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                <title>Legal News India - दैनिक जागरण</title>
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                <title>गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, केवल सर्टिफिकेट से शादी नहीं मानी जाएगी</title>
                                    <description><![CDATA[कोर्ट ने कहा—हिंदू विवाह के लिए रीति-रिवाज और सात फेरे जरूरी, रजिस्ट्रेशन मात्र कानूनी रिकॉर्ड है, विवाह नहीं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-decision-of-gujarat-high-court-marriage-will-not-be/article-57488"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/gujarat-high-court-marriage-verdict.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि केवल मैरिज सर्टिफिकेट बन जाने से किसी भी हिंदू विवाह को वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह तभी कानूनी और धार्मिक रूप से मान्य होता है जब उसमें हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तय सभी रीति-रिवाज और परंपराओं का पालन किया गया हो। जिन समुदायों में सात फेरे को विवाह का मूल आधार माना जाता है, वहां बिना फेरे लिए विवाह को पूरा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मैरिज सर्टिफिकेट सिर्फ एक रिकॉर्ड होता है, जो किसी पहले से हुई शादी को दर्ज करता है, लेकिन अपने आप किसी रिश्ते को विवाह का दर्जा नहीं देता। यह फैसला जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने एक फर्जी शादी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जो ब्रिटेन में रहता है। उसका आरोप था कि अहमदाबाद की एक महिला ने नौकरी दिलाने का झांसा देकर उससे कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर फर्जी तरीके से मैरिज सर्टिफिकेट बनवा लिया। व्यक्ति ने दावा किया कि उसकी उस महिला से कभी कोई शादी नहीं हुई और न ही किसी प्रकार की विवाहिक रस्में पूरी की गईं। इस मामले ने कोर्ट तक पहुंचने से पहले फैमिली कोर्ट में भी सुनवाई हुई थी, लेकिन वहां सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट के आधार पर व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि संबंधित महिला ने खुद फैमिली कोर्ट में स्वीकार किया कि उनके बीच कभी कोई शादी की रस्म नहीं हुई और न ही दोनों कभी पति-पत्नी की तरह साथ रहे। इसके बावजूद निचली अदालत ने केवल रजिस्ट्रेशन के आधार पर विवाह को मान्यता मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया और स्पष्ट टिप्पणी की कि जब विवाह की मूल रस्में ही नहीं हुईं, तो केवल दस्तावेजों के आधार पर उसे वैध विवाह नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-7 का विस्तार से उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक संस्कार है, जो दो व्यक्तियों को सामाजिक और पारिवारिक रूप से जोड़ता है। विवाह का उद्देश्य केवल एक दस्तावेज तैयार करना नहीं होता, बल्कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन होता है, जिसमें रीति-रिवाजों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि विवाह की वास्तविक प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो केवल पंजीकरण के आधार पर उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मैरिज सर्टिफिकेट केवल एक प्रमाण है, जो पहले से हुई वैध शादी को दर्ज करता है। इसका उपयोग विवाह के प्रमाण के रूप में किया जा सकता है, लेकिन यह स्वयं विवाह का निर्माण नहीं करता। अदालत ने कहा कि विवाह की वैधता तय करने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या दोनों पक्षों ने धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के अनुसार विवाह किया है या नहीं। इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत ने फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण को बदलते हुए यह संदेश दिया कि केवल दस्तावेजों के आधार पर किसी भी वैवाहिक संबंध को मान्यता देना उचित नहीं है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्टता आएगी, जहां फर्जी दस्तावेजों के आधार पर विवाह का दावा किया जाता है। अदालत ने यह भी कहा कि विवाह एक गंभीर सामाजिक जिम्मेदारी है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि हिंदू विवाह में रीति-रिवाजों का पालन अनिवार्य है और केवल रजिस्ट्रेशन से विवाह को मान्यता नहीं मिल सकती। यह फैसला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो विवाह से जुड़े दस्तावेजों को ही अंतिम प्रमाण मान लेते हैं। अदालत ने अपने फैसले में सामाजिक और कानूनी दोनों पहलुओं को संतुलित रखते हुए यह स्पष्ट किया कि विवाह केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 11:03:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>E20 पेट्रोल पर बड़ा बयान, रियल टेस्ट अगले साल आएगा</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा—20% एथेनॉल ब्लेंडिंग जारी, नीति में बदलाव नहीं, असर का असली आकलन 2027 तक होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/big-statement-on-e20-petrol-real-test-will-come-next/article-57478"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/e20-petrol-india.