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                <title>court decision - दैनिक जागरण</title>
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                <description>court decision RSS Feed</description>
                
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                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अतिशेष व्याख्याताओं को राहत देने से इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच का फैसला सही ठहराते हुए कहा—जहां छात्र नहीं, वहां शिक्षक रखने का औचित्य नहीं बनता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chhattisgarh-high-court-refuses-to-provide-relief-to-surplus-lecturers/article-56472"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(3).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की युक्तिकरण नीति के तहत अतिशेष घोषित किए गए व्याख्याताओं को राहत देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा और वाणिज्य विषय की व्याख्याताओं द्वारा दायर रिट अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि जिस स्कूल में किसी विषय का एक भी छात्र नहीं है, वहां उस विषय के शिक्षकों को पदस्थ बनाए रखने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बनता। ऐसे मामलों में सरकार द्वारा शिक्षकों को उन स्कूलों में भेजना जहां वास्तव में छात्र अध्ययन कर रहे हैं, प्रशासनिक दृष्टि से उचित और आवश्यक कदम है। मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ विकासखंड स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिवनी से जुड़ा हुआ है। यहां शकुंतला राठौर और कृष्णा देवी साहू वाणिज्य विषय की व्याख्याता के रूप में पदस्थ थीं। शिक्षा विभाग द्वारा की गई समीक्षा और छात्र संख्या के आकलन में यह सामने आया कि विद्यालय में कॉमर्स विषय का एक भी विद्यार्थी अध्ययनरत नहीं है। इसके बाद राज्य सरकार की युक्तिकरण नीति के तहत दोनों शिक्षिकाओं को अतिशेष घोषित किया गया। विभाग ने नियमानुसार काउंसलिंग प्रक्रिया आयोजित की और दोनों की पदस्थापना मुंगेली जिले के दासरंगपुर और कोना स्थित स्कूलों में कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कार्रवाई के खिलाफ दोनों शिक्षिकाओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि विभाग ने काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान जिले में उपलब्ध कुछ रिक्त पदों की जानकारी नहीं दी और मनमाने तरीके से उन्हें दूरस्थ स्थानों पर भेज दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विभाग की कार्रवाई भेदभावपूर्ण है और उन्हें अपने जिले या नजदीकी क्षेत्र में पदस्थापना का अवसर मिलना चाहिए था। उन्होंने यह भी दावा किया कि ट्रांसफर प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं थी और कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया। वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत में प्रस्तुत जवाब में कहा गया कि पूरी प्रक्रिया युक्तिकरण नीति की धारा 7(सी)(2) के तहत अपनाई गई है। सरकार ने बताया कि नीति का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच संतुलन स्थापित करना है ताकि जहां छात्रों की संख्या अधिक है वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हो सकें। यदि किसी स्कूल में किसी विषय का एक भी छात्र नहीं है तो वहां उस विषय के शिक्षक को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। ऐसे मामलों में शिक्षकों को उन संस्थानों में भेजा जाता है जहां वास्तव में उनकी सेवाओं की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वरिष्ठता के आधार पर शिक्षकों को पहले जिला स्तर पर विकल्प देने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके बाद संभाग स्तर की काउंसलिंग के माध्यम से रिक्त पदों पर पदस्थापना की गई। विभाग का कहना था कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप रही है तथा किसी भी कर्मचारी के साथ भेदभाव नहीं किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया। अदालत ने पाया कि सिवनी स्कूल में कॉमर्स विषय के छात्रों की संख्या शून्य थी और यह तथ्य रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से मौजूद है। ऐसे में सरकार द्वारा शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित करना न केवल नीति के अनुरूप है बल्कि शिक्षा व्यवस्था के बेहतर संचालन के लिए भी जरूरी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग वहां होना चाहिए जहां उनकी वास्तविक आवश्यकता हो। यदि किसी विद्यालय में छात्र ही नहीं हैं तो वहां शिक्षकों की नियुक्ति बनाए रखना प्रशासनिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ट्रांसफर और पदस्थापना से जुड़े फैसले नियोक्ता के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों में तभी हस्तक्षेप करता है जब स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई सामने आए। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि विभाग ने नियमों को दरकिनार किया है या जानबूझकर किसी विशेष व्यक्ति के साथ अन्याय किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी दोहराया कि किसी सरकारी कर्मचारी को अपनी पसंद की जगह या गृह जिले में ही पदस्थ रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। सरकारी सेवा की प्रकृति ही ऐसी होती है जिसमें आवश्यकता के अनुसार कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जा सकता है। इसलिए केवल इस आधार पर कि किसी कर्मचारी को नई पदस्थापना पसंद नहीं है, ट्रांसफर आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट के इस फैसले को शिक्षा विभाग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से युक्तिकरण नीति को लेकर विभिन्न जिलों में विवाद और आपत्तियां सामने आती रही हैं। अब इस निर्णय के बाद सरकार को ऐसी नीतियों को लागू करने में कानूनी मजबूती मिलने की संभावना है। साथ ही यह संदेश भी गया है कि छात्र संख्या और शैक्षणिक जरूरतों के आधार पर शिक्षकों की तैनाती को न्यायालय ने उचित माना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:47:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मौत के बाद मिला प्रमोशन, परिवार को मिला 2002 से पदोन्नति लाभ, हाईकोर्ट ने कहा- अधिकार मौत से खत्म नहीं होते</title>
                                    <description><![CDATA[ग्वालियर में हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में दिवंगत कर्मचारी को 2002 से पदोन्नत मानते हुए उनके परिवार को सभी वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/69ca24c116f04/article-49560"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/promotion-after-death-gwalior-high-court-judgment.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ग्वालियर में एक अहम न्यायिक फैसले ने यह साबित कर दिया कि किसी व्यक्ति के अधिकार उसकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते। लंबे समय से लंबित एक मामले में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने दिवंगत कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके परिवार को न्याय दिलाया। यह निर्णय न केवल संबंधित परिवार के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सरकारी सेवा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पूरा मामला क्या है</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह मामला सीनियर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर रहे डॉ. राधाकृष्ण शर्मा से जुड़ा है। वे अपने विभाग में वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति के पात्र थे, लेकिन वर्ष 2002 में हुई प्रमोशन प्रक्रिया में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उनकी जगह उनके जूनियर अधिकारियों को पदोन्नत कर दिया गया, जिससे उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">विभाग का पक्ष और विवाद की वजह</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">विभाग ने पदोन्नति न देने के पीछे दो मुख्य कारण बताए थे। पहला, डॉ. शर्मा के खिलाफ लंबित आपराधिक मामला और दूसरा, उनकी गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर। हालांकि, समय के साथ वे उस आपराधिक मामले से पूरी तरह बरी हो गए। इसके बावजूद विभाग ने उनकी पदोन्नति पर पुनर्विचार नहीं किया, जो बाद में विवाद का मुख्य कारण बना।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अपना हक पाने के लिए डॉ. शर्मा ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह कानूनी संघर्ष लंबा चला और करीब 18 साल तक मामला अदालत में विचाराधीन रहा। दुर्भाग्यवश, इस दौरान डॉ. शर्मा का निधन हो गया। इसके बाद उनके पुत्र रमन शर्मा ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया और न्याय की उम्मीद बनाए रखी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही या गलती के कारण पदोन्नति से वंचित किया जाता है, तो उसे उसका पूरा लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि “नो वर्क-नो पे</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;">”</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;"> का सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होता, जहां गलती कर्मचारी की नहीं बल्कि विभाग की हो।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कोर्ट ने यह भी माना कि बिना बताए गए एसीआर को पदोन्नति का आधार बनाना कानून के विरुद्ध है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अंतिम आदेश और परिवार को राहत</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालत ने अपने अंतिम आदेश में निर्देश दिया कि डॉ. राधाकृष्ण शर्मा को 28 अक्टूबर 2002 से पदोन्नत माना जाए। साथ ही, उसी तारीख से उनके वेतन, एरियर, वरिष्ठता और अन्य सभी लाभों की गणना कर पूरी राशि उनके परिवार को दी जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस फैसले में अदालत ने साफ किया कि पदोन्नति न मिलना डॉ. शर्मा की गलती नहीं थी, बल्कि यह विभाग की लापरवाही का परिणाम था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">फैसले का व्यापक महत्व</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह निर्णय केवल एक व्यक्ति के परिवार को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक मजबूत संदेश देता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अधिकारों का अंत नहीं होता।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 13:12:05 +0530</pubDate>
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