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                <title>Employee Rights - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Employee Rights RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>क्या 5 साल से पहले नौकरी छोड़ने पर मिलेगा ग्रेच्युटी का पैसा या नहीं? जानिए नया नियम</title>
                                    <description><![CDATA[जानिए Gratuity Rule के नए नियम: 5 साल से पहले नौकरी छोड़ने पर ग्रेच्युटी मिलेगी या नहीं, 4 साल 240 दिन नियम और नए लेबर कोड की पूरी जानकारी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/will-you-get-gratuity-money-if-you-leave-the-job/article-52827"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ-(99).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"><strong>Gratuity Rule:</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">आज के समय में नौकरी बदलना काफी आम हो गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर प्राइवेट सेक्टर में जहां बेहतर सैलरी और करियर ग्रोथ के लिए लोग जल्दी-जल्दी बदलाव कर रहे हैं। इसी बीच सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला मुद्दा है ग्रेच्युटी नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कई कर्मचारी यह समझ नहीं पाते कि अगर वे 5 साल से पहले नौकरी छोड़ दें तो उन्हें ग्रेच्युटी मिलेगी या नहीं। यह सवाल आज भी </span>HR <span lang="hi" xml:lang="hi">डिपार्टमेंट से लेकर कर्मचारियों तक हर जगह पूछा जा रहा है और नए लेबर कोड्स के बाद इस पर और भी कन्फ्यूजन बढ़ गया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">असल में ग्रेच्युटी एक तरह का इनाम है जो कंपनी कर्मचारी को उसकी लंबी सेवा के बदले देती है। अभी तक के नियमों के मुताबिक किसी भी कर्मचारी को ग्रेच्युटी पाने के लिए कम से कम 5 साल तक लगातार एक ही कंपनी में काम करना जरूरी होता है। अगर कोई कर्मचारी बीच में नौकरी छोड़ देता है तो सामान्य स्थिति में उसे यह लाभ नहीं मिलता। हालांकि</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौत या स्थायी दिव्यांगता जैसे मामलों में यह नियम लागू नहीं होता और परिवार को ग्रेच्युटी का भुगतान किया जाता है। लेकिन नए लेबर कोड्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर सोशल सिक्योरिटी कोड को लेकर जो बदलाव चर्चा में हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने इस पूरे सिस्टम को थोड़ा अलग मोड़ दिया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जानकारी और विशेषज्ञों की मानें तो नए नियमों में फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए राहत दी गई है। यानी अगर कोई कर्मचारी कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे 5 साल पूरे करने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। ऐसे कर्मचारियों को सिर्फ 1 साल की लगातार सेवा के बाद भी ग्रेच्युटी मिलने की संभावना बनती है। यह बदलाव खासकर गिग वर्कर्स और अस्थायी कर्मचारियों के लिए काफी अहम माना जा रहा है। सरकार की मंशा यही बताई जा रही है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को सोशल सिक्योरिटी के दायरे में लाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि अभी इसे लेकर पूरी तरह से स्पष्टता सभी मामलों में नहीं है और कई नियम लागू होने बाकी हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अब बात आती है उस स्थिति की जिसे अक्सर कर्मचारी नजरअंदाज कर देते हैं। कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि ग्रेच्युटी कानून में एक अहम प्रावधान है जिसे </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">“<span lang="hi" xml:lang="hi">4 साल 240 दिन नियम</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है। इसके अनुसार अगर किसी कर्मचारी ने 4 साल पूरे कर लिए हैं और पांचवें साल में कम से कम 240 दिन काम कर लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे भी ग्रेच्युटी का हकदार माना जा सकता है। इस पर अलग-अलग अदालतों के फैसले भी सामने आए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कई बार कर्मचारी के पक्ष में निर्णय दिया गया है। मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले में भी यह माना गया था कि 240 दिन की सेवा को एक पूरा वर्ष माना जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे ग्रेच्युटी का लाभ मिल सकता है। हालांकि हर केस में यह ऑटोमैटिक लागू नहीं होता और कंपनी की पॉलिसी भी इसमें भूमिका निभाती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि नौकरी छोड़ने या बदलने से पहले कर्मचारी अपने सभी दस्तावेज जैसे नियुक्ति पत्र</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैलरी स्लिप और अटेंडेंस रिकॉर्ड को ठीक से संभालकर रखें। कई बार इन्हीं कागजों के आधार पर यह साबित होता है कि कर्मचारी ने कितनी अवधि तक लगातार काम किया है। छोटे-छोटे रिकॉर्ड बाद में बड़े फायदे दिला सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा </span>HR <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोफेशनल्स का कहना है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">देखा जाए तो ग्रेच्युटी नियम को लेकर अभी भी पूरी तरह स्पष्ट तस्वीर हर कर्मचारी के लिए एक जैसी नहीं है। कुछ कैटेगरी में राहत बढ़ी है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहीं स्थायी कर्मचारियों के लिए पुराना 5 साल वाला नियम अब भी लागू है। ऐसे में नौकरी बदलने से पहले नियमों को अच्छे से समझना और कंपनी की पॉलिसी को ध्यान से पढ़ना बेहद जरूरी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वरना बाद में आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 11:51:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंदौर में बैंक मैनेजर के यौन उत्पीड़न के आरोप, जांच की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[इंदौर बैंक मैनेजर यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व एक्सिस बैंक मैनेजर ने वरिष्ठ अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं, कलेक्टर से जांच की मांग की गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/demand-for-investigation-into-allegations-of-sexual-harassment-of-bank/article-51784"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/indore-mp.jpg" alt=""></a><br /><p>इंदौर में एक निजी बैंक की पूर्व मैनेजर द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने कार्यस्थल की सुरक्षा और व्यवहार को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़िता ने वरिष्ठ अधिकारियों पर मानसिक, शारीरिक उत्पीड़न और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। मामला अब प्रशासनिक जांच के दायरे में आ गया है।</p>
<h5><strong>इंदौर में बैंक मैनेजर आरोप मामला</strong></h5>
<p>इंदौर में बैंकिंग सेक्टर से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें एक निजी बैंक की पूर्व ऑपरेशन हेड (बदला हुआ नाम निहारिका) ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। इंदौर बैंक मैनेजर यौन उत्पीड़न मामले में पीड़िता ने मंगलवार को कलेक्टर जनसुनवाई में आवेदन देकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। पीड़िता का आरोप है कि कार्यस्थल पर उन्हें लगातार अश्लील टिप्पणियों, अनुचित व्यवहार और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही नौकरी छोड़ने के बाद भी उन्हें आर्थिक रूप से परेशान किए जाने का दावा किया गया है।</p>
<h5><strong>कार्यस्थल पर गंभीर आरोप</strong></h5>
<p>पीड़िता के अनुसार, फरवरी 2023 से मई 2025 के बीच उनके कार्यकाल में कई बार वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें केबिन में बुलाकर अश्लील इशारे किए और डबल मीनिंग बातें कही गईं।आरोप यह भी है कि मासिक धर्म के दौरान भी उन्हें लंबे समय तक खड़े रहकर मीटिंग में शामिल होना पड़ा और बैठने की अनुमति नहीं दी गई। साथ ही बैंक की अनिवार्य छुट्टियों का भी पालन नहीं होने दिया गया। इंदौर बैंक मैनेजर यौन उत्पीड़न मामले में यह भी दावा किया गया है कि उनके अच्छे प्रदर्शन के बावजूद कार्यस्थल पर दबाव का माहौल लगातार बना रहा।</p>
<h5><strong>इस्तीफे के बाद विवाद</strong></h5>
<p>पीड़िता ने बताया कि लगातार दबाव और मानसिक उत्पीड़न के कारण उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, नोटिस पीरियड पूरा करने के बावजूद उन्हें कथित रूप से बकाया बोनस और अन्य भुगतान नहीं दिए गए।आरोप है कि बोनस मांगने पर क्षेत्रीय और जोनल अधिकारियों ने भुगतान रोक दिया और उन्हें विभिन्न स्तरों पर शिकायत करने के बावजूद राहत नहीं मिली।इंदौर बैंक मैनेजर यौन उत्पीड़न मामला नौकरी छोड़ने के बाद भी जारी दबाव और धमकियों के आरोपों के कारण और गंभीर हो गया है।</p>
