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                <title>Inspirational Story - दैनिक जागरण</title>
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                <title>जैवलिन छोड़ रग्बी में चमकीं अमनदीप कौर, बनीं स्टार खिलाड़ी</title>
                                    <description><![CDATA[ऑक्शन में घंटों अनसोल्ड रहने के बाद चेन्नई बुल्स ने खरीदा, 1.6 लाख की बोली के बाद बनीं ‘इमर्जिंग प्लेयर ऑफ द सीजन’]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/sports/amandeep-kaur-who-left-javelin-and-shone-in-rugby-became/article-57061"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/amandeep-kaur.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंजाब की 24 वर्षीय अमनदीप कौर की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती। कभी जैवलिन थ्रो में भविष्य बनाने का सपना देखने वाली अमनदीप ने रग्बी में कदम रखा और हाल ही में रग्बी प्रीमियर लीग 2026 में ‘इमर्जिंग प्लेयर ऑफ द सीजन’ का खिताब अपने नाम कर लिया। यह उपलब्धि उनके लिए आसान नहीं थी, क्योंकि इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरा रहा। शुरुआती दौर में जिस खिलाड़ी को किसी टीम ने लंबे समय तक नहीं चुना, वही बाद में पूरे टूर्नामेंट की सबसे चर्चित खिलाड़ी बन गईं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अप्रैल में हुई लीग की पहली नीलामी के दिन अमनदीप के लिए हालात काफी कठिन थे। सुबह 9 बजे से लेकर शाम 8 बजे तक वह अनसोल्ड रहीं और किसी भी टीम ने उन्हें नहीं खरीदा। यह समय उनके लिए मानसिक रूप से बेहद कठिन था, क्योंकि उम्मीदें लगातार टूट रही थीं। लेकिन किस्मत ने आखिरी समय पर करवट ली। रात करीब 8 बजे उनकी एक दोस्त ने सोशल मीडिया के जरिए जानकारी दी कि उन्हें चेन्नई बुल्स ने 1.6 लाख रुपये की बोली लगाकर अपनी टीम में शामिल कर लिया है। यह खबर उनके लिए राहत और खुशी दोनों लेकर आई। खास बात यह रही कि वह नीलामी में संयुक्त रूप से तीसरी सबसे महंगी खिलाड़ी भी बनीं। इसके बाद अमनदीप ने अपने प्रदर्शन से सभी को चौंका दिया और चेन्नई बुल्स को लीग स्टेज में शीर्ष स्थान तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। टीम भले ही फाइनल जीत नहीं सकी, लेकिन उपविजेता रही और अमनदीप का प्रदर्शन सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमनदीप का सफर सिर्फ खेल बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह से जीवन की दिशा बदलने जैसा था। पंजाब के फतेहगढ़ साहिब की रहने वाली अमनदीप ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब वर्ल्ड यूनिवर्सिटी से फिजिकल एजुकेशन में ग्रेजुएशन किया है। शुरुआत में वह जैवलिन थ्रो में करियर बनाना चाहती थीं, लेकिन आर्थिक परेशानियों और ट्रेनिंग की अस्थिरता ने उनके रास्ते मुश्किल कर दिए। उनके कोच का सेंटर बदल जाने के कारण नियमित अभ्यास प्रभावित हुआ और यहीं से उनके खेल करियर में बड़ा बदलाव आया। इसी दौरान उन्होंने रग्बी की ओर रुख किया। न्यूजीलैंड की खिलाड़ी पोर्टिया वुडमैन के खेल और आक्रामक शैली ने उन्हें काफी प्रभावित किया और उन्होंने रग्बी को गंभीरता से लेना शुरू किया। धीरे-धीरे रग्बी उनके लिए सिर्फ खेल नहीं बल्कि अपनी ऊर्जा और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम बन गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">परिवार की मंजूरी भी इस सफर में आसान नहीं थी। उनके भाई, जो खुद एक पहलवान हैं, शुरुआत में रग्बी को लेकर काफी संशय में थे। उनका मानना था कि अमनदीप को व्यक्तिगत खेलों पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन अमनदीप ने अपने फैसले पर भरोसा बनाए रखा। रग्बी के दौरान उन्हें कई बार चोटें भी आईं, कभी सिर में टांके लगे तो कभी हाथ में फ्रैक्चर हुआ। उन्होंने कई बार अपनी चोटों की जानकारी परिवार से छिपाई, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उन्हें खेल छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए। लेकिन समय के साथ उनका प्रदर्शन और समर्पण देखकर परिवार का नजरिया पूरी तरह बदल गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">2025 में अमनदीप को पहली बार भारतीय रग्बी टीम के नेशनल कैंप में बुलाया गया। यह उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुआ। चीन और श्रीलंका दौरे के लिए जब अंतिम 14 खिलाड़ियों का चयन हुआ, तो उनका नाम सबसे पहले लिया गया। यह उनके लिए गर्व का क्षण था, क्योंकि उन्होंने उसी टीम के साथ खेलना शुरू किया, जिसकी कप्तान शिखा यादव को वह पहले सिर्फ वीडियो में देखकर सीखती थीं। चीन में एशियन रग्बी सेवन सीरीज के दौरान उन्होंने पहली बार भारत की जर्सी पहनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">आज अमनदीप कौर का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। वह भारत के लिए एशियन गेम्स में मेडल जीतने का सपना देख रही हैं। उनका मानना है कि मेहनत और आत्मविश्वास के साथ कोई भी खिलाड़ी किसी भी स्तर तक पहुंच सकता है। जैवलिन से रग्बी तक का उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि सही दिशा और अवसर मिलने पर प्रतिभा किसी भी खेल में चमक सकती है। अमनदीप की कहानी अब युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनती जा रही है, खासकर उन लोगों के लिए जो शुरुआत में असफलताओं से जूझ रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पोर्ट्स</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 17:07:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>गरीबी, नस्लभेद और संघर्ष से निकले ‘किंग जेम्स’, बने एथलीट ऑफ द सेंचुरी</title>
                                    <description><![CDATA[लेब्रॉन जेम्स की जिंदगी की कहानी: अभावों से शुरू होकर 1.4 बिलियन डॉलर की सफलता तक का सफर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/sports/king-james-who-came-out-of-poverty-racism-and-struggle/article-56680"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/lebron-james-story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लेब्रॉन जेम्स, जिन्हें दुनिया “किंग जेम्स” के नाम से जानती है, आज बास्केटबॉल की दुनिया का सबसे बड़ा नाम माने जाते हैं। हाल ही में टाइम मैगजीन ने उन्हें “एथलीट ऑफ द सेंचुरी” के रूप में कवर पेज पर जगह दी, जिससे एक बार फिर उनके करियर और संघर्ष दोनों पर चर्चा तेज हो गई है। लेकिन इस ऊंचाई तक पहुंचने का उनका रास्ता आसान नहीं था, बल्कि गरीबी, टूटे परिवार और नस्लभेद जैसी चुनौतियों से भरा रहा है। 30 दिसंबर 1984 को अमेरिका के एक्रोन शहर में जन्मे लेब्रॉन जेम्स का बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। उनकी मां ग्लोरिया जेम्स मात्र 16 साल की उम्र में सिंगल मदर बन गई थीं। पिता जन्म से पहले ही परिवार छोड़कर चले गए थे। ऐसे में लेब्रॉन ने अपने बचपन में पिता का साया कभी महसूस नहीं किया। शुरुआती दिनों में वह अपनी मां और नानी के साथ रहते थे, लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि जीवन लगातार संघर्ष में बीतता रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालात इतने खराब थे कि जब लेब्रॉन केवल 5 साल के थे, तब उनकी नानी का घर प्रशासन ने जर्जर बताकर गिरा दिया। इसके बाद मां और बेटे के पास रहने के लिए कोई स्थायी ठिकाना नहीं बचा। वे कभी रिश्तेदारों के घर तो कभी दोस्तों के घर शिफ्ट होते रहे। इस दौरान 5 से 9 साल की उम्र के बीच उन्हें करीब एक दर्जन जगहों पर रहना पड़ा। इस अस्थिर जीवन ने उनके बचपन को पूरी तरह प्रभावित किया। लेब्रॉन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि चौथी कक्षा में वह लगभग 100 दिन तक स्कूल नहीं जा पाए थे क्योंकि उनके पास स्थायी घर और संसाधन नहीं थे। मां आर्थिक रूप से कमजोर थीं और बेटे की परवरिश अकेले संभालना उनके लिए बेहद कठिन था। इसी दौरान मजबूरी में उनकी मां ने 9 साल के लेब्रॉन को अपने एक परिचित फुटबॉल कोच फ्रैंकी वॉकर के पास रहने के लिए भेज दिया। यह दौर उनके जीवन का सबसे भावनात्मक और कठिन समय माना जाता है। स्कूल और समाज में भी लेब्रॉन को कई बार नस्लभेद का सामना करना पड़ा। उनके रंग और पृष्ठभूमि को लेकर टिप्पणियां की जाती थीं। बड़े होने पर भी यह अनुभव खत्म नहीं हुआ, बल्कि कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से भी नस्लभेदी घटनाओं का सामना करना पड़ा। 2017 में उनके घर पर नस्लभेदी शब्द लिखे जाने की घटना ने अमेरिका में काफी विवाद खड़ा किया था। उन्होंने बाद में कहा था कि “अमेरिका में एक अश्वेत व्यक्ति के रूप में जीवन आसान नहीं होता, चाहे आप कितने भी सफल क्यों न हो जाएं।”</p>
