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                <title>High Court Decision - दैनिक जागरण</title>
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                <description>High Court Decision RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>MPPSC मेंस परीक्षा से रोक हटी, अभ्यर्थियों को बड़ी राहत</title>
                                    <description><![CDATA[हाईकोर्ट ने दी परीक्षा कराने की अनुमति, लेकिन रिजर्वेशन और मेरिट विवाद पर अंतिम फैसला अभी बाकी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/ban-on-mppsc-mains-exam-lifted-big-relief-for-candidates/article-56376"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mppsc-mains-exam-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (Madhya Pradesh Public Service Commission) की राज्य सेवा मुख्य परीक्षा-2025 को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद आखिरकार फिलहाल एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार को इस परीक्षा पर लगी अंतरिम रोक को हटा दिया है, जिसके बाद अब परीक्षा आयोजित करने का रास्ता साफ हो गया है। करीब डेढ़ साल से अटकी इस प्रक्रिया से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से आगे की चयन प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे। यह फैसला हाईकोर्ट की युगलपीठ, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की बेंच ने सुनाया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल मुख्य परीक्षा को लेकर अंतरिम राहत है और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े मूल कानूनी एवं संवैधानिक मुद्दों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को तय की गई है, जिसमें इन विवादों पर विस्तृत विचार किया जाएगा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग की गई थी कि परीक्षा पर लगी रोक हटाई जाए ताकि अभ्यर्थियों का भविष्य अनिश्चितता में न रहे। दलील दी गई कि भर्ती प्रक्रिया पहले ही काफी लंबी हो चुकी है और इसे और रोके रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर अदालत ने परीक्षा आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी, लेकिन सभी कानूनी प्रश्नों को सुरक्षित रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद की जड़ में प्रारंभिक परीक्षा 2025 से जुड़े कई अहम मुद्दे हैं। सबसे बड़ा सवाल वर्गवार कटऑफ सार्वजनिक न किए जाने को लेकर उठाया गया। अभ्यर्थियों का आरोप है कि मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने विस्तृत कटऑफ जारी नहीं किया, जिससे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत कटऑफ को खोलकर याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए थे। दूसरा बड़ा विवाद ओपन मेरिट सीटों को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ओबीसी, एससी, एसटी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के वे अभ्यर्थी, जिन्होंने सामान्य वर्ग के बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें अनारक्षित सीटों पर समायोजित किया जाना चाहिए। लेकिन आयोग की नीति को लेकर यह मुद्दा लगातार विवाद का कारण बना हुआ है। इसी तरह आयु सीमा में छूट पाने वाले अभ्यर्थियों के माइग्रेशन यानी सामान्य वर्ग में समायोजन के नियमों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने इन्हीं सभी बिंदुओं को गंभीर मानते हुए पहले मुख्य परीक्षा पर रोक लगा दी थी। अब रोक हटने के बाद परीक्षा प्रक्रिया फिर से शुरू हो सकेगी, लेकिन अंतिम निर्णय पर सबकी नजर बनी हुई है। इस मामले में यह भी कहा गया कि चयन प्रक्रिया लगातार लंबी होती जा रही है, जिससे अभ्यर्थियों की तैयारी और करियर दोनों प्रभावित हो रहे हैं। पहले जहां चयन एक साल में पूरा हो जाता था, वहीं अब यह प्रक्रिया डेढ़ से दो साल तक खिंच रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सेवा परीक्षाओं के पिछले संस्करण भी कानूनी विवादों में फंसे रहे हैं। 2019 और 2023 की परीक्षाओं के मामले भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे, जहां लंबी सुनवाई के बाद चयन प्रक्रिया आगे बढ़ पाई थी। इस बार भी वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां एक तरफ परीक्षा प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आरक्षण, मेरिट और माइग्रेशन जैसे मुद्दों पर अंतिम न्यायिक निर्णय का इंतजार जारी रहेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:08:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भोजशाला से फिर चर्चा में आई मां वाग्देवी की प्रतिमा, मुगल आक्रमण में हुई थी खंडित, 17 साल से ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है मूल प्रतिमा</title>
