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                <title>Chhattisgarh High Court - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Chhattisgarh High Court RSS Feed</description>
                
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                <title>बिजली कटौती पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- सिर्फ योजना नहीं, जनता को जमीन पर राहत दिखनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[बार-बार बिजली गुल होने पर शासन ने पेश किया एक्शन प्लान, हाईकोर्ट ने प्रगति रिपोर्ट मांगी; अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-courts-strictness-on-power-cuts-said-not-just/article-58286"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bilaspur-power-cut.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">बारिश और आंधी-तूफान के दौरान बिलासपुर में लगातार हो रही बिजली कटौती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और बिजली विभाग के रवैये पर सख्त टिप्पणी की है। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया गया है और कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट होने के बजाय स्पष्ट कहा कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देगा और आम लोगों को वास्तविक राहत नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे दावों का कोई खास महत्व नहीं रहेगा। कोर्ट ने प्रशासन को योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने और प्रगति रिपोर्ट शपथ पत्र के साथ पेश करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से ऊर्जा सचिव और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के प्रबंध निदेशक ने अपना जवाब अदालत में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि बिलासपुर शहर की बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए राज्य स्तर पर बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें नौ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इन फैसलों के तहत बिजली आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और भरोसेमंद बनाने की योजना तैयार की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल यह पूरा मामला बिलासपुर में कुछ दिनों पहले हुई भारी बारिश और तेज आंधी के बाद सामने आया था। शहर के कई हिस्सों में पूरी रात बिजली आपूर्ति बाधित रही। हालात ऐसे थे कि वीवीआईपी क्षेत्र माने जाने वाले कलेक्ट्रेट और सिविल लाइन जैसे इलाकों में भी लंबे समय तक बिजली नहीं रही। इससे आम लोगों के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित हुए। स्थानीय लोगों ने लगातार बिजली गुल रहने, बार-बार फॉल्ट आने और विभाग की धीमी कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताई थी। इस घटना के बाद मीडिया में प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः जनहित याचिका के रूप में मामले की सुनवाई शुरू की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई बड़े सुधार प्रस्तावित हैं। शहर में अब पुराने और क्षतिग्रस्त सीमेंट के बिजली खंभों की जगह लोहे के पोल लगाए जाएंगे, ताकि तेज हवा या अन्य कारणों से बार-बार खंभे गिरने की समस्या कम हो सके। इसके अलावा जहां नए बिजली पोल लगाए जाएंगे, वहां भी स्टील के खंभों का ही उपयोग किया जाएगा। विभाग का मानना है कि इससे बिजली आपूर्ति अधिक सुरक्षित और स्थायी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बिजली उपभोक्ताओं की शिकायतों का तेजी से समाधान करने और बढ़ते लोड को नियंत्रित करने के लिए शहर में दो नए सप्लाई जोन बनाने की योजना भी तैयार की गई है। मंगला और कोनी क्षेत्रों को नए सप्लाई जोन के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके अलावा मुख्यमंत्री शहरी विद्युतीकरण एवं सामान्य विकास योजना के तहत करीब 10 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस राशि से ऐसे क्षेत्रों में खुले बिजली तार हटाकर कवर्ड केबल बिछाई जाएगी, जहां बार-बार फॉल्ट की समस्या सामने आती रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि शहर में बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए नए सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। एक मुख्य सब-स्टेशन और दो 33/11 केवी क्षमता वाले नए सब-स्टेशन बनाने के लिए जिला प्रशासन से भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है। वहीं पेड़ों की शाखाओं से बिजली लाइनों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अतिरिक्त स्काईलिफ्ट वाहन तैनात किए जाएंगे। विभाग में तकनीकी कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए नई भर्तियों की प्रक्रिया भी शुरू करने की जानकारी अदालत को दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से भी शपथ पत्र पेश किया गया। निगम आयुक्त ने बताया कि मानसून के दौरान जलभराव की समस्या से निपटने के लिए विकास भवन में बाढ़ नियंत्रण कक्ष बनाया गया है। यहां अधिकारियों की शिफ्टवार ड्यूटी लगाई गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। निगम ने यह भी बताया कि अप्रैल 2026 से ही शहर के सभी आठ जोनों में नालियों की सफाई और गाद निकालने का अभियान चलाया जा रहा है। इस कार्य की जियो-टैग्ड तस्वीरें भी अदालत में प्रस्तुत की गई हैं। जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए 14 विशेष वाहनों का बेड़ा भी चौबीसों घंटे तैयार रखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इन सभी दावों के बावजूद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर बनाई गई योजनाओं का वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुंचना चाहिए। यदि बारिश के दौरान फिर बिजली गुल होती है या सड़कों पर जलभराव की स्थिति बनती है, तो इसका अर्थ होगा कि योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हुआ। अदालत