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                <title>Parliament News - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Parliament News RSS Feed</description>
                
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                <title>केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा, राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के बाद फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने और भाजपा द्वारा दोबारा उम्मीदवार न बनाए जाने के बाद यह फैसला सामने आया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/resignation-of-union-minister-george-kurien-decision-after-the-end/article-56698"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/george-korean.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">केंद्र सरकार में राज्य मंत्री रहे जॉर्ज कुरियन ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति भवन की ओर से मंगलवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। हालांकि इस्तीफे के पीछे की आधिकारिक वजह सार्वजनिक नहीं की गई है। 65 वर्षीय कुरियन मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनका राज्यसभा कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो गया था और भाजपा ने हालिया राज्यसभा चुनाव में उन्हें दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया।</p>
<p class="isSelectedEnd">जॉर्ज कुरियन अगस्त 2024 से मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्यसभा सदस्य थे। भाजपा संगठन में उनकी पहचान लंबे समय से दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में पार्टी के प्रमुख चेहरों में रही है। राजनीतिक हलकों में उनके इस्तीफे को आगामी संगठनात्मक और मंत्रिमंडलीय बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में संपन्न केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा के अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाने को भी इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में 140 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी, जबकि पार्टी ने राज्य में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाया था।</p>
<h3>केरल में भाजपा का चेहरा</h3>
<p class="isSelectedEnd">जॉर्ज कुरियन केरल के प्रमुख ईसाई संप्रदाय सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च से जुड़े रहे हैं। वे वर्षों तक टीवी डिबेट्स और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाजपा का पक्ष रखने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल रहे।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के केरल दौरों के दौरान कुरियन अक्सर उनके भाषणों का मलयालम में अनुवाद करते दिखाई देते थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करना केरल के ईसाई समुदाय के बीच भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा था।</p>
<h3>राज्यसभा चुनाव से संकेत</h3>
<p class="isSelectedEnd">18 जून को 12 राज्यों की 26 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें अधिकांश सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए। भाजपा ने 4 जून को अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, जिसमें जॉर्ज कुरियन और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा मौका नहीं दिया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों नेताओं के टिकट कटने के बाद से ही केंद्र सरकार में संभावित फेरबदल की अटकलें तेज हो गई थीं। अब कुरियन के इस्तीफे ने इन चर्चाओं को और बल दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा आने वाले महीनों में संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर नई रणनीति के तहत बदलाव कर सकती है। दक्षिण भारत में पार्टी के प्रदर्शन और विस्तार को लेकर भी नेतृत्व नए सिरे से समीक्षा कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इससे पहले तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई के इस्तीफे ने भी दक्षिण भारत की राजनीति में हलचल पैदा की थी। ऐसे में जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा भाजपा की दक्षिण भारत रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p>फिलहाल भाजपा नेतृत्व की ओर से कुरियन की भविष्य की भूमिका को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी है कि पार्टी उन्हें संगठन में नई जिम्मेदारी दे सकती है। केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा अब राष्ट्रीय राजनीति और भारत समाचार अपडेट में प्रमुख चर्चा का विषय बन गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:04:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दैनिक जागरण]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>तृणमूल के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़ एनसीपीआई में किया विलय</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीपीआई में शामिल होकर बगावती सांसदों ने साधा संवैधानिक दांव, भाजपा से सीधा जुड़ाव टालने के पीछे भी रही राजनीतिक रणनीति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/20-trinamool-mps-left-the-party-and-merged-with-ncpi/article-56133"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/trinamool-congress.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के एक साथ पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करने के फैसले ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पहली नजर में यह फैसला चौंकाने वाला लग सकता है क्योंकि जिस पार्टी में इन सांसदों ने विलय किया है, वह राष्ट्रीय स्तर पर लगभग अज्ञात राजनीतिक संगठन मानी जाती है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी रणनीति भी जुड़ी हुई बताई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष एनसीपीआई में विलय का दावा पेश किया। यह संख्या तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है। यही आंकड़ा इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए यह रास्ता चुना, क्योंकि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में केवल दो-तिहाई सदस्यों के साथ किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय ही उन्हें अयोग्यता से बचा सकता है। एनसीपीआई की बात करें तो यह पार्टी त्रिपुरा में पंजीकृत है, लेकिन अभी तक राष्ट्रीय राजनीति में उसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं रहा है। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सीमित स्तर पर चुनाव लड़ा था और उसे बेहद कम वोट मिले थे। इसके बावजूद अब अचानक यह पार्टी लोकसभा में 20 सांसदों के साथ चर्चा के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बागी सांसदों ने इतनी छोटी पार्टी को ही क्यों चुना। शुरुआत में सांसदों के बीच अलग राजनीतिक समूह बनाने पर भी चर्चा हुई थी। लेकिन दल-बदल कानून की मौजूदा व्यवस्था के तहत ऐसा करना आसान नहीं था। यदि सांसद अलग समूह बनाते तो उन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता था। यही वजह रही कि उन्होंने विलय का विकल्प चुना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ की पृष्ठभूमि इस फैसले को समझने में अहम भूमिका निभाती है। जब यह कानून 1985 में लागू हुआ था तब इसमें एक-तिहाई विधायकों या सांसदों के समर्थन से अलग समूह बनाने की छूट थी। लेकिन बाद के वर्षों में इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ। कई राज्यों और केंद्र की राजनीति में नेताओं ने बार-बार दल बदलकर सरकारों की दिशा बदल दी। इसे देखते हुए वर्ष 2003 में कानून में संशोधन किया गया और अलग समूह बनाने वाली व्यवस्था समाप्त कर दी गई। संशोधन के बाद केवल एक ही रास्ता बचा, जिसमें किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर सकते हैं। इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का फैसला किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पूरी तरह संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें सामने आती रही थीं कि बागी सांसद भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं। अटकलें लगाई जा रही थीं कि वे सीधे भाजपा में शामिल हो सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। इसके पीछे भी राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रही हैं। ऐसे में यदि सांसद सीधे भाजपा में शामिल हो जाते तो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में इसका नकारात्मक संदेश जा सकता था। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी इतने बड़े समूह को सीधे पार्टी संरचना में समायोजित करना आसान नहीं होता। पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी असंतोष पैदा हो सकता था। एनसीपीआई का विकल्प इस लिहाज से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया। यह पार्टी राजनीतिक रूप से छोटी है और उसका संगठनात्मक ढांचा सीमित है। ऐसे में बागी सांसद वहां अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रख सकते हैं। साथ ही वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन देकर केंद्र की राजनीति में अपनी भूमिका भी कायम रख सकते हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ने से एनडीए को भी राजनीतिक लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से उन विधेयकों के संदर्भ में, जिनके लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता होती है। माना जा रहा है कि लोकसभा में संख्या बल बढ़ने से सरकार की रणनीतिक स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आने की संभावना जताई जा रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>टीएमसी में बड़ी टूट, 20 सांसदों ने NCPI में विलय कर NDA को समर्थन दिया</title>
                                    <description><![CDATA[ममता बनर्जी को बड़ा झटका, बागी सांसदों ने नई राजनीतिक राह चुनी; चर्चा में आई छोटी पार्टी NCPI]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-break-in-tmc-20-mps-merged-with-ncpi-and/article-55992"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-mps-split.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान भी अपनी ओर खींच लिया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इसके साथ ही इन सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ काम करने की इच्छा भी जताई है। इस घटनाक्रम को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों का एक साथ अलग होना पार्टी की ताकत को सीधे प्रभावित करता है। सांसदों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सदस्यता बचाने की थी। यदि वे सीधे किसी अन्य दल में शामिल होते या एनडीए का समर्थन करने का ऐलान करते, तो दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी लोकसभा सदस्यता खतरे में पड़ सकती थी। इसी वजह से उन्होंने एक अलग रणनीति अपनाई और सामूहिक रूप से एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना। चूंकि सांसदों की संख्या दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है, इसलिए दल-बदल कानून के प्रावधानों के तहत उन्हें राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिस पार्टी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आया है, वह है नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई। राजनीतिक हलकों में यह नाम अब तक बहुत कम लोगों ने सुना था, लेकिन टीएमसी सांसदों के विलय के बाद यह पार्टी अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। दिलचस्प बात यह है कि जिस पार्टी का अब तक न कोई सांसद था और न कोई विधायक, वह एक झटके में लोकसभा में 20 सांसदों वाली पार्टी बनने का दावा कर रही है। एनसीपीआई का गठन 20 जनवरी 2023 को किया गया था। यह एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। पार्टी का पंजीकरण पश्चिम बंगाल में हुआ था, लेकिन इसकी सक्रियता मुख्य रूप से त्रिपुरा में देखने को मिली। गठन के समय पार्टी ने खुद को सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की आवाज बताने का प्रयास किया था। इसके चुनावी संदेशों में दलबदल की राजनीति का विरोध भी प्रमुख रूप से शामिल था। यही वजह है कि अब टीएमसी से आए सांसदों के इस पार्टी में शामिल होने को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में बताया जाता है। पार्टी के अध्यक्ष शेली कुंडू हैं, जबकि संगठनात्मक गतिविधियों में उनके सहयोगियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पार्टी को अब तक बहुत सीमित आर्थिक सहयोग मिला है और इसके संसाधन भी अपेक्षाकृत छोटे स्तर के रहे हैं। एनसीपीआई ने अपना पहला चुनाव त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में लड़ा था। उस चुनाव में पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी, लेकिन कई उम्मीदवारों के नामांकन खारिज हो गए थे। अंततः पार्टी सीमित सीटों पर ही चुनाव लड़ पाई और उसे कोई सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद पार्टी ने खुद को राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास जारी रखा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">टीएमसी सांसदों के इस कदम के पीछे पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष को भी एक कारण