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (E20) ब्लेंडिंग का प्रयोग अभी भी चल रहा है और इसका वास्तविक प्रभाव यानी “रियल टेस्ट” अभी पूरा नहीं हुआ है। सरकार के अनुसार इस नीति के नतीजे अगले वर्ष तक स्पष्ट रूप से सामने आएंगे, जिसके बाद ही इसके दीर्घकालिक प्रभावों का सही आकलन संभव होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब E20 पेट्रोल को लेकर देश में लगातार बहस जारी है और कई विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे हैं कि इससे पुरानी गाड़ियों के इंजन पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने कोर्ट में यह साफ कर दिया कि अब तक किसी तरह के ठोस वैज्ञानिक या तकनीकी सबूत नहीं मिले हैं, जिससे यह साबित हो सके कि E20 मिश्रण से वाहनों को मैकेनिकल नुकसान होता है। सरकार ने इसे ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात में कमी, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण सुधार की दिशा में एक अहम नीति बताया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट में यह टिप्पणी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) की याचिका पर सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी द्वारा की गई। यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें तेल कंपनियों को एक डिस्टिलरी के आवेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था। BPCL ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश राष्ट्रीय स्तर की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि सरकार पहले ही E20 को एक व्यापक नीतिगत लक्ष्य के रूप में आगे बढ़ा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी यह सवाल उठाया कि कंपनी ने पहले कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील क्यों नहीं की, बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के। इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि देश के कई हाई कोर्ट में इसी तरह के मामले लंबित हैं, इसलिए इन सभी मामलों को एक साथ सुनना जरूरी हो सकता है ताकि नीति में असमानता न पैदा हो।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2025-26 के अनुबंध पहले ही कई स्तरों पर अंतिम रूप दिए जा चुके हैं और अक्टूबर 2025 में इनके रिन्यूअल से पहले इस विवाद का निपटारा जरूरी है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने ट्रांसफर याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इससे मामलों के निपटारे में अनावश्यक देरी होगी और नीति से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि अलग-अलग अदालतों में चल रहे मामलों के कारण राष्ट्रीय नीति पर अस्थिरता की स्थिति बन सकती है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में एक साथ सुनवाई उचित होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी की ओर से यह दावा भी किया गया कि उसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 9.90 करोड़ लीटर है, लेकिन उसे उसके अनुरूप एथेनॉल आवंटन नहीं मिला। इसी वजह से उसने अतिरिक्त आवंटन की मांग की थी। सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि किसी भी कंपनी को “प्रेफरेंशियल अलोकेशन” या “बेस्ट एंडेवर” के आधार पर अतिरिक्त एथेनॉल आवंटन का कानूनी अधिकार नहीं है। यदि किसी एक कंपनी के लिए आवंटन बढ़ाया जाता है तो पूरी नीति में बदलाव करना पड़ेगा, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। सुनवाई के बाद सरकार ने दोहराया कि मौजूदा E20 नीति जारी रहेगी और इसमें किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है, जबकि वास्तविक प्रभाव का आकलन आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 09:48:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संजय कपूर की संपत्ति विवाद में नया मोड़, EPF से पैसे निकालने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[करिश्मा कपूर के बच्चों की फीस संकट के बीच प्रिया सचदेव पहुंचीं कोर्ट, संपत्ति फ्रीज मामले में नोटिस जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/new-twist-in-sanjay-kapoors-property-dispute-demand-to-withdraw/article-54338"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/sanjay-kapur-case.jpg" alt=""></a><br /><p>करिश्मा कपूर के पूर्व पति और बिजनेसमैन संजय कपूर के निधन के बाद उनकी संपत्ति और वसीयत को लेकर शुरू हुआ कानूनी विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। मामले में करिश्मा कपूर के बच्चों और संजय कपूर की वर्तमान पत्नी प्रिया सचदेव के बीच संपत्ति के अधिकारों को लेकर अदालत में सुनवाई जारी है। इसी बीच अब प्रिया कपूर ने कोर्ट में एक नई याचिका दायर करते हुए संजय कपूर के EPF (Employee Provident Fund) खाते से पैसे निकालने की अनुमति मांगी है, ताकि बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्चों को पूरा किया जा सके।</p>
