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                <title>donald trump - दैनिक जागरण</title>
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                <title>ईरान पर फिर बरसे अमेरिकी हमले, होर्मुज में जहाजों पर हमले के बाद बढ़ा तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[सीजफायर खत्म होने के बाद अमेरिका ने ईरान के कई शहरों और सैन्य ठिकानों पर एयरस्ट्राइक तेज की, ट्रम्प ने आगे भी कड़ी कार्रवाई के दिए संकेत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/american-attacks-again-on-iran-tension-increased-after-attack-on/article-58239"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/us-iran-conflict-(3).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हाल के दिनों में बना तनाव अब एक बार फिर खुले सैन्य टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच लागू सीजफायर खत्म होने के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के कई शहरों में एयरस्ट्राइक शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक कोनारक, चाबहार और बंदर अब्बास समेत कई इलाकों में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में कई स्थानों पर धुएं के बड़े गुबार उठने की बात कही गई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का कहना है कि यह कार्रवाई होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई है। लगातार हो रहे इन हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव को और बढ़ा दिया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता भी गहरी हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी सेना ने इससे पहले मंगलवार को भी ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। अधिकारियों के अनुसार ताजा अभियान उसी कार्रवाई का विस्तार माना जा रहा है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि उनका उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है जिनका इस्तेमाल क्षेत्र में हमलों के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर ईरान की ओर से अभी तक सभी हमलों के नुकसान का आधिकारिक ब्योरा जारी नहीं किया गया है, लेकिन कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है और राहत एजेंसियां भी सक्रिय हो गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका पहले ही ईरान पर जोरदार हमला कर चुका है और जरूरत पड़ने पर आगे भी बड़े सैन्य अभियान चलाए जा सकते हैं। ट्रम्प ने कहा कि ईरान लंबे समय से मध्य पूर्व में दबाव बनाने और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। उनके इस बयान के कुछ समय बाद ही ईरान में नई एयरस्ट्राइक की खबरें सामने आने लगीं, जिससे माना जा रहा है कि अमेरिका ने अपनी चेतावनी पर तुरंत अमल किया।</p>
<p style="text-align:justify;">तनाव की शुरुआत होर्मुज जलडमरूमध्य में हुए जहाजों पर हमलों के बाद और तेज हुई। ईरान ने मंगलवार को तीन जहाजों को निशाना बनाने की पुष्टि करते हुए दावा किया कि संबंधित जहाज उसके निर्धारित समुद्री मार्गों का पालन नहीं कर रहे थे। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई की गई, जबकि अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नौवहन की स्वतंत्रता पर हमला बताया। अमेरिका का कहना है कि दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल होर्मुज में किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक जवाबी अभियान के तहत ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। बंदर अब्बास स्थित शाहिद हक्कानी पोर्ट पर भी एयरस्ट्राइक की गई, जिसके बाद वहां से धुएं का बड़ा गुबार उठता देखा गया। यह बंदरगाह ईरान के प्रमुख समुद्री केंद्रों में गिना जाता है और इसकी सामरिक अहमियत भी काफी अधिक मानी जाती है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और आम लोगों की आवाजाही सीमित कर दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि दोनों देशों के बीच यही स्थिति बनी रही तो इसका असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और गैस गुजरती है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी असर डाल सकता है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और शिपिंग लागत बढ़ने की आशंका पहले से ही जताई जा रही है। कई देशों ने अपने जहाजों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हालात पर नजर रखी जा रही है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। हालांकि मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए तत्काल तनाव कम होने की संभावना कम दिखाई दे रही है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहा तो यह संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है, जिससे पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति प्रभावित होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 11:04:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ट्रम्प ने तेल कंपनियों को दी चेतावनी, पेट्रोल के दाम तुरंत घटाने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का हवाला देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि ग्राहकों से अब भी जरूरत से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं। उन्होंने तेल कंपनियों को जल्द कीमतें कम करने की चेतावनी दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trump-warns-oil-companies-demands-immediate-reduction-in-petrol-prices/article-57415"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका में पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पेट्रोल बेचने वाली कंपनियों से तुरंत कीमतें कम करने की मांग की है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ चुकी है, लेकिन इसका फायदा आम ग्राहकों तक नहीं पहुंच रहा। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि जब कच्चा तेल करीब 68 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया है, तब भी उपभोक्ताओं से पहले जैसी ऊंची कीमत वसूली जा रही है। उनके मुताबिक यह स्थिति न केवल अनुचित है बल्कि आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी डाल रही है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने संदेश में कहा कि पेट्रोल की कीमतों में तुरंत कमी की जानी चाहिए ताकि लोग राहत महसूस कर सकें। उन्होंने तेल कंपनियों से अपील की कि पेट्रोल का दाम करीब 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाया जाए। ट्रम्प का कहना है कि जब उत्पादन लागत और कच्चे तेल की कीमत घट रही है तो खुदरा कीमतों में भी उसी अनुपात में कमी दिखनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो इसका मतलब है कि कंपनियां ग्राहकों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूल रही हैं। उन्होंने इस तरह की स्थिति को गलत बताते हुए कंपनियों को जल्द कदम उठाने की सलाह दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्रम्प ने अपने बयान में यह भी कहा कि ग्राहकों से जरूरत से ज्यादा कीमत वसूलना गैरकानूनी है और अगर तेल कंपनियों ने जल्द दाम कम नहीं किए तो उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार इस दिशा में कौन से नए कदम उठा सकती है, लेकिन उन्होंने पहले भी अमेरिकी न्याय विभाग को बड़ी तेल कंपनियों की जांच के निर्देश दिए थे। माना जा रहा है कि यदि कीमतों में जल्द राहत नहीं मिलती है तो प्रशासन की ओर से जांच और निगरानी और सख्त की जा सकती है। पिछले कुछ महीनों में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। खासतौर पर अमेरिका, इजराइल और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था। उस समय कई देशों में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें भी बढ़ गई थीं। हालांकि अब हालात पहले की तुलना में कुछ सामान्य हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता हुआ है। इसके बावजूद कई इलाकों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अपेक्षित कमी नहीं आई है। यही मुद्दा ट्रम्प ने अपने बयान में उठाया है। पेट्रोल की खुदरा कीमत केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती। इसमें रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, टैक्स, वितरण व्यवस्था और स्थानीय बाजार की स्थिति भी शामिल होती है। कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद खुदरा स्तर पर कीमतों में बदलाव आने में कुछ समय लग जाता है। इसके बावजूद यदि लंबे समय तक राहत नहीं मिलती है तो उपभोक्ताओं और सरकार दोनों की ओर से सवाल उठना स्वाभाविक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका में ईंधन की कीमतें राजनीतिक मुद्दा भी बन जाती हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सीधा असर आम लोगों की जेब, महंगाई और परिवहन लागत पर पड़ता है। यही वजह है कि सरकारें अक्सर ईंधन की कीमतों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखती हैं। ट्रम्प का ताजा बयान भी ऐसे समय आया है जब महंगाई और ऊर्जा लागत को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे में तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है कि वे कीमतों की समीक्षा करें और उपभोक्ताओं को राहत देने पर विचार करें। तेल कंपनियों की ओर से ट्रम्प के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह भी साफ नहीं है कि आने वाले दिनों में खुदरा पेट्रोल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:18:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ट्रम्प की नीतियों से भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर, रो खन्ना का बड़ा दावा</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने कहा कि टैरिफ नीति और सहयोगी देशों से बिना सलाह लिए लिए गए फैसलों ने दोनों देशों के बीच भरोसे को कमजोर किया, जबकि अमेरिकी राजदूत ने मजबूत साझेदारी का भरोसा जताया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/ro-khannas-big-claim-on-trumps-policies-affecting-india-us-relations/article-57414"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indore-municipal-corporation-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">भारतीय मूल के अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद रो खन्ना ने भारत और अमेरिका के संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों की वजह से दोनों देशों के रिश्ते पिछले करीब 30 वर्षों में सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। वॉशिंगटन में आयोजित यूएस-इंडिया स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप फोरम (USISPF) लीडरशिप समिट 2026 में बोलते हुए खन्ना ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति, सहयोगी देशों से बिना चर्चा किए लिए गए फैसले और ईरान को लेकर अपनाया गया रुख अमेरिका की विश्वसनीयता पर असर डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे करीबी सहयोगी देशों के साथ विश्वास बनाए रखना किसी भी रणनीतिक साझेदारी की सबसे बड़ी जरूरत होती है, लेकिन हाल के वर्षों में इस भरोसे को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, इसी कार्यक्रम में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बताते हुए कहा कि रणनीतिक साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है और एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है।</p>
<p class="isSelectedEnd">रो खन्ना ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय फैसलों में अपने पारंपरिक सहयोगी देशों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया। उनके मुताबिक, ईरान को लेकर हुई सैन्य कार्रवाई जैसे फैसलों में भारत, यूरोप और कनाडा जैसे देशों से पहले चर्चा नहीं की गई। उन्होंने कहा कि जब सहयोगी देशों को विश्वास में नहीं लिया जाता तो इससे लंबे समय में रिश्तों पर असर पड़ता है। खन्ना का कहना था कि किसी भी वैश्विक साझेदारी की मजबूती केवल आर्थिक या सैन्य सहयोग से नहीं बल्कि आपसी भरोसे और संवाद से तय होती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया गया तो भविष्य में संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिकी सांसद ने ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीति की भी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि हाल ही में चीन की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक भारतीय राजनयिक से हुई थी। बातचीत के दौरान उस राजनयिक ने उनसे कहा कि अमेरिका की मौजूदा व्यापारिक नीतियों ने वर्षों से बना भरोसा कमजोर कर दिया है। खन्ना ने कहा कि व्यापारिक साझेदारी में अचानक लगाए गए टैरिफ और एकतरफा फैसले केवल आर्थिक प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उनका असर कूटनीतिक संबंधों पर भी दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले तीन दशकों में जो विश्वास बना था, उसे बनाए रखना दोनों देशों के हित में है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अपने संबोधन के दौरान रो खन्ना ने अमेरिकी घरेलू राजनीति का भी जिक्र किया। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प को "लेम डक" राष्ट्रपति बताते हुए दावा किया कि आने वाले मिड-टर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर सकती है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में वापसी करेगी। खन्ना के मुताबिक, नई पीढ़ी के नेताओं के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना नहीं होगी, बल्कि दुनिया के प्रमुख सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करना भी होगा। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी विदेश नीति सहयोग और साझेदारी पर आधारित थी तथा उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति भी सकारात्मक रुख दिखाया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि, कार्यक्रम में मौजूद भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अलग तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत हैं और दोनों देश कई अहम क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है और जल्द इस दिशा में सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सकती है। गोर ने कहा कि अमेरिका भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का सम्मान करता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लेकर प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा तथा निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले वर्षों में यह रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">सर्जियो गोर ने अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले मियामी में आयोजित एक यूएफसी कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने अचानक प्रधानमंत्री मोदी को फोन करने की इच्छा जताई थी। गोर के अनुसार, जब उन्होंने ट्रम्प को बताया कि भारत में उस समय सुबह के करीब छह बजे हैं, तब भी ट्रम्प ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी शायद जाग चुके होंगे। हालांकि कार्यक्रम की व्यस्तता के कारण उस समय बातचीत नहीं हो सकी और बाद में दोनों नेताओं की बातचीत तय हुई। गोर ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत विश्वास और सहज संवाद का उदाहरण है। उनके मुताबिक, जब दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर मजबूत संबंध होते हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव दोनों देशों के व्यापक रिश्तों पर भी पड़ता है।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान गोर ने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक साझेदार हैं और दोनों देशों के संबंध किसी एक मुद्दे या एक सरकार तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि बदलते वैश्विक हालात के बावजूद दोनों देशों के बीच आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी सहयोग आगे भी जारी रहेगा। वहीं, रो खन्ना के बयान ने इस बात पर नई बहस जरूर छेड़ दी है कि वैश्विक राजनीति, व्यापारिक नीतियां और कूटनीतिक फैसले किस तरह लंबे समय से बने रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते और रणनीतिक सहयोग को लेकर बातचीत जारी है, जिससे आने वाले समय में संबंधों की दिशा और अधिक स्पष्ट होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:17:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title> स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय कूटनीतिक वार्ता शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[ ईरान ने परमाणु बम न बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन संवर्धन अधिकार को बताया अटूट।