                                    <description><![CDATA[धार भोजशाला को लेकर हाईकोर्ट के फैसले के बाद लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा फिर चर्चा में आ गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/the-statue-of-maa-vagdevi-came-into-limelight-again-from/article-53549"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/bhojshala-mother-vagdevi-idol.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार के भोजशाला को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इसे हिंदू मंदिर माना है। इस फैसले के दौरान कोर्ट ने पुरातात्विक साक्ष्यों</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">एएसआई की सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र किया। इसके बाद एक बार फिर भोजशाला और मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा की चर्चा शुरू हो गई है। कहा जाता है कि यह वही प्रतिमा है जिसे हिंदू संगठन भोजशाला की आराध्य देवी मानते हैं। मुग़ल आक्रमण के दौरान यह प्रतिमा खंडित हो गई थी और बाद में इसे अंग्रेजों ने खुदाई में निकाला। अब यह प्रतिमा पिछले 117 साल से लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम के ग्रेट रसल स्ट्रीट में एक कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है। धार से लगभग 7350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग वर्षों से उठती रही है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धार के कृष पाल</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लंदन में रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ने ब्रिटिश म्यूजियम जाकर इस प्रतिमा को करीब से देखा। उन्होंने बताया कि बचपन से ही वे भोजशाला और मां वाग्देवी के बारे में सुनते आए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उन्हें इसे देखने की इच्छा थी। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां पहुंचना आसान नहीं था। म्यूजियम में भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अफ्रीका और अन्य देशों की ऐतिहासिक धरोहरें रखी गई हैं। मां वाग्देवी की यह प्रतिमा एक बड़े कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे छूने की अनुमति नहीं है। प्रतिमा करीब चार से पांच फीट ऊंची है और इसकी दो भुजाएं टूटी हुई हैं। विवरण के अनुसार इसे जैन देवी अंबिका बताया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि हिंदू संगठन इसे मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा मानते हैं। जानकारी के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रतिमा 1909 में लंदन ले जाई गई थी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ब्रिटिश म्यूजियम में भारत से लाकर रखी गई कई मूर्तियां हैं। मां वाग्देवी की प्रतिमा के पास देवी दुर्गा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">गणेशजी और भगवान महावीर समेत अन्य जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी रखी गई हैं। बताया जा रहा है कि इस सफेद पत्थर की प्रतिमा के नीचे 1034 ईस्वी का शिलालेख भी मौजूद है। भोजशाला से जुड़े लोग दावा करते हैं कि यह प्रतिमा राजा भोज की नगरी धार की विद्या की देवी की है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भोजशाला को लेकर वर्षों से विवाद और संघर्ष होते आए हैं। हिंदू पक्ष इसे मंदिर मानता है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता है। इतिहास में यहां कई बार संघर्ष और विरोध की घटनाएं देखी गई हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि 1952 से लगातार इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग की जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए कई सरकारों और नेताओं को ज्ञापन भी दिए गए हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमा भारती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से प्रतिमा लौटाने की मांग की जा चुकी है। 1961 में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहासकार पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर भी लंदन गए थे और उन्होंने यह साबित किया था कि यह धार की मां वाग्देवी की प्रतिमा है। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला और प्रतिमा की वापसी का मुद्दा फिर से गरमाने लगा है। धार और आसपास के क्षेत्र में इस फैसले के बाद धार्मिक और ऐतिहासिक चर्चाएं भी बढ़ गई हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 18:43:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी आवास में प्रार्थना सभा के लिए परमिशन जरूरी नहीं, पुलिस नोटिस किए रद्द </title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि निजी घर में प्रार्थना सभा के लिए अनुमति जरूरी नहीं है। कोर्ट ने पुलिस के नोटिस रद्द करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता को बरकरार रखने और अनावश्यक हस्तक्षेप न करने के निर्देश दिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-permission-is-not-necessary-for/article-49676"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/high-court-decision-prayer-meeting-at-home.