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                <title>Hindu Festival - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Hindu Festival RSS Feed</description>
                
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                <title>जगन्नाथ रथयात्रा की परंपरा पर नया विवाद, पुरी गजपति महाराज ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से की हस्तक्षेप की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[ISKCON द्वारा अलग-अलग तिथियों पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने पर जताई आपत्ति, शास्त्रीय परंपराओं की रक्षा और धार्मिक मर्यादा बनाए रखने की अपील।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/6a507984676f8/article-58357"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/jagannath-rath-yatra.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा को लेकर एक बार फिर परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं के बीच विवाद गहरा गया है। ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर प्राचीन धार्मिक परंपराओं की रक्षा करने की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत इस्कॉन (ISKCON) द्वारा अलग-अलग तिथियों पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह परंपरा, शास्त्रों और भगवान जगन्नाथ की निर्धारित धार्मिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है तथा इससे करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हो रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">8 जुलाई को लिखे गए इस पत्र में गजपति महाराज ने कहा कि जगन्नाथ संस्कृति केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। ऐसे में यदि अलग-अलग संस्थाएं अपनी सुविधा के अनुसार रथयात्रा की तिथियां तय करेंगी तो मूल परंपरा कमजोर होगी और श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होगी। उन्होंने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि इस विषय पर गंभीरता से विचार कर उचित कदम उठाए जाएं, ताकि भगवान जगन्नाथ की प्राचीन परंपराओं की गरिमा बनी रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">गजपति महाराज दिव्यसिंह देव केवल पुरी राजघराने के प्रमुख ही नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति (SJTMC) के स्थायी अध्यक्ष भी हैं। जगन्नाथ परंपरा में उन्हें 'ठाकुर राजा' का विशेष सम्मान प्राप्त है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक माने जाते हैं। हर वर्ष रथयात्रा के दौरान तीनों रथों पर सोने की झाड़ू से सफाई करने की प्रसिद्ध 'छेरा पंहरा' सेवा भी गजपति महाराज द्वारा ही संपन्न की जाती है। यह सेवा राजसत्ता के बजाय भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और सेवा भाव का प्रतीक मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिव्यसिंह देव का राज्याभिषेक वर्ष 1970 में मात्र 17 वर्ष की आयु में हुआ था। उन्होंने विधि की उच्च शिक्षा प्राप्त की है और लंबे समय से श्रीजगन्नाथ मंदिर की धार्मिक व्यवस्थाओं तथा परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में उनके द्वारा उठाया गया यह मुद्दा धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विवाद की मुख्य वजह इस वर्ष विभिन्न देशों में अलग-अलग समय पर आयोजित रथयात्राएं हैं। इस्कॉन ने जून और जुलाई के दौरान लंदन, न्यूयॉर्क तथा सिडनी सहित कई शहरों में रथयात्रा निकाली, जबकि पुरी में इस वर्ष भगवान जगन्नाथ की मुख्य रथयात्रा 16 जुलाई को आयोजित होनी है। इसके अलावा स्नान पूर्णिमा का आयोजन 29 जून को हुआ था। गजपति महाराज का कहना है कि शास्त्रों के अनुसार इन धार्मिक आयोजनों की निश्चित तिथियां निर्धारित हैं और उनसे अलग जाकर आयोजन करना उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">गजपति महाराज ने मध्य प्रदेश में प्रस्तावित रथयात्राओं पर भी सवाल उठाए हैं। जानकारी के अनुसार उज्जैन स्थित इस्कॉन मंदिर द्वारा 16 से 25 जुलाई के बीच राज्य के 66 स्थानों पर रथयात्रा निकालने की योजना बनाई गई है। इस पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक ग्रंथों में रथयात्रा को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ होने वाला नौ दिवसीय उत्सव बताया गया है। इसलिए अलग-अलग स्थानों पर अलग तिथियों में रथयात्रा आयोजित करना शास्त्रीय परंपराओं के अनुरूप नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने अपने पत्र में स्कंद पुराण का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित स्कंद पुराण में स्वयं भगवान जगन्नाथ ने स्नान यात्रा और रथयात्रा की तिथियों का उल्लेख किया है। ऐसे में इन तिथियों में परिवर्तन करना धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। गजपति महाराज का मानना है कि यदि इस प्रकार की परंपराएं लगातार बदलती रहीं तो आने वाली पीढ़ियों तक मूल धार्मिक स्वरूप सुरक्षित रखना कठिन हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, इस्कॉन ने अपने पक्ष में स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य किसी भी परंपरा का उल्लंघन करना नहीं है। संगठन का कहना है कि भगवान जगन्नाथ केवल पुरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। विदेशों में स्थानीय परिस्थितियां, सरकारी नियम, जलवायु और प्रशासनिक व्यवस्थाएं अलग-अलग होती हैं। कई देशों में निर्धारित तिथि पर विशाल रथयात्रा निकालने की अनुमति या आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग तिथियों पर आयोजन किया जाता है, ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु इसमें शामिल हो सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">इस्कॉन ने पहले भी स्पष्ट किया था कि रूस सहित कई देशों में मौसम और प्रशासनिक नियमों के कारण शास्त्रों में वर्णित तिथियों पर रथयात्रा आयोजित करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। संगठन का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल भगवान जगन्नाथ की भक्ति और भारतीय संस्कृति का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है। रथयात्रा को लेकर यह विवाद पहली बार सामने नहीं आया है। वर्ष 2024 और 2025 में भी पुरी के गजपति महाराज ने इस्कॉन से अनुरोध किया था कि विदेशों में भी रथयात्रा पुरी के धार्मिक पंचांग के अनुसार आयोजित की जाए। हालांकि उस समय भी इस्कॉन ने स्थानीय परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपने कार्यक्रमों का बचाव किया था। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:42:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रायपुर में 8 से 14 जुलाई तक देवकीनंदन ठाकुर की श्रीमद्भागवत कथा, ‘नो तिलक-नो एंट्री’ नियम रहेगा लागू</title>
                                    <description><![CDATA[बूढ़ापारा इंडोर स्टेडियम में सात दिवसीय धार्मिक आयोजन, प्रतिदिन दोपहर 3:30 बजे से कथा; कलश यात्रा, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, महारास सहित कई विशेष कार्यक्रम होंगे, आस्था चैनल और यूट्यूब पर होगा सीधा प्रसारण।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/devkinandan-thakurs-shrimad-bhagwat-katha-no-tilak-no-entry-rule-will/article-57949"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/devkinandan-thakur.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">राजधानी रायपुर एक बार फिर भक्ति, आध्यात्म और सनातन संस्कृति के रंग में रंगने जा रही है। शहर के बूढ़ापारा स्थित इंडोर स्टेडियम में 8 जुलाई से 14 जुलाई तक प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जाएगा। यह सात दिवसीय धार्मिक आयोजन अंतरराष्ट्रीय वैश्य फेडरेशन के तत्वावधान में आयोजित होगा, जिसमें छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।</p>
