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                <title>space news - दैनिक जागरण</title>
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                <title>जेफ बेजोस की कंपनी का न्यू ग्लेन रॉकेट टेस्टिंग के दौरान ब्लास्ट</title>
                                    <description><![CDATA[फ्लोरिडा लॉन्चपैड पर बड़ा हादसा, बोले बेजोस- फिर उड़ान भरेंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/jeff-bezoss-companys-new-glenn-rocket-explodes-during-testing/article-54509"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/blue-origin.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">अमेजन के मालिक जेफ बेजोस की स्पेस कंपनी ब्लू ओरिजिन को बड़ा झटका लगा है। कंपनी का न्यू ग्लेन रॉकेट गुरुवार रात फ्लोरिडा के केप कैनावेरल लॉन्चपैड पर टेस्टिंग के दौरान ब्लास्ट हो गया। हादसे का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी काफी चर्चा हो रही है। वीडियो में देखा जा सकता है कि लॉन्चपैड पर खड़ा विशाल रॉकेट अचानक तेज धमाके के साथ आग के बड़े गोले में बदल गया। हालांकि राहत की बात यह रही कि इस हादसे में कोई कर्मचारी घायल नहीं हुआ।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">ब्लू ओरिजिन की तरफ से बताया गया कि न्यू ग्लेन रॉकेट का ‘हॉट फायर टेस्ट’ किया जा रहा था। यह टेस्ट किसी भी रॉकेट को लॉन्च करने से पहले बेहद अहम माना जाता है। इसमें रॉकेट को लॉन्चपैड पर मजबूत क्लैम्प्स से बांधकर उसके इंजनों को पूरी ताकत से कुछ समय के लिए चालू किया जाता है। इसी दौरान रॉकेट में तकनीकी गड़बड़ी आ गई और बड़ा विस्फोट हो गया। हादसा रात करीब 9 बजे हुआ। धमाका इतना तेज था कि आसपास मौजूद लोगों ने दूर तक आग की लपटें और धुआं उठते देखा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">घटना के बाद लॉन्चपैड के आसपास इमरजेंसी टीमों को तुरंत सक्रिय किया गया। अमेरिकी स्पेस फोर्स और स्थानीय प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचे। शुरुआती जांच में कहा गया है कि आम लोगों को इस हादसे से कोई खतरा नहीं हुआ। फिलहाल पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में रखा गया है और विशेषज्ञ टीम हादसे की असली वजह पता लगाने में जुटी है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">ब्लू ओरिजिन के फाउंडर जेफ बेजोस ने हादसे के बाद बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि “आज का दिन कठिन रहा, लेकिन हमारे सभी कर्मचारी सुरक्षित हैं। हम यह पता लगा रहे हैं कि आखिर गलती कहां हुई। जो भी दोबारा बनाना पड़ेगा, हम बनाएंगे और फिर से उड़ान भरेंगे।” बेजोस का यह बयान तेजी से वायरल हो रहा है। स्पेस इंडस्ट्री से जुड़े कई लोगों ने भी टीम का हौसला बढ़ाया है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">नासा के एडमिनिस्ट्रेटर जैरेड इसाकमैन ने भी घटना पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि स्पेसफ्लाइट आसान नहीं होती और हैवी-लिफ्ट रॉकेट तैयार करना दुनिया के सबसे कठिन तकनीकी कामों में शामिल है। उन्होंने कहा कि नासा इस पूरे मामले की जांच में सहयोग करेगा और आगे के मिशनों पर इसके असर का आकलन किया जाएगा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">यह घटना ऐसे समय हुई है जब ब्लू ओरिजिन अपने स्पेस प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पिछले साल नवंबर में कंपनी ने न्यू ग्लेन रॉकेट की सफल लॉन्चिंग कर बड़ी उपलब्धि हासिल की थी। उसी मिशन में कंपनी ने पहली बार अपने रीयूजेबल बूस्टर को सफलतापूर्वक लैंड कराया था। इसे ब्लू ओरिजिन के लिए बड़ी तकनीकी सफलता माना गया था।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">करीब 29 मंजिला इमारत जितने ऊंचे इस न्यू ग्लेन रॉकेट को तैयार करने में कंपनी ने लगभग एक दशक का समय और अरबों डॉलर खर्च किए हैं। यह रॉकेट दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले सिस्टम पर आधारित है। इसे खासतौर पर इलॉन मस्क की स्पेस कंपनी स्पेसएक्स के फॉल्कन और स्टारशिप रॉकेट्स को चुनौती देने के लिए डिजाइन किया गया है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह है कि हादसे से एक दिन पहले ही ब्लू ओरिजिन ने अमेजन के इंटरनेट प्रोजेक्ट से जुड़ी बड़ी घोषणा की थी। कंपनी ने कहा था कि न्यू ग्लेन रॉकेट के जरिए जल्द ही 48 ‘लियो’ सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इन सैटेलाइट्स की मदद से अमेजन दुनिया भर में ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा शुरू करना चाहता है। इसे सीधे तौर पर इलॉन मस्क के स्टारलिंक नेटवर्क को चुनौती देने की तैयारी माना जा रहा था।