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                <title>child welfare - दैनिक जागरण</title>
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                <title>12 साल की बच्ची से दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट सख्त, काउंसिलिंग रिपोर्ट तलब; आरोपी जीजा गिरफ्तार</title>
                                    <description><![CDATA[बैकुंठपुर की घटना में बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्थिति को बताया सर्वोपरि, अगली सुनवाई 2 जुलाई को]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-calls-for-strict-counseling-report-in-case-of/article-57527"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sims-bilaspur-(1).jpg" alt=""></a><br /><div class="qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot">
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<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुंठपुर से सामने आए 12 वर्षीय बच्ची से कथित दुष्कर्म और बाल संरक्षण से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी कानूनी प्रक्रिया से पहले बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्थिति और भविष्य सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों बच्चों को फिलहाल चाइल्ड वेलफेयर की निगरानी में रखने के निर्देश दिए हैं और काउंसिलिंग रिपोर्ट बंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को निर्धारित की गई है। यह मामला दो अनाथ भाई-बहन से जुड़ा है। 12 वर्षीय बच्ची और उसका 9 वर्षीय भाई बैकुंठपुर में अपनी मुंहबोली बहन के घर रह रहे थे। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक दोनों बच्चों को वहीं आश्रय दिया गया था, लेकिन बाद में उनके साथ शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए। बताया गया कि लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर दोनों बच्चे वहां से निकलकर अपने एक परिचित के पास पहुंच गए। इसके बाद मामले की सूचना पुलिस और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) को दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों को संरक्षण में लेने के बाद उनकी काउंसिलिंग कराई गई। इसी दौरान बच्ची ने कथित रूप से बताया कि उसकी मुंहबोली बहन के पति ने उसके साथ दुष्कर्म किया। शिकायत और काउंसिलिंग के आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इस बीच मामले ने नया मोड़ तब लिया जब बच्चों की मुंहबोली बहन ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दावा किया कि दोनों बच्चों को अवैध रूप से चाइल्ड हेल्पलाइन में रखा गया है। हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि रिकॉर्ड के अनुसार बच्ची को अंबिकापुर स्थित बालिका गृह तथा उसके भाई को बैकुंठपुर चाइल्ड वेलफेयर सेंटर में सुरक्षा के मद्देनजर रखा गया है। दोनों बच्चों को वैधानिक प्रक्रिया के तहत संरक्षण दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया था कि दोनों बच्चों को अदालत में प्रस्तुत किया जाए। इसके बाद संबंधित जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी बच्चों को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे और अदालत के समक्ष पूरी स्थिति रखी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिका में कुछ तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बच्चों का हित और उनका मानसिक स्वास्थ्य है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले उनकी स्वतंत्र काउंसिलिंग आवश्यक है, ताकि वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट के निर्देश पर बच्चों की काउंसिलिंग न्यायालय कक्ष के बजाय राज्य न्यायिक अकादमी में कराई गई। यह प्रक्रिया वरिष्ठ अधिवक्ता और संबंधित अधिकारियों की देखरेख में पूरी हुई। अदालत ने निर्देश दिया है कि काउंसिलिंग रिपोर्ट बंद लिफाफे में प्रस्तुत की जाए, ताकि बच्चों की निजता और पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रिपोर्ट के आधार पर आगे की सुनवाई में आवश्यक निर्णय लिया जाएगा।  ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चों की पहचान और गोपनीयता की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक होता है। इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक सहायता, सुरक्षित वातावरण और कानूनी संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कानून के अनुसार नाबालिग पीड़ितों से जुड़े मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया संवेदनशील तरीके से पूरी की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पुलिस अधिकारियों ने बताया कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद मामले की जांच विभिन्न पहलुओं से की जा रही है। मेडिकल रिपोर्ट, बच्चों के बयान, काउंसिलिंग रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं महिला एवं बाल विकास विभाग का कहना है कि दोनों बच्चों को फिलहाल सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया गया है और उनकी नियमित काउंसिलिंग जारी रहेगी। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत की जांच करना होता है। लेकिन यदि किसी नाबालिग को कानून के अनुसार सुरक्षा और संरक्षण के लिए अधिकृत संस्था में रखा गया हो, तो अदालत उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेती है। यही कारण है कि इस मामले में हाईकोर्ट ने बच्चों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विस्तृत रिपोर्ट और काउंसिलिंग को प्राथमिकता दी है। दोनों बच्चों को चाइल्ड वेलफेयर संस्थाओं की निगरानी में रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई तक उनकी सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित की जाए। वहीं आरोपी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की जांच भी जारी रहेगी। </p>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:13:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, गोद लेने वाली महिलाओं को भी मिलेगी 12 हफ्ते तक की मैटरनिटी लीव</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली माताओं के मातृत्व अवकाश को बच्चे की उम्र की सीमा से मुक्त कर 12 हफ्ते करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/women-who-adopt-a-big-decision-of-the-supreme-court/article-48340"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/supreme-court-maternity-leave.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गोद लेने वाली माताओं के मातृत्व अवकाश से जुड़े पुराने नियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया। पहले यह प्रावधान केवल उन माताओं तक सीमित था, जिन्होंने तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की उम्र चाहे कुछ भी हो, गोद लेने वाली सभी माताओं को गोद लेने की तारीख से 12 हफ्ते की मातृत्व छुट्टी का अधिकार मिलेगा। अदालत ने कहा कि बच्चा चाहे जैविक रूप से जन्मा हो या गोद लिया गया हो, मां के लिए मातृत्व अवकाश का अधिकार समान होना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">बेंच ने कहा नियम उम्र के आधार पर भेदभावपूर्ण</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि 'कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020' की धारा 60(4) में उम्र के आधार पर माताओं को छुट्टी देने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ है। अदालत ने यह भी कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य यह नहीं देखा जाना चाहिए कि बच्चा परिवार में किस तरह आता है। सभी माताओं में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। चाहे बच्चा तीन महीने से कम का हो या अधिक, उसे अपनाने वाली मां को बराबर अधिकार मिलना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">प्रजनन की स्वतंत्रता में गोद लेने को शामिल किया</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रजनन की स्वतंत्रता का अधिकार केवल जैविक माताओं तक सीमित नहीं है। इस अधिकार का विस्तार माता-पिता बनने तक होता है, जिसमें गोद लेने की प्रक्रिया भी शामिल है। अदालत ने कहा कि मातृत्व अवकाश का लाभ सभी माताओं को देना ही संवैधानिक न्याय और समानता के सिद्धांत के अनुरूप है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सरकार को पैटरनिटी लीव पर विचार करने का संकेत</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) शुरू करने पर विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने बताया कि देखभाल के मामलों में लिंग-तटस्थ और समावेशी दृष्टिकोण जरूरी है। इसके माध्यम से माता-पिता दोनों ही बच्चे की परवरिश और भावनात्मक सुरक्षा में सक्रिय रूप से भाग ले सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कोर्ट ने कहा कि बड़े बच्चों के लिए, विशेष रूप से वे बच्चे जिन्हें संस्थागत देखभाल से गोद लिया गया है, नए परिवार में घुलने-मिलने में समय लगता है। इसलिए मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल मां की सुविधा नहीं बल्कि बच्चे के भावनात्मक और सामाजिक विकास को भी ध्यान में रखना है। कोर्ट ने यह निर्णय बच्चों के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखकर लिया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">याचिका और पैरवी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह फैसला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर आया। उन्होंने उस नियम को चुनौती दी थी जो पहले मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 और बाद में 2020 के कोड में शामिल किया गया था। उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया। उनकी याचिका में बताया गया कि भारत में गोद लेने का ढांचा अक्सर तीन महीने से कम उम्र के बच्चों पर केंद्रित रहता है, जिससे पहले के प्रावधान का लाभ वास्तविक मामलों में सीमित रह जाता था। वकील बानी दीक्षित ने इस याचिका की पैरवी की।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">------------------------------</span></p>
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                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 18:17:07 +0530</pubDate>
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