<p style="text-align:justify;">आयोजकों के अनुसार कथा का शुभारंभ प्रतिदिन दोपहर 3:30 बजे होगा। सात दिनों तक श्रीमद्भागवत की विभिन्न लीलाओं, भगवान श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों और सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों पर आधारित प्रवचन होंगे। कथा के साथ भजन, संकीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का भी आयोजन किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार आयोजन की सबसे विशेष बात ‘नो तिलक, नो एंट्री’ अभियान है। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि कथा स्थल पर प्रवेश से पहले सभी अपने माथे पर तिलक अवश्य लगाकर आएं। उनका कहना है कि यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के सम्मान और उसकी पहचान का प्रतीक है। इस पहल का उद्देश्य लोगों में अपनी धार्मिक परंपराओं के प्रति जागरूकता और गौरव की भावना विकसित करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">आयोजन समिति का मानना है कि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए ऐसे प्रयास आवश्यक हैं। तिलक लगाने की परंपरा भारतीय संस्कृति में सदियों से चली आ रही है और इसे आध्यात्मिक ऊर्जा, सकारात्मकता तथा धार्मिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। इसी संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाने के लिए कथा स्थल पर इस नियम को लागू किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम की शुरुआत 8 जुलाई को भव्य कलश यात्रा और भागवत महात्म्य के साथ होगी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं और श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में कलश यात्रा में शामिल होंगे। इसके बाद प्रतिदिन श्रीमद्भागवत के विभिन्न प्रसंगों का विस्तृत वर्णन किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">9 जुलाई को भीष्म पितामह, माता कुंती के आगमन तथा पूतना वध की कथा सुनाई जाएगी। 10 जुलाई को गोवर्धन पूजा, अन्नकूट महोत्सव और छप्पन भोग का विशेष आयोजन रहेगा। श्रद्धालुओं को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और गोवर्धन पर्वत की महिमा से जुड़े प्रसंग सुनने का अवसर मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">11 जुलाई को वामन अवतार, भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन और श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का भव्य आयोजन किया जाएगा। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के दौरान आकर्षक झांकियां, भजन और विशेष सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आयोजित की जाएंगी, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">12 जुलाई को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं, माखन चोरी, गोवर्धन पूजन और छप्पन भोग का आयोजन होगा। इसके बाद 13 जुलाई को महारास, सुदामा मिलन, रुक्मिणी विवाह और चिंतक विदाई जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा। इन आयोजनों में भक्ति संगीत और धार्मिक प्रस्तुतियां भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सात दिवसीय कथा का समापन 14 जुलाई को सुदामा चरित्र, कंस वध और हवन-पूजन के साथ होगा। अंतिम दिन श्रद्धालु सामूहिक रूप से पूर्णाहुति में शामिल होंगे और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आयोजन का समापन किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">आयोजन समिति ने बताया कि कथा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। कथा स्थल पर बैठने, पेयजल, पार्किंग, सुरक्षा और चिकित्सा जैसी सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। प्रशासन और स्वयंसेवकों की टीम आयोजन को व्यवस्थित और सुचारु रूप से संचालित करने में सहयोग करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जो श्रद्धालु किसी कारणवश रायपुर नहीं पहुंच पाएंगे, उनके लिए कथा का सीधा प्रसारण भी किया जाएगा। आयोजन का लाइव टेलीकास्ट आस्था चैनल और यूट्यूब के माध्यम से प्रसारित होगा, जिससे देश-विदेश में बैठे श्रद्धालु भी कथा का लाभ ले सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आयोजन से पहले अंतरराष्ट्रीय वैश्य फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष योगेश अग्रवाल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका से राजभवन में मुलाकात कर उन्हें कथा में शामिल होने का निमंत्रण दिया। प्रतिनिधिमंडल में प्रदेश महामंत्री एवं प्रवक्ता राजकुमार राठी सहित कई पदाधिकारी उपस्थित रहे। राज्यपाल ने आयोजन के लिए शुभकामनाएं देते हुए निमंत्रण स्वीकार किया और धार्मिक आयोजनों के सामाजिक महत्व की सराहना की।</p>
<p style="text-align:justify;">आयोजन समिति का कहना है कि श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। देवकीनंदन ठाकुर अपने सहज, सरल और प्रेरणादायी प्रवचनों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। उनके कथा कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं और सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक जागरूकता तथा सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:23:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमरनाथ यात्रा 2026 शुरू: जम्मू और पहलगाम से पहला जत्था बाबा बर्फानी के दर्शन को रवाना</title>
                                    <description><![CDATA[कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच जम्मू और पहलगाम के नुनवान बेस कैंप से अमरनाथ यात्रा का पहला जत्था पवित्र गुफा के लिए रवाना हुआ। 57 दिनों तक चलने वाली यात्रा के पहले दिन श्रद्धालुओं में उत्साह और आस्था का विशेष माहौल देखने को मिला।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/6a4743bba9a6c/article-57751"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/amarnath-yatra-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में शामिल श्री अमरनाथ यात्रा का शुभारंभ शुक्रवार को श्रद्धा, उत्साह और कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच हुआ। जम्मू और पहलगाम के नुनवान बेस कैंप से श्रद्धालुओं का पहला जत्था बाबा बर्फानी के पवित्र दर्शन के लिए रवाना हुआ। इसके साथ ही 57 दिनों तक चलने वाली वार्षिक अमरनाथ यात्रा औपचारिक रूप से शुरू हो गई। यात्रा के पहले दिन श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला और पूरा वातावरण "हर-हर महादेव", "बम-बम भोले" और "चलो बुलावा आया है, बाबा बर्फानी ने बुलाया है" के जयघोष से गूंज उठा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जम्मू से रवाना हुए पहले जत्थे को उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस जत्थे में 4,800 से अधिक श्रद्धालु शामिल थे। सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में सभी श्रद्धालुओं को वाहनों के काफिले के साथ कश्मीर घाटी तक पहुंचाया गया। घाटी में प्रवेश के बाद विभिन्न स्थानों पर स्थानीय लोगों, स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रशासन की ओर से फूल-मालाओं और पारंपरिक स्वागत के साथ यात्रियों का अभिनंदन किया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पहलगाम के नुनवान बेस कैंप और बालटाल बेस कैंप से शुक्रवार सुबह श्रद्धालुओं ने पवित्र गुफा की ओर अपनी पैदल यात्रा शुरू की। दोनों मार्गों पर प्रशासन ने चिकित्सा, सुरक्षा, संचार, भोजन और ठहरने की व्यापक व्यवस्था की है। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह स्वास्थ्य शिविर, विश्राम केंद्र और आपातकालीन सहायता केंद्र स्थापित किए गए हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। यात्रा शुरू होने से पहले पहलगाम क्षेत्र में कुछ समय के लिए भारी बारिश हुई, जिसके कारण सुरक्षा के मद्देनजर पहलगाम मार्ग पर यात्रियों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोक दी गई। मौसम में सुधार होने और मार्ग की स्थिति सामान्य होने के बाद प्रशासन ने यात्रा दोबारा शुरू कर दी। अधिकारियों ने बताया कि यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बालटाल और पहलगाम दोनों मार्गों पर पुलिस, केंद्रीय अर्धसैनिक बल, सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की व्यापक तैनाती की गई है। यात्रा मार्ग पर सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन निगरानी और आधुनिक संचार प्रणाली के माध्यम से सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल भी तैनात किए हैं ताकि यात्रा शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न हो सके। यात्रा के नोडल अधिकारी राहुल यादव ने बताया कि जिला प्रशासन ने बालटाल और पहलगाम दोनों मार्गों पर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सा सुविधाओं, पेयजल, स्वच्छता, बिजली, आपातकालीन सेवाओं और यातायात प्रबंधन के लिए अलग-अलग विभागों को जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। प्रशासन लगातार यात्रा मार्ग की निगरानी कर रहा है ताकि किसी भी स्थिति से तुरंत निपटा जा सके। पहले दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पारंपरिक धार्मिक वेशभूषा में बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए रवाना हुए। कई श्रद्धालु परिवार के साथ पहुंचे, जबकि बड़ी संख्या में युवा और बुजुर्ग भी यात्रा में शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने कहा कि वर्षों से बाबा बर्फानी के दर्शन की इच्छा थी और इस बार यात्रा शुरू होते ही उन्हें पवित्र गुफा जाने का अवसर मिला है। उन्होंने प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाओं की भी सराहना की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमरनाथ यात्रा का धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। समुद्र तल से लगभग 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवित्र गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाले हिम शिवलिंग के दर्शन के लिए हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव ने इसी गुफा में माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। यही कारण है कि इस यात्रा को सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रशासन ने यात्रियों से निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है। श्रद्धालुओं को स्वास्थ्य संबंधी जांच पूरी करने, मौसम के अनुसार आवश्यक सामान साथ रखने और प्रशासन की ओर से जारी एडवाइजरी का पालन करने की सलाह दी गई है। यात्रा मार्ग पर चिकित्सा दल, बचाव दल और आपदा प्रबंधन की टीमें भी लगातार तैनात हैं। इस वर्ष यात्रा अवधि 57 दिनों की निर्धारित की गई है। प्रशासन को उम्मीद है कि पूरे यात्रा काल में लाखों श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए पहुंचेंगे। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए आवास, भोजन, चिकित्सा और परिवहन की व्यवस्थाओं को पहले की तुलना में और मजबूत किया गया है। सुरक्षा एजेंसियां भी पूरे यात्रा मार्ग पर लगातार निगरानी बनाए हुए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 11:25:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संकष्टी चतुर्थी 3 जुलाई को, जानिए व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[3 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी संकष्टी चतुर्थी, भगवान गणेश की पूजा, चंद्र दर्शन, व्रत विधि और शुभ मुहूर्त जानिए विस्तार से।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/know-the-auspicious-time-of-sankashti-chaturthi-fast-on-3rd/article-57452"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sankashti-chaturthi-2026-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी का पर्व भगवान श्री गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने और पूरे श्रद्धाभाव से व्रत रखने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी 3 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन देशभर के गणेश भक्त उपवास रखकर भगवान गणपति का पूजन करेंगे और रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो जीवन में लगातार बाधाओं, आर्थिक परेशानियों, पारिवारिक तनाव या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हों। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 3 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर 4 जुलाई को दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर संकष्टी चतुर्थी का व्रत 3 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन शाम को भगवान गणेश की पूजा के बाद चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। इसलिए श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखने के बाद रात में चंद्र दर्शन करते हैं और फिर व्रत खोलते हैं। मंदिरों में भी विशेष पूजा-अर्चना और गणपति आरती का आयोजन किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">'संकष्टी' शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है संकटों से मुक्ति। वहीं 'चतुर्थी' का अर्थ है चंद्र पक्ष का चौथा दिन। इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी वह पावन अवसर माना जाता है जब भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी संकट दूर करते हैं। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके पूजन से ही होती है। इसलिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। घर के मंदिर या पूजा स्थल को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद दूर्वा घास, लाल फूल, सिंदूर, अक्षत, चंदन, धूप, दीप और मोदक का भोग अर्पित किया जाता है। भगवान गणेश के मंत्रों का जाप, गणेश अथर्वशीर्ष, संकटनाशन स्तोत्र और गणेश चालीसा का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार ग्रहण करते हैं। शाम के समय विशेष पूजा के बाद चंद्रमा को जल अर्पित कर व्रत का समापन किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को मोदक, लड्डू और तिल से बने प्रसाद का विशेष भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि गणेश जी को मोदक अत्यंत प्रिय हैं। पूजा के दौरान 21 दूर्वा, 21 लड्डू और लाल पुष्प अर्पित करने की भी परंपरा है। पूजा समाप्त होने के बाद परिवार के सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण करते हैं और भगवान गणेश से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक ग्रंथों में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन की कठिनाइयां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। विद्यार्थियों को शिक्षा में सफलता, व्यापारियों को कारोबार में उन्नति, नौकरीपेशा लोगों को करियर में प्रगति और परिवार को सुख-शांति प्राप्त होती है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति भी श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखते हैं। कई लोग इसे मानसिक शांति और आत्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का भी माध्यम मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सहित देश के कई राज्यों में संकष्टी चतुर्थी बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। विशेष रूप से महाराष्ट्र में गणपति मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। कई स्थानों पर सामूहिक आरती और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु पूरे परिवार के साथ भगवान गणेश के दर्शन करने पहुंचते हैं और मंगलकामनाएं करते हैं। जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी शुक्रवार को पड़ रही है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी अधिक माना जा रहा है। हालांकि यह अंगारकी संकष्टी चतुर्थी नहीं है, क्योंकि अंगारकी संकष्टी तब होती है जब यह व्रत मंगलवार को पड़ता है। फिर भी शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश दोनों की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालु इस दिन गणेश पूजा के साथ मां लक्ष्मी की आराधना भी कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी माध्यम है। इसलिए इस दिन क्रोध, झूठ, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भगवान गणेश का स्मरण करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों की सहायता, दान-पुण्य और गौ सेवा जैसे कार्य भी इस दिन शुभ माने जाते हैं। ऐसा करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।इस वर्ष 3 जुलाई को पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी पर देशभर के गणेश मंदिरों में विशेष आयोजन होंगे। श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से पूजा कर अपने जीवन से विघ्नों के निवारण और सुख-समृद्धि की कामना करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत भगवान गणेश को प्रसन्न करता है और भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा, सफलता और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:01:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>गुरु पूर्णिमा 2026: 5 जुलाई, रविवार को मनाया जाएगा गुरु श्रद्धा और ज्ञान का महापर्व</title>
                                    <description><![CDATA[5 जुलाई 2026, रविवार को देशभर में गुरु पूर्णिमा श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाएगी। इस दिन गुरु पूजन, दान, सत्संग और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व माना जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/festival-festival/guru-purnima-2026-the-great-festival-of-guru-shraddha-and/article-57455"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/guru-purnima-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक भी होता है। इसी गुरु परंपरा को सम्मान देने के लिए हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई, रविवार को मनाई जाएगी। इस अवसर पर देशभर के मंदिरों, आश्रमों, मठों और धार्मिक स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन और गुरु वंदना के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लाखों श्रद्धालु अपने गुरु का आशीर्वाद लेने के लिए विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पहुंचेंगे और ज्ञान, सेवा तथा संस्कार की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। सनातन धर्म में गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध श्लोक <em>"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः"</em> गुरु की महिमा का वर्णन करता है। मान्यता है कि गुरु ही वह शक्ति हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु के बिना जीवन अधूरा माना जाता है, क्योंकि सही मार्गदर्शन ही व्यक्ति को सफलता, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की और अठारह पुराणों का संपादन किया। भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप देने में उनका योगदान अतुलनीय माना जाता है। इसलिए इस दिन उन्हें आदिगुरु के रूप में भी याद किया जाता है और श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। गुरु पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से भी बहुत बड़ा है। इस दिन विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं और उनसे जीवन में आगे बढ़ने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कई स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में