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                <title>India economy - दैनिक जागरण</title>
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                <description>India economy RSS Feed</description>
                
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                <title>प्याज-टमाटर की महंगाई से बढ़ा रसोई का खर्च, जून में वेज और नॉनवेज थाली हुई महंगी</title>
                                    <description><![CDATA[टमाटर, प्याज, खाद्य तेल और एलपीजी के बढ़ते दामों ने बढ़ाई थाली की लागत, मौसम की मार से दालों के और महंगे होने की आशंका।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/6a4f5123bca60/article-58278"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/gold-price-today-(11).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देशभर में आम लोगों की रसोई पर महंगाई का असर लगातार गहराता जा रहा है। जून 2026 के दौरान घर में तैयार होने वाली वेज और नॉनवेज दोनों तरह की थाली पहले के मुकाबले महंगी हो गई हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह टमाटर, प्याज, खाद्य तेल और एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमतें हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक जून महीने में एक औसत वेज थाली की लागत सालाना आधार पर 5 प्रतिशत बढ़कर 28.4 रुपये हो गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में इसकी कीमत 28.1 रुपये थी। वहीं नॉनवेज थाली की कीमत में भी 6 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते आने वाले महीनों में दालों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल सकती है, जिससे घरेलू बजट पर और दबाव बढ़ने की संभावना है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्रिसिल की 'राइस रोटी रेट (RRR)' रिपोर्ट में बताया गया है कि सब्जियों और रसोई से जुड़े जरूरी सामानों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने थाली की लागत बढ़ा दी है। खासतौर पर टमाटर और प्याज की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर हर घर की रसोई पर पड़ा है। इसके अलावा खाद्य तेल और एलपीजी सिलेंडर महंगे होने से खाना बनाने की कुल लागत भी बढ़ गई है। दूसरी ओर, पहले आलू की कीमतों में आई गिरावट से जो राहत मिली थी, उसका असर अब लगभग खत्म हो चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर मई 2026 और जून 2026 की तुलना करें तो भी महंगाई का असर साफ दिखाई देता है। एक महीने के भीतर वेज थाली की कीमत में 4 प्रतिशत और नॉनवेज थाली की लागत में 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान टमाटर के दाम 17 प्रतिशत, प्याज के दाम 8 प्रतिशत और आलू के दाम 5 प्रतिशत बढ़े हैं। सब्जियों की कीमतों में इस बढ़ोतरी ने घरेलू खर्च को प्रभावित किया है। वहीं पोल्ट्री सेक्टर में सप्लाई कम होने से ब्रॉयलर चिकन की कीमतों में भी लगभग 2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर भी भारतीय बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर पुशन शर्मा के अनुसार मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। इसका असर खाद्य तेल और एलपीजी की कीमतों पर पड़ा है। सालाना आधार पर दोनों की कीमतों में लगभग 10-10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यही वजह है कि घरेलू रसोई का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सब्जियों की बात करें तो टमाटर सबसे अधिक महंगा हुआ है। जून 2025 में टमाटर जहां करीब 32 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वहीं जून 2026 में इसकी कीमत बढ़कर 42 रुपये प्रति किलो पहुंच गई। यानी एक साल में टमाटर करीब 31 प्रतिशत महंगा हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि फरवरी और मार्च के दौरान अधिक तापमान रहने के कारण गर्मियों की फसल की बुआई और रोपाई प्रभावित हुई, जिससे उत्पादन कम हुआ और कीमतें बढ़ गईं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्याज की कीमतों में भी सालाना आधार पर लगभग 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि नई रबी फसल की आवक से बाजार में कुछ राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन सीमित सप्लाई के कारण कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। दूसरी ओर आलू की नई फसल आने से इसकी कीमतों में लगभग 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इससे थाली की लागत को कुछ हद तक नियंत्रित रखने में मदद मिली, लेकिन अन्य खाद्य पदार्थों की महंगाई के कारण कुल खर्च फिर भी बढ़ गया।</p>
<p style="text-align:justify;">नॉनवेज थाली की लागत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह चिकन की कीमतों में आया उछाल है। रिपोर्ट के अनुसार नॉनवेज थाली की कुल लागत में ब्रॉयलर चिकन का हिस्सा करीब 50 प्रतिशत होता है। जून महीने में भीषण गर्मी के कारण पोल्ट्री फार्मों में पक्षियों की मृत्यु दर बढ़ गई। कई पक्षियों का वजन भी कम हो गया और नए चूजों को पालने की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसका सीधा असर सप्लाई पर पड़ा और बाजार में चिकन महंगा हो गया। सालाना आधार पर ब्रॉयलर की कीमतों में लगभग 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आने वाले दिनों में दालों की कीमतें भी आम लोगों की चिंता बढ़ा सकती हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि उड़द और मूंग का शुरुआती स्टॉक पहले से ही कम है। इसके अलावा कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दालों की फसल को नुकसान पहुंचा है। इससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है और कीमतों में आगे भी तेजी बनी रह सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 14:13:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>कच्चा तेल छह महीने के निचले स्तर पर, फिर भी पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस</title>
                                    <description><![CDATA[कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट के बावजूद आम लोगों को राहत नहीं, रिपोर्ट के मुताबिक तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर मजबूत मार्जिन कमा रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/crude-oil-is-at-its-lowest-in-six-months-yet/article-58185"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/crude-oil-price-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इसका फायदा अब तक देश के आम उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाया है। अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने वाला कच्चा तेल अब करीब छह महीने के निचले स्तर पर कारोबार कर रहा है। इंडियन बास्केट के अनुसार कच्चे तेल की कीमत घटकर 68.69 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई है। यह युद्ध के दौरान बने करीब 157 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर से लगभग 56 प्रतिशत कम है। इसके बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में किसी तरह की कमी नहीं की गई है। ऐसे में एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हो चुका है तो घरेलू बाजार में उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं मिल रही।</p>