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निजी आवास में आयोजित प्रार्थना सभाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को अपने घर में शांतिपूर्ण तरीके से प्रार्थना करने या धार्मिक बैठक आयोजित करने के लिए प्रशासन से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को एक बार फिर मजबूती दी है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पुलिस के नोटिस को कोर्ट ने किया खारिज</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">मामले की सुनवाई के दौरान सिंगल बेंच ने पुलिस द्वारा जारी किए गए नोटिस को निरस्त कर दिया। ये नोटिस थाना प्रभारी द्वारा बार-बार जारी किए जा रहे थे, जिनमें याचिकाकर्ताओं को प्रार्थना सभा बंद करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार के इस तरह के नोटिस जारी करना उचित नहीं है और इससे नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">क्या है पूरा मामला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम गोधना का है। यहां याचिकाकर्ताओं ने अपने घर की पहली मंजिल पर एक हॉल बनाया था, जहां वर्ष 2016 से ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए नियमित रूप से प्रार्थना सभा आयोजित की जा रही थी। इन सभाओं के दौरान किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या सामने नहीं आई थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">फिर भी पुलिस द्वारा लगातार नोटिस जारी किए गए</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में बताया कि इसके बावजूद थाना प्रभारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 94 के तहत बार-बार नोटिस भेजकर प्रार्थना सभा पर रोक लगाने का प्रयास कर रहे थे। इतना ही नहीं, ग्राम पंचायत द्वारा पहले दिया गया नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट भी बाद में वापस ले लिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राज्य सरकार का पक्ष</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राज्य शासन की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कुछ आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन्होंने प्रार्थना सभा के लिए संबंधित प्राधिकरण से अनुमति नहीं ली थी। इसी आधार पर पुलिस द्वारा नोटिस जारी किए गए। साथ ही सरकार ने इस मामले में जवाब प्रस्तुत करने के लिए समय भी मांगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि निजी मकान में प्रार्थना सभा आयोजित करना कानून के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी को रोका नहीं जा सकता कि उसने अनुमति नहीं ली है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कब हो सकती है कार्रवाई</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी प्रार्थना सभा के दौरान शोर-शराबा होता है, सार्वजनिक शांति भंग होती है या कानून का उल्लंघन होता है, तो प्रशासन को कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। लेकिन सिर्फ प्रार्थना करने के कारण हस्तक्षेप करना उचित नहीं है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पुलिस को दिए गए निर्देश</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिए कि वे याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक रूप से परेशान न करें और उनके मौलिक अधिकारों का सम्मान करें। साथ ही 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 को जारी सभी नोटिस को रद्द कर दिया गया।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 13:33:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बालिग और शादीशुदा महिला की मर्जी से बने संबंध अपराध नहीं, आरोपी को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेमेतरा के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि बालिग और शादीशुदा महिला की सहमति से बने शारीरिक संबंध को रेप नहीं माना जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chhattisgarh-high-courts-big-decision-consensual-relationship-between-an-adult/article-49534"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/chhattisgarh-high-court-consensual-relationship.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि किसी बालिग और विवाहित महिला के साथ उसकी स्पष्ट सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने इस मामले में निचली अदालत के फैसले को सही मानते हुए अपील को खारिज कर दिया और आरोपी को राहत प्रदान की।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">क्या था मामला और कैसे पहुंचा हाईकोर्ट</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह मामला बेमेतरा जिले से जुड़ा है, जहां महिला ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की अनुमति मांगी थी। महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा करके उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पीड़िता के आरोप और घटनाक्रम</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">महिला ने अपनी शिकायत में कहा था कि आरोपी ने उसे विवाह का भरोसा दिलाकर संबंध बनाए और बाद में अपने वादे से मुकर गया। उसने यह भी बताया कि सामाजिक दबाव और भय के कारण उसने तत्काल शिकायत दर्ज नहीं कराई। बाद में अपने पति को जानकारी देने के पश्चात मामला दर्ज कराया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">साक्ष्य