गुरु सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद व्यक्त करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देशभर के प्रमुख आश्रमों और आध्यात्मिक केंद्रों में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष आयोजन किए जाते हैं। सुबह से ही श्रद्धालु स्नान कर पूजा की तैयारी करते हैं। भगवान विष्णु, महर्षि वेदव्यास और अपने गुरु का पूजन किया जाता है। फूल, फल, दीपक, धूप और प्रसाद अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत भी रखते हैं और जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामग्री का दान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा पर किया गया दान और सेवा विशेष पुण्य प्रदान करता है। बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने इसी दिन सारनाथ में अपने प्रथम पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। इसे धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है। इसलिए बौद्ध अनुयायी इस दिन ध्यान, प्रार्थना और धर्म उपदेश के कार्यक्रम आयोजित करते हैं। जैन धर्म में भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आचार्यों और साधु-संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आधुनिक समय में गुरु पूर्णिमा का स्वरूप कुछ बदला जरूर है, लेकिन इसकी भावना आज भी वैसी ही बनी हुई है। आज लोग अपने गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक को सोशल मीडिया, वीडियो कॉल और डिजिटल माध्यमों से भी शुभकामनाएं भेजते हैं। कई धार्मिक संस्थाएं ऑनलाइन प्रवचन और लाइव सत्संग का आयोजन करती हैं, जिनमें देश-विदेश से श्रद्धालु जुड़ते हैं। इससे यह पर्व नई पीढ़ी तक भी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है। गुरु पूर्णिमा केवल पूजा-पाठ का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सीखने का अवसर भी है। यह पर्व हमें विनम्रता, अनुशासन, सेवा और ज्ञान का महत्व समझाता है। गुरु का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा मानी जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा के दिन कई लोग नए कार्यों की शुरुआत भी करते हैं। आध्यात्मिक साधना, योग, ध्यान और धार्मिक अध्ययन प्रारंभ करने के लिए भी यह दिन शुभ माना जाता है। कई आश्रमों में नए शिष्यों को दीक्षा दी जाती है और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत कराई जाती है। इस दिन किए गए संकल्पों को विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा पर पीले वस्त्र पहनना, भगवान विष्णु की पूजा करना, केले के पेड़ की पूजा करना और ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, फल और दक्षिणा का दान करना शुभ माना जाता है। साथ ही अपने गुरु या शिक्षकों का सम्मान करना और उनका आशीर्वाद लेना भी इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">5 जुलाई 2026, रविवार को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा एक बार फिर पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का संदेश लेकर आएगी। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में सफलता पाने के लिए केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी उतना ही आवश्यक है। गुरु का सम्मान, उनके प्रति कृतज्ञता और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प ही इस पर्व की वास्तविक भावना है। भारतीय संस्कृति में सदियों से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा आज भी समाज को संस्कार, नैतिकता और ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है और गुरु पूर्णिमा इसी अमूल्य परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बुधवार को भगवान गणेश की पूजा कैसे करें? जानें शुभ विधि, मंत्र, भोग और विशेष उपाय</title>
                                    <description><![CDATA[बुधवार भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा, मंत्र जाप और विशेष उपाय करने से बुद्धि, सुख, समृद्धि और विघ्नों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/puja-recitation/6a43c349ca70e/article-57466"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/wednesday-ganesh-puja.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सनातन धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित माना गया है। बुधवार का दिन प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धिदाता और मंगलकर्ता कहा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनसे ही की जाती है। यदि आप चाहते हैं कि आपके कार्य बिना बाधा के पूरे हों, करियर और व्यापार में सफलता मिले तथा घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे, तो बुधवार के दिन भगवान गणेश की विशेष पूजा अवश्य करनी चाहिए।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बुधवार को ऐसे करें भगवान गणेश की पूजा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बुधवार की सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करके स्वच्छ और हल्के हरे या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ जल से पोंछकर लाल या पीले वस्त्र पर स्थापित करें।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजा के दौरान सबसे पहले दीपक और धूप जलाएं। इसके बाद भगवान गणेश को गंगाजल अर्पित करें। फिर रोली, अक्षत, सिंदूर, दूर्वा घास, लाल फूल और मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। गणेश जी को विशेष रूप से दूर्वा घास अत्यंत प्रिय मानी जाती है। मान्यता है कि 21 दूर्वा अर्पित करने से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गणेश मंत्रों का करें जाप</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">पूजा के समय भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार निम्न मंत्रों का जाप कर सकते हैं—</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ॐ गं गणपतये नमः।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">या</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।<br />निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥</strong></p>
<p style="text-align:justify;">यदि समय हो तो गणेश अथर्वशीर्ष, गणेश चालीसा या संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ भी किया जा सकता है। इनका नियमित पाठ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भगवान गणेश को क्या भोग लगाएं</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भगवान गणेश को मोदक सबसे प्रिय माना गया है। यदि मोदक उपलब्ध न हों तो बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू, गुड़, नारियल, केले या अन्य मिठाइयों का भोग भी लगाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भोग लगाने के बाद परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद बांटना शुभ माना जाता है। इससे घर में सुख-शांति और सौहार्द बना रहता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बुधवार को करें ये विशेष उपाय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यदि जीवन में लगातार बाधाएं आ रही हैं या आर्थिक परेशानियां बनी हुई हैं, तो बुधवार को कुछ सरल उपाय भी किए जा सकते हैं।</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>भगवान गणेश को 21 दूर्वा अर्पित करें।</li>
<li>हरे मूंग का दान किसी जरूरतमंद को करें।</li>
<li>गाय को हरा चारा खिलाएं।</li>
<li>विद्यार्थी भगवान गणेश को कलम और पुस्तक अर्पित कर सफलता की प्रार्थना करें।</li>
<li>व्यापार में उन्नति के लिए दुकान या कार्यालय में गणेश जी की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं।</li>
<li>गरीब या जरूरतमंद बच्चों को फल, मिठाई या स्टेशनरी का दान करें।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक मान्यता है कि इन उपायों से शुभ फल प्राप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या करें और क्या न करें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बुधवार के दिन पूजा करते समय मन को शांत रखें और किसी के प्रति क्रोध या कटु वचन बोलने से बचें। पूजा में बासी फूल या खराब भोग का उपयोग नहीं करना चाहिए। भगवान गणेश को तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता, इसलिए पूजा में इसका प्रयोग न करें।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दिन झूठ बोलने, किसी का अपमान करने और अनावश्यक विवाद से बचने की भी सलाह दी जाती है। धार्मिक दृष्टि से संयम, सदाचार और सेवा भाव भगवान गणेश को प्रिय माने गए हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए विशेष महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बुधवार का दिन विशेष रूप से विद्यार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों और नौकरीपेशा लोगों के लिए शुभ माना जाता है। भगवान गणेश बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने से एकाग्रता बढ़ने और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होने की मान्यता है।</p>