<p style="text-align:justify;">मौजूदा हालात में सरकारी तेल विपणन कंपनियां अच्छी स्थिति में हैं। डीएएम कैपिटल की एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा कच्चे तेल की कीमत पर तेल कंपनियां पेट्रोल पर करीब 10.5 रुपए और डीजल पर लगभग 11 रुपए प्रति लीटर तक का मार्जिन हासिल कर रही हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब इंडियन बास्केट का कच्चा तेल 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तब कंपनियां लगभग ब्रेक ईवन की स्थिति में होती हैं, यानी न उन्हें विशेष लाभ होता है और न ही नुकसान। चूंकि 1 जून के बाद से कच्चे तेल की कीमत लगातार इस स्तर से नीचे बनी हुई है, इसलिए कंपनियां पिछले कई सप्ताह से मुनाफे में कारोबार कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के दौरान वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था। हालांकि युद्धविराम की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें धीरे-धीरे नीचे आने लगीं। शुरुआती युद्धविराम के बाद भी कच्चा तेल 115 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बना रहा और अब यह 70 डॉलर के आसपास पहुंच गया है। इसके बावजूद भारत में सरकारी तेल कंपनियों ने खुदरा ईंधन की कीमतों में कोई राहत नहीं दी है। यही वजह है कि उपभोक्ताओं के बीच असंतोष भी देखने को मिल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि कच्चे तेल की कीमतों और पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों के बीच सीधा संबंध हमेशा नहीं रहा। वर्ष 2018 में जब कच्चा तेल करीब 80 डॉलर प्रति बैरल था, तब दिल्ली में पेट्रोल लगभग 72 रुपए और डीजल करीब 70 रुपए प्रति लीटर बिक रहा था। इसके बाद 2020 में कोरोना महामारी के दौरान कच्चे तेल की कीमत गिरकर करीब 43 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, लेकिन खुदरा कीमतों में वैसी राहत देखने को नहीं मिली जैसी उपभोक्ता उम्मीद कर रहे थे। बाद में 2022 में जब कच्चा तेल 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई। हालांकि जनवरी 2023 में कच्चे तेल के दाम फिर करीब 75 डॉलर तक आ गए, लेकिन उस समय भी खुदरा कीमतों में कोई खास बदलाव नहीं किया गया। तेल कंपनियों का तर्क था कि वे पहले हुए नुकसान की भरपाई कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह भी है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों वाले दौर में भी तेल कंपनियों का वित्तीय प्रदर्शन मजबूत बना रहा। जनवरी से मार्च 2026 की चौथी तिमाही में देश की प्रमुख तेल कंपनियों के नतीजे सकारात्मक रहे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार चार बड़ी तेल कंपनियों का संयुक्त मुनाफा पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 22 प्रतिशत तक बढ़ा। इसी अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 157 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा था और मार्च के दौरान इसका औसत भाव भी 125 डॉलर प्रति बैरल से अधिक रहा। इसके बावजूद कंपनियों के मुनाफे में कमी नहीं आई।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच निजी क्षेत्र की ईंधन कंपनी नायरा एनर्जी ने 1 जुलाई को अपने ग्राहकों को राहत देते हुए पेट्रोल की कीमत में 5 रुपए प्रति लीटर और डीजल में 3 रुपए प्रति लीटर की कटौती की थी। इस फैसले के बाद कई शहरों में नायरा के पंपों पर ईंधन सरकारी कंपनियों की तुलना में सस्ता मिलने लगा। भोपाल जैसे शहरों में भी नायरा के पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। हालांकि इसके बाद भी सरकारी तेल कंपनियों ने अपनी कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले मई महीने में सरकारी तेल कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे कच्चे तेल का हवाला देते हुए चरणबद्ध तरीके से पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में कुल 7.50 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की थी। देशभर के अधिकांश पेट्रोल पंप इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के नियंत्रण में हैं, इसलिए इन कंपनियों के फैसलों का असर सीधे करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ता है। फिलहाल कीमतों में कटौती नहीं होने से आम लोगों की जेब पर बोझ बना हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:55:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>1 जुलाई से आर्थिक बदलावों की बाढ़, पेट्रोल-डीजल से पासपोर्ट तक असर</title>
                                    <description><![CDATA[देशभर में 1 जुलाई से 7 बड़े बदलाव लागू, आम जनता की जेब और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/flood-of-economic-changes-from-july-1-impact-from-petrol-diesel/article-57479"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/1-july-changes-india.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">1 जुलाई से देशभर में कई ऐसे बड़े बदलाव लागू हो गए हैं जिनका सीधा असर आम लोगों की जेब और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने वाला है। कहीं पेट्रोल-डीजल के दामों में राहत मिली है तो कहीं सेवाएं महंगी हो गई हैं। कॉमर्शियल गैस सिलेंडर से लेकर पासपोर्ट फीस, ट्रेन यात्रा नियम और कारों की कीमतों तक कई फैसले एक साथ लागू हुए हैं। सरकार और कंपनियों के इन फैसलों को मिलाकर कुल 7 बड़े बदलाव माने जा रहे हैं, जिनकी चर्चा हर तरफ हो रही है।</p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">नयारा एनर्जी ने पेट्रोल की कीमत में 5 रुपए प्रति लीटर और डीजल में 3 रुपए प्रति लीटर की कटौती कर दी है। वहीं कॉमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम औसतन 180 रुपए तक घट गए हैं। दिल्ली में अब यह करीब 2930 रुपए में मिल रहा है, जो पहले 3113 रुपए से भी ज्यादा था। इसके साथ ही पेट्रोल पंपों पर डीजल भरने की 200 लीटर की दैनिक सीमा भी हटा दी गई है, जिससे ट्रांसपोर्ट और बड़े उपभोक्ताओं को राहत मिली है। हालांकि दूसरी तरफ पासपोर्ट बनवाना अब महंगा हो गया है और ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने पर जुर्माना भी दोगुना कर दिया गया है। आधार कार्ड में ईमेल अपडेट फिलहाल मुफ्त कर दिया गया है और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी कारों की कीमतें बढ़ा दी हैं।</p>
<p>कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम घटने से होटल, रेस्टोरेंट और कैटरिंग सेक्टर में राहत की उम्मीद जताई जा रही है। कारोबारियों का कहना है कि इससे खाने-पीने की चीजों की लागत कुछ हद तक कम हो सकती है। दूसरी तरफ डीजल की कीमतों में आई कटौती और डीजल पर लगी सीमा हटने से लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी हलचल देखी जा रही है। पहले 18 दिनों तक जो पाबंदियां लागू थीं, उन्हें अब हटा दिया गया है, जिससे बड़े उपभोक्ता फिर से सीधे पेट्रोल पंपों से ईंधन ले सकेंगे।</p>
