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                <title>LegalNews - दैनिक जागरण</title>
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                            <item>
                <title>हनीमून मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने सोनम रघुवंशी की जमानत पर रोक से किया इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[मेघालय सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल जरूर उठाए, लेकिन पहले से रिहा हो चुकी सोनम की जमानत तत्काल रद्द करने से इनकार किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/honeymoon-murder-case-supreme-court-refuses-to-stay-bail-of/article-57833"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sonam-raghuvanshi.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">राजा रघुवंशी हत्याकांड में आरोपी सोनम रघुवंशी को मिली जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मेघालय सरकार ने इस मामले में मेघालय हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत सोनम को जमानत दी गई थी। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले के कुछ पहलुओं पर सवाल जरूर उठाए, लेकिन यह भी माना कि सोनम पहले ही जेल से रिहा हो चुकी हैं और ट्रायल कोर्ट की ओर से तय की गई शर्तों का पालन करते हुए फिलहाल शिलांग में रह रही हैं। अदालत ने फिलहाल उनकी जमानत रद्द करने या उस पर रोक लगाने का कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया। यह मामला वर्ष 2025 में सामने आए चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड से जुड़ा है। आरोप है कि मेघालय में हनीमून के दौरान राजा रघुवंशी की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में उनकी पत्नी सोनम रघुवंशी, उनके कथित प्रेमी और अन्य आरोपियों को जांच के बाद गिरफ्तार किया गया था। इस केस ने देशभर में काफी सुर्खियां बटोरी थीं और जांच एजेंसियों की कार्रवाई लगातार चर्चा में रही।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और निचली अदालतों ने पहले ही सोनम के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार पाए थे। उन्होंने अदालत को बताया कि सोनम की जमानत याचिका पहले तीन बार खारिज हो चुकी थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि जांच के दौरान इस बात की आशंका जताई गई थी कि यदि उन्हें राहत दी जाती है तो वह फरार हो सकती हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं या साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकती हैं। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को लेकर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। जस्टिस एमएम सुंदरेश ने सुनवाई के दौरान पूछा कि यदि पहले तथ्यों के आधार पर जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं, तो बाद में केवल तकनीकी आधार पर राहत देना किस हद तक उचित माना जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहली नजर में हाई कोर्ट के आदेश के कुछ पहलुओं पर अदालत की आपत्तियां हैं। हालांकि पीठ ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि सोनम पहले ही रिहा हो चुकी हैं और फिलहाल अदालत द्वारा तय सभी शर्तों का पालन कर रही हैं। ऐसे में तत्काल उनकी जमानत पर रोक लगाने की जरूरत नहीं समझी गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया है और आगे विस्तृत सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया जाएगा।</p>
<p>इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू गिरफ्तारी के दौरान दर्ज की गई कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा रहा। रिकॉर्ड के अनुसार सोनम रघुवंशी को 27 अप्रैल को जमानत मिली थी और इस फैसले में गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेजों में हुई एक गंभीर त्रुटि अहम कारण बनी। मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103 के तहत दर्ज किया गया था, जो हत्या के अपराध से संबंधित है। लेकिन जब सोनम को गिरफ्तारी के आधार बताए गए तो दस्तावेजों में बीएनएस की धारा 403(1) का उल्लेख किया गया। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि बीएनएस में धारा 403(1) का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जांच में यह भी सामने आया कि यही त्रुटि केवल एक दस्तावेज तक सीमित नहीं थी, बल्कि गिरफ्तारी मेमो, गिरफ्तारी चेकलिस्ट, निरीक्षण मेमो, अधिकारों की जानकारी से जुड़े रिकॉर्ड और केस डायरी सहित कई दस्तावेजों में दोहराई गई थी। हाई कोर्ट ने माना था कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों और गिरफ्तारी के वास्तविक आधार की स्पष्ट जानकारी देना उसका संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि यह केवल क्लर्क की साधारण गलती थी। हाई कोर्ट का मानना था कि कई दस्तावेजों में एक जैसी त्रुटि होना गंभीर प्रक्रिया संबंधी कमी को दर्शाता है। इसी आधार पर सोनम को जमानत दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट इस आदेश की वैधता और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं की विस्तार से समीक्षा करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:51:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>14 लाख सालाना कमाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है, आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को इसका लाभ नहीं दिया जा सकता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wife-earning-rs-14-lakh-annually-will-not-get-maintenance/article-56792"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/maintenance-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से सक्षम और स्वयं पर्याप्त आय अर्जित करने वाले जीवनसाथी को अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) का लाभ नहीं दिया जा सकता। भोपाल निवासी एक महिला द्वारा पति से अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मांग प्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में वर्णित “एक पाउंड मांस” की मांग जैसी प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ में हुई। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तलाक से जुड़े लंबित मामले के दौरान अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और आय संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही माना और महिला की याचिका खारिज कर दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रकरण के अनुसार दंपति का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और वर्ष 2023 से वे अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद पत्नी ने अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की थी। सुनवाई के दौरान महिला ने स्वीकार किया कि वह एक निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और नियमित वेतन प्राप्त करती हैं। प्रारंभिक चरण में महिला ने अपनी वार्षिक आय करीब 20 लाख रुपए बताई थी, जबकि पति की आय 30 लाख रुपए से अधिक होने का दावा किया गया था। बाद में महिला की ओर से कहा गया कि उनकी आय में कमी आई है और वर्तमान में वह लगभग 14 लाख रुपए सालाना कमा रही हैं। इसी आधार पर उन्होंने आर्थिक सहायता की मांग की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि अदालत ने केवल मौखिक दावों पर भरोसा नहीं किया बल्कि वेतन संबंधी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि महिला की मासिक आय लगभग 1.25 लाख रुपए है। इस हिसाब से उनकी वार्षिक आय करीब 14.81 लाख रुपए बैठती है। न्यायालय ने माना कि यह आय किसी भी व्यक्ति के सामान्य जीवन-यापन और व्यक्तिगत खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य ऐसे जीवनसाथी को आर्थिक सहायता प्रदान करना है जो स्वयं अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो या आर्थिक रूप से दूसरे पक्ष पर निर्भर हो। यदि कोई व्यक्ति अच्छी आय अर्जित कर रहा है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है तो उसे केवल इस आधार पर मेंटिनेंस नहीं दिया जा सकता कि दूसरे पक्ष की आय उससे अधिक है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दंपति की कोई संतान नहीं है, जिसकी देखभाल का अतिरिक्त वित्तीय भार महिला पर हो। इसके अलावा पति और पत्नी की आय में भी इतना अधिक अंतर नहीं पाया गया जिससे आर्थिक निर्भरता या असमानता का गंभीर आधार बन सके। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण का प्रावधान किसी आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने के लिए नहीं बनाया गया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का उल्लेख भी किया। अदालत ने कहा कि जिस प्रकार नाटक में एक पाउंड मांस की मांग कानूनी और नैतिक सीमाओं के कारण पूरी नहीं की जा सकती थी, उसी तरह वर्तमान मामले में भी कानून की भावना के विपरीत जाकर राहत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा बन गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, जहां दोनों पक्ष आर्थिक रूप से सक्षम हों और फिर भी भरण-पोषण की मांग की जा रही हो। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसकी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंततः हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के 18 फरवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखा। न्यायालय ने दोहराया कि मेंटिनेंस का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है। यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त आय अर्जित कर रहा है और अपना खर्च स्वयं वहन करने में सक्षम है, तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 13:29:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>12 साल पुराने सरपंच आत्महत्या मामले में ठेकेदार बरी, हाईकोर्ट ने 7 साल की सजा रद्द की</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि उधार दी गई रकम की मांग करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर नहीं है। अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/contractor-acquitted-in-12-year-old-sarpanch-suicide-case-high/article-56714"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh1.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 12 वर्ष पुराने एक चर्चित आत्महत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी ठहराए गए ठेकेदार की सात साल की सजा रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को उधार दी गई राशि वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या भुगतान के लिए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना अपने आप में आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला धमतरी जिले के बलियारा गांव का है, जहां जून 2014 में तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी का शव खेत में मिला था। जांच के दौरान यह सामने आया कि उन्होंने कथित रूप से कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या की थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में एक ठेकेदार का नाम दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">मृतक के परिजनों का आरोप था कि चौपाल निर्माण कार्य में उपयोग की गई सामग्री के भुगतान को लेकर आरोपी लगातार दबाव बना रहा था और मूल राशि से अधिक रकम की मांग कर रहा था। उनका कहना था कि इसी मानसिक दबाव के कारण सरपंच ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का दोषी मानते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।</p>