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/us-iran-switzerland-talks-begin-amid-lebanon-crisis/article-56595"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-high-stakes-four-party-talks-begin-in-switzerland;-iran-assures-no-bomb-but-call-enrichment-non-negotiable-(2).jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr">अमेरिका और ईरान के बीच अत्यंत संवेदनशील और उच्च स्तरीय राजनयिक वार्ता रविवार दोपहर कड़ी सुरक्षा के बीच स्विट्जरलैंड के बर्गनस्टॉक में आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ की अगुवाई में हो रही इस चार-पक्षीय शिखर बैठक में पाकिस्तान और कतर के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">यह महत्वपूर्ण बैठक हाल ही में हस्ताक्षरित 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' (MoU) के बाद आयोजित की जा रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच जारी सैन्य संघर्ष को रोकना है। हालांकि, दोनों पक्ष 60 दिनों के अस्थाई युद्धविराम के साये में बातचीत की मेज पर आए हैं, लेकिन दोपहर के सत्र से पहले ही ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया। तेहरान ने साफ कहा कि उसका यूरेनियम संवर्धन (Nuclear Enrichment) का अधिकार पूरी तरह से संप्रभु और गैर-परक्राम्य (जिस पर कोई समझौता न हो सके) है, हालांकि वह यह लिखित आश्वासन देने को तैयार है कि वह कभी भी परमाणु बम नहीं बनाएगा।</p>
<p dir="ltr">स्विस विदेश मंत्रालय के अनुसार, राजनयिक कार्यक्रम की शुरुआत बंद कमरे में हुई द्विपक्षीय बैठकों से हुई, जहां ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थ टीमों के साथ बातचीत की रूपरेखा तैयार की। इन तकनीकी वार्ताओं के बाद—जिसमें पाकिस्तान के थल सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर की अचानक मौजूदगी ने सबको चौंका दिया—दोपहर बाद आधिकारिक चार-पक्षीय पूर्ण सत्र (Plenary Session) की शुरुआत हुई।</p>
<h3 dir="ltr">लेबनान संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य एजेंडे में सबसे ऊपर</h3>
<p dir="ltr">मूल रूप से यह बैठक अमेरिका-ईरान अंतरिम शांति समझौते की तकनीकी बारीकियों को तय करने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन क्षेत्र में तेजी से बिगड़ते हालातों के कारण चर्चा का दायरा तुरंत बढ़ा दिया गया। दोनों प्रतिनिधिमंडलों के सूत्रों ने पुष्टि की है कि लेबनान में जारी संघर्ष की आपातकालीन समीक्षा को बैठक के प्राथमिक एजेंडे के रूप में शामिल किया गया है।</p>
<p dir="ltr">मध्य पूर्व में सुरक्षा स्थिति इस समय बेहद नाजुक बनी हुई है। सप्ताहांत में दक्षिणी लेबनान के कफ़र तेबनित के पास हिजबुल्लाह के रॉकेट और ड्रोन हमलों में कम से कम छह इजरायली सैनिक मारे गए और 20 अन्य घायल हो गए। इसके साथ ही लेबनान के पश्चिमी बेका और टायर क्षेत्रों में इजरायली हवाई हमलों में एक बच्चे और महिला सहित कम से कम सात नागरिकों की जान चली गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्विट्जरलैंड पहुंचने से पहले कहा था कि लेबनान में स्थाई युद्धविराम सुनिश्चित करना वाशिंगटन की तात्कालिक प्राथमिकता है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने इजरायल पर लेबनान में अपनी प्रतिबद्धताओं को बार-बार तोड़ने का आरोप लगाया।</p>
<p dir="ltr">सैन्य तनाव के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन (समुद्री व्यापार मार्ग) को लेकर भी विवाद गहरा गया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े फार्स न्यूज ने संकेत दिया है कि रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अगले आदेश तक अनधिकृत वाणिज्यिक जहाजों के लिए पूरी तरह बंद रहेगा। इस समुद्री नाकेबंदी ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मचा दिया है, जिसके कारण कतर को खाड़ी देशों की ओर से सुबह के सत्र में आक्रामक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि खाड़ी देशों की तेल और गैस आपूर्ति श्रृंखला इस बंदी के कारण सीधे तौर पर ठप हो गई है।</p>
<h3 dir="ltr">अरबों डॉलर का वित्तीय और कूटनीतिक गतिरोध</h3>
<p dir="ltr">बर्गनस्टॉक शिखर सम्मेलन के आर्थिक दांव बेहद ऊंचे हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने रविवार को घोषणा की कि इस प्रारंभिक समझौते का एक मुख्य हिस्सा कतरी खातों में फ्रीज (जब्त) किए गए 6 अरब डॉलर के ईरानी फंड की तत्काल रिहाई है। पेज़ेशकियन ने दावा किया कि इस समझौते की शर्तें पूरी तरह से तेहरान के पक्ष में हैं, और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन अधिकारों को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है जिन्हें वाशिंगटन पहले दबाना चाहता था।</p>
<p dir="ltr">दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन से इस पूरे मामले में एक नया और विवादित मोड़ जोड़ दिया है। ट्रंप ने पुष्टि की कि 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा, लेकिन भविष्य में यह मुफ्त आवाजाही सशर्त होगी। उन्होंने संकेत दिया कि यदि कोई व्यापक समझौता नहीं होता है, तो मध्य पूर्व की सुरक्षा में अमेरिका द्वारा निभाई गई "गार्जियन एंजेल" (रक्षक) की भूमिका और सुरक्षा खर्चों की भरपाई के लिए अमेरिका जहाजों पर ट्रांजिट फीस (टोल) लगा सकता है।</p>
<p dir="ltr">"अमेरिका के साथ किसी भी अंतिम शांति समझौते की असली परीक्षा कागजों पर नहीं, बल्कि तेल क्षेत्र में होगी। हम वैश्विक भागीदारों के लिए सैकड़ों निवेश परियोजनाएं खोलने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब पश्चिमी देश प्रतिबंधों में ढील देने के अपने वादों का पूरी तरह पालन करेंगे।" — मोहसेन पाकनेजाद, ईरानी तेल मंत्री</p>
<h3 dir="ltr">कड़ा घरेलू विरोध और संशय के बादल</h3>
<p dir="ltr">स्विट्जरलैंड में चल रही इस कूटनीतिक कवायद के बावजूद, दोनों देशों के भीतर घरेलू स्तर पर राजनीतिक विरोध तेज हो गया है। वाशिंगटन में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने भू-राजनीतिक गतिरोध से निपटने के राष्ट्रपति ट्रंप के तरीकों पर चौतरफा हमला बोला है। मैरीलैंड के डेमोक्रेटिक सांसद जॉनी ओल्शेवस्की ने सोशल मीडिया पर इस पहल की कड़ी आलोचना करते हुए इसे "समझौते के रूप में पेश किया गया एक दिखावटी युद्धविराम" करार दिया, जो लागू होने से पहले ही बिखरना शुरू हो गया है।</p>
<p dir="ltr">ऐसा ही असंतोष यरूशलेम (इजरायल) में भी देखने को मिल रहा है। हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम और अगाम इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक व्यापक जनमत संग्रह (Poll) से पता चला है कि 92.1% इजरायलियों का मानना है कि इस हालिया संघर्ष और अमेरिकी समझौते से ईरान और मजबूत होकर उभरा है। इसके अलावा, 82.9% उत्तरदाताओं को लगता है कि इससे इजरायल की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ गंभीर समझौता हुआ है।</p>
<p dir="ltr">इस कड़े रुख को दोहराते हुए इजरायल के दक्षिणपंथी वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने रविवार को दोटूक कहा कि जब तक हिजबुल्लाह पूरी तरह से अपने हथियार नहीं डाल देता, तब तक इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान से "एक मिलीमीटर भी पीछे नहीं हटेगी"। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका समय से पहले पीछे हटने की मांग करता है, तो इजरायल वाशिंगटन के दबाव के आगे नहीं झुकेगा।</p>
<p dir="ltr">फिलहाल, अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाने के बाद ईरान ने अपने खार्ग द्वीप निर्यात टर्मिनल से कच्चे तेल की लोडिंग दोबारा शुरू कर दी है। आर्थिक मोर्चे पर यह समझौता राजनीतिक सहमति की तुलना में कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि, ईरान के सर्वोच्च नेता के वरिष्ठ सलाहकारों, जिनमें मोहसेन रजाई और मोहम्मद मोखबर शामिल हैं, ने अपने वार्ताकारों को अमेरिकी हस्ताक्षरों पर अत्यधिक भरोसा न करने की चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कहा है कि यदि वाशिंगटन अपने आर्थिक वादों से मुकरता है, तो मध्य पूर्व के ऊर्जा गलियारों को एक बार फिर तत्काल व्यवधानों का सामना करना पड़ेगा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 17:24:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दैनिक जागरण]]></dc:creator>