<p style="text-align:justify;">इन कठिन हालातों के बीच लेब्रॉन का बास्केटबॉल करियर धीरे-धीरे आकार लेने लगा। कोच फ्रैंकी वॉकर ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें खेल की ओर प्रेरित किया। स्कूल टीम से खेलते हुए लेब्रॉन ने जल्दी ही अपनी अलग पहचान बना ली। हाई स्कूल टूर्नामेंट में उनका प्रदर्शन इतना शानदार रहा कि उन्हें लगातार तीन बार “ओहायो मिस्टर बास्केटबॉल” का खिताब मिला। उनकी प्रतिभा को देखते हुए एनबीए टीम क्लीवलैंड कैवेलियर्स ने 2003 में उन्हें ड्राफ्ट किया, जहां से उनका पेशेवर करियर शुरू हुआ। इसके बाद लेब्रॉन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने एनबीए में चार चैंपियनशिप जीतीं और तीन बार ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अमेरिकी टीम के कप्तान भी रहे। उनकी खेल शैली, फिटनेस और निरंतरता ने उन्हें दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में शामिल कर दिया। आज वे एनबीए के ऑल टाइम लीडिंग स्कोरर भी हैं। मैदान के बाहर भी लेब्रॉन जेम्स एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन चुके हैं। उनकी नेटवर्थ लगभग 1.4 बिलियन डॉलर बताई जाती है। वे कई स्पोर्ट्स ब्रांड्स के साथ जुड़े हैं और उनकी अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी भी है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सामाजिक कार्यों में भी बड़ी भूमिका निभाई है। उनकी संस्था “आई प्रॉमिस स्कूल” गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और कॉलेज स्कॉलरशिप प्रदान करती है, जो उनके बचपन के संघर्षों से प्रेरित है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेब्रॉन का जीवन यह दिखाता है कि कठिन परिस्थितियां किसी व्यक्ति को रोक नहीं सकतीं, अगर उसमें मेहनत और निरंतरता हो। गरीबी से शुरू होकर दुनिया के सबसे बड़े खेल सितारों में शामिल होने तक का उनका सफर सिर्फ खेल की कहानी नहीं, बल्कि इंसानी हौसले की मिसाल है। आज “किंग जेम्स” केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुके हैं, जिनकी कहानी दुनिया भर के युवाओं को यह सिखाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, सपनों को हासिल किया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पोर्ट्स</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:50:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>किसान परिवार से निकलकर बना सुपरस्टार, चौकीदार की नौकरी से बदली अपनी किस्मत</title>
                                    <description><![CDATA[किसान परिवार से निकलकर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने केमिस्ट और चौकीदार की नौकरी छोड़कर 13 साल संघर्ष किया और बॉलीवुड में बड़ा नाम बनाया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/becoming-a-superstar-after-coming-out-of-a-farmers-family/article-53783"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/nawazuddin-siddiqui-bollywood-story-of-struggle.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की जिंदगी संघर्ष</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेहनत और धैर्य की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे सुनकर लोग आज भी दंग रह जाते हैं। अब नवाजुद्दीन को इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन कलाकारों में गिना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इस मंजिल तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं रहा। एक छोटे किसान परिवार से निकलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने केमिस्ट की नौकरी छोड़कर एक्टिंग के अपने जुनून का पीछा किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे रास्ते पर कदम रखा जिसमें असफलताएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंतजार और अनिश्चितता थी। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना में हुआ था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और बचपन से ही उनके मन में अभिनय का सपना पल रहा था।