माना जा रहा है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनावी नतीजों के बाद संगठन के भीतर मतभेदों की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग राय दिखाई दे रही थी। अब सांसदों के इस बड़े समूह के अलग होने के बाद यह असंतोष खुलकर सामने आ गया है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने इस राजनीतिक बदलाव की घोषणा करते हुए कहा कि उनका समूह भविष्य में एनडीए के साथ मिलकर काम करेगा। इसके बाद बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से भी मुलाकात कर अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर भी राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 17:05:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>टीएमसी में बगावत तेज, ममता के करीबी सुदीप बंदोपाध्याय भी बागी खेमे में शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, बागी सांसदों ने लोकसभा में ‘असली टीएमसी’ होने का दावा ठोकने की तैयारी की, स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात संभव।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/rebellion-in-tmc-intensifies-mamatas-close-friend-sudeep-bandopadhyay-also/article-55921"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-rebellion.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है और पार्टी की शीर्ष नेतृत्व के लिए यह स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। ताजा घटनाक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी और पार्टी के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंदोपाध्याय के बागी खेमे के साथ खड़े होने की खबरों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि यह घटनाक्रम टीएमसी के अंदर चल रहे शक्ति संघर्ष को और तेज कर सकता है। विधानसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद संगठन के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। अब यह असंतोष खुली बगावत का रूप लेता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि सुदीप बंदोपाध्याय ने बागी सांसदों के साथ बैठकें की हैं और आगे की रणनीति पर चर्चा भी की है। इस घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सुदीप लंबे समय से ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागी गुट सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर सकता है। इस मुलाकात के दौरान बागी सांसद अपने पक्ष को विस्तार से रखने और संसदीय स्तर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह टीएमसी के लिए एक बड़ा संस्थागत संकट साबित हो सकता है। लोकसभा में पार्टी की स्थिति और नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं। बागी खेमे की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि लोकसभा में उनके समूह का नेतृत्व सुदीप बंदोपाध्याय करें। विद्रोही नेताओं का मानना है कि उनके अनुभव और राजनीतिक पकड़ को देखते हुए वे इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इस विषय पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ सुदीप बंदोपाध्याय की मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। रिपोर्टों के अनुसार इस मुलाकात में टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय भी मौजूद थीं। इसके अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की खबरों ने भी राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। विपक्षी दल और राजनीतिक पर्यवेक्षक इन बैठकों को बंगाल की राजनीति में संभावित नए समीकरणों के संकेत के रूप में देख रहे हैं। टीएमसी के भीतर असंतोष केवल संसदीय स्तर तक सीमित नहीं है। विधानसभा में भी स्थिति पार्टी नेतृत्व के लिए चिंताजनक बताई जा रही है। खबरों के मुताबिक बड़ी संख्या में विधायक पहले ही हाईकमान के फैसलों पर सवाल उठा चुके हैं। बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी को नेता के रूप में समर्थन देने का संकेत दिया है। इससे साफ है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभरकर सामने आए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूर्व मंत्री मानस भूनिया का हाल ही में पार्टी से इस्तीफा देना भी इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। उनके इस्तीफे के बाद यह संदेश गया कि असंतोष केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के विभिन्न स्तरों पर इसकी गूंज सुनाई दे रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाता तो आने वाले समय में और भी नेता खुलकर विरोध का रास्ता अपना सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागी सांसद जगदीश चंद्र बसूनिया ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट कहा कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंप दिया है और वे जल्द ही अपने समूह की ओर से औपचारिक दावा पेश करेंगे। उनका कहना है कि उनका गुट ही वास्तविक तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है और इसी आधार पर वे संसदीय मान्यता की मांग करेंगे। इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उधर टीएमसी समर्थकों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व अभी भी मजबूत स्थिति में है और बागी नेताओं की गतिविधियां संगठन को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगी। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह असंतोष अस्थायी है और समय के साथ स्थिति सामान्य हो जाएगी। हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना आसान नहीं है कि विवाद किस दिशा में जाएगा। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से नाटकीय घटनाक्रमों और तीखे राजनीतिक संघर्षों के लिए जानी जाती रही है। मौजूदा संकट भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 17:25:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>TMC में बड़ी टूट के बीच ममता ने कल्याण बनर्जी को बनाया चीफ व्हिप</title>