<h2>हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी</h2>
<p class="isSelectedEnd">अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकलपीठ ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और पूर्व न्यायिक निर्णयों का अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया या प्रेरित किया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">अदालत ने अपने आदेश में कहा कि लेनदार को अपनी राशि वापस मांगने का वैध अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति भुगतान के लिए संपर्क करता है या कानूनी विकल्प अपनाने की बात करता है तो इसे आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण साबित करने के लिए प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं।</p>
<h2>आर्थिक संकट भी बना कारण</h2>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि मृतक ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए बैंक से ऋण लिया था। ऋण की किस्तें जमा नहीं होने पर बैंक ने ट्रैक्टर जब्त कर उसकी नीलामी कर दी थी। रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख था कि बैंक का बकाया भुगतान मृतक पर लंबित था।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट ने माना कि आर्थिक संकट, बैंक का दबाव और संपत्ति जब्त होने जैसी परिस्थितियां भी व्यक्ति के मानसिक तनाव का कारण बन सकती हैं। इसलिए केवल आरोपी द्वारा पैसे मांगने को आत्महत्या का सीधा कारण नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd">अदालत ने एससी-एसटी एक्ट से जुड़े आरोपों पर भी विचार किया। फैसले में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि मृतक को उसकी जातीय पहचान के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित किया गया था। इसलिए इस कानून के तहत लगाए गए आरोप भी टिक नहीं सके।</p>
<p>सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी अशोक कुमार वाधवानी को दोषमुक्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा रद्द कर दी। साथ ही मृतक पक्ष की ओर से सजा बढ़ाने और एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग वाली अपील भी खारिज कर दी गई। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की आवश्यकता और कानूनी मानकों को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:44:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दैनिक जागरण]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[याचिका में कहा गया- आधार केवल पहचान का दस्तावेज, नागरिकता, निवास और जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करना कानून के खिलाफ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/question-on-considering-aadhaar-as-proof-of-citizenship-supreme-court/article-56124"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/aadhaar-card.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश में आधार कार्ड के इस्तेमाल को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि आधार कार्ड का उपयोग केवल पहचान साबित करने के लिए किया जाए और इसे नागरिकता, निवास, पते या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए। अदालत के इस कदम ने आधार की कानूनी स्थिति और उसके विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में उपयोग को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने की। याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 स्पष्ट रूप से बताती है कि आधार संख्या किसी व्यक्ति को नागरिकता या निवास का अधिकार प्रदान नहीं करती और न ही इसे नागरिकता या डोमिसाइल का प्रमाण माना जा सकता है। याचिकाकर्ता ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) की अगस्त 2023 की अधिसूचना का भी उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया था कि आधार केवल पहचान का प्रमाण है, न कि नागरिकता, पते या जन्मतिथि का प्रमाण।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून और अधिसूचनाओं में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद देश के कई हिस्सों में आधार कार्ड को उम्र, निवास और नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इसके तहत स्कूलों में प्रवेश, संपत्ति की खरीद-बिक्री, जन्म प्रमाण पत्र बनवाने, राशन कार्ड हासिल करने और ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने जैसी प्रक्रियाओं में आधार का उपयोग किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे कानून की मूल भावना प्रभावित हो रही है और आधार की सीमाओं का उल्लंघन हो रहा है। याचिका में विशेष रूप से नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 का भी उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि इस फॉर्म में आधार को जन्मतिथि और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) के तहत आधार का उपयोग केवल पहचान स्थापित करने के लिए किया जा सकता है, न कि उम्र या निवास साबित करने के लिए। इसलिए फॉर्म-6 में इस तरह का उपयोग कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आधार कार्ड प्राप्त करने के लिए भारतीय नागरिक होना आवश्यक नहीं है। आधार अधिनियम के अनुसार कोई भी निवासी, जिसने एक निर्धारित अवधि तक भारत में निवास किया हो, आधार संख्या प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने चिंता जताई है कि विदेशी नागरिक, अवैध प्रवासी या घुसपैठिए भी आधार प्राप्त कर सकते हैं और बाद में अन्य दस्तावेज हासिल करने में इसका उपयोग कर सकते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि इसी प्रक्रिया के जरिए कुछ लोग मतदाता पहचान पत्र और अन्य सरकारी दस्तावेज प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता ने अदालत से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की है कि आधार कार्ड को केवल पहचान के दस्तावेज के रूप में ही इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार करने की व्यवस्था को भी रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था आधार अधिनियम, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 14 की भावना के विपरीत है। मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार अवैध आव्रजन और घुसपैठ का असर चुनावी व्यवस्था, जनसांख्यिकीय संतुलन और सुरक्षा संबंधी मामलों पर पड़ सकता है। इसी कारण आधार के उपयोग की सीमा को स्पष्ट रूप से तय करना जरूरी है। हालांकि इन दावों पर अंतिम निर्णय अभी अदालत को करना है और केंद्र तथा राज्यों के जवाब के बाद ही मामले की विस्तृत सुनवाई आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस मामले पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले समय में अदालत का फैसला आधार कार्ड के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है। यह मामला केवल एक दस्तावेज के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि पहचान, नागरिकता, चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने ला रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>6 साल की देरी को हाईकोर्ट ने बताया प्रताड़ना, महिला पत्रकार को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[जांच और चार्जशीट में अनुचित देरी को अदालत ने प्रताड़ना माना, कहा- यह अनुच्छेद 21 के तहत मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a311c93a2d3f/article-56093"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि बिना किसी ठोस वजह के किसी आपराधिक मामले की जांच और चार्जशीट दाखिल करने में छह साल से ज्यादा की देरी करना आरोपी को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महिला पत्रकार श्रिया पांडेय के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट दोनों को निरस्त कर दिया। मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य की एजेंसियां किसी भी नागरिक को अनिश्चितकाल तक आपराधिक मुकदमे की तलवार के नीचे नहीं रख सकतीं। यदि जांच एजेंसी समय पर कार्रवाई नहीं करती और उसके पास देरी का कोई उचित कारण भी नहीं है, तो यह न्याय प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">यह मामला साल 2018 का है। याचिकाकर्ता श्रिया पांडेय उस समय बिलासपुर में एक न्यूज चैनल में रिपोर्टर के रूप में काम कर रही थीं। जून 2018 में पुलिसकर्मियों का आंदोलन चल रहा था। इसी दौरान यह सूचना मिली कि आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नी को महिला थाने में बैठाया गया है। खबर की पुष्टि करने और जानकारी लेने के लिए श्रिया पांडेय अपनी टीम के साथ देर रात महिला थाना पहुंचीं। आरोप है कि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने सहयोग करने के बजाय उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा डालने, पुलिसकर्मियों से मारपीट करने और मिलीभगत जैसे आरोप लगाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 186, 353, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया। पत्रकार का कहना था कि वह केवल एक रिपोर्टर के तौर पर तथ्य जुटाने गई थीं और उनके खिलाफ दर्ज मामला पुलिस की नाराजगी का परिणाम था।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">इस कार्रवाई के खिलाफ श्रिया पांडेय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि घटना जून 2018 की है, जबकि पुलिस ने चार्जशीट नवंबर 2024 में पेश की। यानी जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में छह साल से अधिक का समय लग गया। अदालत ने जब इस देरी का कारण पूछा तो पुलिस विभाग की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केस डायरी और चार्जशीट का अवलोकन करने से स्पष्ट होता है कि पूरा मामला केवल पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े गवाहों के बयानों पर आधारित है। घटना स्थल पर मौजूद किसी स्वतंत्र गवाह का बयान रिकॉर्ड नहीं किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि गवाहों के बयानों में आपसी विरोधाभास है और महिला पत्रकार के खिलाफ किसी भी अपराध का प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।</p>