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रारंभिक शिक्षा के बाद</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाजुद्दीन ने हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में वे गुजरात के वडोदरा पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में उन्हें केमिस्ट की नौकरी मिल गई। जीवन सामान्य था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और नौकरी भी स्थिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अंदर से कहीं एक बेचैनी थी कि वो कुछ और करना चाहते हैं। इसी जुनून ने उन्हें दिल्ली की ओर खींचा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां उन्होंने थिएटर की दुनिया को करीब से जानने का फैसला किया और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (</span>NSD) <span lang="hi" xml:lang="hi">में दाखिला लेकर एक्टिंग की बारीकियों को सीखा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इस संघर्ष के दौरान आर्थिक तंगी भी झेली। कभी-कभी उन्हें चौकीदार यानी वॉचमैन की नौकरी भी करनी पड़ी। मुंबई आने के बाद वापसी रास्ता भी आसान नहीं था। उन्हें छोटे-छोटे रोल मिलते रहे</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी चोर का किरदार निभाया तो कभी भीड़ में शामिल होकर स्क्रीन पर दिखे। साल 1999 में आमिर खान की फिल्म </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">सरफरोश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में एक छोटा सा रोल मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उससे कोई खास पहचान नहीं बनी। इसके बाद </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">शूल</span>’, ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">मुन्नाभाई एमबीबीएस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी फिल्मों में भी उनका काम नजर आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वो लंबे समय तक वो सफलता नहीं मिली जिसकी उन्हें तलाश थी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">करीब 13 साल के संघर्ष के बाद</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिरकार साल 2012 में अनुराग कश्यप की फिल्म </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">गैंग्स ऑफ वासेपुर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस फिल्म में फैजल खान का किरदार निभाकर नवाजुद्दीन ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बना ली। उनका डायलॉग </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">बाप का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दादा का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाई का</span>… <span lang="hi" xml:lang="hi">सबका बदला लेगा तेरा फैजल</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी लोगों की जुबान पर है। इसके बाद नवाजुद्दीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">द लंचबॉक्स</span>’, ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">बजरंगी भाईजान</span>’, ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">रमन राघव 2.0</span>’, ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">मंटो</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">रात अकेली है</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी फिल्मों में अपने अदाकारी का लोहा मनवाया।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">सेक्रेड गेम्स</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">वेब सीरीज में उनके किरदार को दर्शकों ने खूब सराहा। नवाजुद्दीन की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि अगर आपके इरादे मजबूत हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हालात चाहे जैसे भी हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान अपनी मंजिल हासिल कर सकता है। अब वो सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकलते हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2026 15:50:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>मदर्स डे स्पेशल: मां-बेटी दोनों ने खेला इंटरनेशनल क्रिकेट, देश के लिए रचा इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[मदर्स डे 2026 पर जानिए किम गार्थ और ऐनी-मैरी गार्थ की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने अलग-अलग पीढ़ियों में इंटरनेशनल क्रिकेट खेलकर इतिहास रचा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/sports/mothers-day-special-mother-and-daughter-both-played-international-cricket/article-52969"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-09t113026.874.