ने निर्देश दिया कि मानसून के पूरे दौर में बिजली आपूर्ति यथासंभव निर्बाध रखी जाए और किसी भी शिकायत का तत्काल समाधान किया जाए। डिवीजन बेंच ने नगर निगम आयुक्त और ऊर्जा सचिव को निर्देश दिया है कि वे शपथ पत्र के साथ विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करें। रिपोर्ट में यह स्पष्ट होना चाहिए कि अब तक घोषित योजनाओं पर कितना काम हुआ है और जनता को उसका क्या लाभ मिला है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल योजनाएं बनाकर फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनका असर शहर की व्यवस्था में साफ दिखाई देना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 14:13:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>AI से बने शपथ-पत्र पर भड़के चीफ जस्टिस, CIMS की व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी</title>
                                    <description><![CDATA[बिलासपुर स्थित CIMS अस्पताल की अव्यवस्थाओं पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि कागजों में सब कुछ ठीक दिखाने से हकीकत नहीं बदलती। जरूरतमंद मरीजों को बेहतर इलाज मिलना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chief-justice-angry-over-affidavit-made-by-ai-high-court/article-58199"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/cims-bilaspur.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (CIMS) की बदहाल व्यवस्थाओं और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव की ओर से अदालत में प्रस्तुत किए गए शपथ-पत्र को देखकर मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दस्तावेज के कई हिस्सों में एक जैसी भाषा और दोहराव दिखाई देता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से तैयार किया गया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल व्यवस्थित और आकर्षक दस्तावेज पेश करने से अस्पताल की वास्तविक स्थिति नहीं बदल जाती।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि अस्पताल में सभी व्यवस्थाएं वास्तव में संतोषजनक होतीं तो मामला अदालत तक पहुंचता ही नहीं। उन्होंने सरकार और संबंधित अधिकारियों को यह भी कहा कि अदालत को गुमराह करने की बजाय अस्पताल की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का उद्देश्य किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं, बल्कि अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार सुनिश्चित करना है ताकि मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि किसी सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाला मरीज केवल मशीनों और इमारतों पर भरोसा नहीं करता, बल्कि उसे समय पर उपचार और आवश्यक सुविधाओं की उम्मीद होती है। यदि जरूरतमंद व्यक्ति को सही समय पर इलाज मिलेगा तो वह अस्पताल और वहां कार्यरत लोगों के लिए दुआ करेगा। इसलिए केवल कागजों पर दावे करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वास्तविक सुधार दिखाई देना भी जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मार्च और अप्रैल महीने में किए गए निरीक्षण की रिपोर्ट भी रखी गई। कोर्ट कमिश्नरों ने अपनी रिपोर्ट में अस्पताल की कई गंभीर खामियों का उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल की इमारत में कई स्थानों पर पानी का रिसाव हो रहा था और हाल ही में हुई बारिश के बाद अस्पताल के कुछ हिस्सों में पानी भर गया था। इसके अलावा अस्पताल का फायर फाइटिंग सिस्टम भी लंबे समय से बंद पड़ा हुआ मिला, जिससे किसी भी आपात स्थिति में मरीजों और कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि फायर फाइटिंग सिस्टम की मरम्मत के लिए 15 जून 2026 को आदेश जारी कर दिया गया था और वर्तमान में मरम्मत का कार्य तेजी से चल रहा है। अधिकारियों ने दावा किया कि जल्द ही यह प्रणाली पूरी तरह चालू कर दी जाएगी। हालांकि अदालत ने इस दावे पर संतोष व्यक्त करने के बजाय कहा कि इन कार्यों की वास्तविक स्थिति का सत्यापन आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) ने भी अदालत में एक अलग शपथ-पत्र प्रस्तुत किया। इसमें CIMS के लिए खरीदी जा रही आधुनिक चिकित्सा मशीनों और उपकरणों की विस्तृत जानकारी दी गई। रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल के लिए कुल 31 अत्याधुनिक मशीनों की खरीद प्रक्रिया जारी है। इनमें से 13 मशीनें अस्पताल पहुंच चुकी हैं, जबकि दो मशीनों के लिए जून महीने में खरीद आदेश जारी किए जा चुके हैं। दो अन्य मशीनों की कीमत अधिक होने के कारण उनकी खरीद के लिए CIMS प्रशासन से अतिरिक्त स्वीकृति मांगी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">शपथ-पत्र में यह भी बताया गया कि कुछ मशीनें अभी तकनीकी परीक्षण के चरण में हैं। परीक्षण पूरा होने के बाद उनकी वित्तीय बोली खोली जाएगी। वहीं कुछ अन्य उपकरणों के टेंडर का मूल्यांकन जारी है और शेष मशीनों की निविदाएं भी तय कार्यक्रम के अनुसार खोली जानी हैं। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी दर्ज करते हुए कहा कि मशीनों की खरीद तभी सार्थक मानी जाएगी जब वे अस्पताल में स्थापित होकर मरीजों के इलाज में उपयोग होने लगें।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत केवल सरकारी दावों पर निर्भर नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि कोर्ट कमिश्नर किसी भी समय अस्पताल का निरीक्षण कर सकते हैं और यह जांच सकते हैं कि अदालत में प्रस्तुत किए गए दावों के अनुरूप वास्तव में काम हुआ है या नहीं। उन्होंने अधिकारियों को याद दिलाया कि न्यायालय के समक्ष तथ्यों को पूरी ईमानदारी के साथ रखना उनकी जिम्मेदारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">AI से तैयार किए गए शपथ-पत्र को लेकर की गई टिप्पणी भी सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी दस्तावेज को आधुनिक तकनीक की सहायता से तैयार किया जाता है, तब भी उसमें वास्तविक तथ्यों का सही और स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। केवल भाषा को आकर्षक बनाकर या एक जैसी सामग्री दोहराकर अदालत को प्रभावित करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय ने अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे भविष्य में ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करें जो वास्तविक स्थिति का सटीक चित्र प्रस्तुत करें।