<p class="zlAe0W_TextBase zlAe0W_Text" style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने यह भी माना कि लंबी देरी के कारण आरोपी को मानसिक और पेशेवर दोनों तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। खासतौर पर जब मामला किसी पत्रकार से जुड़ा हो, तो इसका असर उसकी प्रतिष्ठा और कामकाज पर भी पड़ता है। यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आपराधिक न्याय व्यवस्था में समयबद्ध जांच और अभियोजन की आवश्यकता पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि राज्य की जांच एजेंसियां अनिश्चितकाल तक मामलों को लंबित नहीं रख सकतीं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय की संवैधानिक जिम्मेदारी है। पत्रकार संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय उन मामलों में मिसाल बन सकता है जहां पत्रकारों या आम नागरिकों पर लंबे समय तक मुकदमे लटकाकर दबाव बनाया जाता है। अदालत के इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ है कि केवल पुलिस के बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य भी आवश्यक हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 15:27:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में आज से नियमित सुनवाई शुरू, सभी बेंचें करेंगी काम</title>
                                    <description><![CDATA[समर वेकेशन समाप्त होने के बाद जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में फिर शुरू होगा नियमित न्यायिक कार्य, प्रशासनिक बदलावों की भी चर्चा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/somvati-amavasya-today-a-rare-coincidence-of-amrit-siddhi-yoga/article-55957"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/madhya-pradesh-high-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक महीने के ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद सोमवार से नियमित न्यायिक कार्य फिर शुरू हो गया है। जबलपुर स्थित मुख्यपीठ के साथ-साथ इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में भी सभी नियमित बेंचें अब पूर्व की तरह मामलों की सुनवाई करेंगी। लंबे अवकाश के बाद अदालतों में एक बार फिर सामान्य गतिविधियां लौटने से वकीलों, पक्षकारों और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है। पिछले एक महीने के दौरान केवल जरूरी और अत्यावश्यक मामलों की ही सुनवाई हो रही थी, जबकि बड़ी संख्या में नियमित मामलों की सुनवाई अवकाश समाप्त होने का इंतजार कर रही थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस वर्ष हाईकोर्ट का समर वेकेशन 16 मई से शुरू होकर 14 जून तक चला। इस दौरान अदालत पूरी तरह बंद नहीं रही बल्कि विशेष व्यवस्था के तहत वेकेशन बेंचों का गठन किया गया था। इन बेंचों ने आवश्यक मामलों पर सुनवाई जारी रखी। हालांकि नियमित मामलों की संख्या काफी अधिक होने के कारण बड़ी संख्या में प्रकरण लंबित रहे, जिनकी सुनवाई अब शुरू होगी। न्यायिक हलकों में माना जा रहा है कि अवकाश के बाद शुरुआती दिनों में अदालतों में मामलों की संख्या सामान्य से अधिक रह सकती है क्योंकि बड़ी संख्या में लंबित याचिकाएं और अपीलें सूचीबद्ध की जाएंगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बार समर वेकेशन के दौरान सुनवाई की व्यवस्था भी कुछ अलग रही। आमतौर पर ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान वेकेशन बेंच सप्ताह में केवल दो दिन बैठती थी, लेकिन न्यायिक कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के उद्देश्य से इस बार नई व्यवस्था लागू की गई। विशेष बेंचों ने सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को सुनवाई की। अधिकारियों के अनुसार इस व्यवस्था का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला और कई अर्जेंट मामलों का समय पर निराकरण हो सका। साथ ही लंबित मामलों के दबाव को भी कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई की शुरुआत ऐसे समय हो रही है जब न्यायिक प्रशासन में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने के बाद हाईकोर्ट की जिम्मेदारी फिलहाल एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया संभाल रहे हैं। उनके नेतृत्व में अब नियमित बेंचों का संचालन किया जाएगा। न्यायिक समुदाय की नजरें इस बात पर भी टिकी हुई हैं कि आने वाले दिनों में प्रशासनिक स्तर पर क्या बदलाव किए जाते हैं और न्यायिक व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कौन से कदम उठाए जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंदौर खंडपीठ में भी जल्द प्रशासनिक फेरबदल देखने को मिल सकता है। इंदौर खंडपीठ के प्रशासनिक न्यायाधीश जस्टिस विजय कुमार शुक्ला इस महीने के अंत में सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। उनकी सेवानिवृत्ति से पहले और उसके बाद न्यायिक जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। न्यायिक सूत्रों का कहना है कि मुख्यपीठ से किसी वरिष्ठ न्यायाधीश को इंदौर भेजा जा सकता है ताकि प्रशासनिक कार्यों में निरंतरता बनी रहे। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस सुबोध अभ्यंकर के नाम संभावित प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए चर्चा में हैं। यदि ऐसा होता है तो इंदौर खंडपीठ के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव देखने को मिल सकता है। न्यायिक हलकों का मानना है कि प्रशासनिक पदों पर अनुभवी न्यायाधीशों की नियुक्ति से मामलों के प्रबंधन और न्यायिक कार्यों के संचालन में गति आएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने एक बड़ी चुनौती न्यायाधीशों के रिक्त पदों की भी है। वर्तमान में हाईकोर्ट में कुल 53 न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन सभी पद भरे नहीं हैं। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की सेवानिवृत्ति के बाद कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या और कम होकर 37 रह जाएगी। इसका मतलब है कि कुल 16 पद रिक्त हो जाएंगे। न्यायिक विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायाधीशों की कमी का सीधा असर मामलों के निपटारे की गति पर पड़ता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पहले से ही बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। ऐसे में रिक्त पदों को जल्द भरना आवश्यक माना जा रहा है।  यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं तो लंबित मामलों का बोझ और बढ़ सकता है। वहीं दूसरी ओर अदालतों में तकनीकी सुधार, ई-कोर्ट व्यवस्था और बेहतर केस मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए भी लंबित मामलों को कम करने की कोशिशें जारी हैं। समर वेकेशन समाप्त होने के साथ ही हाईकोर्ट की सभी नियमित बेंचों में कामकाज सामान्य हो गया है। पक्षकारों को अब अपने मामलों की सुनवाई के लिए नई तारीखों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और नियमित न्यायिक प्रक्रिया फिर से गति पकड़ती दिखाई दे रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 12:41:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वायरल गर्ल की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई, 23 जून तक टली सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[दस्तावेजों में कथित हेरफेर और उम्र विवाद से जुड़े मामले में कोर्ट ने कमियां दूर करने के लिए दिया समय]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/hearing-on-viral-girls-petition-postponed-in-high-court-till/article-55801"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/viral-girl.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">इंदौर हाईकोर्ट में शुक्रवार को सोशल मीडिया पर चर्चित ‘वायरल गर्ल’ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई हुई। मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उनके जन्म संबंधी दस्तावेजों में हेरफेर कर उनकी वैध शादी को अवैध साबित करने की कोशिश की गई है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से याचिका में कई त्रुटियों और दस्तावेजों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कमियां दूर करने के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 23 जून को तय की है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, याचिका में दावा किया गया है कि वायरल गर्ल के पिता ने जन्म रिकॉर्ड में बदलाव कर उन्हें नाबालिग दिखाने का प्रयास किया। याचिकाकर्ता का कहना है कि उनके छोटे भाई के दस्तावेजों को उनका बताकर रिकॉर्ड में गलत जानकारी प्रस्तुत की गई। उनका आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य उनकी उम्र को लेकर भ्रम पैदा करना और विवाह की वैधता पर सवाल खड़े करना था। इसी आधार पर हाईकोर्ट से रिकॉर्ड की जांच और कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष पड़ताल की मांग की गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला उस समय ज्यादा चर्चा में आया जब वायरल गर्ल के विवाह को लेकर उम्र संबंधी विवाद सामने आया। बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने के बाद उन्हें फिल्मों में काम करने के अवसर मिले थे। इसी दौरान केरल में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात एक युवक से हुई। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और मार्च 2026 में उन्होंने विवाह कर लिया। शादी के बाद यह मामला सार्वजनिक बहस का विषय बन गया और उम्र को लेकर कई तरह के दावे सामने आने लगे। विवाद तब और गहरा गया जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने विवाह के समय वायरल गर्ल की उम्र लगभग 16 वर्ष होने की आशंका जताई। इसके बाद मामले ने कानूनी मोड़ ले लिया। खरगोन पुलिस ने संबंधित युवक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। इसी कार्रवाई के बाद उम्र से जुड़े दस्तावेजों की जांच और उनकी प्रमाणिकता को लेकर सवाल उठने लगे। अब यही मुद्दा हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी कहा गया है कि विवाह को लेकर सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी फैलाई गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उनके निजी मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई और विभिन्न प्लेटफॉर्म पर गलत तथ्यों के आधार पर प्रचार किया गया। दंपति का कहना है कि इससे उनकी सामाजिक छवि प्रभावित हुई और उन्हें अनावश्यक विवादों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि उनके जन्म प्रमाण पत्र को मूल स्वरूप में बहाल किया जाए और रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ की स्वतंत्र जांच कराई जाए। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान वायरल गर्ल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता पी.वी. दिनेश वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए। दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से याचिका की तकनीकी कमियों और दस्तावेजों की प्रतियों को लेकर सवाल उठाए गए। सरकारी पक्ष ने विशेष रूप से जन्म प्रमाण पत्र की प्रस्तुत प्रतिलिपि पर आपत्ति दर्ज कराई और रिकॉर्ड की स्पष्टता को लेकर अपनी बात रखी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने जन्म प्रमाण पत्र की मूल प्रति भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की। इसके बाद कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिकाकर्ता के वकीलों को याचिका में मौजूद कमियां दूर करने और जन्म प्रमाण पत्र की स्पष्ट एवं पठनीय प्रति रिकॉर्ड पर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। इसके लिए 10 दिन का समय दिया गया है। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। कोर्ट का ध्यान अभी याचिका की प्रक्रियात्मक कमियों को दूर कराने पर केंद्रित है। ऐसे में अब सभी की नजर 23 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि उस दिन दस्तावेजों और उम्र विवाद से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर आगे की सुनवाई हो सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 12:39:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रिटायर जज गौतम पटेल का दावा, फैसले के बाद परिवार को मिल रहीं धमकियां</title>