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">Mothers Day </span></strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"><strong>2026:</strong> मदर्स डे 2026 इस बार 10 मई को मनाया जाएगा और इस मौके पर जब हर तरफ मां के सम्मान और रिश्तों की बात हो रही है</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तब क्रिकेट की दुनिया से एक ऐसी कहानी सामने आती है जो भावनाओं और उपलब्धियों दोनों से जुड़ी हुई है। </span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">Mothers Day </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">के इस खास अवसर पर चर्चा उस मां-बेटी की जोड़ी की हो रही है</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिन्होंने अलग-अलग समय में इंटरनेशनल क्रिकेट खेलकर अपने देश का नाम रोशन किया। यह कहानी ऑस्ट्रेलिया की स्टार ऑलराउंडर किम गार्थ और उनकी मां ऐनी-मैरी गार्थ की है</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिन्होंने खेल के मैदान पर अपनी मेहनत और जुनून से इतिहास में जगह बनाई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">किम गार्थ का क्रिकेट करियर बेहद कम उम्र में शुरू हुआ था। सिर्फ 14 साल की उम्र में उन्होंने आयरलैंड की महिला टीम के लिए इंटरनेशनल डेब्यू कर दिया था और उस वक्त वह दुनिया की सबसे युवा टी20 इंटरनेशनल खिलाड़ी बन गई थीं। शुरुआती दौर में ही उन्होंने अपनी ऑलराउंड क्षमता से सबको प्रभावित किया। आयरलैंड के लिए खेलते हुए किम ने वनडे और टी20 दोनों फॉर्मेट में अहम योगदान दिया। वनडे क्रिकेट में उन्होंने 34 मैचों में 448 रन बनाए और 23 विकेट हासिल किए</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जबकि टी20 इंटरनेशनल में 51 मैचों में 762 रन और 42 विकेट लेकर अपनी उपयोगिता साबित की। साल 2021 में उन्हें आयरलैंड की दशक की सर्वश्रेष्ठ महिला क्रिकेटर का खिताब भी मिला</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जो उनके लगातार प्रदर्शन की बड़ी पहचान थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हालांकि क्रिकेट सफर यहीं नहीं रुका। साल 2020 में किम ने ऑस्ट्रेलिया की ओर रुख किया और क्रिकेट विक्टोरिया के साथ अनुबंध साइन किया। यहां उन्होंने खुद को नए स्तर पर तैयार किया और कड़ी मेहनत के बाद 2022 में ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय टीम में जगह बना ली। आज वह ऑस्ट्रेलिया के लिए तीनों फॉर्मेट में खेल रही हैं और दुनिया की बेहतरीन ऑलराउंडरों में उनकी गिनती होती है। मैदान पर उनका संतुलित प्रदर्शन और मैच को बदल देने वाली क्षमता उन्हें खास बनाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर उनकी मां ऐनी-मैरी गार्थ भी कम नहीं रहीं। उन्होंने भी अपने समय में आयरलैंड की महिला क्रिकेट टीम के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट खेला है। साल 1988-89 के दौरान उन्होंने 12 वनडे मैच खेले</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसमें उन्होंने 6 विकेट हासिल किए और 14 रन बनाए। हालांकि उनका करियर लंबा नहीं रहा</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लेकिन उन्होंने जिस दौर में महिला क्रिकेट सीमित संसाधनों के साथ खेला जाता था</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">उसमें देश का प्रतिनिधित्व करना ही बड़ी उपलब्धि माना जाता है। खास बात यह है कि इस परिवार में क्रिकेट सिर्फ किम और उनकी मां तक सीमित नहीं रहा</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि उनके पिता जोनाथन गार्थ भी आयरलैंड के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट खेल चुके हैं। उनके भाई भी क्रिकेट से जुड़े रहे हैं</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिससे यह पूरा परिवार खेल के प्रति समर्पण की मिसाल बन गया है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ऐसे