                                    <description><![CDATA[20 बागी सांसदों के NDA समर्थन के दावे के बाद ममता बनर्जी का बड़ा कदम, लोकसभा स्पीकर को भेजा पत्र]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mamata-made-kalyan-banerjee-the-chief-whip-amid-major-rift/article-55444"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-crisis-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे सियासी घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है। पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और सांसदों की बगावत के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी को पार्टी का नया चीफ व्हिप नियुक्त कर दिया है। मंगलवार को इस संबंध में लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजा गया और अनुरोध किया गया कि इस नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ चुका है और कई सांसद नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता लोकसभा में उसके सांसदों की एकजुटता को लेकर है। पार्टी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों के अलग रुख अपनाने का दावा किया गया है। बागी सांसदों का कहना है कि उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को संभालने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसी रणनीति के तहत कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंपे जाने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक दिन पहले बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार को अपना चीफ व्हिप चुने जाने का दावा किया था। इसके बाद उन्होंने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र भी भेजा था। बताया गया कि इस पत्र में बागी सांसदों के हस्ताक्षर मौजूद थे और उन्होंने अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में बैठने की अनुमति मांगी थी। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि संसदीय राजनीति में चीफ व्हिप की भूमिका काफी अहम होती है। पार्टी लाइन को लागू करवाना, सांसदों के बीच समन्वय बनाए रखना और महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकजुटता सुनिश्चित करना इसी पद की जिम्मेदारी होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">काकोली घोष पहले ही पार्टी छोड़ चुकी हैं, लेकिन उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह अब भी खुद को लोकसभा में मुख्य सचेतक मानती हैं। उनके बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि वह दशकों से पार्टी के साथ जुड़ी रही हैं और संघर्ष के रास्ते से आगे बढ़ी हैं। उनके इस बयान को पार्टी नेतृत्व के प्रति नाराजगी के रूप में भी देखा गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उधर, तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेताओं ने बागी सांसदों पर तीखे हमले किए हैं। राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोगों की वफादारी केवल सत्ता तक सीमित रहती है और राजनीतिक दबाव के सामने उनके सिद्धांत कमजोर पड़ जाते हैं। वहीं कल्याण बनर्जी ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीतिक ताकतों के सामने उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता और पार्टी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी अभी भी बंगाल में मजबूत स्थिति में है और कार्यकर्ताओं का समर्थन नेतृत्व के साथ बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजनीतिक संकट केवल सांसदों तक सीमित नहीं है। इससे पहले राज्य की राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला था, जब बड़ी संख्या में विधायकों के अलग गुट बनाने की खबर सामने आई। पार्टी के भीतर लगातार बढ़ते असंतोष ने नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर इस तरह की घटनाएं पार्टी की संगठनात्मक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिल्ली में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गतिविधियां तेज रहीं। बागी सांसदों की कई बैठकें हुईं।  कुछ बैठकें गोपनीय स्थानों पर आयोजित की गईं, जहां आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। इसी दौरान कुछ सांसदों की वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मुलाकात की खबरें भी सामने आईं। इन मुलाकातों ने राजनीतिक अटकलों को और मजबूत किया। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन बैठकों को लेकर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी भी इसी बीच दिल्ली पहुंचे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका दौरा केवल विपक्षी गठबंधन की बैठकों तक सीमित नहीं था, बल्कि पार्टी के भीतर उभर रहे संकट का आकलन करना भी इसका हिस्सा था। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व बागी सांसदों को मनाने में कितना सफल होता है या फिर यह असंतोष और बड़ा रूप लेता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:41:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>नेपाल में बालेन सरकार पर उठने लगे सवाल, 100 में 88 वादे अब तक अधूरे</title>
                                    <description><![CDATA[दो महीने में बढ़ी नाराजगी, मंत्रियों के इस्तीफे और अधूरे वादों पर घिरी सरकार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/questions-are-being-raised-on-balen-government-in-nepal-88/article-54507"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/_donald-trump-note-nepal-prime-minister.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr">नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी दो महीने ही हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार अब सवालों के घेरे में आ गई है। मार्च में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बालेन शाह ने बड़े बदलावों और प्रशासनिक सुधारों का दावा करते हुए 100 पॉइंट एजेंडा पेश किया था। उस समय युवाओं और खासकर जेन-जी वर्ग में इसे लेकर काफी उत्साह दिखाई दिया था। लोग मान रहे थे कि पारंपरिक राजनीति से अलग छवि रखने वाले बालेन नेपाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू करेंगे। लेकिन अब हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट के मुताबिक बालेन सरकार के 100 में से 88 वादे तय समय से पीछे चल रहे हैं। कई योजनाएं अभी शुरुआती स्तर पर भी नहीं पहुंच पाई हैं। विपक्ष तो सरकार पर सवाल उठा ही रहा है, अब उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर करनी शुरू कर दी है। सोशल मीडिया पर भी युवा पूछ रहे हैं कि अगर नई राजनीति में भी पुराने तरीके ही दिखेंगे तो फिर बदलाव कहां है।</p>
<p dir="ltr">सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर दो मंत्रियों का इस्तीफा भी बालेन सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग पर एक विवादित कारोबारी से संबंधों के आरोप लगे। मामला बढ़ने के बाद उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। इन घटनाओं ने सरकार की साफ-सुथरी छवि को नुकसान पहुंचाया है।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद मंत्रालयों की संख्या कम करने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने, सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे कई बड़े वादे किए थे। इसके अलावा डिजिटल निवेश व्यवस्था, ऊर्जा निर्यात नीति और बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने की बात भी कही गई थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने इन वादों के लिए बेहद कम समय सीमा तय कर दी थी। कई योजनाओं को 24 घंटे, 7 दिन और 15 दिन में पूरा करने का दावा किया गया, जो व्यवहारिक तौर पर मुश्किल माना जा रहा था।</p>