<h5><strong>धमकी और शिकायतें</strong></h5>
<p>पीड़िता का कहना है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद उन्हें कथित रूप से धमकी दी गई कि उनका करियर बर्बाद कर दिया जाएगा। इसके अलावा विभिन्न कार्यालयों के चक्कर लगवाकर मानसिक रूप से परेशान करने का भी आरोप है। उन्होंने ‘शी-बॉक्स पोर्टल’ और सरकारी लेबर विभाग में भी शिकायत दर्ज कराई है, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने का दावा किया गया है।</p>
<h5><strong>बैंक का पक्ष और जांच की मांग</strong></h5>
<p>मामले में बैंक के डिप्टी एचआर अधिकारी ने कहा है कि उनके पास यौन उत्पीड़न से जुड़ी कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। हालांकि, बोनस भुगतान को लेकर एक अलग शिकायत मिलने की बात स्वीकार की गई है, जिसे बैंक नीति के अनुसार निपटाया गया। पीड़िता ने कलेक्टर से निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अपील की है।</p>
<p>यह मामला अब प्रशासनिक जांच की दिशा में बढ़ रहा है। इंदौर बैंक मैनेजर यौन उत्पीड़न से जुड़ी इस शिकायत ने कार्यस्थल सुरक्षा और कॉरपोरेट जवाबदेही पर नई बहस को जन्म दिया है। आने वाले दिनों में जांच के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 16:27:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: कर्मचारियों का प्रमोशन कोई मौलिक अधिकार नहीं, CMO और RI का रास्ता साफ</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रमोशन किसी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chhattisgarh-high-courts-decision-promotion-of-employees-is-not-a/article-49105"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/chhattisgarh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जो नगरीय प्रशासन विभाग के लिए दिशानिर्देश स्वरूप है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी के लिए पदोन्नति हासिल करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इस फैसले के साथ ही 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">राजस्व निरीक्षक को मुख्य नगर पालिका अधिकारी पद की दौड़ में शामिल करना संवैधानिक</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) क्लास-बी के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह से संवैधानिक है। यह किसी भी कर्मचारी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी और नगरपालिका सेवक के बीच समानता का हनन हो रहा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पदोन्नति नीतिगत निर्णय के अंतर्गत आता है</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति के लिए फीडर कैडर तय करना और अलग-अलग पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह से कार्यपालिका और सरकार के नीतिगत निर्णय के दायरे में आता है। कर्मचारियों को केवल यह अधिकार है कि नियमों के अनुसार उन्हें पदोन्नति के लिए विचार किया जाए</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रमोशन हासिल करना उनका निहित अधिकार नहीं है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अनुभव में छूट देना अवैध नहीं</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को भी सही ठहराया</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसमें राजस्व निरीक्षकों के लिए अनुभव की अनिवार्य अवधि 6 साल से घटाकर 5 साल की गई थी। यह एक वन टाइम रियायत थी</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसे अधिकारियों की कमी और जनहित को देखते हुए लागू किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">याचिकाएं खारिज</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नई सुनवाई</span></strong></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह साबित नहीं किया कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम असंवैधानिक हैं। इसलिए सभी याचिकाएं निराधार पाई गईं और खारिज कर दी गईं। यह मामला पहले भी हाईकोर्ट में सुना गया था और तब प्रावधानों को अवैध घोषित किया गया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को आदेश दिया कि मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में लौटाया जाए। अब डिवीजन बेंच का नया निर्णय आया है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 13:18:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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