<p>यह पूरा मामला तब और गंभीर हो गया जब अदालत ने संजय कपूर की सभी संपत्तियों को फ्रीज करने का आदेश जारी कर दिया। इसमें बैंक खाते, शेयर, निवेश, और अन्य वित्तीय संपत्तियां शामिल हैं। कोर्ट के इस आदेश के बाद किसी भी प्रकार की निकासी या ट्रांसफर पर रोक लग गई है।</p>
<p>प्रिया सचदेव की याचिका पर 26 मई को सुनवाई हुई, जिसमें उन्होंने कोर्ट से 30 अप्रैल के आदेश में आंशिक संशोधन की मांग की। उनके वकीलों ने दलील दी कि EPF खाते से निकाले जाने वाले धन का उपयोग केवल करिश्मा कपूर के बच्चों कियान और समायरा की शिक्षा और आवश्यक खर्चों के लिए किया जाएगा। वकीलों के अनुसार, यह कदम बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए जरूरी है।</p>
<p>लाइव एंड लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रिया कपूर ने कोर्ट के अंतरिम आदेश के कुछ हिस्सों में बदलाव की मांग की है। विशेष रूप से अनुच्छेद 79 के खंड B और D में संशोधन का अनुरोध किया गया है। इन खंडों में संपत्ति और वित्तीय नियंत्रण से जुड़े प्रतिबंध शामिल हैं।</p>
<p>इस बीच करिश्मा कपूर के बच्चों कियान और समायरा ने पहले ही अदालत में याचिका दाखिल कर अपने पिता संजय कपूर की वसीयत को चुनौती दी है। उनका दावा है कि वसीयत में उनके अधिकारों को ठीक से शामिल नहीं किया गया है और दस्तावेज में कई विसंगतियां हैं। बच्चों ने आरोप लगाया है कि वसीयत में उनके नाम गलत तरीके से लिखे गए हैं, जिससे दस्तावेज की वैधता पर सवाल उठता है।</p>
<p>वहीं दूसरी ओर, प्रिया सचदेव ने अदालत में एक वसीयत पेश की है, जिसमें दावा किया गया है कि संजय कपूर ने अपनी अधिकांश संपत्ति उनके नाम छोड़ी है। इस दावे के बाद विवाद और गहरा गया है, क्योंकि करिश्मा कपूर के बच्चे इसे फर्जी बता रहे हैं।</p>
<p>कोर्ट ने पहले सुनवाई के दौरान संजय कपूर की सभी संपत्तियों को फ्रीज करने का आदेश दिया था। इसके तहत न केवल बैंक खातों बल्कि कंपनी शेयर, कीमती संपत्तियों जैसे घड़ियां, आभूषण, पेंटिंग और यहां तक कि विदेशी खातों और क्रिप्टो संपत्तियों पर भी रोक लगा दी गई है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी भी संपत्ति को न तो बेचा जा सकता है और न ही ट्रांसफर किया जा सकता है।</p>
<p>हालांकि कोर्ट ने बच्चों की शिक्षा और आवश्यक जीवन-यापन खर्चों के लिए सीमित राहत देने की बात कही थी। इसी वजह से अब प्रिया कपूर EPF से पैसे निकालने की अनुमति मांग रही हैं, ताकि बच्चों की फीस समय पर भरी जा सके। मामले की पृष्ठभूमि भी काफी जटिल है। करिश्मा कपूर और संजय कपूर की शादी 2003 में हुई थी और दोनों के दो बच्चे कियान और समायरा हैं। 13 साल बाद दोनों का तलाक हो गया था। इसके बाद संजय कपूर ने प्रिया सचदेव से शादी की थी। संजय कपूर का निधन 12 जून 2025 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने से हुआ था।</p>
<p>तलाक के समय संजय कपूर ने लिखित रूप में बच्चों की शिक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी ली थी। इसी आधार पर करिश्मा कपूर के बच्चे अब अपनी शिक्षा खर्चों की जिम्मेदारी को लेकर कोर्ट पहुंचे हैं। समायरा, जो अमेरिका में पढ़ाई कर रही हैं, ने भी अदालत में कहा था कि पिछले कुछ महीनों से उनकी कॉलेज फीस नहीं भरी गई है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।</p>
<p>इस पर पहले की सुनवाई में कोर्ट ने दोनों पक्षों को फटकार भी लगाई थी और कहा था कि बच्चों के भविष्य से जुड़े मामलों में देरी नहीं होनी चाहिए। उस समय प्रिया सचदेव के वकीलों ने आश्वासन दिया था कि बच्चों की फीस समय पर दी जाएगी, लेकिन संपत्ति फ्रीज होने के कारण अब भुगतान में अड़चन आ रही है। अब कोर्ट ने इस नई याचिका को स्वीकार करते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और उनसे जवाब मांगा है। अगली सुनवाई जुलाई में निर्धारित की गई है, जिसमें यह तय होगा कि EPF से पैसे निकालने की अनुमति दी जाएगी या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 15:44:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सबरीमाला केस: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, मूर्ति छूना अपमान कैसे</title>
                                    <description><![CDATA[सबरीमाला केस में धार्मिक परंपरा बनाम संवैधानिक अधिकार पर बहस तेज, फैसला जल्द संभव सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियों ने बहस को नया मोड़ दे दिया। देशभर में नजरें अब इस अहम फैसले पर टिकी हैं।