                                    <description><![CDATA[दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद से जुड़े फैसले के बाद बढ़ी चिंता, लंदन में बेटी पर हमले और धमकी भरे पत्र का मामला सामने आया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/retired-judge-gautam-patel-claims-family-is-receiving-threats-after/article-55450"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/justice-gautam-patel.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मुंबई से सामने आए एक गंभीर घटनाक्रम ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। बॉम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस गौतम पटेल ने दावा किया है कि पिछले करीब दस महीनों से उन्हें और उनके परिवार को लगातार धमकियां मिल रही हैं। उनका कहना है कि यह पूरा मामला दाऊदी बोहरा समुदाय के उत्तराधिकार विवाद पर उनके द्वारा दिए गए एक फैसले से जुड़ा हुआ है। हालात तब और गंभीर हो गए जब उनकी बेटी पर लंदन में हमला हुआ और उसके बाद एक और धमकी भरा पत्र मिलने की बात सामने आई।</p>
<p class="isSelectedEnd">जानकारी के मुताबिक जस्टिस गौतम पटेल ने अगस्त 2024 में दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े लंबे समय से चल रहे उत्तराधिकार विवाद पर फैसला सुनाया था। इस फैसले में सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन को समुदाय का वैध 53वां दाई-अल-मुतलक माना गया था। यह विवाद कई वर्षों से कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रहा था और इसे समुदाय के भीतर सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक माना जाता रहा है। फैसला आने के बाद मामला शांत होने की उम्मीद थी, लेकिन अब पूर्व न्यायाधीश का दावा है कि इसके बाद से ही उन्हें और उनके परिवार को धमकी भरे संदेश मिलने शुरू हो गए थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">बताया जा रहा है कि सितंबर 2025 में उन्हें एक पत्र मिला था, जिसमें फैसले को वापस लेने और सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करने की मांग की गई थी कि फैसला दबाव में दिया गया था। जस्टिस पटेल के अनुसार उनसे यह भी कहा गया कि वे एक वीडियो रिकॉर्ड कर अपने निर्णय को गलत बताएं। हालांकि उन्होंने ऐसी किसी भी मांग को मानने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत दिया गया फैसला किसी व्यक्तिगत बयान या वीडियो के जरिए बदला नहीं जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला उस समय और ज्यादा गंभीर हो गया जब 22 अप्रैल 2026 को उनकी बेटी अदिति पटेल पर लंदन में हमला हुआ। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक अदिति अपने बच्चे को स्कूल छोड़कर लौट रही थीं। इसी दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने पीछे से उन पर हमला कर दिया। हमले में उनकी नाक की हड्डी टूट गई और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने जांच शुरू की। बताया जा रहा है कि जांच एजेंसियां पहले से मिल रही धमकियों और इस हमले के बीच किसी संभावित संबंध की भी पड़ताल कर रही हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">जस्टिस पटेल ने दावा किया है कि 5 जून को उनकी बेटी को एक और गुमनाम पत्र मिला। इस पत्र में कथित तौर पर चेतावनी दी गई थी कि यदि उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपना फैसला वापस नहीं लिया तो उनके पूरे परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। पत्र के साथ एक एसडी कार्ड भी भेजा गया था। इसमें यह भी कहा गया था कि कथित रूप से कुछ लोगों को इस काम के लिए नियुक्त किया गया है। इस पत्र के बाद परिवार की चिंता और बढ़ गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन घटनाओं के बाद अदिति पटेल और उनके पति ने ब्रिटेन की पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। बताया जा रहा है कि वेस्ट हर्टफोर्डशायर की आतंकवाद विरोधी इकाई भी मामले की समीक्षा कर रही है। जांच एजेंसियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह केवल धमकी का मामला है या इसके पीछे कोई संगठित साजिश भी हो सकती है। फिलहाल अधिकारियों ने जांच जारी होने का हवाला देते हुए अधिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पूर्व न्यायाधीश ने कहा है कि उन्होंने इस पूरे मामले की जानकारी भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के संबंधित अधिकारियों को दे दी है। उन्होंने भारतीय उच्चायोग, बॉम्बे हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी मामले से अवगत कराया है। उनका कहना है कि वह अप्रैल 2024 से सेवानिवृत्त हैं और किसी भी न्यायिक फैसले को यूट्यूब वीडियो या सार्वजनिक बयान के माध्यम से बदला नहीं जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह की घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती है तो यह संस्थागत व्यवस्था के लिए चिंता का विषय होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">उधर इस मामले के सामने आने के बाद कानूनी समुदाय ने भी चिंता जताई है। बॉम्बे बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित कर जस्टिस पटेल और उनके परिवार को दी जा रही धमकियों की निंदा की है। संगठन ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से भी इस मुद्दे को ब्रिटेन सरकार के समक्ष उठाने की मांग की है ताकि परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। वहीं सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि दाऊदी बोहरा समुदाय हमेशा शांति, सहिष्णुता और कानून के सम्मान में विश्वास रखता है। बयान में न्यायपालिका को प्रभावित करने या किसी प्रकार की धमकी का समर्थन करने से स्पष्ट रूप से इनकार किया गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:41:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को 3 साल की सजा, एमपी-एमएलए कोर्ट से जमानत मिली, एफडी हेराफेरी केस में दोषी</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को एफडी हेराफेरी मामले में तीन साल की सजा मिली, एमपी-एमएलए कोर्ट के फैसले से विधायकी पर संकट गहराया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/congress-mla-rajendra-bharti-sentenced-to-3-years-gets-bail/article-49954"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/mp-mla-rajendra-bharti-court-verdict.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को 27 साल पुराने एफडी हेराफेरी मामले में एमपी-एमएलए कोर्ट ने दोषी करार दिया है। अदालत ने उन्हें तीन साल की सजा सुनाई और जमानत भी प्रदान की। यह मामला दतिया जिले के सहकारी ग्रामीण विकास बैंक से जुड़ा है। फैसले के बाद उनकी विधायकी पर संकट गहरा गया है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालत ने उन्हें धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश की धाराओं में दोषी माना है। सह-आरोपी बैंक लिपिक रघुवीर प्रजापति को भी समान रूप से दोषी ठहराया गया है। कोर्ट ने अलग-अलग धाराओं में 3-3 साल और 2 साल की सजा सुनाई है। कानूनी प्रावधानों के अनुसार, दो साल या उससे अधिक की सजा पर विधायकी स्वतः समाप्त हो सकती है। हालांकि, कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को हाईकोर्ट में अपील का अवसर मिलेगा। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">एफडी हेराफेरी मामला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यह पूरा मामला वर्ष 1998 से 2001 के बीच का बताया जा रहा है। आरोप है कि श्याम सुंदर संस्थान की ओर से दतिया सहकारी ग्रामीण विकास बैंक में 10 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई गई थी। उसी दौरान राजेंद्र भारती बैंक के संचालक मंडल से जुड़े हुए थे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">आरोपों के मुताबिक, बैंक रिकॉर्ड में कूटरचना कर एफडी की अवधि को 3 साल से बढ़ाकर 15 साल कर दिया गया। इसके बाद सालाना 13.5 प्रतिशत की दर से ब्याज निकालकर लगभग 1.35 लाख रुपये की राशि कई वर्षों तक प्राप्त की गई। जांच में इसे वित्तीय अनियमितता और धोखाधड़ी माना गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">जांच और कानूनी प्रक्रिया</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2011 में तत्कालीन बैंक अध्यक्ष ने इस मामले को उजागर किया था। इसके बाद सहकारिता विभाग ने जांच कराई, जिसमें ऑडिट आपत्तियां सामने आईं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">2015 में तत्कालीन कलेक्टर की पहल पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ और IPC की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया। मामला बाद में एमपी-एमएलए कोर्ट में स्थानांतरित किया गया। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने अब अपना फैसला सुनाया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालत का निर्णय और प्रभाव</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अदालत ने धोखाधड़ी (धारा 420), जालसाजी (धारा 467, 468, 471) और आपराधिक साजिश (धारा 120B) में दोष सिद्ध किया है। राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा सुनाई गई है, हालांकि उन्हें जमानत भी मिल गई है ताकि वे उच्च न्यायालय में अपील कर सकें।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">अधिकारियों के अनुसार, यदि सजा पर स्टे नहीं मिलता है, तो उनकी विधायकी स्वतः समाप्त हो सकती है। इससे संबंधित क्षेत्र में उपचुनाव की संभावना भी बन सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">आगे क्या होगा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती अब इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में हैं। उनके परिवार के अनुसार, वे कानूनी विकल्पों का उपयोग करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रहेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">यदि उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलती है, तो उनकी विधानसभा सीट रिक्त घोषित की जा सकती है और चुनाव आयोग उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।</span></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">कुल मिलाकर यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम हो गया है, जहां कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी पर अब बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 16:08:11 +0530</pubDate>
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