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                <title>सुबह ईरान को चेतावनी, रात में शांति समझौता; एक दिन में बदला ट्रम्प का रुख</title>
                                    <description><![CDATA[G7 समिट में सख्त बयान देने वाले ट्रम्प ने कुछ घंटों बाद फ्रांस के वर्साय पैलेस में ईरान के साथ शांति समझौते पर किए हस्ताक्षर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/warning-to-iran-in-the-morning-peace-agreement-at-night/article-56330"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(4).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच बुधवार का दिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ही दिन में ऐसा रुख दिखाया जिसने दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया। सुबह तक ईरान को कड़ी चेतावनी देने वाले ट्रम्प ने रात होते-होते उसी देश के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। यह घटनाक्रम फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आया, जहां ट्रम्प के बयानों और फैसलों ने वैश्विक कूटनीति को नई दिशा दे दी। दिन की शुरुआत में ट्रम्प ने G7 समिट के दौरान आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ईरान को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। ट्रम्प ने यह भी चेतावनी दी कि यदि आने वाले समय में समझौता नहीं हुआ और हालात बिगड़ते हैं, तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। उनके इस बयान को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने प्रमुखता से दिखाया और माना गया कि अमेरिका ईरान के खिलाफ दबाव की नीति जारी रखेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी दौरान ट्रम्प की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में ट्रम्प ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वह बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले नेता हैं। ट्रम्प की यह टिप्पणी भी दिनभर चर्चा का विषय बनी रही। हालांकि वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा नजरें ईरान को लेकर उनके अगले कदम पर टिकी हुई थीं। G7 सम्मेलन समाप्त होने के बाद ट्रम्प अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ फ्रांस के ऐतिहासिक वर्साय पैलेस के लिए रवाना हुए। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उन्हें विशेष रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया था। बताया गया कि G7 नेताओं में ट्रम्प अकेले ऐसे नेता थे जिन्हें इस विशेष आयोजन के लिए न्योता मिला था। वर्साय पहुंचने पर मैक्रों और उनकी पत्नी ब्रिजिट मैक्रों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान दोनों देशों के रिश्तों और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वर्साय पैलेस अपने भव्य इतिहास और शानदार वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। ट्रम्प ने यहां के ऐतिहासिक हिस्सों का दौरा किया और विशेष रूप से शीशमहल को काफी देर तक देखा। बताया जाता है कि 357 बड़े आइनों से सजी इस ऐतिहासिक गैलरी की भव्यता ने उन्हें प्रभावित किया। सोने की नक्काशी और शाही सजावट के प्रति रुचि रखने वाले ट्रम्प ने इस इमारत की खुलकर प्रशंसा भी की। इस दौरान माहौल पूरी तरह औपचारिक और मैत्रीपूर्ण नजर आ रहा था। हालांकि असली घटनाक्रम डिनर शुरू होने से ठीक पहले सामने आया। रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्साय पैलेस में मौजूद कई अधिकारियों और मेहमानों को आखिरी समय तक यह जानकारी नहीं थी कि ईरान से जुड़े समझौते पर उसी रात हस्ताक्षर हो सकते हैं। कुछ तस्वीरों में ट्रम्प और मैक्रों को एक फोन कॉल के दौरान बातचीत करते हुए देखा गया। माना जा रहा है कि इसी दौरान अंतिम स्तर की चर्चा हुई और समझौते को मंजूरी मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके बाद ट्रम्प ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। हस्ताक्षर के समय फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों उनके साथ मौजूद थे, जबकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो भी वहां उपस्थित थे। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हुए ट्रम्प की तस्वीरें सामने आते ही पूरी दुनिया में यह खबर तेजी से फैल गई। खास बात यह रही कि जिस समझौते को आधिकारिक तौर पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में अंतिम रूप दिया जाना था, उस पर अपेक्षा से पहले फ्रांस में ही हस्ताक्षर कर दिए गए। हस्ताक्षर के बाद ट्रम्प ने मीडिया के सामने संक्षिप्त प्रतिक्रिया दी। जब एक पत्रकार ने उनसे समझौते के बारे में पूछा तो उन्होंने जोर से जवाब दिया, “साइन किए।” इस एक वाक्य ने पूरे दिन की राजनीतिक कहानी को समेट दिया। सुबह जहां ट्रम्प ईरान के खिलाफ सख्त बयान दे रहे थे, वहीं रात तक वे समझौते के जरिए तनाव कम करने की दिशा में कदम उठा चुके थे। ट्रम्प की यह रणनीति दबाव और बातचीत के मिश्रण पर आधारित रही। पहले उन्होंने कड़ा संदेश देकर अपनी स्थिति मजबूत की और बाद में बातचीत के जरिए समझौते का रास्ता चुना। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसे ट्रम्प की पारंपरिक वार्ता शैली का हिस्सा मान रहे हैं, जिसमें वह पहले सख्त रुख अपनाते हैं और फिर अचानक समझौते की ओर बढ़ जाते हैं। इस समझौते को पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 16:57:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड से हटाया ‘इंडो’, भारत की भूमिका पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[2018 में चीन को संतुलित करने की रणनीति के तहत जोड़ा गया था ‘इंडो’, अब नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड करने पर विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-removes-indo-from-indo-pacific-command-questions-raised-on-indias/article-56234"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-pacific-command.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह कदम अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है और क्या इससे भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर कोई नया संदेश जा रहा है। वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने इस सैन्य कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं माना गया था, बल्कि इसे अमेरिका की नई एशिया रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया था। अमेरिका ने तब स्पष्ट किया था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने नाम परिवर्तन की घोषणा करते हुए कहा था कि हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसकी भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था ताकि भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को दर्शाया जा सके।