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला पिछले कुछ समय से CIMS अस्पताल में मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं, भवन की स्थिति, चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा में है। जनहित याचिका के माध्यम से अस्पताल की कई कमियों को अदालत के सामने रखा गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट ने नियमित रूप से इस मामले की निगरानी शुरू की। अदालत का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 15:52:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, आपसी सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिगों के मामले में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, कहा- केवल शादी से इनकार करना दुष्कर्म नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/important-comment-of-chhattisgarh-high-court-consensual-relationship-is-not/article-57417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने हैं, तो बाद में पुरुष द्वारा शादी से इनकार करने मात्र से उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का निर्णय केवल किसी एक बयान या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे संबंध की प्रकृति, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यह फैसला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे। अदालत ने सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले बालिग व्यक्तियों के बीच बने शारीरिक संबंधों को सामान्य परिस्थितियों में सहमति से बना संबंध माना जा सकता है, जब तक कि उपलब्ध साक्ष्य इसके विपरीत स्पष्ट रूप से संकेत न दें। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत थीं। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि वर्ष 2019 में रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। दोनों के बीच निकटता बढ़ी और बाद में वे लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उनसे शादी करने का वादा किया था और इसी भरोसे पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायत में महिला ने आगे कहा कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी ने शादी की बात टालनी शुरू कर दी। बाद में उसने कथित रूप से यह कहा कि उसके परिवार वाले इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि महिला उम्र में उससे बड़ी हैं, तलाकशुदा हैं और ईसाई समुदाय से संबंध रखती हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को जब वह शादी की बात करने आरोपी के घर पहुंचीं तो वहां उनके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए। इसी आधार पर उन्होंने दुष्कर्म और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया। मामले की सुनवाई पहले सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल यह तथ्य कि दोनों विवाह करना चाहते थे, इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण ही स्थापित हुए थे। अदालत ने कहा कि जब दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो यह माना जा सकता है कि वे अपने संबंधों और उनके संभावित परिणामों से पूरी तरह परिचित थे। ऐसे मामलों में प्रत्येक परिस्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन करना आवश्यक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि न्यायालयों को इस प्रकार के मामलों को केवल तकनीकी या संकीर्ण कानूनी दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। किसी भी मामले में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का व्यवहार, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि लंबे समय तक दोनों की सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में विवाह न होने की स्थिति को स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। फैसले के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के एक निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कैनी राजन बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि सहमति का अर्थ केवल मौन स्वीकृति या आत्मसमर्पण नहीं होता, बल्कि यह सोच-समझकर लिया गया स्वतंत्र निर्णय होता है। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह देखना आवश्यक है कि सहमति किन परिस्थितियों में दी गई थी और क्या उसके पीछे किसी प्रकार का छल या दबाव था। हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध चिकित्सकीय रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिपोर्ट में दर्ज चोटों और कथित घटना के समय के बीच भी स्पष्ट सामंजस्य नहीं पाया गया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:41:57 +0530</pubDate>