<p dir="ltr">नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सुधारों और आयोगों की सिफारिशें लागू करने में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। लेकिन बालेन सरकार ने तेजी दिखाने के चक्कर में कई फैसले बिना पर्याप्त तैयारी के ले लिए। इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है।</p>
<p dir="ltr">सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अध्यादेशों के जरिए फैसले लेने को लेकर हो रही है। बालेन सरकार निचले सदन में मजबूत स्थिति में है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में सरकार ने कई अहम फैसले अध्यादेशों के जरिए लागू करने की कोशिश की। इनमें छात्र संगठनों और सिविल सर्विस यूनियनों को खत्म करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। बाद में नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। छात्र संगठनों और सरकारी कर्मचारियों ने भी इसका विरोध किया।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई देते हुए कहा कि सरकारी दफ्तरों और स्कूलों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना जरूरी है। उनका कहना था कि छात्र संगठन और यूनियन अब पेशेवर संस्थाओं की जगह राजनीतिक दलों के “स्लीपर सेल” बन चुके हैं। हालांकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहा है।</p>
<p dir="ltr">इसी बीच सरकार द्वारा शुरू किए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान ने भी विवाद खड़ा कर दिया है। काठमांडू घाटी समेत कई इलाकों में बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक करीब 4 हजार ढांचे हटाए गए हैं, जिससे लगभग 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें बिना पर्याप्त समय दिए घरों और दुकानों से हटाया गया।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उनकी पहचान बुलडोजर एक्शन को लेकर बनी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उसी मॉडल को देशभर में लागू करने की कोशिश की। लेकिन अब यह फैसला गरीब और भूमिहीन लोगों के विरोध का कारण बन रहा है।</p>
<p dir="ltr">भारत-नेपाल सीमा पर भी सरकार के नए नियमों को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू किया है। नियम के अनुसार 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लाने पर टैक्स देना होगा। दशकों से सीमा पर रहने वाले लोग भारत के शहरों से राशन, कपड़े और घरेलू सामान खरीदते रहे हैं। अब नए नियमों के बाद लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। चुनाव के दौरान उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कही थी, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। संसद में विपक्ष लगातार उनसे जवाब मांग रहा है। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं दिख रही। हालांकि सरकार का दावा है कि कुछ बड़े फैसले लागू किए जा चुके हैं। गरीब मरीजों के लिए अस्पतालों में मुफ्त बेड की व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच शुरू करना इनमें शामिल है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:12:50 +0530</pubDate>
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                <title>AAP को बड़ा झटका, 7 सांसदों के BJP में विलय को मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा में भाजपा की ताकत बढ़कर 113 हुई, AAP घटकर 3 सांसदों तक सिमटी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-blow-to-aap-approval-for-merger-of-7-mps/article-52217"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/aap,-bjp.jpg" alt=""></a><br /><p>राज्यसभा में आज बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब सभापति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">CP Radhakrishnan</span></span> ने आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय को मंजूरी दे दी। इस फैसले के बाद राज्यसभा में AAP की संख्या घटकर 3 रह गई, जबकि भाजपा की ताकत बढ़कर 113 सांसदों तक पहुंच गई।इस घटनाक्रम ने संसद के ऊपरी सदन में राजनीतिक संतुलन को बदल दिया है और विपक्षी खेमे में हलचल तेज कर दी है।</p>
<h5><span><strong>कौन-कौन हुए शामिल</strong></span></h5>
<p>जिन सात सांसदों के विलय को मंजूरी मिली है, उनमें <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Raghav Chadha</span></span>, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Swati Maliwal</span></span>, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रमजीत साहनी और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। इन सभी ने हाल ही में भाजपा नेतृत्व से मुलाकात के बाद पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया था। बता दें, इन सांसदों ने सभापति को आवेदन देकर खुद को भाजपा सांसद के रूप में मान्यता देने की मांग की थी, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है।</p>
<h5><span><strong>क्या है पूरा मामला</strong></span></h5>
<p>यह घटनाक्रम 24 अप्रैल को शुरू हुआ, जब राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भाजपा नेतृत्व से मुलाकात के बाद पार्टी में शामिल होने की घोषणा की थी। बाद में अन्य सांसदों ने भी इसी राह को अपनाया।इन सांसदों ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है और आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी है।</p>
<p>यह निर्णय संसद भवन, नई दिल्ली में राज्यसभा सभापति द्वारा आज सोमवार को लिया गया। इसके बाद राज्यसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इन सांसदों को भाजपा के सदस्य के रूप में अपडेट कर दिया गया।</p>
<p>इस पूरे घटनाक्रम ने दलबदल कानून की वैधानिकता और व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आम आदमी पार्टी ने इसे संविधान की 10वीं अनुसूची का उल्लंघन बताया है और आरोप लगाया है कि यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है।पार्टी के वरिष्ठ नेता <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Sanjay Singh</span></span> ने सभापति को पत्र लिखकर सभी सात सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है।</p>
<h5><span><strong>कैसे बदला राजनीतिक समीकरण</strong></span></h5>
<p>इस विलय के बाद राज्यसभा में भाजपा की ताकत 106 से बढ़कर 113 हो गई है, जिससे उसे सदन में और मजबूत स्थिति मिली है। वहीं आम आदमी पार्टी अब केवल 3 सांसदों तक सीमित रह गई है, जिससे उसका संसदीय प्रभाव काफी कम हो गया है।</p>