अब आठ साल बाद इस फैसले को पलटते हुए अमेरिका ने फिर से पुराना नाम अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यूएस पैसिफिक कमांड नाम ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है और इसका सैन्य विरासत से गहरा संबंध रहा है। मंत्रालय के अनुसार यह नाम कई महत्वपूर्ण अभियानों, युद्धों और सैन्य उपलब्धियों का प्रतीक है। इसलिए इसे वापस लाने का फैसला किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पेंटागन ने साफ किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की जिम्मेदारियों, अधिकार क्षेत्र, सैन्य रणनीति और संचालन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस कदम को केवल औपचारिक बदलाव मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कूटनीति और सुरक्षा नीति में प्रतीकों का भी बड़ा महत्व होता है और ऐसे फैसले अक्सर व्यापक रणनीतिक संकेत देते हैं। जब 2018 में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था, तब अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी चिंतित था। उस समय भारत को अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय साझेदार माना जा रहा था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का उद्देश्य क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान बदलाव से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका अब अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की नई विदेश नीति सोच से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अब अपने संसाधनों और सैन्य फोकस को अलग तरीके से व्यवस्थित करना चाहता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी रणनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है। इस फैसले पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड के भविष्य के लिए कोई संकेत है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील साबित हो सकती है। थरूर की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों पर लगातार चर्चा हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। इसका क्षेत्र एशिया-प्रशांत के विशाल हिस्से तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और कई अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इसी वजह से इसके नाम में होने वाला बदलाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति के अन्य फैसलों पर नजर रखनी होगी। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह कदम केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच काम कर रही है। फिलहाल अमेरिका ने यह जरूर कहा है कि उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके बावजूद भारत, क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े देशों में इस फैसले को लेकर चर्चा जारी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:39:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>यूएस-ईरान न्यूक्लियर डील पर ट्रंप का बड़ा दावा, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने पर सहमति जताई</title>
                                    <description><![CDATA[ट्रंप बोले—ईरान को 300 अरब डॉलर देने की खबर फर्जी, वेंस ने समझौते को बताया ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trumps-big-claim-on-us-iran-nuclear-deal-iran-agreed-not/article-56041"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-nuclear-deal.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव और संघर्ष के बीच अब परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक बड़ा राजनीतिक दावा सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान ने परमाणु हथियार कभी न बनाने पर सहमति जताई है। ट्रंप ने यह भी साफ किया कि सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में जो यह दावा किया जा रहा है कि अमेरिका ईरान को 300 अरब डॉलर दे रहा है, वह पूरी तरह “फर्जी खबर” है। ट्रंप ने यह बयान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए दिया। उन्होंने लिखा कि ईरान ने स्पष्ट रूप से परमाणु हथियार न रखने पर सहमति दी है और 300 मिलियन या अरब डॉलर देने की बात गलत तरीके से फैलायी जा रही है। ट्रंप ने इस तरह की खबरों को राजनीतिक विरोधियों की साजिश बताया और कहा कि यह जानकारी अमेरिकी जनता को भ्रमित करने के लिए फैलाई जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक समझौते पर हस्ताक्षर होने की खबरें सामने आई हैं। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच वर्षों से चले आ रहे युद्ध जैसे हालात को समाप्त करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक स्थायी ढांचा तैयार करना बताया जा रहा है। हालांकि अभी तक इस डील के सभी विस्तृत बिंदु सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, जिससे कई सवाल बने हुए हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने भी ट्रंप के बयान का समर्थन करते हुए इसे बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है। वेंस ने कहा कि पूरी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यही था कि ईरान किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने यह भी दावा किया कि यह समझौता अमेरिकी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि है और इससे क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूती मिलेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच ईरान की तरफ से भी सावधानी भरी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इस समझौते को एक महत्वपूर्ण कदम बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अभी अंतिम शांति समझौता तैयार होना बाकी है। ईरानी पक्ष का कहना है कि किसी भी स्थायी समझौते के लिए विस्तृत बातचीत और ठोस शर्तों पर सहमति जरूरी है। सबसे बड़ा विवाद उस 300 अरब डॉलर के कथित पैकेज को लेकर है, जिस पर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। ट्रंप ने जहां इसे पूरी तरह झूठ बताया है, वहीं कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह रकम किसी प्रत्यक्ष भुगतान के रूप में नहीं बल्कि आर्थिक पुनर्निर्माण और निवेश कार्यक्रम से जुड़ी हो सकती है। ईरानी मीडिया का दावा है कि यह राशि युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई और प्रतिबंधों में राहत के तौर पर मांगी गई संभावित आर्थिक पैकेज का हिस्सा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि ईरान ने 24 अरब डॉलर की फ्रीज संपत्तियों की रिहाई की मांग की है और साथ ही तेल और पेट्रोकेमिकल सेक्टर पर लगे प्रतिबंधों में ढील की भी बात शामिल है। ईरानी पक्ष का तर्क है कि देश को हुए नुकसान का आकलन कई सौ अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, इसलिए आर्थिक राहत किसी भी समझौते का अहम हिस्सा होना चाहिए। दूसरी ओर पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स में इस आंकड़े को अलग नजरिए से देखा जा रहा है। इन रिपोर्ट्स के अनुसार यह 300 अरब डॉलर का पैकेज सीधे भुगतान नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेश और पुनर्निर्माण सहयोग से जुड़ा एक प्रस्ताव हो सकता है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी भी शामिल हो सकती है। इस अंतर ने पूरे समझौते को और अधिक विवादित बना दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">समझौते के प्रारंभिक ढांचे को लेकर उपराष्ट्रपति वेंस ने कहा है कि यह दस्तावेज अभी केवल डेढ़ पेज का है और बहुत सामान्य प्रकृति का है। उन्होंने यह भी बताया कि आने वाले दिनों में इसके और विवरण सामने आएंगे। वेंस के अनुसार समझौते में परमाणु निरीक्षकों की वापसी, यूरेनियम स्टॉकपाइल के प्रबंधन और प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दे शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को ईरान में दोबारा प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है, ताकि परमाणु गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके। इसके अलावा यह भी प्रस्ताव है कि ईरान के उच्च स्तर पर समृद्ध यूरेनियम भंडार को लेकर एक साझा समाधान निकाला जाएगा। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि किसी भी अंतिम समझौते से पहले ईरान को कई अहम शर्तों को पूरा करना होगा, जिनमें परमाणु हथियार न बनाने की गारंटी और क्षेत्रीय उग्रवादी समूहों से दूरी बनाना शामिल है। हालांकि ईरान की ओर से इन शर्तों पर औपचारिक प्रतिक्रिया अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 11:19:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यूएस-ईरान डील पर ट्रंप का बड़ा दावा, शुक्रवार तक समझौता जारी हो सकता है</title>