]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/sabarimala-case-supreme-court-asked-how-touching-the-idol-is/article-51778"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/sabarimala-case-supreme-court.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली में <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">सुप्रीम कोर्ट</span></span> में <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">सबरीमाला मंदिर</span></span> से जुड़े बहुचर्चित मामले की सुनवाई मंगलवार को निर्णायक चरण में पहुंचती दिखी। नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने सुनवाई के दौरान अहम सवाल उठाते हुए पूछा कि किसी भक्त द्वारा मूर्ति को छूना ईश्वर का अपमान कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को केवल जन्म, लिंग या वंश के आधार पर देवता को छूने या मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो क्या संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा। यह मामला महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है और आज की ताज़ा ख़बरें व भारत समाचार अपडेट में प्रमुख बना हुआ है।</p>
<p>सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर भी जोर दिया कि आस्था और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है। जजों ने कहा कि आधुनिक समाज में बदलती सोच और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा जरूरी हो सकती है। कोर्ट ने संकेत दिया कि किसी भी परंपरा को अंतिम मानने से पहले यह देखना होगा कि वह संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं।</p>
<h3><strong>धार्मिक तर्क</strong></h3>
<p>मंदिर पक्ष की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि हर मंदिर की अपनी विशिष्ट परंपराएं होती हैं, जो वहां के देवता की प्रकृति और मान्यताओं पर आधारित होती हैं। उनके अनुसार, भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, इसलिए सबरीमाला मंदिर में कुछ विशेष नियम लागू हैं। वकीलों ने कहा कि पूजा-पद्धति और धार्मिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप आस्था पर सीधा असर डाल सकता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण प्राप्त है।</p>
<h3><strong>संवैधानिक बहस</strong></h3>
<p>सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या कोई आस्तिक व्यक्ति अपने ही धर्म की प्रथाओं को अदालत में चुनौती दे सकता है। जजों ने कहा कि यदि धार्मिक समुदाय के भीतर ही किसी प्रथा को लेकर मतभेद है, तो अदालत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या आधुनिक शिक्षा और तकनीकी प्रगति के दौर में धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या बदली जा सकती है।</p>
<p>इस मामले में कुल 66 याचिकाएं जुड़ी हुई हैं, जिनमें महिलाओं के प्रवेश पर रोक, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार जैसे मुद्दे शामिल हैं। इससे पहले 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाने का फैसला सुनाया था। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब सुनवाई जारी है।</p>
<p>अधिकारियों के अनुसार, इस संवेदनशील मामले में फैसला जल्द आ सकता है। इसका असर न केवल सबरीमाला मंदिर की परंपराओं पर पड़ेगा, बल्कि देशभर में धार्मिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक नई दिशा भी तय कर सकता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 15:54:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बालिग और शादीशुदा महिला की मर्जी से बने संबंध अपराध नहीं, आरोपी को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेमेतरा के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि बालिग और शादीशुदा महिला की सहमति से बने शारीरिक संबंध को रेप नहीं माना जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chhattisgarh-high-courts-big-decision-consensual-relationship-between-an-adult/article-49534"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/chhattisgarh-high-court-consensual-relationship.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि किसी बालिग और विवाहित महिला के साथ उसकी स्पष्ट सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने इस मामले में निचली अदालत के फैसले को सही मानते हुए अपील को खारिज कर दिया और आरोपी को राहत प्रदान की।