<p style="text-align:justify;">व्यापारियों के लिए भी बुधवार का दिन लाभकारी माना जाता है। नए कार्य की शुरुआत, नए सौदे या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले गणेश जी का स्मरण करना शुभ माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बुधवार का आध्यात्मिक संदेश</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भगवान गणेश केवल धन और सफलता के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि विवेक, धैर्य और सकारात्मक सोच का भी संदेश देते हैं। उनकी बड़ी सूंड, विशाल कान और छोटा मुख हमें अधिक सुनने, कम बोलने और सोच-समझकर निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बुधवार को भगवान गणेश की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने, मानसिक शांति प्राप्त करने और सुख-समृद्धि बढ़ाने की मान्यता है। नियमित पूजा, मंत्र जाप, दान और अच्छे कर्मों के साथ यदि भगवान गणेश का स्मरण किया जाए, तो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास का संचार होता है। हालांकि, धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित होती हैं और उनका पालन प्रत्येक व्यक्ति अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>108 कलशों के पवित्र जल से महाप्रभु का महाअभिषेक, खुले मंच से दिए भक्तों को दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन का वैदिक विधि-विधान से स्नान, अब 15 दिनों तक रहेंगे अनासार गृह में, इसके बाद होगा नवयौवन दर्शन और रथयात्रा का शुभारंभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mahaprabhus-mahaabhishek-with-the-holy-water-of-108-kalash-was/article-57321"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jagannath-puri.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">सनातन आस्था के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में शामिल देव स्नान पूर्णिमा का पर्व सोमवार को ओडिशा के श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में पूरे श्रद्धा, उत्साह और वैदिक परंपराओं के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र, बहन देवी सुभद्रा, सुदर्शन और मदनमोहन का 108 पवित्र कलशों के जल से महाअभिषेक किया गया। हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन होने वाला यह दिव्य अनुष्ठान विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा महापर्व की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों के साथ विदेशों से भी हजारों श्रद्धालु इस दुर्लभ अवसर के साक्षी बनने पुरी पहुंचे। सुबह से ही श्रीमंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं और पूरा क्षेत्र शंखध्वनि, घंटानाद तथा वैदिक मंत्रों से गूंजता रहा। देव स्नान पूर्णिमा वर्ष का एकमात्र ऐसा दिन माना जाता है जब भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को खुले मंच से प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। सुबह मंगला आरती, अबकाश और अन्य दैनिक नीतियां पूरी होने के बाद पारंपरिक पहंडी विजय के माध्यम से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन को गर्भगृह से बाहर स्नान मंडप तक लाया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने जय जगन्नाथ के जयघोष के साथ महाप्रभु का स्वागत किया। पूरे मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला और श्रद्धालुओं में भगवान के दर्शन को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd"><img alt="9k="></img></p>
<p class="isSelectedEnd">स्नान अनुष्ठान के लिए मंदिर परिसर स्थित पवित्र सुना कुआं यानी स्वर्ण कूप से जल निकाला गया। इस जल में चंदन, कपूर, अगरु, केसर, पुष्प और विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों को मिलाकर उसे सुगंधित बनाया गया। इसके बाद 108 स्वर्ण कलशों में इस जल को भरकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान का राजकीय स्नान कराया गया। परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ को 35 कलश, भगवान बलभद्र को 33, देवी सुभद्रा को 22 तथा सुदर्शन को 18 कलशों के पवित्र जल से स्नान कराया गया। यह अनुष्ठान श्रीजगन्नाथ परंपरा की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक विधियों में से एक माना जाता है। महाअभिषेक के बाद गजपति महाराजा ने पारंपरिक 'छेरा पहंरा' की रस्म निभाई। इसके पश्चात भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र को दुर्लभ 'हाती बेश' अर्थात गजानन स्वरूप में सजाया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान ने अपने परम भक्त गणपति भट्ट को दर्शन देने के लिए हाथी स्वरूप धारण किया था। तभी से देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान को हाती बेश में सजाने की परंपरा चली आ रही है। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन को अत्यंत शुभ माना जाता है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु विशेष रूप से इस अवसर पर पुरी पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 108 कलशों के शीतल जल से स्नान कराने के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें अनासार गृह में विश्राम के लिए ले जाया जाता है, जहां अगले 15 दिनों तक आम श्रद्धालुओं के लिए प्रत्यक्ष दर्शन बंद रहते हैं। इस अवधि में केवल दैतापति सेवक भगवान की विशेष सेवा करते हैं और आयुर्वेदिक औषधियों से उनकी सेवा-सुश्रुषा की जाती है। इसे भगवान के विश्राम काल के रूप में देखा जाता है। अनासार अवधि पूरी होने के बाद नवयौवन दर्शन का आयोजन होता है, जिसमें भगवान नए स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके तुरंत बाद विश्वविख्यात रथयात्रा का आयोजन किया जाता है, जिसका इंतजार देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालु पूरे वर्ष करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd"><img alt="9k="></img></p>
<p class="isSelectedEnd">स्कंद पुराण के अनुसार देव स्नान पूर्णिमा की परंपरा का संबंध राजा इंद्रद्युम्न से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के विग्रहों की स्थापना के बाद राजा इंद्रद्युम्न ने पहली बार इस महाअभिषेक का आयोजन कराया था। तभी से ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन को भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य दिवस के रूप में भी माना जाता है। यही कारण है कि देव स्नान पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन परंपरा, ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत और भगवान जगन्नाथ के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक बन चुकी है। इस वर्ष भी मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए थे। दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष प्रबंधन किया गया ताकि बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के महाप्रभु के दर्शन कर सकें। पूरे दिन भजन-कीर्तन, वैदिक अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहा। श्रद्धालुओं का मानना है कि देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान के खुले मंच से दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। देव स्नान पूर्णिमा के साथ अब जगन्नाथ संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो गया है। अगले 15 दिनों तक भगवान अनासार गृह में रहेंगे, जिसके बाद नवयौवन दर्शन होगा और फिर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे। विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और परंपरा का ऐसा उत्सव है, जिसकी पहचान पूरी दुनिया में है। पुरी की यह परंपरा सदियों से सनातन संस्कृति की जीवंत विरासत को आगे बढ़ाती आ रही है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 16:57:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>24 जून 2026 का पंचांग: आज भद्रा का प्रभाव, शुभ कार्यों से पहले जानें मुहूर्त</title>