और गवाहों पर अदालत की टिप्पणी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों से यह साबित नहीं होता कि महिला की सहमति किसी दबाव, डर या धोखे के तहत ली गई थी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि महिला पहले से शादीशुदा थी और गर्भवती भी थी। इन परिस्थितियों में यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले कि संबंध उसकी इच्छा के विरुद्ध बने थे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कानूनी दृष्टिकोण और फैसले की अहम बात</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई बालिग महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से शारीरिक संबंध बनाती है, तो उसे रेप नहीं माना जा सकता। केवल यह आरोप कि संबंध शादी के वादे के आधार पर बने थे, पर्याप्त नहीं है जब तक यह साबित न हो कि सहमति धोखे या दबाव के कारण प्राप्त की गई थी। इस आधार पर अदालत ने अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सहमति की परिभाषा पर फिर शुरू हुई बहस</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस फैसले के बाद सहमति और यौन अपराधों की कानूनी परिभाषा को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। हर मामले में परिस्थितियों, साक्ष्यों और दोनों पक्षों के बयानों का गहराई से विश्लेषण जरूरी होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">न्यायिक संतुलन की चुनौती</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करते हुए आरोपी के लिए निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करें। सहमति जैसे संवेदनशील मुद्दे में यह समझना आवश्यक होता है कि क्या वह पूरी तरह स्वतंत्र इच्छा से दी गई थी या किसी प्रकार के भय, दबाव या भ्रम के कारण। यह फैसला इसी संतुलन को दर्शाता है और बताता है कि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 10:59:59 +0530</pubDate>
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                <title>हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं, सोम डिस्टिलरीज की याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[जबलपुर हाईकोर्ट ने 8 लाइसेंस निलंबन को सही ठहराया, नियम उल्लंघन पर सख्ती को बताया वैध]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/big-decision-of-high-court-trade-of-liquor-is-not/article-48926"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/mp-news-(23).jpg" alt=""></a><br /><p>मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने शराब कारोबार से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने सोम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़ी कंपनी की याचिका खारिज करते हुए एक्साइज विभाग द्वारा 8 लाइसेंस निलंबित करने की कार्रवाई को वैध ठहराया है।</p>
<p>जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकल पीठ ने 32 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा कि शराब का उत्पादन, वितरण और बिक्री पूरी तरह सरकारी नियंत्रण के अधीन है। ऐसे में यदि नियमों का उल्लंघन होता है, तो लाइसेंस निलंबित या रद्द करना पूरी तरह कानूनी और उचित कार्रवाई है।</p>
<p>यह मामला 4 फरवरी 2026 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें एक्साइज कमिश्नर ने सोम डिस्टिलरीज और सोम डिस्टिलरीज एंड ब्रेवरीज प्राइवेट लिमिटेड के कुल 8 लाइसेंस सस्पेंड कर दिए थे। यह कार्रवाई 26 फरवरी 2024 को जारी एक शो-कॉज नोटिस के आधार पर की गई थी, जिसमें फर्जी परमिट के जरिए शराब परिवहन के आरोप लगाए गए थे।</p>
<p>कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संबंधित नोटिस 2023-24 की अवधि से जुड़ा था और 31 मार्च 2024 को उस अवधि के लाइसेंस समाप्त हो चुके थे। इसके बाद नए लाइसेंस जारी किए गए, इसलिए पुराने नोटिस के आधार पर कार्रवाई को अवैध माना जाना चाहिए।</p>
<p>हालांकि, राज्य सरकार की ओर से पेश पक्ष में कहा गया कि एक्साइज एक्ट के तहत विभाग को कार्रवाई का स्पष्ट अधिकार है और नियमों का पालन अनिवार्य है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि गंभीर अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई समय-सीमा से बंधी नहीं होती।</p>
<p>हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शो-कॉज नोटिस किसी एक अवधि तक सीमित नहीं होता। यदि आरोप गंभीर हों, तो बाद में भी कार्रवाई की जा सकती है और पुराने उल्लंघनों का प्रभाव नए लाइसेंस पर भी पड़ सकता है।</p>
<p>अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी जैसे मामलों में तकनीकी दलीलों का महत्व कम हो जाता है। एक बार आरोप प्रमाणित हो जाएं, तो अन्य कानूनी तर्क कमजोर पड़ जाते हैं।</p>
<p>फैसले में कहा गया कि डिस्टिलिंग, ब्रूइंग और बॉटलिंग जैसी गतिविधियों में नियमों का उल्लंघन सार्वजनिक हित से जुड़ा मामला है। ऐसे में सख्त कार्रवाई जरूरी है और यह ‘प्रोपोर्शनैलिटी टेस्ट’ पर भी खरी उतरती है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:07:58 +0530</pubDate>
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