में </span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">Mothers Day </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">के मौके पर किम और ऐनी-मैरी गार्थ की यह कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि पीढ़ियों के जुड़ाव और खेल के प्रति जुनून की भी कहानी बन जाती है</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जहां एक मां का अनुभव और एक बेटी की आधुनिक प्रतिभा मिलकर एक अनोखा इतिहास रचती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पोर्ट्स</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 11:33:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऋषिकेश में डॉ. भार्गव मल्लप्पा ने श्री श्री रविशंकर से की मुलाकात, लिया आशीर्वाद</title>
                                    <description><![CDATA[आध्यात्म, सेवा और समाज पर हुई चर्चा; जीवन में नैतिक मूल्यों और नेतृत्व में आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर दिया जोर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/dr-bhargava-mallappa-met-sri-sri-ravi-shankar-in-rishikesh/article-48625"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/dr.-bhargav-mallappa-.jpg" alt=""></a><br /><p>उत्तराखंड के ऋषिकेश में आध्यात्मिक गुरु <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">श्री श्री रविशंकर</span></span> से डॉ. भार्गव मल्लप्पा ने मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया। इस दौरान दोनों के बीच आध्यात्म, सेवा और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह मुलाकात शांत और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हुई, जहां जीवन के मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों पर विचार साझा किए गए।</p>
<p>मुलाकात के दौरान <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">डॉ. भार्गव मल्लप्पा</span></span> और श्री श्री रविशंकर ने आंतरिक शांति, नैतिकता और व्यक्ति की समाज में भूमिका जैसे विषयों पर बातचीत की। श्री श्री रविशंकर ने जीवन और नेतृत्व में आध्यात्मिक सोच को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि इससे न केवल व्यक्तिगत विकास होता है, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन भी संभव है।</p>
<p>डॉ. मल्लप्पा ने इस मुलाकात को अपने जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आध्यात्मिक संवाद व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और जीवन की दिशा को स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार, आज के समय में जब भौतिकता हावी है, तब आध्यात्मिक मार्गदर्शन का महत्व और बढ़ जाता है।</p>
<p>उन्होंने अपने वक्तव्य में “धर्मो रक्षति रक्षितः” श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने का सिद्धांत है। उनका कहना था कि जब व्यक्ति सत्य, कर्तव्य और सही आचरण का पालन करता है, तो वही मूल्य उसे कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं।</p>
<p>यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब समाज में नैतिक मूल्यों और सामूहिक जिम्मेदारी पर लगातार चर्चा हो रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के संवाद सार्वजनिक जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक होते हैं और लोगों को समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करते हैं।</p>
<p>मुलाकात के अंत में डॉ. मल्लप्पा ने श्री श्री रविशंकर से आशीर्वाद प्राप्त किया और समाज के प्रति सकारात्मक योगदान देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। यह मुलाकात न केवल व्यक्तिगत स्तर पर प्रेरणादायक रही, बल्कि सामाजिक सरोकारों को लेकर भी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है।</p>
<p></p><video style="width:280px;height:373px;" src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-03/whatsapp-video-2026-03-21-at-12.19.32-am.mp4" controls=""></video>
<p>-------------------------</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 08:31:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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