                                    <description><![CDATA[बुधवार के दिन तिथि, नक्षत्र और शुभ-अशुभ समय पर रहेगी लोगों की नजर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/horoscope/panchang-of-june-24-2026-effect-of-bhadra-today-know/article-56752"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/panchang-24-june-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आइए विस्तार से जानते हैं आज 24 जून 2026 के विस्तृत पंचांग, मुख्य ग्रह गोचर, चौघड़िया, शुभ समय और राहुकाल की सटीक समय-सारणी के बारे में, ताकि आपके सभी कार्य बिना किसी बाधा के संपन्न हो सकें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>24 जून 2026 के पंचांग के मुख्य घटक</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">वैदिक पंचांग के पांच मुख्य अंग तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार होते हैं। आज के पंचांग की मुख्य स्थितियां इस प्रकार हैं:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><span class="citation-90">विक्रम संवत:</span><span class="citation-90 citation-end-90"> 2083 (सिद्धार्थी)<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-89">शक संवत:</span><span class="citation-89 citation-end-89"> 1948 (पराभव)<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-88">मास व पक्ष:</span><span class="citation-88 citation-end-88"> ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-87">आज की तिथि:</span><span class="citation-87 citation-end-87"> दशमी तिथि (शाम को 06 बजकर 12 मिनट तक, इसके बाद एकादशी तिथि का आरंभ होगा)।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-86">आज का नक्षत्र:</span><span class="citation-86 citation-end-86"> चित्रा नक्षत्र (दुपहर 01 बजकर 59 मिनट तक, इसके बाद स्वाती नक्षत्र लगेगा)।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-85">आज का योग:</span><span class="citation-85 citation-end-85"> परिघ योग (सुबह 10 बजकर 23 मिनट तक, इसके बाद शिव योग की शुरुआत होगी)।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-84">आज का करण:</span><span class="citation-84 citation-end-84"> गरज (शाम 06 बजकर 12 मिनट तक), तदुपरांत वणिज करण जो पूरी रात रहेगा।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-83">आज का दिन:</span><span class="citation-83 citation-end-83"> बुधवार<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>सूर्य और चंद्रमा के उदय व अस्त का समय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार सूर्य और चंद्र देव की स्थिति हमारे दिन के वातावरण को प्रभावित करती है। आज समय-सारणी इस प्रकार रहेगी:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><span class="citation-82">सूर्योदय:</span><span class="citation-82 citation-end-82"> सुबह 05 बजकर 25 मिनट पर<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-81">सूर्यास्त:</span><span class="citation-81 citation-end-81"> शाम को 07 बजकर 23 मिनट पर<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-80">चंद्रोदय:</span><span class="citation-80 citation-end-80"> दोपहर 02 बजकर 42 मिनट पर<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-79">चंद्रास्त:</span><span class="citation-79 citation-end-79"> मध्यरात्रि के बाद 01 बजकर 35 मिनट पर (25 जून)<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-78">सूर्य राशि:</span><span class="citation-78 citation-end-78"> सूर्य देव इस समय मिथुन राशि में विराजमान हैं।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-77">चंद्र राशि:</span><span class="citation-77 citation-end-77"> चंद्र देव आज तुला राशि में संचार करेंगे।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आज के शुभ मुहूर्त: कार्यों की सफलता के लिए सर्वश्रेष्ठ समय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यदि आप आज कोई नया व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, गृह प्रवेश की रूपरेखा बना रहे हैं, या कोई बड़ा वित्तीय लेनदेन करने जा रहे हैं, तो इन शुभ समयों का उपयोग करें:</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><span class="citation-76">अमृत काल:</span><span class="citation-76 citation-end-76"> सुबह 07 बजकर 01 मिनट से सुबह 08 बजकर 46 मिनट तक।<sup class="superscript"></sup></span> यह समय किसी भी प्रकार के आध्यात्मिक और मांगलिक कार्यों के लिए बहुत उत्तम है। </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-75">ब्रह्म मुहूर्त:</span><span class="citation-75 citation-end-75"> सुबह 03 बजकर 53 मिनट से सुबह 04 बजकर 39 मिनट तक।<sup class="superscript"></sup></span> योग, ध्यान और अध्ययन के लिए यह समय सर्वोत्तम माना गया है। </p>
</li>
<li>
<p>दिन का चौघड़िया मुहूर्त:</p>
<ul>
<li>
<p><span class="citation-74">लाभ (उन्नति):</span><span class="citation-74 citation-end-74"> सुबह 05:25 से सुबह 07:10 तक<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p>अमृत (सर्वोत्तम): सुबह 07:10 से सुबह 08:55 तक</p>
</li>
<li>
<p>शुभ (उत्तम): सुबह 10:39 से दोपहर 12:24 तक</p>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<blockquote>
<p>विशेष नोट: आज 24 जून 2026 को दोपहर में कोई विशिष्ट 'अभिजित मुहूर्त' उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऊपर दिए गए अमृत काल अथवा शुभ चौघड़िया में मांगलिक कार्य संपन्न किए जा सकते हैं।</p>
</blockquote>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>अशुभ समय और राहुकाल: इस दौरान वर्जित हैं शुभ कार्य</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों के अनुसार, राहुकाल और कुछ अन्य विशिष्ट समयों में कोई भी नया या मांगलिक कार्य शुरू नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस दौरान किए गए कार्यों में विघ्न आने की आशंका रहती है।</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li>
<p><span class="citation-73">राहुकाल:</span><span class="citation-73 citation-end-73"> दोपहर 12 बजकर 00 मिनट से दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक रहेगा।<sup class="superscript"></sup></span> इस डेढ़ घंटे की अवधि में किसी भी नए अनुबंध, खरीद-बिक्री या यात्रा की शुरुआत करने से बचें। </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-72">गुलिक काल:</span><span class="citation-72 citation-end-72"> सुबह 10 बजकर 30 मिनट से दोपहर 12 बजकर 00 मिनट तक।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p><span class="citation-71">यमगण्ड:</span><span class="citation-71 citation-end-71"> सुबह 07 बजकर 30 मिनट से सुबह 09 बजकर 00 मिनट तक।<sup class="superscript"></sup></span> </p>
</li>
<li>
<p>दिशाशूल: बुधवार के दिन उत्तर दिशा में दिशाशूल रहता है। यदि इस दिशा में यात्रा करना बहुत आवश्यक हो, तो सुबह घर से निकलने से पहले धनिया या तिल खाकर निकलें।</p>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आज का धार्मिक महत्व और विशेष उपाय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">24 जून 2026 को ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि होने के कारण यह दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत पवित्र है। <span class="citation-70 citation-end-70">शाम 06:12 के बाद एकादशी तिथि शुरू हो जाएगी, जो कि अगले दिन 'निर्जला एकादशी' के रूप में मनाई जाएगी।<sup class="superscript"></sup></span> जो श्रद्धालु निर्जला एकादशी का कठिन व्रत रखते हैं, वे आज दशमी तिथि की शाम से ही चावल और तामसिक भोजन का त्याग कर देते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">आज का महाउपाय: चूंकि आज बुधवार है और परिघ के साथ शिव योग का सुंदर तालमेल बन रहा है, इसलिए सुबह के समय भगवान गणेश को 21 दूर्वा (दूब घास) अर्पित करें और मोदक का भोग लगाएं। ऐसा करने से कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है, व्यापार में उन्नति होती है और धन से जुड़ी सभी परेशानियां समाप्त होती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 10:42:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>22 जून 2026 का पंचांग: जानिए आज का शुभ मुहूर्त, तिथि और ग्रहों की स्थिति</title>
                                    <description><![CDATA[सोमवार, 22 जून 2026 के पंचांग में तिथि, नक्षत्र, योग, करण और शुभ-अशुभ समय का विशेष महत्व माना जा रहा है। जानिए दिनभर के ज्योतिषीय संकेत और धार्मिक दृष्टि से आज का महत्व।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/horoscope/panchang-of-june-22-2026-know-todays-auspicious-time-date/article-56604"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/22-june-2026-panchang.