                                    <description><![CDATA[वेस्ट एशिया युद्ध खत्म करने के लिए वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सहमति, वेंस बोले—परमाणु निरीक्षकों की वापसी तय मानी जा रही है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/trumps-big-claim-on-us-iran-deal-agreement-may-be-finalized/article-56039"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-deal-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव और संघर्ष के बीच अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को संकेत दिया कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच हुआ नया समझौता शुक्रवार तक सार्वजनिक किया जा सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच कई हफ्तों से चली आ रही कूटनीतिक बातचीत और तनावपूर्ण हालात के बाद वेस्ट एशिया में शांति की उम्मीदें बढ़ी हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो रही है और यह अहम तेल मार्ग शुक्रवार तक पूरी तरह “खुला” हो सकता है। यह समझौता कई दौर की कठिन वार्ताओं के बाद तैयार हुआ है, जिसमें सैन्य तनाव, क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। हालांकि अभी तक इस डील के सभी बिंदु सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, जिससे कई सवाल बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की वास्तविक शर्तें सामने आने के बाद ही यह साफ होगा कि दोनों देशों ने किन मुद्दों पर समझौता किया है और किन पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस पूरे घटनाक्रम पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि उनके देश का इतिहास टूटे हुए वादों और अधूरे समझौतों से भरा रहा है, इसलिए वे किसी भी समझौते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकते। अराघची ने कहा कि पिछले अनुभवों को देखते हुए ईरान सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहा है और किसी भी जल्दबाजी से बचना चाहता है। उनके बयान से यह साफ संकेत मिला है कि ईरान अभी भी पूरी तरह भरोसे की स्थिति में नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने भी इस समझौते को लेकर अहम जानकारी दी है। उन्होंने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा कि इस डील के तहत परमाणु निरीक्षकों को ईरान में दोबारा प्रवेश की अनुमति दी जाएगी। वेंस के अनुसार यह कदम पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे युद्ध और तनाव को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। यह पूरा घटनाक्रम कई हफ्तों की कूटनीतिक बातचीत, दबाव और क्षेत्रीय तनाव के बाद सामने आया है। इस दौरान कई बार ऐसी आशंका जताई गई थी कि स्थिति और बिगड़ सकती है और सैन्य टकराव दोबारा शुरू हो सकता है। लेकिन अचानक हुए इस समझौते ने हालात को काफी हद तक बदल दिया है। हालांकि अभी भी  इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जब तक आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं आते, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। सबसे अहम मुद्दों में होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना शामिल है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ट्रंप के अनुसार, इस रूट से जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो चुकी है और आने वाले दिनों में यह पूरी तरह सामान्य हो जाएगी। अगर यह स्थिति स्थिर रहती है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है, जहां पिछले कुछ समय से अस्थिरता बनी हुई थी। अमेरिका और ईरान के बीच इस संभावित समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी नजर बनाए हुए है। कई देशों का मानना है कि यदि यह डील सफल रहती है तो वेस्ट एशिया में शांति की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। यह समझौता कितना टिकाऊ होगा, यह आने वाले समय में दोनों देशों के व्यवहार और प्रतिबद्धताओं पर निर्भर करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 11:19:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईरान युद्ध खत्म होने का ट्रंप का दावा, जल्द हो सकता है समझौता</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ शांति समझौता अंतिम चरण में है, सप्ताहांत तक यूरोप में हस्ताक्षर होने की उम्मीद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trumps-claim-of-ending-iran-war-may-reach-agreement-soon/article-55737"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में कई दिनों से जारी तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ संघर्ष अब प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका है और दोनों पक्षों के बीच एक व्यापक समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस समझौते पर यूरोप में सप्ताहांत तक हस्ताक्षर हो सकते हैं। ट्रंप के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ वैश्विक बाजारों का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। उनके अनुसार, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस संभावित समझौता समारोह में अमेरिका का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर उन्होंने कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत और पाकिस्तान सहित कई देशों के नेताओं से चर्चा की है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने परमाणु हथियार हासिल करने की किसी भी कोशिश को स्थायी रूप से छोड़ने पर सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त यही थी कि ईरान भविष्य में किसी भी रूप में परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। ट्रंप के अनुसार, प्रस्तावित समझौते में इस विषय पर विस्तृत और स्पष्ट प्रावधान शामिल किए गए हैं। बाद में एक टेली-रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के साथ चल रहे युद्ध को समाप्त कर दिया है। उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि यह संघर्ष उसी उद्देश्य के लिए था जिसके तहत अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता था कि ईरान कभी परमाणु हथियार न बना सके। ट्रंप ने कहा कि अब ईरान इस शर्त को स्वीकार कर चुका है और इसी कारण शांति की दिशा में तेजी से प्रगति हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप का यह बयान उस समय आया है जब कुछ घंटे पहले तक उनका रुख काफी आक्रामक दिखाई दे रहा था। दिन में उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी थी। यहां तक कि उन्होंने ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप और अन्य ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की बात भी कही थी। लेकिन बाद में उन्होंने प्रस्तावित हमलों को रोकने की घोषणा कर दी और कहा कि बातचीत में सकारात्मक प्रगति होने के कारण सैन्य कार्रवाई फिलहाल टाल दी गई है। ट्रंप के इस अचानक बदले रुख के पीछे कूटनीतिक प्रयासों की बड़ी भूमिका हो सकती है। पिछले कुछ सप्ताहों से अमेरिका और ईरान के बीच विभिन्न माध्यमों से बातचीत जारी थी। कई बार यह संकेत मिले कि दोनों देश किसी समझौते के करीब पहुंच गए हैं, लेकिन अब तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी। ट्रंप का ताजा बयान इस दिशा में सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि समझौता होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित और सामान्य तरीके से संचालित किया जाएगा। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। हाल के तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई थी। ट्रंप के अनुसार, यदि समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। वित्तीय बाजारों में भी इस खबर का असर देखने को मिला। निवेशकों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक कदम माना। लंबे समय से चल रही अनिश्चितता के कारण ऊर्जा कीमतों और शेयर बाजारों पर दबाव बना हुआ था। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम समझौते के दस्तावेज सामने आने के बाद ही इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा। ईरान की ओर से अभी तक समझौते को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि विभिन्न कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि बातचीत के कई दौर सफल रहे हैं और दोनों पक्ष कुछ प्रमुख मुद्दों पर सहमति के करीब पहुंच चुके हैं। ऐसे में ट्रंप के बयान को वार्ता प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यदि यह समझौता सफल होता है तो यह केवल अमेरिका और ईरान के संबंधों को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था पर इसका असर पड़ेगा। लंबे समय से क्षेत्र में मौजूद तनाव, प्रतिबंधों और सैन्य टकराव की आशंकाओं के बीच किसी बड़े समझौते की संभावना को महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि अंतिम दस्तावेज सार्वजनिक होने तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। उनका मानना है कि कई बार वार्ताएं अंतिम चरण तक पहुंचने के बाद भी बाधित हो जाती हैं। इसके बावजूद ट्रंप का आत्मविश्वास और उनके द्वारा दिए गए संकेत यह दर्शाते हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अब पूरी दुनिया की निगाहें संभावित समझौते पर टिकी हैं। यदि सप्ताहांत तक यूरोप में इस पर हस्ताक्षर होते हैं, तो यह हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक घटनाओं में से एक साबित हो सकता है। साथ ही यह भी तय करेगा कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:20:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर, कुवैत ने बंद किया हवाई क्षेत्र; मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिकी हमलों के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई का दावा, कुवैत और बहरीन अलर्ट पर; इजराइल ने भी उत्तरी सीमा पर हमले की चेतावनी जारी की]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/at-the-height-of-us-iran-tension-kuwait-closed-its-airspace/article-55672"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-conflict-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका द्वारा ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। गुरुवार को कुवैत ने "ईरानी आक्रामकता" का हवाला देते हुए अस्थायी रूप से अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया, जबकि इजराइल ने लेबनान की दिशा से उत्तरी इलाकों पर संभावित हमलों की चेतावनी जारी की। घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में व्यापक संघर्ष की आशंका को और गहरा कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कुवैत सरकार के अनुसार, देश की वायु सुरक्षा प्रणालियों ने कई संदिग्ध हवाई लक्ष्यों को इंटरसेप्ट किया। सुरक्षा कारणों से नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने कुछ घंटों के लिए हवाई क्षेत्र बंद रखने का फैसला किया। बाद में स्थिति नियंत्रण में आने के बाद हवाई क्षेत्र को फिर से खोल दिया गया। हालांकि इस दौरान क्षेत्रीय उड़ानों और अंतरराष्ट्रीय एयर ट्रैफिक पर असर पड़ा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि ईरान ने कुवैत और बहरीन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। रिपोर्टों के अनुसार, कुवैत के अली सलेम और अहमद अल-जाबेर एयर बेस के अलावा बहरीन के शेख ईसा एयर बेस पर भी हमले किए गए। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। बहरीन ने कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने कई हवाई हमलों को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बीच इजराइल की होम फ्रंट कमांड ने उत्तरी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों ने कहा कि लेबनान की दिशा से रॉकेट या अन्य हमले किए जाने की आशंका है। सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तनाव की यह स्थिति तब पैदा हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना ने ईरान के कई सैन्य और निगरानी ठिकानों पर हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, इन हमलों में ईरान की सैन्य निगरानी क्षमताओं, संचार नेटवर्क और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाया गया। अमेरिका का दावा है कि ये कार्रवाई उन खतरों को समाप्त करने के लिए की गई जो अमेरिकी सैनिकों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए जोखिम पैदा कर रहे थे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान ने इसके जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। ईरानी मीडिया ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास अमेरिकी जहाजों को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया गया। इसके साथ ही ईरान की शीर्ष सैन्य कमान ने जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद करने की चेतावनी दी है। यदि ऐसा होता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मार्ग पर सैन्य तनाव बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसका असर भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त रुख दिखाया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रख सकता है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के बाद ईरानी अधिकारियों ने उनसे संपर्क कर कार्रवाई रोकने की अपील की थी। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ तो अमेरिका आगे भी सैन्य कदम उठा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्रंप ने ईरान से परमाणु और सुरक्षा समझौते पर सहमति बनाने की अपील करते हुए कहा कि अमेरिका एक ऐसा समझौता चाहता है जो प्रभावी और स्थायी हो। दूसरी ओर ईरान ने अमेरिकी दबाव को खारिज करते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अज़ीजी ने कहा कि यदि संघर्ष बढ़ा तो इसका दायरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी चिंतित है। कई देशों ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी है। वैश्विक बाजारों में भी अनिश्चितता का माहौल देखा जा रहा है। निवेशक स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो इसका असर केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और वैश्विक कूटनीति सभी प्रभावित हो सकते हैं।  मध्य पूर्व में तेजी से बदलते हालात के बीच आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:53:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>होर्मुज स्ट्रेट के पास अमेरिकी अपाचे हेलिकॉप्टर क्रैश, पायलट सुरक्षित; ईरान-इजराइल तनाव के बीच बढ़ी चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[समुद्री सुरक्षा मिशन के दौरान हुआ हादसा, अमेरिकी सेना ने शुरू की जांच; मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच घटना ने खींचा दुनिया का ध्यान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/american-apache-helicopter-crashes-near-the-strait-of-hormuz-pilot/article-55453"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-helicopter-crash.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका का एक अपाचे हेलिकॉप्टर होर्मुज स्ट्रेट के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। घटना सोमवार की बताई जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान हेलिकॉप्टर क्रैश होने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि हेलिकॉप्टर में मौजूद दोनों पायलट सुरक्षित हैं और उन्हें किसी तरह की गंभीर चोट नहीं आई है। हालांकि दुर्घटना के पीछे की वजह अभी साफ नहीं हो पाई है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक हेलिकॉप्टर समुद्री सुरक्षा अभियान में शामिल था और नियमित ऑपरेशन के दौरान हादसे का शिकार हुआ।</p>
<p class="isSelectedEnd">घटना ऐसे समय में हुई है जब होर्मुज स्ट्रेट और आसपास के समुद्री इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था बेहद संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका इस क्षेत्र में अपने सैन्य संसाधनों की तैनाती बढ़ा चुका है। अपाचे हेलिकॉप्टरों के अलावा MQ-9 रीपर ड्रोन, F/A-18 और F-35 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान भी लगातार निगरानी और सुरक्षा मिशन में लगे हुए हैं। बताया जा रहा है कि अपाचे हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल खासतौर पर छोटी हथियारबंद नौकाओं और ड्रोन खतरों को रोकने के लिए किया जाता है। ऐसे में इस हेलिकॉप्टर का दुर्घटनाग्रस्त होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने घटना की जांच शुरू कर दी है। फिलहाल यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि हेलिकॉप्टर तकनीकी खराबी के कारण गिरा या फिर किसी बाहरी हमले का शिकार हुआ। हालांकि अभी तक किसी हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। रक्षा अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी। घटना के बाद क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य इकाइयों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच ईरान