<p>राघव चड्ढा ने पहले कहा था कि वे खुद को “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” महसूस कर रहे थे। वहीं स्वाति मालीवाल ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए थे और कहा था कि उनके साथ पार्टी में दुर्व्यवहार हुआ।दूसरी ओर, AAP का कहना है कि यह राजनीतिक दबाव और रणनीतिक हस्तक्षेप का परिणाम है।फिलहाल यह मामला संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है, और आगे इसकी कानूनी जांच और राजनीतिक प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-blow-to-aap-approval-for-merger-of-7-mps/article-52217</link>
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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 15:52:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महिला आरक्षण पर सियासत तेज, भूपेश बघेल का तंज—CM बदलने की सलाह</title>
                                    <description><![CDATA[महिला आरक्षण बिल विवाद के बीच भूपेश बघेल का बयान, छत्तीसगढ़ में विशेष सत्र की तैयारी महिला आरक्षण पर जारी राजनीतिक टकराव ने नया मोड़ ले लिया है। बयानबाजी के बीच सियासत और तेज हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/politics-intensifies-bhupesh-baghels-taunt-on-womens-reservation-advice/article-51770"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/cg-news-(27).jpg" alt=""></a><br /><p>छत्तीसगढ़ में महिला आरक्षण बिल को लेकर सियासी घमासान तेज होता जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भूपेश बघेल</span></span> ने राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए तंज कसा कि अगर महिलाओं को लेकर इतनी चिंता है, तो “कौशल्या भाभी को मुख्यमंत्री बना दीजिए।” यह बयान ऐसे समय आया है जब केंद्र में महिला आरक्षण बिल पारित नहीं हो सका और राज्य में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं।</p>
<p>छत्तीसगढ़ में महिला आरक्षण बिल को लेकर सियासी घमासान तेज होता जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भूपेश बघेल</span></span> ने राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए तंज कसा कि अगर महिलाओं को लेकर इतनी चिंता है, तो “कौशल्या भाभी को मुख्यमंत्री बना दीजिए।” यह बयान ऐसे समय आया है जब केंद्र में महिला आरक्षण बिल पारित नहीं हो सका और राज्य में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं।</p>
<p>रायपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बघेल ने कहा कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में कांग्रेस ने हमेशा पहल की है। उन्होंने दावा किया कि 1989 में ही यह कानून लागू हो सकता था, लेकिन उस समय भाजपा ने विरोध किया। उनके मुताबिक पंचायत स्तर पर आरक्षण लागू होने के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं राजनीति में आईं और नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं।</p>
<h5><strong>विशेष सत्र की तैयारी</strong></h5>
<p>राज्य सरकार इस मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रस्ताव राज्यपाल को भेजा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, इस सत्र में विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। मुख्यमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">विष्णुदेव साय</span></span> ने पहले ही संकेत दिए हैं कि विपक्ष के रुख को लेकर सरकार सख्त रुख अपनाएगी।</p>
<h5><strong>राजनीतिक बयानबाजी तेज</strong></h5>
<p>बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल के समर्थन में राज्यभर में प्रदर्शन शुरू कर दिया है। 20 अप्रैल से शुरू हुए इस अभियान के तहत महिला सम्मेलन और विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।सरकार का कहना है कि विपक्ष के कारण बिल पास नहीं हो सका, जबकि कांग्रेस इसे राजनीतिक आरोप बता रही है। बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा और उससे जुड़े संगठनों ने कभी महिलाओं को शीर्ष नेतृत्व में पर्याप्त अवसर नहीं दिया।</p>
<p>पृष्ठभूमि की बात करें तो संसद में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल आवश्यक बहुमत नहीं जुटा सका। रिपोर्ट्स के अनुसार, बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि इसे पारित करने के लिए अधिक समर्थन की जरूरत थी।इस घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">नरेन्द्र मोदी</span></span> ने सार्वजनिक रूप से महिलाओं से माफी भी मांगी थी और विपक्ष पर निशाना साधा था।</p>
<h5><strong>असर और आगे की राह</strong></h5>
<p>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा आने वाले समय में चुनावी एजेंडा बन सकता है। इससे महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर बहस और तेज होगी। जनता के बीच भी इस विषय पर चर्चा बढ़ रही है, खासकर ग्रामीण और स्थानीय निकाय स्तर पर, जहां पहले से आरक्षण लागू है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मुद्दा “पब्लिक इंटरेस्ट स्टोरी” बन चुका है और राष्ट्रीय स्तर पर असर डाल सकता है।</p>
<p>आने वाले दिनों में विशेष सत्र और राजनीतिक प्रदर्शनों के जरिए यह स्पष्ट होगा कि यह विवाद किस दिशा में जाता है। फिलहाल, महिला आरक्षण बिल को लेकर जारी बयानबाजी और राजनीतिक रणनीतियां देश की आज की ताज़ा ख़बरें और ट्रेंडिंग न्यूज इंडिया में प्रमुख बनी हुई हैं।</p>
<p>में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बघेल ने कहा कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में कांग्रेस ने हमेशा पहल की है। उन्होंने दावा किया कि 1989 में ही यह कानून लागू हो सकता था, लेकिन उस समय भाजपा ने विरोध किया। उनके मुताबिक पंचायत स्तर पर आरक्षण लागू होने के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं राजनीति में आईं और नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं।</p>
<h5><strong>विशेष सत्र की तैयारी</strong></h5>
<p>राज्य सरकार इस मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रस्ताव राज्यपाल को भेजा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, इस सत्र में विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। मुख्यमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">विष्णुदेव साय</span></span> ने पहले ही संकेत दिए हैं कि विपक्ष के रुख को लेकर सरकार सख्त रुख अपनाएगी।</p>
<h5><strong>राजनीतिक बयानबाजी तेज</strong></h5>