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                <title>वक्फ संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- ऐसे मामलों की सुनवाई ट्रिब्यूनल ही करेगा</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्ति पर कथित अवैध निर्माण से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, ट्रिब्यूनल को दो महीने में फैसला करने का निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-courts-big-decision-in-waqf-property-dispute-said/article-57132"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/waqf-property-dispute.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों की सुनवाई को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए वक्फ ट्रिब्यूनल ही सक्षम और वैधानिक मंच है। अदालत ने कहा कि जब वक्फ अधिनियम के तहत विवादों के समाधान के लिए विशेष व्यवस्था उपलब्ध है, तब सीधे हाईकोर्ट में हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मामला पहले से ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित है तो वहीं उसकी सुनवाई होगी और उसी मंच पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि लंबित मामले का कानून के अनुसार दो महीने के भीतर निपटारा किया जाए। मामले की सुनवाई जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ में हुई। याचिकाकर्ता मोहम्मद अजमल खान ने कवर्धा स्थित जामा मस्जिद मुस्लिम ट्रस्ट की वक्फ संपत्ति पर कथित अवैध निर्माण को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि वक्फ संपत्ति के मुतवल्ली यानी प्रबंधक की ओर से नियमों के विपरीत निर्माण कराया जा रहा है, जिससे वक्फ संपत्ति के प्रबंधन और उपयोग को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) ने कथित अवैध निर्माण को रोकने के लिए पहले ही आदेश जारी किए थे। इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उनका कहना था कि आदेश जारी होने के बाद भी निर्माण को रोकने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, जिसके कारण उन्हें न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता पहले ही वक्फ अधिनियम की धारा 83(2) के तहत वक्फ ट्रिब्यूनल में आवेदन प्रस्तुत कर चुके थे। हालांकि उस समय ट्रिब्यूनल में आवश्यक कोरम उपलब्ध नहीं होने के कारण मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी थी। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी। मामले में राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड की ओर से अदालत में कहा गया कि वक्फ अधिनियम के तहत इस प्रकार के विवादों के निपटारे के लिए विशेष रूप से ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। अब ट्रिब्यूनल पूरी तरह कार्यशील है और संबंधित मामला पहले से वहीं लंबित है। इसलिए हाईकोर्ट को इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। उनका तर्क था कि जब कानून ने किसी विशेष विवाद के लिए अलग मंच निर्धारित किया है तो उसी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड के तर्कों से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि वक्फ अधिनियम में स्पष्ट रूप से ट्रिब्यूनल को ऐसे मामलों की सुनवाई और निर्णय का अधिकार दिया गया है। इसलिए हाईकोर्ट समानांतर रूप से इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपना पक्ष वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष ही रखें। साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित वक्फ ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि यदि मामला अभी भी लंबित है तो कानून के अनुरूप उसकी सुनवाई कर दो महीने के भीतर निर्णय दिया जाए। अदालत ने माना कि न्याय में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और यदि ट्रिब्यूनल अब कार्यशील है तो मामले का शीघ्र निपटारा किया जाना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस विवाद के गुण-दोष यानी मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े सभी तथ्य, साक्ष्य और कानूनी प्रश्न ट्रिब्यूनल के समक्ष विचार के लिए खुले रहेंगे। ट्रिब्यूनल स्वतंत्र रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड और कानून के आधार पर अपना निर्णय देगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह फैसला भविष्य में वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि जहां किसी विशेष कानून के तहत विवाद निपटाने के लिए वैधानिक मंच उपलब्ध हो, वहां सीधे हाईकोर्ट का रुख करने के बजाय पहले उसी मंच पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। इससे न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ भी कम होगा और विशेष मामलों का निपटारा विशेषज्ञ मंचों के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा। वक्फ संपत्तियों को लेकर देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में संपत्ति के प्रबंधन, उपयोग, निर्माण कार्य और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर कई तरह के कानूनी प्रश्न उठते हैं। वक्फ अधिनियम इन्हीं विवादों के समाधान के लिए ट्रिब्यूनल की व्यवस्था करता है ताकि मामलों का त्वरित और विधिसम्मत निपटारा हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 14:07:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अतिशेष व्याख्याताओं को राहत देने से इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच का फैसला सही ठहराते हुए कहा—जहां छात्र नहीं, वहां शिक्षक रखने का औचित्य नहीं बनता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chhattisgarh-high-court-refuses-to-provide-relief-to-surplus-lecturers/article-56472"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(3).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की युक्तिकरण नीति के तहत अतिशेष घोषित किए गए व्याख्याताओं को राहत देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा और वाणिज्य विषय की व्याख्याताओं द्वारा दायर रिट अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि जिस स्कूल में किसी विषय का एक भी छात्र नहीं है, वहां उस विषय के शिक्षकों को पदस्थ बनाए रखने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बनता। ऐसे मामलों में सरकार द्वारा शिक्षकों को उन स्कूलों में भेजना जहां वास्तव में छात्र अध्ययन कर रहे हैं, प्रशासनिक दृष्टि से उचित और आवश्यक कदम है। मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ विकासखंड स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिवनी से जुड़ा हुआ है। यहां शकुंतला राठौर और कृष्णा देवी साहू वाणिज्य विषय की व्याख्याता के रूप में पदस्थ थीं। शिक्षा विभाग द्वारा