्टी चतुर्थी का उत्साह अधिक देखने को मिलता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। कई गणेश मंदिरों में भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">व्रत के दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके भगवान गणेश का स्मरण करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। पूरे दिन उपवास रखा जाता है। कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार का सेवन करते हैं। व्रत के दौरान सामान्य भोजन का त्याग किया जाता है। फल, दूध, साबूदाना, मूंगफली, आलू और अन्य व्रत में उपयोग होने वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखना भी आवश्यक माना गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शाम के समय भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाती है। गणपति की प्रतिमा को दूर्वा घास, लाल फूल और चंदन अर्पित किया जाता है। दीपक जलाकर धूप और अगरबत्ती से पूजा की जाती है। इसके बाद गणेश मंत्रों और स्तोत्रों का पाठ किया जाता है। कई श्रद्धालु गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशन स्तोत्र और वक्रतुंड महाकाय मंत्र का जाप भी करते हैं। पूजा के दौरान भगवान गणेश को मोदक, लड्डू और अन्य प्रिय भोग अर्पित किए जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में चंद्र दर्शन का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा के बाद चंद्रमा के दर्शन करके उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात ही व्रत का पारण किया जाता है। चंद्रमा की पूजा के दौरान जल, अक्षत, चंदन और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि इससे व्रत पूर्ण माना जाता है और पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों में संकष्टी चतुर्थी व्रत को अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जीवन में आ रही आर्थिक, पारिवारिक और मानसिक परेशानियां दूर होने लगती हैं। कई दंपति संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत रखते हैं। भक्तों का विश्वास है कि गणेश जी सभी प्रकार के विघ्नों का नाश करते हैं और जीवन में शुभता का संचार करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विशेष बात यह है कि प्रत्येक माह आने वाली संकष्टी चतुर्थी का अपना अलग महत्व और व्रत कथा होती है। वर्ष भर में कुल 12 संकष्टी चतुर्थी आती हैं, जबकि अधिक मास होने पर इनकी संख्या 13 हो सकती है। हर माह भगवान गणेश के अलग स्वरूप और विशेष महिमा का वर्णन किया जाता है। यही कारण है कि यह व्रत पूरे वर्ष श्रद्धापूर्वक किया जाता है। 4 जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश की आराधना का एक महत्वपूर्ण अवसर है। श्रद्धालु इस दिन उपवास, पूजा और चंद्र दर्शन के माध्यम से गणपति बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत जीवन के संकटों को दूर करने और सुख-समृद्धि प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 11:14:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कब रखा जाएगा वट पूर्णिमा व्रत? जानें सही तारीख, महत्व और पूजा विधि पूरी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[वट पूर्णिमा व्रत 2026 की तारीख 29 जून तय की गई है। जानें इसका महत्व, पूजा विधि और धार्मिक मान्यताएं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/when-will-vat-purnima-fast-be-observed-know-the-exact/article-52809"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ-(87).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">Vat Purnima <span lang="hi" xml:lang="hi">2026</span> Date: <span lang="hi" xml:lang="hi">वट पूर्णिमा व्रत 2026 को लेकर महिलाओं में अभी से ही तैयारियां और चर्चा शुरू हो गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर उत्तर भारत और पश्चिमी भारत के कई राज्यों में। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखा जाता है। वट पूर्णिमा व्रत 2026 इस बार जून के आखिर में पड़ रहा है और पंचांग के अनुसार इसकी तिथि 29 जून तय की गई है। बताया जा रहा है कि इस बार ज्येष्ठ मास में अधिक मास की स्थिति होने के कारण वट सावित्री और वट पूर्णिमा के बीच समय का अंतर भी ज्यादा रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लोगों में थोड़ी उलझन भी देखी जा रही है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पंचांग की गणना के मुताबिक पूर्णिमा तिथि 29 जून 2026 को तड़के 3 बजकर 7 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 30 जून की सुबह 5 बजकर 27 मिनट पर होगा। उदयकाल की मान्यता के अनुसार वट पूर्णिमा व्रत 29 जून को ही रखा जाएगा। कई ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इस बार का व्रत विशेष माना जा रहा है क्योंकि तिथि और नक्षत्रों का संयोग अलग तरह का बन रहा है। महाराष्ट्र</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह परंपरा काफी धूमधाम से निभाई जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां महिलाएं पूरे श्रद्धा भाव से इस दिन निर्जला उपवास रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वट पूर्णिमा व्रत का महत्व धार्मिक दृष्टि से काफी गहरा माना जाता है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने तप और समर्पण से अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले लिए थे</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी कथा से यह व्रत जुड़ा हुआ है। इसी कारण महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं। सुबह से ही महिलाएं स्नान करके साफ वस्त्र पहनती हैं और कई जगहों पर लाल या पीले कपड़ों को शुभ माना जाता है। 16 श्रृंगार करने की परंपरा भी देखी जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि यह हर क्षेत्र में अलग-अलग तरीके से निभाई जाती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पूजा की प्रक्रिया में वट वृक्ष के नीचे दीप जलाने से लेकर कच्चा सूत लपेटने तक की परंपरा निभाई जाती है। कई महिलाएं बांस की टोकरी में फल</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">फूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुमकुम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनाज और अन्य पूजन सामग्री लेकर जाती हैं। वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए धागा लपेटने की परंपरा को बहुत शुभ माना जाता है। इसके बाद वृक्ष पर तिलक किया जाता है और चने-गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है। पूजा के बाद महिलाएं अपने पति के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेती हैं और कई जगहों पर पति को पंखा झलने की भी परंपरा निभाई जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सम्मान और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 09:39:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>Chaitra Navratri 2026 Ghatasthapana: 19 मार्च से आरंभ, जानें शुभ मुहूर्त, विधि और महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[घटस्थापना के लिए सुबह और अभिजीत मुहूर्त विशेष, पूरे दिन रहेगा पंचक काल लेकिन पूजा-अर्चना शुभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/chaitra-navratri-2026-ghatasthapana-starts-from-19th-march-know-the/article-48252"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/dubai-airport-drone-attack-(2).jpg" alt=""></a><br /><p>चैत्र नवरात्रि 2026 का पर्व 19 मार्च, गुरुवार से शुरू हो रहा है। इस दिन घटस्थापना कर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा प्रारंभ होगी। घटस्थापना के दौरान कलश में देवी शक्ति का आवाहन किया जाता है, जो घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि और शांति लाने का प्रतीक है।</p>
<p>घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 19 मार्च को सुबह 6:52 से 7:56 बजे तक और दोपहर 12:05 से 12:53 बजे तक है। पूजा के लिए प्रतिपदा तिथि सूर्योदय से पहले शुरू होगी और अगले दिन सुबह 4:53 बजे समाप्त होगी। यह तिथि विक्रम संवत 2083 की शुरुआत के साथ नए साल के शुभ आरंभ का प्रतीक भी मानी जाती है।</p>
<p>वैदिक ज्योतिष और शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, नवरात्रि की घटस्थापना से घर में देवी की शक्ति का आगमन होता है। मिट्टी के पात्र में जौ बोकर, जल से भरे कलश, आम के पत्ते, नारियल और लाल कपड़े का प्रयोग कर पूजा की जाती है। भक्त प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं और ध्यान व साधना के साथ मां दुर्गा का आवाहन करते हैं।</p>
<p>चैत्र नवरात्रि हर वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवमी तक मनाई जाती है। यह नौ दिनों तक शक्ति, भक्ति और साधना का प्रतीक है। घटस्थापना के दिन पूरे दिन पंचक काल रहेगा। हालांकि पंचक काल को शास्त्रों में अशुभ माना जाता है, देवी की पूजा और घटस्थापना इसके प्रभाव से मुक्त मानी जाती है।</p>
<p>धार्मिक विद्वानों का कहना है कि घटस्थापना का सही मुहूर्त और विधि के अनुसार अनुष्ठान करने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। नवरात्रि का यह आरंभिक संस्कार पूरे नौ दिन की पूजा का आधार बनता है।</p>
<p>भक्त इस दिन सुबह के शुभ मुहूर्त में पूजा कर सकते हैं। यदि सुबह का मुहूर्त छूट जाए तो अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा और कलश स्थापना संभव है। इस अनुष्ठान के दौरान जप, उपवास और साधना को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।</p>
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                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 15:01:10 +0530</pubDate>
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