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">क्या था मामला और कैसे पहुंचा हाईकोर्ट</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह मामला बेमेतरा जिले से जुड़ा है, जहां महिला ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की अनुमति मांगी थी। महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा करके उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पीड़िता के आरोप और घटनाक्रम</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">महिला ने अपनी शिकायत में कहा था कि आरोपी ने उसे विवाह का भरोसा दिलाकर संबंध बनाए और बाद में अपने वादे से मुकर गया। उसने यह भी बताया कि सामाजिक दबाव और भय के कारण उसने तत्काल शिकायत दर्ज नहीं कराई। बाद में अपने पति को जानकारी देने के पश्चात मामला दर्ज कराया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">साक्ष्य और गवाहों पर अदालत की टिप्पणी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों से यह साबित नहीं होता कि महिला की सहमति किसी दबाव, डर या धोखे के तहत ली गई थी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि महिला पहले से शादीशुदा थी और गर्भवती भी थी। इन परिस्थितियों में यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले कि संबंध उसकी इच्छा के विरुद्ध बने थे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कानूनी दृष्टिकोण और फैसले की अहम बात</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई बालिग महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से शारीरिक संबंध बनाती है, तो उसे रेप नहीं माना जा सकता। केवल यह आरोप कि संबंध शादी के वादे के आधार पर बने थे, पर्याप्त नहीं है जब तक यह साबित न हो कि सहमति धोखे या दबाव के कारण प्राप्त की गई थी। इस आधार पर अदालत ने अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सहमति की परिभाषा पर फिर शुरू हुई बहस</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस फैसले के बाद सहमति और यौन अपराधों की कानूनी परिभाषा को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। हर मामले में परिस्थितियों, साक्ष्यों और दोनों पक्षों के बयानों का गहराई से विश्लेषण जरूरी होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">न्यायिक संतुलन की चुनौती</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे पीड़ित के अधिकारों की रक्षा करते हुए आरोपी के लिए निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करें। सहमति जैसे संवेदनशील मुद्दे में यह समझना आवश्यक होता है कि क्या वह पूरी तरह स्वतंत्र इच्छा से दी गई थी या किसी प्रकार के भय, दबाव या भ्रम के कारण। यह फैसला इसी संतुलन को दर्शाता है और बताता है कि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 10:59:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भोपाल में असलम कुरैशी पर NSA, जमानत के 22 घंटे बाद फिर जेल</title>
                                    <description><![CDATA[गोमांस मामले में आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी; जेल में घटा वजन, नई पहचान ‘बंदी नंबर 500’]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/aslam-qureshi-in-bhopal-jail-again-after-22-hours-of/article-48662"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-03/mp-news-(17).jpg" alt=""></a><br /><p>मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में चर्चित गोमांस मामले के आरोपी असलम कुरैशी उर्फ ‘चमड़ा’ को जमानत मिलने के महज 22 घंटे बाद राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत दोबारा गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। बुधवार देर रात सेशन कोर्ट से रिहाई के बाद जैसे ही वह भोपाल सेंट्रल जेल से बाहर निकला, पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। गुरुवार को प्रशासन ने उस पर NSA की कार्रवाई करते हुए फिर से जेल में दाखिल कर दिया।</p>
<p>प्रशासन का कहना है कि आरोपी की गतिविधियां कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती हैं, इसी आधार पर यह कार्रवाई की गई। अब असलम को विचाराधीन बंदी के रूप में नया नंबर 500/26 दिया गया है और सुरक्षा कारणों से उसे जेल के ‘बी’ खंड में रखा गया है।</p>
<p>असलम कुरैशी को करीब 70 दिन जेल में रहने के बाद जमानत मिली थी। सेशन कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संबंधित अपराध न तो मृत्युदंड और न ही आजीवन कारावास से दंडनीय है। साथ ही जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है, इसलिए जमानत देना उचित है। कोर्ट ने यह भी शर्त रखी थी कि आरोपी ट्रायल में बाधा नहीं डालेगा और बिना अनुमति देश नहीं छोड़ेगा।</p>
<p>हालांकि, जमानत के तुरंत बाद NSA लगाने के फैसले ने इस मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में प्रशासन के पास व्यापक अधिकार होते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी किया जाता है जब सार्वजनिक शांति को खतरे की आशंका हो।</p>
<p>जेल रिकॉर्ड के मुताबिक, 8 जनवरी 2026 को जब असलम को पहली बार जेल भेजा गया था, तब उसका वजन 65 किलो था। दोबारा जेल में दाखिल किए जाने पर उसका वजन घटकर 61 किलो दर्ज किया गया। बताया जा रहा है कि जेल की दिनचर्या और खानपान में बदलाव के कारण उसके स्वास्थ्य पर असर पड़ा है।</p>