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">22 जून 2026, सोमवार का दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। भारतीय पंचांग के अनुसार किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले तिथि, नक्षत्र, योग और करण का विचार करना परंपरा का हिस्सा रहा है। यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग अपने दैनिक कार्यों, यात्राओं, पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यक्रमों के लिए पंचांग का सहारा लेते हैं। आज का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है, क्योंकि सोमवार का संबंध शिव पूजा से जुड़ा हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार आज आषाढ़ मास के प्रारंभिक दिनों का प्रभाव देखने को मिल रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है। सुबह के समय वातावरण अपेक्षाकृत शांत और सकारात्मक रहने की संभावना है। कई श्रद्धालु आज मंदिरों में दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंच सकते हैं। बताया जाता है कि सोमवार को शिवलिंग पर जल अर्पित करने से मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज की तिथि कई धार्मिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शुभ कार्य करने से पहले तिथि और नक्षत्र का विचार करना लाभकारी हो सकता है। दिनभर ग्रहों की स्थिति कुछ राशियों के लिए अनुकूल संकेत दे सकती है, जबकि कुछ लोगों को महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक आज का दिन धैर्य, संयम और योजनाबद्ध तरीके से काम करने वालों के लिए बेहतर परिणाम लेकर आ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नक्षत्र की दृष्टि से भी आज का दिन विशेष माना जा रहा है। नक्षत्रों का प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव, निर्णय क्षमता और कार्यों की सफलता पर पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि शुभ नक्षत्र में शुरू किए गए कार्यों के सफल होने की संभावना अधिक रहती है। यही वजह है कि विवाह, गृह प्रवेश, वाहन खरीद और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए पंचांग का अध्ययन किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज का योग भी कई मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। योग का संबंध व्यक्ति के भाग्य और कार्यों के परिणाम से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ योग में किए गए कार्य अपेक्षाकृत बेहतर फल प्रदान करते हैं। वहीं अशुभ समय में महत्वपूर्ण निर्णयों को टालने की सलाह दी जाती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मेहनत और सही दिशा में किया गया प्रयास किसी भी ग्रह स्थिति से अधिक प्रभावशाली होता है। करण की बात करें तो इसका उपयोग विशेष रूप से मुहूर्त निर्धारण में किया जाता है। पंचांग के पांच प्रमुख अंगों में करण भी शामिल है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार किसी भी कार्य की सफलता में करण की भूमिका मानी जाती है। इसलिए कई लोग नए कार्यों की शुरुआत से पहले इसकी जानकारी प्राप्त करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक दृष्टि से आज का दिन पूजा-पाठ, दान-पुण्य और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए अनुकूल माना जा रहा है। मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ सकती है। कई स्थानों पर विशेष पूजा और धार्मिक आयोजनों की भी संभावना है। सुबह और शाम के समय भगवान शिव के मंत्रों का जाप तथा ध्यान करना मानसिक शांति प्रदान कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि नियमित पूजा और सकारात्मक सोच व्यक्ति के जीवन में संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज के पंचांग के अनुसार राहुकाल और अन्य अशुभ समय को ध्यान में रखकर कार्य करना बेहतर माना जाता है। हालांकि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच हर व्यक्ति पंचांग के अनुसार अपने कार्य नहीं कर पाता, फिर भी धार्मिक आस्था रखने वाले लोग शुभ समय का विशेष ध्यान रखते हैं। दिनभर के दौरान संयमित व्यवहार और सकारात्मक दृष्टिकोण लाभकारी साबित हो सकता है। 22 जून 2026 का पंचांग धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तिथि, नक्षत्र, योग और करण का प्रभाव दिनभर महसूस किया जा सकता है। जो लोग धार्मिक गतिविधियों में रुचि रखते हैं, उनके लिए आज का दिन पूजा, ध्यान और आध्यात्मिक चिंतन के लिए अनुकूल माना जा रहा है। वहीं सामान्य लोगों के लिए भी यह दिन योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने और सकारात्मक सोच बनाए रखने का संदेश देता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 11:37:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>चंद्र दर्शन 2026 आज: अमावस्या के बाद चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व, श्रद्धालु करेंगे व्रत और पूजा</title>
                                    <description><![CDATA[16 जून को मनाया जाएगा चंद्र दर्शन पर्व, चंद्र देव की आराधना से सुख, समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होने की मान्यता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/chandra-darshan-2026-today-after-amavasya-there-is-special-importance/article-56034"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chandra-darshan-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन का पर्व 16 जून 2026, मंगलवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार अमावस्या के बाद पहली बार चंद्रमा के दर्शन करने की परंपरा को चंद्र दर्शन कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि अमावस्या के अंधकार के बाद चंद्रमा के प्रथम दर्शन जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और शुभ फल लेकर आते हैं। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखते हैं और चंद्र देव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। चंद्रमा को मन, बुद्धि, भावनाओं और शांति का कारक माना गया है। नवग्रहों में भी चंद्रदेव का महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा मजबूत स्थिति में होता है, उन्हें जीवन में सुख, सम्मान और समृद्धि प्राप्त होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु चंद्र दर्शन के दिन उपवास रखकर चंद्रदेव से कृपा और आशीर्वाद की कामना करते हैं। बताया जाता है कि यह पर्व विशेष रूप से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और आर्थिक उन्नति से जुड़ा हुआ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 15 जून की सुबह 8 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 16 जून की सुबह 4 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। वहीं 16 जून को चंद्रमा का उदय सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर और अस्त रात 8 बजकर 50 मिनट पर होगा। हालांकि चंद्र दर्शन के लिए सबसे शुभ समय सूर्यास्त के बाद माना जाता है, जब श्रद्धालु आकाश में नवचंद्र के दर्शन कर पूजा संपन्न करते हैं। कई स्थानों पर परिवार के सदस्य एक साथ चंद्रमा को अर्घ्य देकर मंगलकामना करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करते हैं। शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद पूजा कर व्रत खोला जाता है। पूजा में चंदन, अक्षत, सफेद पुष्प, दूध और मिठाई का विशेष महत्व बताया गया है। कई श्रद्धालु चंद्रदेव के मंत्रों का जाप भी करते हैं। माना जाता है कि इससे मन की अशांति दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन के दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को चावल, चीनी, सफेद वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करने से शुभ फल प्राप्त होता है। कई लोग ब्राह्मणों को भोजन कराकर आशीर्वाद भी प्राप्त करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फलदायी होता है और व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं कम होती हैं। पौराणिक कथाओं में चंद्रदेव को अत्यंत पूजनीय माना गया है। उन्हें राजा दक्ष की 27 पुत्रियों का पति बताया गया है, जिन्हें 27 नक्षत्रों के रूप में जाना जाता है। वहीं बुध ग्रह को चंद्रदेव का पुत्र माना जाता है। चंद्रमा का संबंध प्रकृति, वनस्पति और जीव-जंतुओं के पोषण से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में चंद्रमा केवल एक खगोलीय पिंड नहीं बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक आस्था का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन का पर्व उन लोगों के लिए विशेष लाभकारी माना जाता है, जो मानसिक तनाव, निर्णय लेने में कठिनाई या पारिवारिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। चंद्रदेव की आराधना से मन को स्थिरता और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। कई लोग इस दिन चंद्रमा को दूध मिश्रित जल अर्पित कर विशेष पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। देशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भी चंद्र दर्शन को लेकर विशेष आयोजन किए जाते हैं। श्रद्धालु शाम के समय मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और नवचंद्र के दर्शन कर अपने जीवन में सुख, शांति और सफलता की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या के बाद चंद्रमा के प्रथम दर्शन जीवन में नए अवसरों और सकारात्मक बदलावों का संकेत माने जाते हैं। इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व ऐसे समय में आ रहा है जब लोग आध्यात्मिकता और धार्मिक परंपराओं की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे में चंद्र दर्शन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक बन गया है। श्रद्धालुओं को विश्वास है कि चंद्रदेव की कृपा से उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 00:00:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>11 जून 2026: परम एकादशी व्रत, जानें समय और महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[देशभर में कल मनाई जाएगी परम एकादशी, विष्णु भक्ति और व्रत का विशेष महत्व, जानें पूरी जानकारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/11-june-2026-param-ekadashi-fast-know-its-time-and/article-55467"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/param-ekadashi-2026.jpg" alt=""></a><br /><p>देशभर में 11 जून 2026 को परम एकादशी का पावन पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। सुबह से ही मंदिरों में भक्तों की आवाजाही बढ़ने लगी है और वातावरण पूरी तरह भक्ति रस में डूबा नजर आ रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह एकादशी कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में आती है और इसे अधिमास या मलमास की अत्यंत पुण्यदायी तिथि माना गया है। इस वर्ष एकादशी तिथि 11 जून की रात 12:58 बजे शुरू होकर रात 10:36 बजे तक रहेगी। सूर्योदय सुबह 5:44 बजे और सूर्यास्त शाम 7:08 बजे दर्ज किया गया है। वहीं व्रत का पारण 12 जून की सुबह 5:44 बजे से 8:25 बजे के बीच किया जाएगा। इस बार की परम एकादशी को विशेष फलदायी माना जा रहा है क्योंकि यह समय भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।</p>