<p>बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल के समर्थन में राज्यभर में प्रदर्शन शुरू कर दिया है। 20 अप्रैल से शुरू हुए इस अभियान के तहत महिला सम्मेलन और विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।सरकार का कहना है कि विपक्ष के कारण बिल पास नहीं हो सका, जबकि कांग्रेस इसे राजनीतिक आरोप बता रही है। बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा और उससे जुड़े संगठनों ने कभी महिलाओं को शीर्ष नेतृत्व में पर्याप्त अवसर नहीं दिया।</p>
<p>पृष्ठभूमि की बात करें तो संसद में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल आवश्यक बहुमत नहीं जुटा सका। रिपोर्ट्स के अनुसार, बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि इसे पारित करने के लिए अधिक समर्थन की जरूरत थी। इस घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">नरेन्द्र मोदी</span></span> ने सार्वजनिक रूप से महिलाओं से माफी भी मांगी थी और विपक्ष पर निशाना साधा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा आने वाले समय में चुनावी एजेंडा बन सकता है। इससे महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर बहस और तेज होगी।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/politics-intensifies-bhupesh-baghels-taunt-on-womens-reservation-advice/article-51770</link>
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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 14:44:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरिवंश नारायण सिंह तीसरी बार राज्यसभा के उपसभापति बने, सदन ने जताया भरोसा</title>
                                    <description><![CDATA[पहली बार मनोनीत सदस्य को मिली यह जिम्मेदारी, पीएम मोदी ने दी बधाई, कहा– अनुभव का सदन को मिला लाभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/harivansh-narayan-singh-becomes-deputy-chairman-of-rajya-sabha-for/article-51472"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/rajya-sabha-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली में राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जहां हरिवंश नारायण सिंह को लगातार तीसरी बार उपसभापति चुना गया। शुक्रवार को हुए चुनाव में वे निर्विरोध चुने गए, क्योंकि विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा गया था।</p>
<p>यह पहली बार है जब किसी मनोनीत सदस्य को राज्यसभा का उपसभापति बनाया गया है। उनके समर्थन में कुल पांच प्रस्ताव पेश किए गए। इनमें पहला प्रस्ताव केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री जेपी नड्डा ने रखा, जबकि दूसरा प्रस्ताव नितिन नवीन की ओर से प्रस्तुत किया गया।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश के पुनः चयन पर उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह सदन के विश्वास का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि उपसभापति के रूप में उनके अनुभव से राज्यसभा को लगातार लाभ मिला है और उन्होंने सभी सदस्यों को साथ लेकर काम करने का प्रयास किया है।</p>
<p>हरिवंश नारायण सिंह का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा उन्हें पुनः मनोनीत किया गया। वे 2032 तक राज्यसभा के सदस्य बने रहेंगे। संविधान के अनुसार राज्यसभा में 12 सदस्य मनोनीत होते हैं, जिन्हें कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में योगदान के आधार पर नामित किया जाता है।</p>
<p>राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो हरिवंश मूल रूप से पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं और बाद में राजनीति में आए। उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के माध्यम से राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व किया। वे 2018 में पहली बार उपसभापति बने और 2020 में दोबारा इस पद पर चुने गए थे।</p>
<p>सूत्रों के अनुसार, 18 मार्च को बजट सत्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उनके कार्यकाल को लेकर संकेत दिए थे। उन्होंने सदन में कहा था कि हरिवंश ने लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाई है और उनका योगदान सराहनीय रहा है, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं।</p>
<p>विपक्ष की ओर से कोई नामांकन न आने के कारण चुनाव निर्विरोध रहा। सदन में इस निर्णय को सहमति और स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/harivansh-narayan-singh-becomes-deputy-chairman-of-rajya-sabha-for/article-51472</link>
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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:14:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राज्यसभा उपनेता पद से हटे राघव चड्ढा, बोले- 'AAP मेरी आवाज दबा रही'</title>
                                    <description><![CDATA[राघव चड्ढा को राज्यसभा उपनेता पद से हटाने पर AAP में हलचल, बोले- आवाज दबाई जा रही। जानें पूरा मामला।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/69cf649a2df65/article-50040"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/raghav-chadha-aap-rajya-sabha-deputy-leader-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राघव चढ्ढा (Raghav Chadha) को राज्यसभा में उपनेता (डिप्टी लीडर) के पद से हटाए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए चड्ढा ने आरोप लगाया कि पार्टी उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा कि वह सदन में आम लोगों के मुद्दे उठाते रहे हैं और यदि यही कारण है तो यह सवाल उठता है कि इसमें गलत क्या है। चड्ढा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “खामोश करवाया गया हूं, हारा नहीं हूं,” और इसे अपनी राजनीतिक लड़ाई का नया चरण बताया। इस घटनाक्रम को Arvind Kejriwal के नेतृत्व में लिए गए निर्णय के रूप में देखा जा रहा है, जिसने पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर चर्चाओं को जन्म दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर चड्ढा की जगह सांसद अशोक मित्तल को उपनेता नियुक्त करने की सिफारिश की है। पार्टी की ओर से इसे “रूटीन प्रक्रिया</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;">”</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;"> बताया गया है। पत्र में यह भी कहा गया कि सदन में पार्टी के कोटे का जो समय पहले चड्ढा को मिलता था, अब वह अशोक मित्तल को दिया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">बयान और विवाद</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राघव चड्ढा ने अपने 2 मिनट 18 सेकंड के वीडियो संदेश में कहा कि उन्होंने संसद में मोबाइल डेटा की कीमत, मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ, एयरपोर्ट पर महंगे खाने और डिलिवरी कर्मियों की समस्याओं जैसे मुद्दे उठाए। उनके मुताबिक इन मुद्दों को जनता का समर्थन मिला और कुछ मामलों में समाधान भी निकला।