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">हादसे के बाद सोशल मीडिया पर इलॉन मस्क की प्रतिक्रिया भी सामने आई। उन्होंने एक्स पर लिखा कि “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण। रॉकेट बनाना और उन्हें ऑपरेट करना बेहद कठिन काम है।” मस्क का यह बयान काफी चर्चा में है क्योंकि स्पेसएक्स खुद भी कई बार टेस्टिंग के दौरान ऐसे विस्फोटों का सामना कर चुकी है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">पिछले कुछ महीनों में ब्लू ओरिजिन को दूसरी बार बड़ा झटका लगा है। इससे पहले फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन ने एक असफल सैटेलाइट लॉन्चिंग की जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद कंपनी के न्यू ग्लेन प्रोग्राम को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा था। अब इस नए हादसे ने कंपनी की आगामी लॉन्चिंग योजनाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। रॉकेट साइंस में असफलताएं नई बात नहीं हैं। कई बार टेस्टिंग के दौरान हुई विफलताएं ही आगे की सफलता का रास्ता तैयार करती हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:18:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>स्पेस में बढ़ता खतरा: 2025 में 18 बार टकराव से बचे भारतीय सैटेलाइट, इसरो ने बदला रास्ता</title>
                                    <description><![CDATA[1.5 लाख अलर्ट के बीच इसरो की सतर्कता, अंतरिक्ष मलबे से बढ़ा जोखिम; चंद्रयान-2 को भी कई बार बदलनी पड़ी कक्षा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/increasing-danger-in-space-indian-satellite-saved-from-collision-18/article-51424"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/space-news.jpg" alt=""></a><br /><p>अंतरिक्ष में बढ़ते मलबे के खतरे के बीच भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन</span></span> की ‘इंडियन स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस रिपोर्ट-2025’ के अनुसार, वर्ष 2025 में भारतीय सैटेलाइट्स को संभावित टकराव से बचाने के लिए 18 बार उनकी कक्षा में बदलाव करना पड़ा। यह स्थिति अंतरिक्ष में बढ़ती भीड़ और मलबे के खतरे को स्पष्ट करती है।</p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक, इसरो को साल भर में करीब 1.5 लाख से अधिक अलर्ट मिले। ये अलर्ट मुख्य रूप से अमेरिकी स्पेस कमांड से प्राप्त हुए, जिनका भारतीय वैज्ञानिकों ने विश्लेषण कर सटीक ऑर्बिटल डेटा के साथ मिलान किया। इन अलर्ट्स ने संकेत दिया कि लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) अब बेहद संवेदनशील और जोखिमपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।</p>
<p>संभावित टकराव से बचने के लिए इसरो ने 18 बार ‘कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर’ किया। इनमें से 14 बार LEO में स्थित उपग्रहों के लिए और 4 बार जियो स्टेशनरी ऑर्बिट (GEO) में मौजूद सैटेलाइट्स के लिए कक्षा बदली गई। इस प्रक्रिया में उपग्रह की गति और ऊंचाई में बदलाव कर उसे मलबे से दूर किया जाता है।</p>
<p>रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अंतरिक्ष में मलबा 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रहा है। ऐसे में एक छोटा सा टुकड़ा भी सैटेलाइट को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। वर्तमान में अंतरिक्ष में 10 सेंटीमीटर से बड़े लगभग 40,000 और 1 सेंटीमीटर से बड़े करीब 12 लाख मलबे के टुकड़े मौजूद हैं।</p>
<p>गहरे अंतरिक्ष मिशनों पर भी इसका असर पड़ा है। <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">चंद्रयान-2</span></span> के ऑर्बिटर को 2025 में 16 बार अपनी कक्षा बदलनी पड़ी। इसके अलावा, नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर से संभावित टकराव से बचने के लिए दो बार मिशन प्लानिंग में बदलाव किया गया।</p>
<p>इसरो ने अपने सभी पांच लॉन्च मिशनों के दौरान भी सतर्कता बरती। एक मामले में एलवीएम3-एम6 मिशन की लॉन्चिंग को 41 सेकंड तक टालना पड़ा, ताकि मलबे से सुरक्षित दूरी सुनिश्चित की जा सके।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, 2025 में वैश्विक स्तर पर 328 लॉन्च प्रयास हुए, जिनमें 4,198 सैटेलाइट्स स्थापित किए गए। इससे अंतरिक्ष में कुल 4,651 नए ऑब्जेक्ट्स जुड़ गए, जिससे भीड़ और खतरा दोनों बढ़े हैं।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस समस्या से निपटने के प्रयास जारी हैं। अमेरिका उन्नत रडार और सेंसर से मलबे की ट्रैकिंग कर रहा है, जबकि यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर रही है। जापान और चीन भी मलबा हटाने की नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 11:11:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>54 साल बाद मून मिशन पर NASA, 4 एस्ट्रोनॉट्स करेंगे चांद की परिक्रमा, iPhone से आएंगी लाइव तस्वीरें</title>