<p>यह पूरा मामला 17 दिसंबर 2025 को सामने आया था, जब भोपाल में एक कंटेनर से करीब 26 टन मांस बरामद किया गया था। जांच के लिए भेजे गए सैंपल में गोमांस की पुष्टि होने के बाद 8 जनवरी 2026 को जहांगीराबाद पुलिस ने असलम कुरैशी और अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था।</p>
<p>मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज रही है। प्रदेश के मंत्री और जनप्रतिनिधियों ने सख्त कार्रवाई की बात कही है। वहीं कुछ सामाजिक संगठनों ने जांच और चार्जशीट को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कमजोर चार्जशीट के कारण आरोपी को जमानत मिली।</p>
<p>फिलहाल, NSA के तहत गिरफ्तारी के बाद असलम कुरैशी को लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है। प्रशासन मामले की निगरानी कर रहा है और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।</p>
<p>----------------------------</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 11:45:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>1.5 करोड़ डिमांड ड्राफ्ट जमा करने के बाद राजपाल यादव को अंतरिम जमानत</title>
                                    <description><![CDATA[हाईकोर्ट ने एफडीआर से इनकार किया, तय प्रारूप में भुगतान पर ही मिली राहत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/rajpal-yadav-granted-interim-bail-after-depositing-rs-15-crore/article-46443"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/bollywood-(2)2.jpg" alt=""></a><br /><p>अभिनेता <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">राजपाल यादव</span></span> को हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गई है। अदालत ने 1.5 करोड़ रुपए की शेष राशि डिमांड ड्राफ्ट के जरिए जमा करने की शर्त पर राहत दी। निर्धारित समयसीमा के भीतर भुगतान पूरा होने के बाद कोर्ट ने रिहाई का आदेश पारित किया।</p>
<p>सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान भुगतान के तरीके को लेकर अदालत में विस्तृत बहस हुई। बचाव पक्ष ने राशि को एफडीआर (फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद) के रूप में जमा करने की पेशकश की, लेकिन जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि अदालत केवल डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से ही भुगतान स्वीकार करेगी।</p>
<h5><strong>पहले भी जमा हो चुके थे ड्राफ्ट</strong></h5>
<p>अदालत के रिकॉर्ड में यह दर्ज किया गया कि 25 लाख रुपए का एक डिमांड ड्राफ्ट पहले ही जमा किया जा चुका था। इसके अलावा 75 लाख रुपए का एक अन्य डीडी भी पूर्व में प्रस्तुत किया गया था। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि शेष 1.5 करोड़ रुपए उसी दिन दोपहर 3 बजे तक डिमांड ड्राफ्ट के रूप में जमा किए जाएं।</p>
<p>न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि तय प्रारूप और समयसीमा का पालन नहीं होने की स्थिति में अंतरिम जमानत संभव नहीं होगी। सुनवाई के दौरान अदालत का रुख सख्त रहा और किसी भी प्रकार की वैकल्पिक व्यवस्था को अस्वीकार कर दिया गया।</p>
<h5><strong>समय पर भुगतान, फिर मिली राहत</strong></h5>
<p>निर्धारित समय से पहले शेष 1.5 करोड़ रुपए का डिमांड ड्राफ्ट कोर्ट में जमा कर दिया गया। इसके बाद न्यायालय ने अंतरिम जमानत मंजूर करते हुए अभिनेता की रिहाई का आदेश दिया।</p>
<p>हालांकि, मामले की अगली सुनवाई नियत तिथि पर होगी। फिलहाल कोर्ट की शर्तों का पालन करने के बाद राजपाल यादव को अस्थायी राहत मिल गई है।</p>
<p>-----</p>
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                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 13:32:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आदित्य पंचोली की 2019 रेप FIR रद्द करने की मांग पर बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[वर्सोवा थाने में दर्ज केस; शिकायतकर्ता को 24 फरवरी को पेश होने का निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/hearing-in-bombay-high-court-on-aditya-pancholis-demand-to/article-46040"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/bollywood-(31).jpg" alt=""></a><br /><p>बॉलीवुड अभिनेता <strong><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Aditya Pancholi</span></span></strong> की ओर से वर्ष 2019 में दर्ज रेप मामले की एफआईआर रद्द करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर <strong><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Bombay High Court</span></span></strong> में सुनवाई हुई। मामला मुंबई के वर्सोवा पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 समेत अन्य गंभीर धाराओं में दर्ज किया गया था।</p>