<p>परम एकादशी को ‘पुरुषोत्तम एकादशी’ भी कहा जाता है और इसका सीधा संबंध भगवान विष्णु से है। धार्मिक मान्यता है कि अधिमास में आने वाली यह एकादशी साधक के जीवन से न केवल पापों का नाश करती है बल्कि उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जाती है। कहा जाता है कि इस व्रत को करने से मनुष्य को इस जीवन के साथ-साथ पूर्व जन्मों के पापों से भी मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि स्वयं राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इस एकादशी के महत्व के बारे में प्रश्न किया था, जिसके उत्तर में श्रीकृष्ण ने इसे अत्यंत श्रेष्ठ और मोक्षदायी बताया था। कथा के अनुसार एक निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने ऋषि कौंड़िन्य के मार्गदर्शन में यह व्रत किया था, जिसके बाद उनके जीवन में अचानक गरीबी समाप्त होकर समृद्धि आ गई थी। बताया जाता है कि स्वयं कुबेर ने भी इस व्रत के प्रभाव से धन और वैभव प्राप्त किया था और देवताओं के कोषाध्यक्ष बने थे। यही कारण है कि इसे धन, सुख और समृद्धि प्रदान करने वाला व्रत भी माना जाता है।</p>
<p>धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं। कुछ श्रद्धालु निर्जला व्रत का पालन करते हैं जबकि कुछ फलाहार और दूध पर निर्भर रहते हैं। सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा की जाती है जिसमें तुलसी पत्र, फूल, दीपक, धूप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है और भक्त “विष्णु सहस्रनाम” का पाठ करते हैं। कई स्थानों पर रातभर भजन-कीर्तन और जागरण का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते रहते हैं। व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से ही संयम और सात्विक भोजन के साथ की जाती है, ताकि एकादशी के दिन शरीर और मन पूर्ण रूप से शुद्ध रह सके। व्रत का समापन द्वादशी तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-पुण्य करने के बाद किया जाता है।</p>
<p>स्थानीय मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल रही है और कई स्थानों पर विशेष सुरक्षा एवं व्यवस्था की गई है। भोपाल सहित विभिन्न शहरों में भक्तजन परिवार सहित मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं।  इस वर्ष की परम एकादशी पर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है, क्योंकि मान्यता है कि इस व्रत से जीवन में स्थायी सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। पंडितों का कहना है कि जो भी व्यक्ति नियमपूर्वक इस एकादशी का व्रत करता है, उसे न केवल सांसारिक सुख प्राप्त होते हैं बल्कि अंततः वैकुंठ धाम की प्राप्ति भी होती है। धार्मिक ग्रंथों में इसे अत्यंत शक्तिशाली व्रत बताया गया है, जो व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा दोनों बदलने की क्षमता रखता है। इस प्रकार परम एकादशी का यह पावन पर्व एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ पूरे देश में मनाया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 12:03:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Kalashtami 2026: आज देशभर में मासिक कालाष्टमी का पावन दिन</title>
                                    <description><![CDATA[भगवान काल भैरव की आराधना के लिए विशेष व्रत और पूजा का दिन, सुबह से ही मंदिरों में दिखी भक्तों की भीड़]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/kalashtami-2026-today-is-the-holy-day-of-monthly-kalashtami/article-55241"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/kalashtami-2026-(2).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज देशभर में Kalashtami 2026 का पावन पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार मासिक कालाष्टमी हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आती है और इसे भगवान काल भैरव की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस बार यह तिथि 08 जून 2026, सोमवार को पड़ रही है और सुबह से ही मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। कई शहरों में लोग तड़के उठकर स्नान कर व्रत और पूजा की तैयारी में जुट गए। वातावरण पूरी तरह धार्मिक और भक्तिमय बना हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">भोपाल सहित मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के प्रमुख शिव मंदिरों में सुबह से ही घंटियों की आवाज और मंत्रोच्चारण गूंजता रहा। भक्तों ने भगवान काल भैरव के दर्शन के लिए लंबी कतारें लगाईं। बताया जा रहा है कि इस दिन का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसे नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और जीवन में शांति तथा स्थिरता लाने वाला माना जाता है। मंदिरों में श्रद्धालु फूल, दीप और प्रसाद के साथ पूजा करते नजर आए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कालाष्टमी पर भगवान शिव के उग्र स्वरूप काल भैरव की पूजा की जाती है। मान्यता है कि Lord Shiva ने जब ब्रह्मा के अहंकार को शांत करने के लिए उग्र रूप धारण किया, तब उनका यह स्वरूप Lord Bhairav कहलाया। इसी कारण काल भैरव को समय और न्याय का देवता माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ष कालाष्टमी की अष्टमी तिथि 08 जून सुबह 3:25 बजे से शुरू होकर 09 जून सुबह 3:24 बजे तक रहेगी। इस दौरान व्रत रखने वाले श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखते हैं और कई लोग बिना अन्न-जल ग्रहण किए भगवान की आराधना करते हैं। कुछ भक्त रात में जागरण कर भजन-कीर्तन और कथा श्रवण करते हैं। मंदिरों में विशेष आरती का आयोजन भी किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। सुबह से ही कई स्थानों पर यह दृश्य देखने को मिला कि श्रद्धालु अपने परिवार के साथ मंदिर पहुंचे और विधि-विधान से पूजा की। कुछ स्थानों पर लोग काले कुत्तों को भोजन कराते नजर आए, जिसे काल भैरव का वाहन माना जाता है। यह परंपरा विशेष रूप से उत्तर भारत के कई हिस्सों में आज भी निभाई जाती है। स्थानीय पुजारियों के अनुसार यह दिन केवल धार्मिक अनुष्ठान का ही नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक है।</p>
<p style="text-align:justify;">सूत्रों के अनुसार इस बार मंदिरों में भीड़ पिछले वर्षों की तुलना में अधिक रही। सुबह के समय कई जगहों पर ट्रैफिक और भीड़ नियंत्रण के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ी। हालांकि प्रशासन की ओर से स्थिति को नियंत्रित किया गया और श्रद्धालुओं को सुचारू रूप से दर्शन कराए गए। लोगों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखा गया और कई परिवारों ने एक साथ मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की। मान्यता यह भी है कि कालाष्टमी पर दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। कई भक्तों ने गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराया और जरूरतमंदों को वस्त्र दान किए। काशी जैसे तीर्थ स्थलों में भी इस दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन किया गया पुण्य कई गुना फल देता है और जीवन की कठिनाइयों को कम करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ श्रद्धालुओं ने बताया कि आज के समय में मानसिक तनाव और जीवन की भागदौड़ के बीच ऐसे धार्मिक अवसर लोगों को मानसिक शांति प्रदान करते हैं। मंदिरों में बैठकर मंत्रों का जाप और भजन सुनना लोगों के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बनता है। कई जगहों पर शाम तक विशेष पूजा और आरती का आयोजन जारी रहने की उम्मीद है। Kalashtami 2026 का यह पर्व पूरे देश में आस्था, विश्वास और परंपरा का एक मजबूत उदाहरण बनकर सामने आया है। सुबह से लेकर दिनभर मंदिरों में भक्तों की भीड़, पूजा-पाठ और व्रत की परंपरा ने इस दिन को और भी विशेष बना दिया है। श्रद्धालुओं का कहना है कि यह दिन जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता लेकर आता है और भगवान काल भैरव की कृपा से जीवन की कठिनाइयाँ कम होती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 11:07:06 +0530</pubDate>
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