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ये मुद्दे जनता से जुड़े हैं, तो इन्हें उठाने से पार्टी को क्या नुकसान हो सकता है। चड्ढा ने यह भी दावा किया कि पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को लिखकर उनके बोलने के समय को सीमित करने की मांग की थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राजनीतिक संकेत</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">चड्ढा का बयान केवल व्यक्तिगत नाराजगी तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसे पार्टी नेतृत्व को खुली चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझना, मैं वो दरिया हूं जो सैलाब ला सकता हूं,” जो सियासी संदेश के तौर पर लिया जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पार्टी के भीतर इससे पहले भी नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर इन्हें कभी स्वीकार नहीं किया गया। सूत्रों के मुताबिक, हाल के महीनों में चड्ढा की सक्रियता और उनके मुद्दों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग राय थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पृष्ठभूमि</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">AAP में राज्यसभा में डिप्टी लीडर का पद पहले एनडी गुप्ता के पास था, जिसके बाद यह जिम्मेदारी राघव चड्ढा को सौंपी गई थी। चड्ढा को पार्टी का युवा और मुखर चेहरा माना जाता रहा है, जिन्होंने संसद में कई जनहित से जुड़े मुद्दे उठाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हालांकि, हालिया घटनाक्रम यह संकेत देता है कि पार्टी अब अपने संसदीय चेहरों और रणनीति में बदलाव कर रही है। अशोक मित्तल की नियुक्ति इसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">असर और आगे की राह</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस फैसले का असर केवल पार्टी के अंदरूनी समीकरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संसद में AAP की रणनीति और आवाज पर भी पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले समय में पार्टी की छवि और आंतरिक एकजुटता को प्रभावित कर सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 14:02:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>संसद में गूंजा ‘सरके चुनर’ विवाद: सरकार ने सख्ती के संकेत दिए, डायरेक्टर ने दी सफाई</title>
                                    <description><![CDATA[अश्लीलता के आरोपों पर राजनीतिक बहस तेज, सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर उठे सवाल]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/sarke-chunar-controversy-echoed-in-parliament-government-indicated-strictness-director/article-48422"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/गीोल.jpg" alt=""></a><br /><p>फिल्म KD: The Devil के गाने ‘सरके चुनर तेरी सरके’ को लेकर विवाद अब संसद तक पहुंच गया है। समाजवादी पार्टी के सांसद आनंद भदोरिया ने लोकसभा में इस गाने के कथित अश्लील बोल और प्रस्तुति का मुद्दा उठाया, जिस पर केंद्र सरकार नेसख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं।</p>
<p>सूचना एवं प्रसारण मंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Ashwini Vaishnaw</span></span> ने सदन में स्पष्ट किया कि विवादित गाने पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है और इसे बैन किया गया है। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के दायरे में है और समाज के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक प्रतिबंध लागू किए जाएंगे।</p>
<h5><strong>सरकार का रुख</strong></h5>
<p>मंत्री ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से फैल रहे कंटेंट को देखते हुए सरकार बच्चों, महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों में और कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।</p>
<p>यह बयान ऐसे समय आया है जब सोशल मीडिया पर इस गाने को लेकर व्यापक बहस चल रही है और कई संगठनों ने आपत्ति दर्ज कराई है।</p>
<h5><strong>फिल्म पक्ष की सफाई</strong></h5>
<p>फिल्म के डायरेक्टर <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Prem Jogi</span></span> ने विवाद को लेकर अपनी सफाई दी है। उनका कहना है कि गाने को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और इसे पूरे संदर्भ में समझने की जरूरत है।</p>
<p>उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि गाना प्रतीकात्मक रूप से बनाया गया है और इसका गलत अर्थ निकालना दर्शकों के नजरिए पर निर्भर करता है। उन्होंने सेंसर बोर्ड पर भरोसा जताते हुए कहा कि वे उसके फैसले का सम्मान करेंगे।</p>
<h5><strong>परिवार और इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया</strong></h5>
<p>डायरेक्टर की पत्नी <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Rakshita</span></span> ने भी सोशल मीडिया पर गाने के समर्थन में पोस्ट किए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि पहले भी कई फिल्मों और गानों में इसी तरह के बोल और दृश्य रहे हैं, लेकिन इस बार ही इतना बड़ा विवाद क्यों हो रहा है।उन्होंने पुराने लोकप्रिय गानों और फिल्मों का हवाला देते हुए इसे चयनात्मक विरोध बताया।</p>
<h5><strong>क्या है पूरा मामला</strong></h5>
<p>यह गाना 14 मार्च को रिलीज हुआ था और इसमें <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Nora Fatehi</span></span> और <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Sanjay Dutt</span></span> नजर आए। रिलीज के तुरंत बाद गाने के बोल, डांस स्टेप्स और पिक्चराइजेशन को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना शुरू हो गई।</p>
<p>कई यूजर्स ने इसे डबल मीनिंग और आपत्तिजनक बताते हुए शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मामला तूल पकड़ता गया और अब संसद तक पहुंच गया।</p>
<p>यह विवाद केवल एक गाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप के बीच संतुलन पर बड़ी बहस का हिस्सा बन गया है।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में कंटेंट पर नियंत्रण और जिम्मेदारी दोनों ही जरूरी हैं। वहीं, फिल्म इंडस्ट्री इसे रचनात्मक स्वतंत्रता के नजरिए से देख रही है।</p>
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                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 15:51:35 +0530</pubDate>
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