और इजराइल के बीच फिर से बढ़े तनाव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। करीब दो महीने पहले हुए युद्धविराम के बाद हालात कुछ सामान्य होते दिखाई दे रहे थे, लेकिन पिछले 24 घंटों में घटनाक्रम तेजी से बदला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने इजराइल की ओर करीब 30 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इसके जवाब में इजराइली सेना ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और पेट्रोकेमिकल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। दोनों देशों के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">तनाव बढ़ने के बाद भारत ने भी अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। ईरान में मौजूद भारतीय नागरिकों से सतर्क रहने और आवश्यक होने पर जल्द देश छोड़ने की सलाह दी गई है। भारतीय दूतावास ने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने को कहा है। क्षेत्र में हालात तेजी से बदल रहे हैं और सुरक्षा स्थिति को लेकर लगातार निगरानी रखी जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">उधर यमन के हूती विद्रोहियों ने भी हालात को और जटिल बना दिया है। हूती समूह ने रेड सी में इजराइल से जुड़े जहाजों की नाकाबंदी का ऐलान किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इजराइल से जुड़े किसी भी जहाज को निशाना बनाया जा सकता है। इस घोषणा के बाद वैश्विक समुद्री व्यापार को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां पहले ही अपने रूट्स की समीक्षा कर रही हैं। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। तेल बाजार पर भी इस तनाव का सीधा असर दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई दोनों के दाम ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं।  यदि होर्मुज स्ट्रेट में किसी तरह की बाधा उत्पन्न होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेदों की खबरें भी चर्चा में हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ट्रम्प ने नेतन्याहू से ईरान के खिलाफ बड़े स्तर पर जवाबी कार्रवाई से बचने को कहा है। हालांकि दोनों देशों की ओर से इस पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ट्रम्प ने इतना जरूर कहा कि भविष्य में ईरान के साथ जो भी समझौता होगा, उसमें सभी पक्षों को सहयोग करना होगा। अमेरिकी हेलिकॉप्टर हादसे और ईरान-इजराइल तनाव ने पूरे मध्य पूर्व को एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:41:46 +0530</pubDate>
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                <title>H-1B वीजा फीस पर ट्रंप प्रशासन को झटका, कोर्ट ने फैसला रद्द किया</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिकी अदालत ने 1 लाख डॉलर फीस बढ़ोतरी को अवैध बताया, भारतीय पेशेवरों और कंपनियों को मिल सकती है बड़ी राहत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/shock-to-trump-administration-on-h-1b-visa-fees-court-cancels/article-55417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/h-1b-visa-news.jpg" alt=""></a><br /><p>अमेरिका में काम करने और बसने का सपना देखने वाले हजारों भारतीय पेशेवरों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिकी संघीय अदालत ने H-1B वीजा से जुड़े उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसके तहत वीजा आवेदन की फीस को बढ़ाकर एक लाख डॉलर तक कर दिया गया था। यह फैसला ट्रंप प्रशासन की उन नीतियों में शामिल था, जिनका उद्देश्य अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की संख्या को सीमित करना और स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना बताया गया था। लेकिन अब अदालत ने इस फैसले को गैर-कानूनी मानते हुए इसे निरस्त कर दिया है। इस निर्णय को भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो बड़ी संख्या में विदेशी प्रतिभाओं को रोजगार देती हैं।</p>
<p>बोस्टन की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज लियो सोरोकिन ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि H-1B वीजा फीस में इतनी बड़ी बढ़ोतरी के लिए आवश्यक विधायी मंजूरी नहीं ली गई थी। अदालत का मानना था कि ऐसा कोई भी बड़ा वित्तीय निर्णय कांग्रेस की स्वीकृति के बिना लागू नहीं किया जा सकता। यही वजह रही कि अदालत ने फीस बढ़ाने के आदेश को अवैध करार दिया। इस फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर झटका माना जा रहा है। पिछले साल जारी किए गए आदेश में H-1B वीजा की लागत कई गुना बढ़ाकर एक लाख डॉलर कर दी गई थी, जबकि पहले यह फीस विभिन्न श्रेणियों के आधार पर आमतौर पर दो हजार से पांच हजार डॉलर के बीच होती थी।</p>
<p>यदि यह बढ़ी हुई फीस लागू रहती तो हजारों कंपनियों और विदेशी कर्मचारियों के लिए अमेरिका में नौकरी हासिल करना काफी मुश्किल हो जाता। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता क्योंकि H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी समुदाय भारतीयों का ही रहा है। हर साल बड़ी संख्या में भारतीय आईटी विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डेटा वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र के अन्य पेशेवर इस वीजा के जरिए अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं। ऐसे में अदालत के इस फैसले को भारतीय समुदाय के लिए राहत भरा कदम माना जा रहा है।</p>
<p>अमेरिका का H-1B वीजा प्रोग्राम लंबे समय से दुनिया के सबसे लोकप्रिय रोजगार वीजा कार्यक्रमों में शामिल रहा है। इसके तहत हर साल 65,000 नए वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अलावा उच्च शिक्षा प्राप्त और विशेष योग्यता रखने वाले आवेदकों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा भी उपलब्ध होते हैं। यह वीजा आमतौर पर तीन से छह साल तक के लिए दिया जाता है। कई मामलों में यह अमेरिका में स्थायी निवास की दिशा में पहला कदम भी माना जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर के कुशल पेशेवर, खासकर भारत से, इस वीजा को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं।</p>
<p>हालांकि ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इस कार्यक्रम की आलोचना करता रहा है। प्रशासन का तर्क रहा है कि विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देने से अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं। इसी सोच के तहत इमिग्रेशन और वीजा नियमों को लगातार सख्त करने की कोशिश की गई। H-1B फीस बढ़ाने का फैसला भी उसी रणनीति का हिस्सा माना गया था। प्रशासन का कहना था कि ऊंची फीस लगाने से केवल वही कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करेंगी जिन्हें वास्तव में उनकी जरूरत होगी। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षेत्र को नुकसान हो सकता है क्योंकि कई उद्योग विदेशी प्रतिभाओं पर निर्भर हैं।</p>
<p>अदालत के फैसले के बावजूद H-1B वीजा को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। हाल ही में रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने अमेरिकी संसद में एक नया विधेयक पेश किया है, जिसका उद्देश्य H-1B वीजा कार्यक्रम में और बदलाव करना है। प्रस्तावित कानून के तहत इस वीजा को स्थायी निवास का रास्ता बनने से रोकने और कुछ अन्य नियमों को सख्त करने की बात कही गई है। इसके अलावा ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग यानी OPT कार्यक्रम को भी समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है। यह कार्यक्रम विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है। आने वाले समय में अमेरिका की इमिग्रेशन नीति राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बनी रहेगी। एक ओर उद्योग जगत और तकनीकी कंपनियां कुशल विदेशी कर्मचारियों की आवश्यकता पर जोर देती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक समूह अमेरिकी नागरिकों के लिए अधिक रोजगार अवसर सुरक्षित करने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में H-1B वीजा से जुड़े नियमों में भविष्य में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 15:33:53 +0530</pubDate>
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