<p>पासपोर्ट फीस में बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। सामान्य पासपोर्ट की फीस अब 1500 से बढ़कर 2500 रुपए हो गई है, जबकि तत्काल सेवा के लिए 5000 रुपए तक चुकाने होंगे। इसी तरह ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने पर अब कम से कम 500 रुपए जुर्माना देना होगा, जो पहले 250 रुपए था। रेलवे ने साफ किया है कि पकड़े जाने पर किराया और जुर्माना दोनों मिलाकर ज्यादा भुगतान करना पड़ेगा, और गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।</p>
<p>दूसरी ओर आधार कार्ड में ईमेल अपडेट करने की सुविधा को फिलहाल मुफ्त कर दिया गया है, जिससे लाखों लोगों को राहत मिलेगी। पहले इस सेवा के लिए शुल्क देना पड़ता था, लेकिन अब दिसंबर 2026 तक यह सुविधा निशुल्क रहेगी। वहीं ऑटो सेक्टर में भी बदलाव देखने को मिला है, जहां कई कंपनियों ने 1 से 2 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाने का फैसला लिया है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो नई कार खरीदने की योजना बना रहे हैं।</p>
<p>1 जुलाई से लागू ये बदलाव किसी न किसी रूप में हर वर्ग को प्रभावित कर रहे हैं। कहीं राहत की खबर है तो कहीं खर्च का बोझ बढ़ गया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 09:48:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कॉमर्शियल LPG सप्लाई पर लगी पाबंदियां हटीं, अब 100% गैस उपलब्ध कराएगी सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[एलपीजी आपूर्ति में सुधार के बाद केंद्र सरकार का बड़ा फैसला, उद्योगों के लिए बल्क सप्लाई भी आंशिक रूप से बहाल, घरेलू उपलब्धता बनाए रखने पर रहेगा जोर।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/restrictions-on-commercial-lpg-supply-lifted-now-government-will-provide/article-56982"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/commercial-lpg.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">केंद्र सरकार ने एलपीजी आपूर्ति को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए कॉमर्शियल LPG सिलेंडरों पर लगी सभी सेक्टर आधारित पाबंदियां हटा दी हैं। इसके साथ ही राज्यों को पहले की तरह 100 फीसदी कॉमर्शियल गैस सप्लाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। गैस संकट के दौरान होटलों, रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक उपभोक्ताओं को सीमित मात्रा में गैस उपलब्ध कराई जा रही थी, लेकिन अब हालात में सुधार के बाद यह व्यवस्था सामान्य की जा रही है। सरकार के इस फैसले से व्यापारिक गतिविधियों और औद्योगिक क्षेत्र को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने बताया कि देश में एलपीजी की उपलब्धता पहले की तुलना में बेहतर हुई है। घरेलू उत्पादन बढ़ने और विदेशों से आयातित एलपीजी कार्गो के आने की संभावना को देखते हुए कॉमर्शियल सप्लाई पर लगी सभी सीमाएं समाप्त कर दी गई हैं। इसके अलावा, गैस संकट की शुरुआत में पूरी तरह रोक दी गई बल्क एलपीजी सप्लाई को भी आंशिक रूप से बहाल कर दिया गया है। अब बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं को संकट से पहले की खपत के स्तर का 50 प्रतिशत तक बल्क एलपीजी उपलब्ध कराया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सरकार का मानना है कि इस फैसले से होटल, रेस्तरां, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और अन्य व्यावसायिक संस्थानों को राहत मिलेगी। पिछले कुछ महीनों से गैस की सीमित उपलब्धता के कारण कई उद्योगों को अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ रहा था। अब सप्लाई सामान्य होने से उत्पादन गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। मंत्रालय के अनुसार, सप्लाई चेन में सुधार के बाद सी-3 और सी-4 हाइड्रोकार्बन स्ट्रीम्स के डायवर्जन को भी कम किया जाएगा। इससे पेट्रोकेमिकल और डाउनस्ट्रीम उद्योगों को उनका पुराना आवंटन फिर से मिलने लगेगा। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी परिस्थिति में घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं की आपूर्ति प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इसी वजह से रोजाना कम से कम 40 हजार टन घरेलू एलपीजी उत्पादन बनाए रखने का लक्ष्य तय किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दरअसल, पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई दिया था। क्षेत्र में संघर्ष और समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता के कारण एलपीजी और कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई बाधाओं का असर देश की आपूर्ति व्यवस्था पर भी पड़ा। इसी स्थिति को देखते हुए सरकार ने शुरुआत में घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरतों को प्राथमिकता दी और व्यावसायिक क्षेत्र के लिए गैस आपूर्ति में कटौती की थी। गैस संकट के दौरान कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई। कारोबारियों का कहना था कि बढ़ती कीमतों और सीमित उपलब्धता के कारण होटल और रेस्तरां उद्योग पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा। कई छोटे व्यवसायों को परिचालन लागत बढ़ने की वजह से मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अब सरकार के ताजा फैसले से उन्हें राहत मिलने की उम्मीद है, हालांकि कीमतों में स्थायी कमी अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी आयातकों में शामिल है और देश की कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। ऐसे में वैश्विक हालात सामान्य होने पर ही घरेलू बाजार में स्थिरता बनी रह सकती है। फिलहाल विदेशी आपूर्ति बेहतर होने के संकेत मिले हैं, जिससे सरकार ने प्रतिबंधों में ढील देने का निर्णय लिया है। 'प्री-क्राइसिस लेवल' का मतलब उस समय की खपत से है जब गैस संकट शुरू नहीं हुआ था। संकट के दौरान राज्यों और उद्योगों को सीमित मात्रा में गैस उपलब्ध कराई जा रही थी, ताकि घरेलू रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित न हो। अब धीरे-धीरे उसी स्तर की ओर वापसी की जा रही है। सरकार का कहना है कि अगर आपूर्ति की स्थिति लगातार बेहतर बनी रहती है तो आने वाले समय में उद्योगों को और अधिक राहत दी जा सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 11:34:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कच्चा तेल 72 डॉलर प्रति बैरल पर लौटा, पेट्रोल-डीजल में राहत के लिए करना होगा इंतजार</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान तनाव कम होने के बाद वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल सस्ता हुआ, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी आने में अभी करीब ढाई महीने का समय लग सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/crude-oil-returns-to-72-per-barrel-will-have-to/article-56980"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/crude-oil-price.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर उस स्तर पर पहुंच गई हैं, जहां वे ईरान से जुड़े तनाव शुरू होने से पहले थीं। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया। यह लगभग वही स्तर है, जो युद्ध जैसे हालात बनने से पहले दर्ज किया गया था। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होने से उम्मीद जरूर बढ़ी है कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी राहत मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को इसका फायदा तुरंत मिलने वाला नहीं है। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होना माना जा रहा है। हाल के दिनों में हुई बातचीत के बाद ईरानी तेल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई है। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही फिर बढ़ने लगी है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। जहाजों की संख्या बढ़ने से बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता कम हुई और इसका असर सीधे कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अभी भी जहाजों की आवाजाही पहले जैसी सामान्य नहीं हुई है। युद्ध से पहले जहां प्रतिदिन 100 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या उससे कुछ कम बनी हुई है। इसके बावजूद बाजार को यह भरोसा मिला है कि आने वाले समय में तेल की आपूर्ति सामान्य बनी रह सकती है। यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटने का असर सीधे पेट्रोल पंपों पर नहीं दिखता। इसकी सबसे बड़ी वजह तेल की खरीद और सप्लाई की लंबी प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल जिन पेट्रोल और डीजल उत्पादों की बिक्री हो रही है, वे उस कच्चे तेल से तैयार किए गए हैं, जिसे उस समय खरीदा गया था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें काफी अधिक थीं। ऐसे में वर्तमान में सस्ता हुआ कच्चा तेल अभी उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">किसी भी देश से खरीदा गया कच्चा तेल पहले वहां के बंदरगाहों तक पहुंचता है और फिर जहाजों में लोड किया जाता है। इसके बाद समुद्री रास्ते से भारत आने में लगभग दो महीने तक का समय लग सकता है। भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने के बाद तेल को रिफाइनरियों में भेजा जाता है, जहां उससे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके बाद यह ईंधन देशभर के डिपो और पेट्रोल पंपों तक पहुंचता है। पूरी प्रक्रिया में करीब 75 से 80 दिन लग जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटने के बावजूद उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना नहीं है। अगर मौजूदा स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर बनी रहती हैं तो अगस्त के आखिर या सितंबर की शुरुआत से कुछ असर दिखाई देना शुरू हो सकता है। वहीं पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वास्तविक राहत दशहरे के आसपास मिलने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण कारण तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी है। कंपनियां पिछले कुछ समय से पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नुकसान झेल रही हैं। इसके अलावा सरकार ने पहले उत्पाद शुल्क में भी कटौती की थी, जिससे राजस्व पर असर पड़ा। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमतें कम बनी रहती हैं तो शुरुआती अवधि में कंपनियां अपने नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर सकती हैं। इसके बाद ही खुदरा कीमतों में कटौती का फैसला लिया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां पहले की तुलना में काफी स्थिर दिखाई दे रही हैं। यदि पश्चिम एशिया में दोबारा कोई बड़ा तनाव नहीं बढ़ता और तेल आपूर्ति सामान्य रहती है तो निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी आने की संभावना कम है। इससे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों को राहत मिल सकती है और महंगाई पर भी सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 11:34:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>फोनपे वॉलेट पर नया नियम, इनएक्टिव यूजर्स से ₹100 फीस</title>
                                    <description><![CDATA[365 दिन इस्तेमाल न करने पर वॉलेट से हर तिमाही कटेंगे ₹100]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/new-rule-on-phonepe-wallet-%E2%82%B9100-fee-from-inactive-users/article-56439"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/phonepe-wallet-charges.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म फोनपे एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह यूजर्स के लिए राहत वाली नहीं बल्कि चिंता बढ़ाने वाली है। कंपनी के नए नियमों के मुताबिक अगर किसी यूजर का PhonePe वॉलेट लगातार 365 दिनों तक इस्तेमाल नहीं होता है तो उसे इनएक्टिव यानी ‘डॉर्मेंट’ मान लिया जाएगा। ऐसे वॉलेट पर हर तीन महीने में ₹100 का मेंटेनेंस चार्ज लगाया जाएगा। कंपनी की ओर से कहा गया है कि इस बदलाव से पहले यूजर्स को 15 दिन का नोटिस भेजा जाएगा और लगातार अलर्ट भी दिए जाएंगे। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर काफी नाराजगी देखने को मिल रही है। X (पहले ट्विटर) और Reddit जैसे प्लेटफॉर्म पर कई यूजर्स ने स्क्रीनशॉट शेयर कर दावा किया है कि उन्हें पहले से ही वॉलेट एक्टिव रखने के मैसेज आने लगे हैं। लोगों का कहना है कि यह नियम खासकर उन यूजर्स के लिए परेशानी पैदा करेगा जो वॉलेट में छोटी रकम रखकर लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं करते। कई लोगों ने इसे “छुपा हुआ चार्ज” और “अनचाहा पेनल्टी सिस्टम” बताया है। कंपनी के नियमों के अनुसार अगर नोटिस पीरियड के बाद भी वॉलेट एक्टिव नहीं किया गया तो चार्ज सीधे बैलेंस से काट लिया जाएगा। अगर वॉलेट में ₹100 से कम राशि होगी तो पूरी रकम खत्म कर दी जाएगी और बैलेंस को जीरो कर दिया जाएगा। कंपनी के पास यह अधिकार भी रहेगा कि वह समय-समय पर अपनी फीस पॉलिसी में बदलाव कर सके और नए चार्ज लागू कर सके। यह बात भी यूजर्स की नाराजगी की एक बड़ी वजह बन रही है क्योंकि इससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल पेमेंट सेक्टर में यह पहली बार नहीं है जब किसी वॉलेट ने इनएक्टिविटी चार्ज लागू किया हो। इससे पहले मोबिक्विक ने भी अपने इनएक्टिव यूजर्स से सालाना मेंटेनेंस फीस लेने की घोषणा की थी। वहीं एयरटेल पेमेंट्स बैंक भी अपनी पॉलिसी में इनएक्टिव अकाउंट्स पर चार्ज का प्रावधान रखता है। हालांकि फोनपे का बड़ा यूजर बेस और तिमाही आधार पर ₹100 की कटौती को लेकर मामला ज्यादा चर्चा में आ गया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में UPI ट्रांजैक्शन तेजी से बढ़े हैं, जिससे डिजिटल वॉलेट का उपयोग काफी कम हो गया है। अब लोग छोटे और बड़े भुगतान सीधे UPI के जरिए करते हैं, जबकि वॉलेट में पैसे लंबे समय तक पड़े रह जाते हैं। ऐसे में कंपनियों का तर्क है कि वॉलेट को सुरक्षित और ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, सिक्योरिटी और कंप्लायंस पर लगातार खर्च होता है, जिसे पूरा करने के लिए यह चार्ज जरूरी हो जाता है। हालांकि यूजर्स का कहना है कि इस तरह के चार्ज उन लोगों पर बोझ डालते हैं जो वॉलेट का नियमित इस्तेमाल नहीं करते लेकिन उसमें थोड़ी रकम सुरक्षित रखने के लिए छोड़ देते हैं। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या डिजिटल वॉलेट अब धीरे-धीरे बैंक जैसी फीस स्ट्रक्चर की ओर बढ़ रहे हैं। फिलहाल कंपनी की ओर से साफ किया गया है कि यह नियम केवल लंबे समय तक निष्क्रिय वॉलेट पर लागू होगा और एक्टिव यूजर्स पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।आने वाले समय में डिजिटल पेमेंट कंपनियां अपने रेवेन्यू मॉडल को मजबूत करने के लिए इस तरह की पॉलिसी और सख्त कर सकती हैं। UPI के दबदबे के बीच वॉलेट कंपनियों के लिए यह एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जहां उन्हें सर्विस और कमाई के बीच संतुलन बनाना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:24:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती, 58 पैसे की तेज बढ़त</title>