की गई समीक्षा और छात्र संख्या के आकलन में यह सामने आया कि विद्यालय में कॉमर्स विषय का एक भी विद्यार्थी अध्ययनरत नहीं है। इसके बाद राज्य सरकार की युक्तिकरण नीति के तहत दोनों शिक्षिकाओं को अतिशेष घोषित किया गया। विभाग ने नियमानुसार काउंसलिंग प्रक्रिया आयोजित की और दोनों की पदस्थापना मुंगेली जिले के दासरंगपुर और कोना स्थित स्कूलों में कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कार्रवाई के खिलाफ दोनों शिक्षिकाओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि विभाग ने काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान जिले में उपलब्ध कुछ रिक्त पदों की जानकारी नहीं दी और मनमाने तरीके से उन्हें दूरस्थ स्थानों पर भेज दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विभाग की कार्रवाई भेदभावपूर्ण है और उन्हें अपने जिले या नजदीकी क्षेत्र में पदस्थापना का अवसर मिलना चाहिए था। उन्होंने यह भी दावा किया कि ट्रांसफर प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं थी और कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया। वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत में प्रस्तुत जवाब में कहा गया कि पूरी प्रक्रिया युक्तिकरण नीति की धारा 7(सी)(2) के तहत अपनाई गई है। सरकार ने बताया कि नीति का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच संतुलन स्थापित करना है ताकि जहां छात्रों की संख्या अधिक है वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हो सकें। यदि किसी स्कूल में किसी विषय का एक भी छात्र नहीं है तो वहां उस विषय के शिक्षक को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। ऐसे मामलों में शिक्षकों को उन संस्थानों में भेजा जाता है जहां वास्तव में उनकी सेवाओं की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वरिष्ठता के आधार पर शिक्षकों को पहले जिला स्तर पर विकल्प देने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके बाद संभाग स्तर की काउंसलिंग के माध्यम से रिक्त पदों पर पदस्थापना की गई। विभाग का कहना था कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप रही है तथा किसी भी कर्मचारी के साथ भेदभाव नहीं किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया। अदालत ने पाया कि सिवनी स्कूल में कॉमर्स विषय के छात्रों की संख्या शून्य थी और यह तथ्य रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से मौजूद है। ऐसे में सरकार द्वारा शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित करना न केवल नीति के अनुरूप है बल्कि शिक्षा व्यवस्था के बेहतर संचालन के लिए भी जरूरी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग वहां होना चाहिए जहां उनकी वास्तविक आवश्यकता हो। यदि किसी विद्यालय में छात्र ही नहीं हैं तो वहां शिक्षकों की नियुक्ति बनाए रखना प्रशासनिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ट्रांसफर और पदस्थापना से जुड़े फैसले नियोक्ता के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों में तभी हस्तक्षेप करता है जब स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई सामने आए। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि विभाग ने नियमों को दरकिनार किया है या जानबूझकर किसी विशेष व्यक्ति के साथ अन्याय किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी दोहराया कि किसी सरकारी कर्मचारी को अपनी पसंद की जगह या गृह जिले में ही पदस्थ रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। सरकारी सेवा की प्रकृति ही ऐसी होती है जिसमें आवश्यकता के अनुसार कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जा सकता है। इसलिए केवल इस आधार पर कि किसी कर्मचारी को नई पदस्थापना पसंद नहीं है, ट्रांसफर आदेश को अवैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट के इस फैसले को शिक्षा विभाग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से युक्तिकरण नीति को लेकर विभिन्न जिलों में विवाद और आपत्तियां सामने आती रही हैं। अब इस निर्णय के बाद सरकार को ऐसी नीतियों को लागू करने में कानूनी मजबूती मिलने की संभावना है। साथ ही यह संदेश भी गया है कि छात्र संख्या और शैक्षणिक जरूरतों के आधार पर शिक्षकों की तैनाती को न्यायालय ने उचित माना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:47:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>री-NEET परीक्षा में शामिल होगा जेल में बंद छात्र, हाईकोर्ट का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस सुरक्षा में परीक्षा दिलाने के दिए निर्देश, छात्रों की सुविधा के लिए रेलवे 10 ट्रेनों में लगाएगा 40 अतिरिक्त कोच]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/jailed-students-will-appear-in-re-neet-exam-order-of-high/article-56389"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/re-neet-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">री-NEET 2026 परीक्षा से पहले छत्तीसगढ़ में एक अनोखा मामला सामने आया है। रायपुर सेंट्रल जेल में बंद एक छात्र को हाईकोर्ट ने परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने मामले की तत्काल सुनवाई करते हुए पुलिस और जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि छात्र को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच परीक्षा केंद्र तक पहुंचाया जाए और परीक्षा पूरी होने के बाद वापस जेल लाया जाए। कोर्ट के इस फैसले की शिक्षा और कानूनी क्षेत्र में व्यापक चर्चा हो रही है। छात्र रायपुर के खमतराई थाना क्षेत्र में दर्ज एक आपराधिक मामले के कारण वर्तमान में रायपुर सेंट्रल जेल में बंद है। छात्र ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अंतरिम जमानत या परीक्षा में शामिल होने की विशेष अनुमति मांगी थी। याचिका में कहा गया था कि वह NEET परीक्षा की तैयारी लंबे समय से कर रहा है और उसका भविष्य इस परीक्षा पर निर्भर है। इसके साथ छात्र का एडमिट कार्ड भी न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान छात्र के वकील ने यह भी आग्रह किया कि जेल में अध्ययन के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाए, ताकि परीक्षा की तैयारी प्रभावित न हो। इस पर कोर्ट ने जेल प्रशासन को नियमों के तहत आवश्यक किताबें और अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार महत्वपूर्ण है और कानूनी प्रक्रिया के बीच भी छात्र को परीक्षा देने का अवसर मिलना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट के आदेश के बाद रायपुर पुलिस और जेल प्रशासन परीक्षा के दिन विशेष सुरक्षा व्यवस्था की तैयारी में जुट गया है। छात्र को पुलिस अभिरक्षा में परीक्षा केंद्र तक ले जाया जाएगा। परीक्षा समाप्त होते ही उसे वापस जेल पहुंचाया जाएगा। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि अदालत के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाएगा और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। इधर, 21 जून को होने वाली री-NEET परीक्षा को लेकर प्रदेशभर में तैयारियां तेज कर दी गई हैं। बिलासपुर जिले में 19 परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं। कलेक्टर संजय अग्रवाल और एसएसपी रजनेश सिंह ने विभिन्न परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। अधिकारियों ने सुरक्षा, यातायात, बिजली, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं की समीक्षा की है। पिछले वर्षों में परीक्षा से जुड़े विवादों और पेपर लीक की घटनाओं को देखते हुए इस बार सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी, अतिरिक्त पुलिस बल और प्रवेश प्रक्रिया को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। प्रशासन का कहना है कि परीक्षा को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न कराया जाएगा।छात्रों की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए बिलासपुर स्थित सिम्स मेडिकल कॉलेज अस्पताल ने 24 घंटे की मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन शुरू की है। इस हेल्पलाइन के माध्यम से परीक्षा को लेकर तनाव, चिंता या घबराहट महसूस करने वाले छात्र विशेषज्ञों से सलाह ले सकेंगे। अधिकारियों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान मानसिक दबाव काफी बढ़ जाता है, इसलिए यह पहल छात्रों के लिए मददगार साबित होगी। री-NEET परीक्षा के मद्देनजर रेलवे ने भी विशेष तैयारियां की हैं। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने परीक्षा देने वाले छात्रों और उनके अभिभावकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए 10 ट्रेनों में 40 अतिरिक्त जनरल कोच लगाने का फैसला किया है। इसके अलावा कुछ रूटों पर विशेष मेमू ट्रेनों का संचालन भी किया जाएगा ताकि विद्यार्थियों को समय पर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में परेशानी न हो। रेलवे प्रशासन ने छात्रों से अपील की है कि वे यात्रा की योजना पहले से बनाएं और ट्रेन की समय-सारिणी की जानकारी पहले ही प्राप्त कर लें। रेलवे का कहना है कि परीक्षा के दौरान यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए गए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:39:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भरण-पोषण मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी जहां रहेगी वहीं होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी जहां वर्तमान में रह रही है, वहीं की फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का मामला दायर करने का अधिकार रखती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-in-maintenance-case-hearing-will/article-55091"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर भविष्य में इसी तरह के कई मामलों पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने वर्तमान निवास स्थान पर रह रही है, तो उसे वहीं की सक्षम अदालत में भरण-पोषण का दावा पेश करने का अधिकार है। केवल इस आधार पर कि उसका स्थायी पता या पैतृक घर किसी दूसरे जिले में है, अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही एक डॉक्टर पति की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एक डॉक्टर और उनकी पत्नी से जुड़ा है। दोनों का विवाह 16 मई 2019 को हुआ था। विवाह के बाद उनके परिवार में दो बेटियों का जन्म हुआ। कुछ समय बाद पति-पत्नी के संबंधों में विवाद शुरू हो गया। पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के बाद उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। इसके अलावा उसने अपने पति पर गंभीर व्यक्तिगत आरोप भी लगाए। इन परिस्थितियों के बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे और मामला कानूनी विवाद तक पहुंच गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने बिलासपुर स्थित फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। अपने आवेदन में उसने कहा कि उसके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है और दोनों नाबालिग बेटियां उसकी देखरेख में रह रही हैं। उसने अदालत से अपने लिए एक लाख रुपए प्रतिमाह तथा दोनों बेटियों के लिए 20-20 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने की मांग की। इस प्रकार कुल 1 लाख 40 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण की मांग अदालत के समक्ष रखी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर डॉक्टर पति ने इस आवेदन का विरोध किया। उन्होंने फैमिली कोर्ट में क्षेत्राधिकार को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि विवाह सारंगढ़ में हुआ था और पत्नी का स्थायी निवास भी वहीं है। इसलिए बिलासपुर की फैमिली कोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। पति ने यह भी तर्क दिया कि आवेदन दाखिल किए जाने के समय दोनों बच्चियां सारंगढ़ में पढ़ाई कर रही