<h5><strong>शिकायतकर्ता को नया नोटिस</strong></h5>
<p>सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसी की ओर से कई नोटिस भेजे जाने के बावजूद शिकायतकर्ता उपस्थित नहीं हुईं। इस पर हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता को नया नोटिस जारी करते हुए 24 फरवरी 2026 को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया।</p>
<h5><strong>15 साल बाद शिकायत का दावा</strong></h5>
<p>याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कथित घटना के लगभग 15 वर्ष बाद एफआईआर दर्ज की गई, जो दुर्भावनापूर्ण है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ‘भजनलाल’ फैसले का हवाला देते हुए एफआईआर को निरस्त करने की मांग की गई है।</p>
<p>बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि उनके पास एक ऑडियो रिकॉर्डिंग है, जिसे अदालत में प्रस्तुत किया गया है, और उसमें शिकायत दर्ज कराने के पीछे कथित रूप से अनुचित मंशा का संकेत मिलता है।</p>
<h5><strong>किन धाराओं में दर्ज है मामला</strong></h5>
<p>एफआईआर में आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म), 328 (नशीला पदार्थ देकर नुकसान), 384 (जबरन वसूली), 341 और 342 (गैरकानूनी रोक एवं बंधक), 323 (मारपीट) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत आरोप दर्ज किए गए थे।</p>
<p>मामला फिलहाल न्यायालय में लंबित है और अगली सुनवाई 24 फरवरी को निर्धारित है।</p>
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                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 13:57:40 +0530</pubDate>
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                <title>रिटायरमेंट के बाद GPF कटौती पर हाईकोर्ट सख्त: 6 महीने बाद वसूली को बताया गैरकानूनी</title>
                                    <description><![CDATA[12 साल बाद जारी आदेश रद्द, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रिटायर्ड लेक्चरर को दी बड़ी राहत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-strict-on-gpf-deduction-after-retirement-calls-recovery/article-45704"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/cg-(17)1.jpg" alt=""></a><br /><p>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के छह माह बाद सामान्य भविष्य निधि (GPF) खाते से किसी भी तरह की वसूली कानूनन वैध नहीं है। कोर्ट ने इसी आधार पर एक रिटायर्ड लेक्चरर के खिलाफ वर्षों बाद जारी किए गए वसूली आदेश को रद्द कर दिया।</p>
<p>मामला जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ निवासी लक्ष्मीनारायण तिवारी से जुड़ा है, जो शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ससहा में व्याख्याता के पद पर कार्यरत थे। वे 31 जनवरी 2011 को निर्धारित आयु पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के करीब 12 साल बाद महालेखाकार कार्यालय, रायपुर ने उनके GPF खाते में ऋणात्मक शेष का हवाला देते हुए वसूली आदेश जारी कर दिया।</p>
<p>इस आदेश से आहत होकर लक्ष्मीनारायण तिवारी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि इतने लंबे समय बाद की जा रही वसूली न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि सेवा नियमों के भी विरुद्ध है।</p>
<p><strong>न्यायिक मिसालों का दिया गया हवाला</strong><br />याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पूर्व में जबलपुर हाईकोर्ट और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के कई मामलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रिटायरमेंट के छह माह के भीतर ही विभागीय देयों की वसूली की जा सकती है। इसके बाद की गई कोई भी कटौती नियमों के खिलाफ मानी जाएगी।</p>
<p>अधिवक्ताओं ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के नियम 65 का भी हवाला दिया, जिसमें यह प्रावधान है कि यदि GPF खाते में कोई बकाया पाया जाता है, तो उसकी वसूली सीमित समय-सीमा के भीतर ही संभव है।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख</strong><br />हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों, दस्तावेजों और न्यायिक निर्णयों पर विचार करते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के 12 वर्ष बाद जारी किया गया वसूली आदेश विधिसंगत नहीं है। अदालत ने महालेखाकार कार्यालय द्वारा जारी आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को पूर्ण राहत प्रदान की।</p>
<p>इस फैसले को राज्य के अन्य सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे सेवानिवृत्ति के बाद की वित्तीय सुरक्षा को लेकर एक स्पष्ट कानूनी दिशा तय होती है।</p>
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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 12:53:05 +0530</pubDate>
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