                                    <description><![CDATA[कच्चे तेल में गिरावट और शेयर बाजार की मजबूती से रुपये ने शुरुआती कारोबार में 94.60 का स्तर छुआ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/rupee-strengthened-by-58-paise-against-dollar/article-55956"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/indian-rupee-news.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">15 जून 2026, सोमवार की सुबह विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने मजबूत शुरुआत की और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 58 पैसे की तेजी दर्ज की। शुरुआती कारोबार में रुपया 94.70 पर खुला और थोड़ी ही देर में बढ़त दिखाते हुए 94.60 के स्तर पर पहुंच गया। यह मजबूती पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले उल्लेखनीय मानी जा रही है और इसे वैश्विक बाजारों में बने सकारात्मक माहौल का परिणाम बताया जा रहा है। मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, रुपये की इस तेजी के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट मानी जा रही है, जो अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के बाद देखने को मिली। लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के खत्म होने की खबर ने वैश्विक बाजारों में स्थिरता लाई है, जिससे निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ी है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को फायदा मिला है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घरेलू स्तर पर भी बाजार में सकारात्मक माहौल देखने को मिला। भारतीय शेयर बाजार में सेंसेक्स और निफ्टी ने मजबूत शुरुआत की, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ा। विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी बढ़ने और फंड फ्लो में सुधार होने से डॉलर की मांग में थोड़ी कमी आई, जिससे भारतीय मुद्रा को सहारा मिला। बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर में खरीदारी के चलते बाजार में भरोसा बढ़ा और इसका असर मुद्रा बाजार पर भी दिखाई दिया। फॉरेक्स डीलरों का कहना है कि डॉलर इंडेक्स में कमजोरी भी रुपये की मजबूती का एक प्रमुख कारण है। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर पर दबाव देखा जा रहा है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव में कमी आई है और सुरक्षित निवेश की मांग घट गई है। ऐसे में निवेशक जोखिम वाले बाजारों की ओर लौट रहे हैं, जिससे एशियाई मुद्राओं को मजबूती मिल रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में नरमी से आयात बिल कम होता है और चालू खाते के घाटे पर दबाव घटता है। इससे रुपये पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उसकी स्थिरता बढ़ती है। यही कारण है कि तेल बाजार में गिरावट के साथ रुपये में तेजी देखी जा रही है। आने वाले दिनों में रुपये की दिशा वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। यदि कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं और विदेशी निवेश का प्रवाह जारी रहता है, तो रुपये में और मजबूती देखी जा सकती है। हालांकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और वैश्विक आर्थिक संकेतक भी रुपये की चाल को प्रभावित कर सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुद्रा बाजार में कारोबारियों का कहना है कि फिलहाल निवेशकों की भावना सकारात्मक बनी हुई है। वैश्विक शांति संकेतों के कारण जोखिम का माहौल कम हुआ है और उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह बढ़ा है। इससे रुपये को मजबूती मिल रही है और अल्पकालिक रूप से यह रुझान जारी रह सकता है। यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि मुद्रा बाजार में अस्थिरता हमेशा बनी रहती है। किसी भी अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय घटना या आर्थिक डेटा के कारण रुपये में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसलिए निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। 15 जून 2026 का दिन भारतीय रुपये के लिए सकारात्मक शुरुआत लेकर आया है। वैश्विक बाजारों में सुधार, कच्चे तेल की गिरती कीमतें और घरेलू शेयर बाजारों की मजबूती ने मिलकर रुपये को समर्थन दिया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 11:41:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतों से शेयर बाजार में गिरावट</title>
                                    <description><![CDATA[सेंसेक्स और निफ्टी शुरुआती कारोबार में लुढ़के, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और अमेरिकी महंगाई ने बढ़ाई चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/stock-market-falls-due-to-us-iran-tension-and-crude-oil/article-55589"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/stock-market-india-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय शेयर बाजार गुरुवार, 11 जून 2026 को शुरुआती कारोबार में दबाव में नजर आया, जब वैश्विक बाजारों में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ा। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी, जिसका सीधा असर सेंसेक्स और निफ्टी पर देखने को मिला। सुबह के सत्र में बीएसई सेंसेक्स 358.54 अंक गिरकर 73,624.64 के स्तर पर पहुंच गया, जबकि एनएसई निफ्टी 117 अंक टूटकर 23,098.30 पर कारोबार करता दिखा। बाजार में यह गिरावट लगातार विदेशी निवेशकों की बिकवाली और ग्लोबल आर्थिक संकेतों की कमजोरी के कारण देखने को मिली।</p>
<p>विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ रही है। बुधवार को ही FIIs ने करीब 2,124 करोड़ रुपये से अधिक की इक्विटी बेच दी थी, जिससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया। अमेरिका की तरफ से ईरान से जुड़े ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की खबरों ने वैश्विक स्तर पर तनाव को और बढ़ा दिया है। इससे कच्चे तेल के बाजार में तेजी देखी गई है और ब्रेंट क्रूड 1.70 प्रतिशत बढ़कर 94.68 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। तेल की कीमतों में यह उछाल भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।</p>
<p>शेयर बाजार के शुरुआती कारोबार में आईटी सेक्टर के शेयरों पर सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। HCL Tech, Infosys, Tech Mahindra, TCS, Eternal और Trent जैसे प्रमुख शेयर गिरावट में रहे। वहीं दूसरी ओर कुछ बैंकिंग और एविएशन स्टॉक्स में हल्की खरीदारी देखने को मिली, जिनमें ICICI Bank, Bharti Airtel और InterGlobe Aviation शामिल रहे। वैश्विक बाजारों में भी इसी तरह का कमजोर रुख देखा गया। जापान का निक्केई, दक्षिण कोरिया का कोस्पी, चीन का शंघाई कंपोजिट और हांगकांग का हैंगसेंग सभी में गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी बाजार पहले ही बुधवार को बड़ी गिरावट के साथ बंद हुए थे, जहां डॉव जोंस 950 अंकों से ज्यादा गिर गया था।</p>