थीं और केवल किरायानामा प्रस्तुत कर बिलासपुर में मामला दर्ज कराया गया है। उन्होंने स्वयं को पोलियो से प्रभावित दिव्यांग बताते हुए यह भी कहा कि पत्नी उन्हें परेशान करने की नीयत से बिलासपुर में मामला चला रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने इन आरोपों का अदालत में विरोध किया। उसने कहा कि वह वर्तमान में बिलासपुर जिले के लगरा क्षेत्र में किराए के मकान में रह रही है। इसके समर्थन में उसने आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। पत्नी ने यह भी बताया कि उसकी दोनों बेटियां अब बिलासपुर के एक निजी विद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं और उनका पूरा जीवन वर्तमान में बिलासपुर से जुड़ा हुआ है। उसके अनुसार उसने किसी भी प्रकार का फर्जी दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति की क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया था। इसके बाद डॉक्टर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने पूरे रिकॉर्ड और दस्तावेजों का अवलोकन किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी ने स्पष्ट रूप से बिलासपुर के लगरा क्षेत्र को अपना वर्तमान निवास बताया है और उसके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज भी पेश किए हैं। अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति किसी स्थान पर वास्तविक रूप से निवास कर रहा है, तो उसे उस क्षेत्र की सक्षम अदालत में कानूनी राहत मांगने का अधिकार है। केवल इस वजह से कि उसका स्थायी पता किसी अन्य जिले में है, वर्तमान निवास वाले क्षेत्र की अदालत का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी खामी नजर नहीं आती। इसलिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने डॉक्टर पति की पुनरीक्षण याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट की कार्यवाही को जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह फैसला महिलाओं और बच्चों से जुड़े भरण-पोषण मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। कई बार पति-पत्नी अलग-अलग स्थानों पर रहने लगते हैं और क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि वर्तमान निवास स्थान भी न्यायिक अधिकार क्षेत्र तय करने का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है। इस फैसले के बाद बिलासपुर फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। वहीं यह आदेश उन महिलाओं के लिए भी राहत का संदेश माना जा रहा है जो अलग रहने की स्थिति में अपने वर्तमान निवास स्थान से न्याय पाने की कोशिश करती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 14:13:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से अमित बघेल को मिली अंतरिम जमानत, पर 3 महीने रायपुर से बाहर रहेंगे</title>
                                    <description><![CDATA[अमित बघेल जमानत मामले में हाईकोर्ट ने 14 एफआईआर पर 3 महीने की अंतरिम राहत दी, साथ ही रायपुर में रहने पर प्रतिबंध लगाया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/amit-baghel-gets-interim-bail-from-chhattisgarh-high-court-will/article-50734"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/amit-baghel-interim-bail-chhattisgarh-high-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के बाद जोहार छत्तीसगढ़िया पार्टी के अध्यक्ष अमित बघेल को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज कुल 14 एफआईआर मामलों में अंतरिम जमानत मंजूर कर ली है। यह मामला उनके एक सार्वजनिक बयान से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">मामले की पृष्ठभूमि</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब रायपुर के वीआईपी चौक पर छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा क्षतिग्रस्त हो गई थी। इस घटना के बाद अमित बघेल ने एक बयान दिया, जिसमें अग्रवाल और सिंधी समाज को लेकर टिप्पणी की गई थी। उनके इस बयान को लेकर शहर में आक्रोश फैल गया और कई जगहों पर विरोध दर्ज किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">एफआईआर और कानूनी कार्रवाई</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">इस बयान के बाद रायपुर के विभिन्न थानों में उनके खिलाफ कुल 14 एफआईआर दर्ज की गईं। इनमें तेलीबांधा थाना, कोतवाली थाना और देवेंद्र नगर थाना प्रमुख हैं। शिकायतों में आरोप लगाया गया कि उनके बयान से सामाजिक सौहार्द प्रभावित हुआ है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">हाईकोर्ट में सुनवाई</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में हुई, जहां दोनों पक्षों ने अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं। अमित बघेल की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन परगनिहा ने पक्ष रखा, जबकि आपत्तिकर्ता की ओर से सुनील ओटवानी ने दलील दी। राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास ने भी अदालत में अपना पक्ष रखा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">अदालत का फैसला और शर्तें</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अमित बघेल को 3 महीने की अंतरिम जमानत प्रदान की। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अवधि में वे रायपुर जिले की सीमा में निवास नहीं करेंगे। साथ ही उन्हें अदालत में पेशी के लिए निर्धारित तिथियों पर रायपुर आने की अनुमति दी गई है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 18:26:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: कर्मचारियों का प्रमोशन कोई मौलिक अधिकार नहीं, CMO और RI का रास्ता साफ</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रमोशन किसी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chhattisgarh-high-courts-decision-promotion-of-employees-is-not-a/article-49105"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/chhattisgarh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जो नगरीय प्रशासन विभाग के लिए दिशानिर्देश स्वरूप है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी के लिए पदोन्नति हासिल करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इस फैसले के साथ ही 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">राजस्व निरीक्षक को मुख्य नगर पालिका अधिकारी पद की दौड़ में शामिल करना संवैधानिक</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) क्लास-बी के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह से संवैधानिक है। यह किसी भी कर्मचारी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी और नगरपालिका सेवक के बीच समानता का हनन हो रहा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पदोन्नति नीतिगत निर्णय के अंतर्गत आता है</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति के लिए फीडर कैडर तय करना और अलग-अलग पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह से कार्यपालिका और सरकार के नीतिगत निर्णय के दायरे में आता है। कर्मचारियों को केवल यह अधिकार है कि नियमों के अनुसार उन्हें पदोन्नति के लिए विचार किया जाए</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रमोशन हासिल करना उनका निहित अधिकार नहीं है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अनुभव में छूट देना अवैध नहीं</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को भी सही ठहराया</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसमें राजस्व निरीक्षकों के लिए अनुभव की अनिवार्य अवधि 6 साल से घटाकर 5 साल की गई थी। यह एक वन टाइम रियायत थी</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसे अधिकारियों की कमी और जनहित को देखते हुए लागू किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">याचिकाएं खारिज</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नई सुनवाई</span></strong></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह साबित नहीं किया कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम असंवैधानिक हैं। इसलिए सभी याचिकाएं निराधार पाई गईं और खारिज कर दी गईं। यह मामला पहले भी हाईकोर्ट में सुना गया था और तब प्रावधानों को अवैध घोषित किया गया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को आदेश दिया कि मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में लौटाया जाए। अब डिवीजन बेंच का नया निर्णय आया है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 13:18:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रिटायरमेंट के बाद GPF कटौती पर हाईकोर्ट सख्त: 6 महीने बाद वसूली को बताया गैरकानूनी</title>
                                    <description><![CDATA[12 साल बाद जारी आदेश रद्द, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रिटायर्ड लेक्चरर को दी बड़ी राहत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-strict-on-gpf-deduction-after-retirement-calls-recovery/article-45704"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/cg-(17)1.jpg" alt=""></a><br /><p>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के छह माह बाद सामान्य भविष्य निधि (GPF) खाते से किसी भी तरह की वसूली कानूनन वैध नहीं है। कोर्ट ने इसी आधार पर एक रिटायर्ड लेक्चरर के खिलाफ वर्षों बाद जारी किए गए वसूली आदेश को रद्द कर दिया।</p>
<p>मामला जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ निवासी लक्ष्मीनारायण तिवारी से जुड़ा है, जो शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ससहा में व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे। वे 31 जनवरी 2011 को निर्धारित आयु पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के करीब 12 साल बाद महालेखाकार कार्यालय, रायपुर ने उनके GPF खाते में ऋणात्मक शेष का हवाला देते हुए वसूली आदेश जारी कर दिया।</p>
<p>इस आदेश से आहत होकर लक्ष्मीनारायण तिवारी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि इतने लंबे समय बाद की जा रही वसूली न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि सेवा नियमों के भी विरुद्ध है।</p>
<p><strong>न्यायिक मिसालों का दिया गया हवाला</strong><br />याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पूर्व में जबलपुर हाईकोर्ट और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के कई मामलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रिटायरमेंट के छह माह के भीतर ही विभागीय देयों की वसूली की जा सकती है। इसके बाद की गई कोई भी कटौती नियमों के खिलाफ मानी जाएगी।</p>
<p>अधिवक्ताओं ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के नियम 65 का भी हवाला दिया, जिसमें यह प्रावधान है कि यदि GPF खाते में कोई बकाया पाया जाता है, तो उसकी वसूली सीमित समय-सीमा के भीतर ही संभव है।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख</strong><br />हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों, दस्तावेजों और न्यायिक निर्णयों पर विचार करते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के 12 वर्ष बाद जारी किया गया वसूली आदेश विधिसंगत नहीं है। अदालत ने महालेखाकार कार्यालय द्वारा जारी आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को पूर्ण राहत प्रदान की।</p>
<p>इस फैसले को राज्य के अन्य सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे सेवानिवृत्ति के बाद की वित्तीय सुरक्षा को लेकर एक स्पष्ट कानूनी दिशा तय होती है।</p>
<p>-----</p>
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                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 12:53:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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