                                    <description><![CDATA[NASA का Artemis II मिशन 54 साल बाद इंसानों को चांद के करीब ले जा रहा है। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की परिक्रमा करेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/after-54-years-4-nasa-astronauts-will-orbit-the-moon/article-49898"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/nasa-artemis-ii-moon-mission-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">54 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर मानव अंतरिक्ष इतिहास के सबसे रोमांचक अध्याय की ओर बढ़ चुका है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने Artemis II मिशन के जरिए इंसानों को चंद्रमा के करीब भेजने की ऐतिहासिक शुरुआत की है। यह मिशन 1972 में हुए अपोलो 17 मून मिशन के बाद पहली बार मानव को चंद्रमा के पास ले जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कैनेडी स्पेस सेंटर से ऐतिहासिक लॉन्च</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">फ्लोरिडा स्थित कैनेडी स्पेस सेंटर से आज सुबह 3 बजकर 58 मिनट पर इस मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। यह सिर्फ एक अंतरिक्ष उड़ान नहीं, बल्कि भविष्य में चंद्रमा और उससे आगे मंगल तक मानव मिशन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री Orion कैप्सूल में सवार होकर चंद्रमा की परिक्रमा करेंगे और सुरक्षित पृथ्वी पर लौटेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">चंद्रमा की कक्षा में एक दिन का विशेष चरण</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">Artemis II मिशन की कुल अवधि लगभग 10 दिन तय की गई है। इसमें अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलने में एक दिन का समय लगेगा। इसके बाद चंद्रमा तक पहुंचने में करीब 3 से 4 दिन का समय लगेगा। अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की कक्षा में लगभग एक दिन बिताएंगे और इसके बाद वापसी की यात्रा शुरू करेंगे, जो करीब 4 दिन में पूरी होगी। यह मिशन लैंडिंग नहीं करेगा, लेकिन भविष्य के लूनर मिशनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण डेटा जुटाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पहली बार अंतरिक्ष में पर्सनल iPhone</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस मिशन की एक खास बात यह भी है कि पहली बार अंतरिक्ष यात्रियों को अपने साथ पर्सनल स्मार्टफोन ले जाने की अनुमति दी गई है। इससे वे चंद्रमा के पास से शानदार तस्वीरें और वीडियो कैद कर सकेंगे। इन तस्वीरों के जरिए आम लोगों को अंतरिक्ष के अनुभव से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यह पहल अंतरिक्ष यात्रियों को अपने व्यक्तिगत अनुभवों को और अधिक जीवंत तरीके से साझा करने का अवसर देगी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">मिशन में शामिल चार अंतरिक्ष यात्री</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस ऐतिहासिक मिशन की कमान रीड वाइसमैन के हाथों में है, जो पहले भी अंतरिक्ष यात्रा कर चुके हैं। उनके साथ पायलट के रूप में विक्टर ग्लोवर शामिल हैं, जो चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री बनेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">मिशन विशेषज्ञ के तौर पर क्रिस्टीना कोच इस उड़ान का हिस्सा हैं, जिनके नाम लंबी अंतरिक्ष यात्रा का रिकॉर्ड है। चौथे सदस्य जेरेमी हैनसेन हैं, जो कनाडा की ओर से इस मिशन में शामिल हुए हैं और यह उनकी पहली अंतरिक्ष यात्रा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">मिशन का उद्देश्य और भविष्य की योजना</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">Artemis II का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के आसपास सुरक्षित मानव यात्रा की क्षमता का परीक्षण करना है। इसके साथ ही यह मिशन अंतरिक्ष के वातावरण, सोलर फ्लेयर्स और कोरोनल मास इजेक्शन जैसे घटनाओं का अध्ययन भी करेगा। यह मिशन भविष्य में चंद्रमा पर स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने और मंगल ग्रह तक इंसानों को भेजने की तैयारी का आधार बनेगा।</span></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह मिशन विज्ञान, तकनीक और मानव साहस का संगम है, जो आने वाले दशकों में अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा तय करेगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 11:32:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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