<p>भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई का मिश्रित असर निवेशकों के मूड को प्रभावित कर रहा है। अमेरिकी महंगाई दर में बढ़ोतरी ने यह संकेत दिया है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जिससे वैश्विक निवेश प्रवाह प्रभावित हो रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। इससे न केवल महंगाई बढ़ने का खतरा है, बल्कि रुपये पर दबाव, कंपनियों के मुनाफे में गिरावट और राजकोषीय घाटे पर भी असर पड़ सकता है।</p>
<p>बुधवार को बाजार ने अंत में कुछ रिकवरी दिखाई थी और सेंसेक्स 64 अंक की मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ था, लेकिन गुरुवार की शुरुआत ने फिर से निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। निफ्टी भी हल्की गिरावट के साथ बंद हुआ था, जिससे बाजार की अनिश्चितता साफ दिखाई देती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति स्थिर नहीं होती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। खासकर तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 11:51:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सोना-चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों में हलचल</title>
                                    <description><![CDATA[चांदी ₹12,655 टूटकर ₹2.33 लाख किलो, सोना ₹5,373 गिरकर ₹1.47 लाख प्रति 10 ग्राम; बाजार में उतार-चढ़ाव जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/big-fall-in-gold-and-silver-prices-stir-among-investors/article-55593"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/gold-silver-price-fall-india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सोने और चांदी की कीमतों में एक बार फिर तेज गिरावट देखने को मिली है, जिससे सर्राफा बाजार में हलचल बढ़ गई है। बुधवार, 10 जून 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच कीमती धातुओं के दामों में अचानक गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों के लिए यह गिरावट एक बड़ा संकेत मानी जा रही है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, 10 ग्राम 24 कैरेट सोना ₹5,373 टूटकर ₹1.47 लाख के स्तर पर आ गया है। वहीं चांदी की कीमतों में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली और 1 किलो चांदी ₹12,655 गिरकर ₹2.33 लाख प्रति किलो पर पहुंच गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले कुछ दिनों में चांदी के दामों में लगातार गिरावट का रुख देखा जा रहा है। 31 मई को जहां चांदी की कीमत ₹2.63 लाख प्रति किलो थी, वहीं अब यह करीब ₹30 हजार तक सस्ती हो चुकी है। इसी अवधि में सोने की कीमतों में भी करीब ₹9 हजार की गिरावट दर्ज की गई है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद निवेशक सुरक्षित संपत्तियों से मुनाफावसूली कर रहे हैं, जिससे कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। मिडिल ईस्ट में तनाव और अमेरिकी आर्थिक संकेतों ने भी इस अस्थिरता को बढ़ाया है। सोने और चांदी की कीमतें आमतौर पर संकट के समय बढ़ती हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति में निवेशकों की रणनीति बदल रही है। कई निवेशक ऊंचे स्तर पर मुनाफा वसूल रहे हैं, जिससे कीमतों पर दबाव बना हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">घरेलू बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब शादी-ब्याह और त्योहारी सीजन की तैयारी भी शुरू हो रही है। आमतौर पर इस समय मांग बढ़ने से कीमतों में मजबूती आती है, लेकिन फिलहाल अंतरराष्ट्रीय दबाव ज्यादा प्रभावी दिखाई दे रहा है। सर्राफा कारोबारियों का कहना है कि कीमतों में इस तरह की तेज गिरावट से अल्पकालिक खरीदारी बढ़ सकती है। हालांकि, लंबे समय के निवेशक अभी भी बाजार की दिशा को लेकर सतर्क बने हुए हैं। इसी बीच वैश्विक बाजारों में भी सोने-चांदी की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। डॉलर की मजबूती और अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों ने भी कीमती धातुओं पर दबाव बनाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़ी एक बड़ी खबर भी सामने आई है। मेटा और रिलायंस इंडस्ट्रीज भारत में पहला AI-इनेबल्ड डेटा सेंटर बनाने की योजना पर काम कर रही हैं। यह साझेदारी भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा दे सकती है। यह प्रोजेक्ट भारत को डिजिटल इकोनॉमी में एक मजबूत स्थिति दिलाने में मदद करेगा और डेटा प्रोसेसिंग तथा AI सेवाओं में बड़ा बदलाव ला सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 11:51:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एथेनॉल मिक्स पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी खत्म, सरकार का बड़ा फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[22% से 30% एथेनॉल ब्लेंडिंग वाले पेट्रोल को टैक्स फ्री कर क्रूड ऑयल इम्पोर्ट घटाने और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने की तैयारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/governments-big-decision-to-end-excise-duty-on-ethanol-mix/article-55588"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/ethanol-blended-petrol-india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केंद्र सरकार ने देश में ऊर्जा नीति को लेकर एक बड़ा कदम उठाते हुए पेट्रोल में अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले फ्यूल पर एक्साइज ड्यूटी को खत्म कर दिया है। नए नियमों के अनुसार 22% से लेकर 30% तक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर अब कोई एक्साइज ड्यूटी नहीं लगेगी। सरकार का मकसद देश में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के आयात को कम करना और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना बताया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी नोटिफिकेशन के मुताबिक इस टैक्स छूट के दायरे में E22, E25, E27 और E30 जैसे नए फ्यूल वेरिएंट शामिल होंगे। हालांकि पहले से लागू E20 यानी 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर इस फैसले का कोई सीधा लाभ नहीं दिया गया है। यह पहली बार है जब सरकार ने हाई लेवल एथेनॉल ब्लेंडिंग को वित्तीय प्रोत्साहन देकर बढ़ावा देने का निर्णय लिया है। एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है, जिसे जैविक स्रोतों से तैयार किया जाता है। यह मुख्य रूप से गन्ने के रस, मक्का और अन्य स्टार्च आधारित फसलों से बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर ईंधन को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाया जाता है, जिससे प्रदूषण में कमी और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का कहना है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 87% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जो देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाकर विदेशी मुद्रा की बचत की जा सकती है और किसानों को भी उनकी फसलों का बेहतर मूल्य मिल सकता है। एथेनॉल उत्पादन को लेकर देश में तीन प्रमुख श्रेणियां मानी जाती हैं। फर्स्ट जनरेशन एथेनॉल गन्ना, मक्का और मीठे फसलों से बनाया जाता है। सेकेंड जनरेशन एथेनॉल कृषि अवशेषों जैसे भूसी, बांस और वेस्ट मटेरियल से तैयार होता है। वहीं थर्ड जनरेशन बायोफ्यूल अभी विकास के चरण में है, जो मुख्य रूप से एल्गी (शैवाल) पर आधारित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने इस नीति को लागू करने से पहले तकनीकी तैयारियों पर भी काम किया है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने E22 से E30 तक के फ्यूल ब्लेंड्स के लिए गुणवत्ता मानक तय कर दिए हैं। इन मानकों में ऑक्टेन रेटिंग, सल्फर लेवल, सुरक्षा मानक और टेस्टिंग प्रोसेस शामिल हैं। ये नियम मई 2026 से प्रभावी हो चुके हैं, जिससे इस ईंधन को व्यावसायिक रूप से अपनाने का रास्ता साफ हो गया है। भारत का एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आगे बढ़ा है। पहले जहां 2030 तक E20 लक्ष्य रखा गया था, उसे बाद में संशोधित कर 2025-26 तक कर दिया गया। सरकारी तेल कंपनियों ने 10% ब्लेंडिंग का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया था, जिससे इस नीति की गति का अंदाजा लगाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर कुछ उपभोक्ताओं ने चिंता भी जताई है। खासकर पुरानी गाड़ियों में माइलेज कम होने और इंजन पर असर पड़ने की आशंका को लेकर सवाल उठे थे। यह मामला न्यायालय तक भी पहुंचा था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने E20 फ्यूल के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का कहना है कि यह बदलाव पूरी तरह तकनीकी जांच के बाद लागू किया गया है और इससे किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। साथ ही, ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी स्पष्ट किया है कि E20 या उससे कम ब्लेंड वाले ईंधन से वाहन की सुरक्षा पर कोई बड़ा खतरा नहीं है, हालांकि माइलेज में मामूली अंतर संभव है। वर्तमान में एक चुनौती यह भी है कि एथेनॉल की लागत कई बार पेट्रोल से अधिक पड़ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ट्रांसपोर्ट और GST मिलाकर एथेनॉल की औसत लागत लगभग 71 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है, जिससे रिटेल फ्यूल प्राइस को कम करना आसान नहीं हो पा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 11:04:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत बना दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी डिजिटल इकॉनोमी, एआई प्रदर्शन में भी चौथा स्थान</title>
                                    <description><![CDATA[डिजिटल कनेक्टिविटी, फिनटेक और नवाचार के दम पर भारत ने कई विकसित देशों को पीछे छोड़ा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/india-becomes-the-worlds-fifth-largest-digital-economy-and-also/article-54581"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/india-digital-economy.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। देश अब दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी डिजिटल इकॉनोमी बन गया है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत ने डिजिटल प्रदर्शन के मामले में जर्मनी, फ्रांस, जापान और कनाडा जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ दिया है। यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब देश में डिजिटल सेवाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है और करोड़ों लोग रोजमर्रा के कामों के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस की ओर से जारी ‘इंडियाज डिजिटल इकोनॉमी 2026’ रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में भारत डिजिटलाइजेशन के मामले में आठवें स्थान पर था, लेकिन एक वर्ष के भीतर तीन स्थान की छलांग लगाकर पांचवें स्थान पर पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान, इंटरनेट पहुंच, मोबाइल कनेक्टिविटी और तकनीकी नवाचार ने इस प्रगति में अहम भूमिका निभाई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">रिपोर्ट में दुनिया की जीडीपी के लगभग 96 प्रतिशत हिस्से को कवर करने वाले 71 देशों का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि भारत की डिजिटल क्षमता और तकनीकी विस्तार कई स्थापित अर्थव्यवस्थाओं से अधिक तेजी से बढ़ रहा है। डिजिटल क्षेत्र में देश की मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने डिजिटल माध्यमों से करीब 31 लाख करोड़ रुपये का व्यापार किया है। यह आंकड़ा देश में बढ़ते डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन आर्थिक गतिविधियों की ओर इशारा करता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। चिप्स-एआई इंडेक्स में भारत अमेरिका, चीन और सिंगापुर के बाद चौथे स्थान पर पहुंच गया है। यह रैंकिंग देश की तकनीकी क्षमता, प्रतिभा और एआई अपनाने की गति को दर्शाती है। पिछले कुछ वर्षों में एआई आधारित स्टार्टअप, अनुसंधान परियोजनाएं और डिजिटल सेवाओं में तेजी से वृद्धि हुई है, जिसका असर अब वैश्विक स्तर पर दिखाई देने लगा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि दुनिया के अधिकांश एआई उपयोगकर्ता अब विकासशील देशों में मौजूद हैं। आंकड़ों के अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग 72 प्रतिशत एआई उपयोगकर्ता विकासशील देशों से आते हैं। भारत और चीन मिलकर दुनिया के करीब 40 प्रतिशत एआई उपयोगकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें भारत अकेले लगभग 26 प्रतिशत वैश्विक एआई उपयोगकर्ताओं का हिस्सा रखता है। यह दर्शाता है कि देश में नई तकनीकों को अपनाने की गति काफी तेज है और आम लोगों के बीच भी डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग तेजी से बढ़ा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एआई टैलेंट हब भी माना जा रहा है। बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट और तकनीकी विशेषज्ञ वैश्विक कंपनियों और स्टार्टअप्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। देश के विभिन्न तकनीकी संस्थान और विश्वविद्यालय भी एआई और मशीन लर्निंग से जुड़े पाठ्यक्रमों पर लगातार जोर दे रहे हैं। इसके कारण आने वाले वर्षों में भारत की तकनीकी क्षमता और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि रिपोर्ट में कुछ चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। एआई उपयोग और प्रतिभा के मामले में भारत मजबूत स्थिति में है, लेकिन निवेश के क्षेत्र में अभी भी काफी अंतर दिखाई देता है। वैश्विक निजी एआई निवेश का केवल लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा ही भारत को प्राप्त हो रहा है। यह आंकड़ा बताता है कि तकनीकी क्षमता होने के बावजूद निवेश आकर्षित करने के लिए अभी काफी काम करने की जरूरत है। एडवांस सेमीकंडक्टर चिप्स, उच्च क्षमता वाले कंप्यूटिंग संसाधन और बड़े एआई मॉडल अभी भी दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित हैं। ऐसे में भारत को अपने डिजिटल विस्तार को मजबूत करने के लिए अनुसंधान, नवाचार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक निवेश करना होगा। साथ ही स्टार्टअप, उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग बढ़ाने की भी आवश्यकता है ताकि नई तकनीकों का विकास देश के भीतर ही हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल इंडिया अभियान, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), तेज इंटरनेट विस्तार और सरकारी डिजिटल सेवाओं ने भारत को वैश्विक डिजिटल मानचित्र पर एक मजबूत पहचान दिलाई है। ग्रामीण क्षेत्रों तक इंटरनेट और डिजिटल भुगतान की पहुंच बढ़ने से भी डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। यही वजह है कि भारत अब केवल उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि डिजिटल नवाचार और तकनीकी विकास का प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 16:00:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>आरबीआई की रिपोर्ट में भरोसा, वैश्विक संकट के बीच भी भारत की विकास दर मजबूत</title>
                                    <description><![CDATA[वित्त वर्ष 2026-27 में 6.9% जीडीपी ग्रोथ का अनुमान, महंगाई नियंत्रित रहने की उम्मीद; भू-राजनीतिक तनाव को बताया सबसे बड़ा जोखिम]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/confidence-in-rbi-report-that-indias-growth-rate-remains-strong/article-54571"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/india-gdp-growth-2026-27.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक सकारात्मक तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में देश की रियल जीडीपी ग्रोथ 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ऐसे समय में जब दुनिया के कई बड़े देश आर्थिक सुस्ती, बढ़ती महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, भारत की विकास दर को लेकर यह अनुमान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत घरेलू मांग, स्थिर आर्थिक नीतियां और अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता भारत को वैश्विक संकटों के असर से बचाने में मदद कर रही हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी रफ्तार बनाए रखने की स्थिति में दिखाई दे रही है। आरबीआई का मानना है कि आने वाले समय में भी देश की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर लगातार नजर रखने की जरूरत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट में दुनिया के मौजूदा हालात को लेकर भी चिंता जताई गई है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक वर्ष 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा खतरा भू-राजनीतिक तनाव है। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर के आर्थिक अनुमानों को प्रभावित किया है। ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, सप्लाई चेन में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर दबाव के कारण कई देशों की विकास दर प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक विकास दर 3.3 प्रतिशत से घटकर 3.1 प्रतिशत तक आ सकती है। इसी तरह वैश्विक व्यापार की रफ्तार भी धीमी पड़ने का अनुमान है। आरबीआई ने चेतावनी दी है कि यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव और बढ़ता है तो दुनिया की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है। इसका असर वित्तीय बाजारों, निवेश और व्यापार गतिविधियों पर भी दिखाई दे सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक महंगाई का दबाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और ऊर्जा क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता नए जोखिम पैदा कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बावजूद भारत के लिए तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। आरबीआई ने चार प्रमुख कारणों का उल्लेख करते हुए कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है। पहला कारण कॉर्पोरेट सेक्टर और बैंकिंग प्रणाली की मजबूत बैलेंस शीट है। दूसरा, सरकार द्वारा लगातार बढ़ाया जा रहा पूंजीगत व्यय है जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार को समर्थन मिल रहा है। तीसरा, देश में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है जो महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद करेगा। चौथा, कृषि उत्पादन का स्थिर रहना है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती रहेगी। रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक हालात ज्यादा नहीं बिगड़ते हैं तो भारत के लिए 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल करना संभव है। हालांकि बाहरी परिस्थितियों में अचानक बदलाव की स्थिति में जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महंगाई को लेकर भी केंद्रीय बैंक ने संतुलित दृष्टिकोण पेश किया है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर लगभग 4.6 प्रतिशत रह सकती है। यह आरबीआई के लक्ष्य दायरे के भीतर मानी जा रही है। मजबूत खाद्यान्न उपलब्धता और कृषि उत्पादन को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में झटके और रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव महंगाई पर दबाव बना सकते हैं। यही कारण है कि केंद्रीय बैंक ने ऊपर की तरफ जोखिम बने रहने की बात भी कही है। दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर महंगाई दर 4.4 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जो पहले के अनुमान से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि दुनिया के कई देशों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखना अभी भी चुनौती बना रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि क्षेत्र को लेकर रिपोर्ट में मॉनसून की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। भारत की खेती अब भी काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। आरबीआई ने कहा है कि अल नीनो की स्थिति इस वर्ष बारिश को प्रभावित कर सकती है, जिससे कृषि उत्पादन पर दबाव बन सकता है। हालांकि वर्ष के उत्तरार्ध में इंडियन ओशन डिपोल के अनुकूल रहने की संभावना से राहत मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा नए लेबर कोड को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार श्रम सुधारों से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं और उत्पादकता में सुधार आने की संभावना है। इससे लोगों की आय और खर्च करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा लाभ अर्थव्यवस्था को मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र के बारे में भी रिपोर्ट आश्वस्त करने वाली है। आरबीआई का कहना है कि सेवाओं के निर्यात, विदेशों से आने वाली रेमिटेंस और विभिन्न देशों के साथ हुए व्यापार समझौते भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती देंगे। बैंकिंग सिस्टम को लेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय बैंक पर्याप्त पूंजी और मजबूत वित्तीय स्थिति के साथ काम कर रहे हैं। यही वजह है कि किसी संभावित वैश्विक वित्तीय झटके का सामना करने की उनकी क्षमता पहले की तुलना में अधिक मजबूत मानी जा रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता और निवेशकों की बदलती धारणा निकट भविष्य में कुछ चुनौतियां जरूर पैदा कर सकती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
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