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                <title>Forest Department - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Forest Department RSS Feed</description>
                
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                <title>मझगवां अस्पताल के डॉक्टर कक्ष में घुसा जहरीला सांप, वन विभाग ने रेस्क्यू कर टाला बड़ा हादसा</title>
                                    <description><![CDATA[सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सांप दिखते ही मरीजों और स्टाफ में मची अफरातफरी, वन विभाग की टीम ने सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/vindhya-rewa/a-poisonous-snake-entered-the-doctors-room-of-majhgawan-hospital/article-58333"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/majhgawan-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">जिले के मझगवां स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उस समय अफरातफरी का माहौल बन गया, जब अस्पताल के डॉक्टर कक्ष के भीतर एक जहरीला सांप दिखाई दिया। सांप को देखते ही अस्पताल में मौजूद मरीज, उनके परिजन और स्वास्थ्य कर्मियों में दहशत फैल गई। कुछ देर के लिए अस्पताल परिसर में हड़कंप जैसी स्थिति बन गई और लोग सुरक्षित स्थानों की ओर हटने लगे। सूचना मिलते ही वन विभाग की रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और सावधानीपूर्वक सांप को पकड़कर सुरक्षित जंगल में छोड़ दिया। समय रहते की गई इस कार्रवाई से एक संभावित बड़ा हादसा टल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुबह अस्पताल की नियमित गतिविधियां चल रही थीं। मरीज उपचार के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, जबकि डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी अपने कार्य में व्यस्त थे। इसी दौरान डॉक्टर कक्ष में अचानक एक जहरीला सांप दिखाई दिया। जैसे ही इसकी जानकारी अस्पताल के कर्मचारियों को मिली, उन्होंने तत्काल कमरे को खाली कराया और मरीजों को भी सुरक्षित दूरी पर रहने की सलाह दी।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ ही मिनटों में यह खबर पूरे अस्पताल परिसर में फैल गई। कई मरीज और उनके परिजन घबराकर अस्पताल के बाहर निकल आए। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने स्थिति को शांत बनाए रखने की कोशिश की और किसी भी प्रकार की अफवाह फैलने से रोका। इसके बाद तुरंत वन विभाग को सूचना दी गई। सूचना मिलने पर वन विभाग की रेस्क्यू टीम बिना देर किए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंची। टीम के सदस्य विनोद पाण्डेय और लखन यादव ने पूरे क्षेत्र का निरीक्षण किया और सांप की गतिविधियों पर नजर रखी। काफी सावधानी और अनुभव के साथ उन्होंने सांप को सुरक्षित तरीके से पकड़ लिया। रेस्क्यू के दौरान यह सुनिश्चित किया गया कि न तो किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचे और न ही सांप को किसी प्रकार की चोट आए।</p>
<p style="text-align:justify;">रेस्क्यू टीम ने बताया कि सांप जहरीली प्रजाति का था। यदि समय रहते उसे नहीं पकड़ा जाता तो अस्पताल में मौजूद लोगों के लिए खतरा बढ़ सकता था। सांप को पकड़ने के बाद उसे सुरक्षित कंटेनर में रखा गया और वन क्षेत्र में ले जाकर प्राकृतिक वातावरण में छोड़ दिया गया। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि बरसात के मौसम में इस तरह की घटनाएं बढ़ जाती हैं। लगातार बारिश के कारण बिलों और झाड़ियों में रहने वाले सांप सुरक्षित स्थानों की तलाश में आबादी वाले इलाकों, मकानों, स्कूलों और सरकारी भवनों तक पहुंच जाते हैं। अस्पताल, जहां हर समय बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहते हैं, वहां इस प्रकार की घटनाओं को गंभीरता से लेना जरूरी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अस्पताल प्रशासन ने वन विभाग की त्वरित कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि यदि रेस्क्यू टीम समय पर नहीं पहुंचती तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी। कर्मचारियों ने भी राहत की सांस ली कि बिना किसी नुकसान के पूरे घटनाक्रम का सफलतापूर्वक समाधान हो गया। घटना के बाद अस्पताल परिसर की साफ-सफाई और निरीक्षण भी कराया गया। अधिकारियों ने भवन के आसपास झाड़ियों और घास की सफाई कराने के निर्देश दिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की संभावना कम हो सके। साथ ही अस्पताल परिसर में मौजूद पुराने सामान और अनुपयोगी वस्तुओं को हटाने की भी योजना बनाई गई है, क्योंकि ऐसे स्थानों पर अक्सर सांप और अन्य जीव छिप जाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>विंध्य/रीवा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:08:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हाथी दांत मामले में फिर चर्चा में मोहनलाल, वन विभाग को 10 दांत और 13 मूर्तियों की दी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[15 साल पुराने मामले में एमनेस्टी योजना के तहत किया खुलासा, वन विभाग करेगा जांच; डीएनए परीक्षण की भी संभावना जताई गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/6a4cb43280040/article-58093"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mohanlal.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के वरिष्ठ अभिनेता मोहनलाल एक बार फिर हाथी दांत रखने से जुड़े पुराने मामले को लेकर चर्चा में हैं। केरल वन विभाग के समक्ष अभिनेता ने सरकार की एमनेस्टी योजना के तहत 10 हाथी के दांत और हाथी दांत से बनी 13 मूर्तियों की जानकारी दी है। इस खुलासे के बाद एक बार फिर वह मामला सुर्खियों में आ गया है, जिसकी शुरुआत करीब 15 साल पहले हुई थी। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, पहले अभिनेता ने केवल चार हाथी दांत होने की जानकारी दी थी, लेकिन अब उन्होंने छह और हाथी दांत के साथ कई कलाकृतियों की भी घोषणा की है। विभाग पूरे मामले की जांच कर रहा है और जरूरत पड़ने पर इन वस्तुओं का डीएनए परीक्षण भी कराया जा सकता है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई को लेकर फैसला लिया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अभिनेता ने जिन वस्तुओं की घोषणा की है, उनमें भगवान कृष्ण, भगवान राम और तिरुपति बालाजी सहित कई धार्मिक प्रतिमाएं शामिल हैं। इन सभी हाथी दांतों और मूर्तियों का कुल वजन करीब 46 किलोग्राम बताया जा रहा है। मोहनलाल का कहना है कि ये वस्तुएं उन्हें विरासत में मिली थीं या फिर उपहार के रूप में प्राप्त हुई थीं। उन्होंने इन्हें किसी अवैध व्यापार या शिकार के जरिए हासिल नहीं किया। हालांकि वन विभाग अब इस दावे की भी जांच करेगा कि इन वस्तुओं की वास्तविक उत्पत्ति क्या है और क्या इनके पास रखने की प्रक्रिया उस समय लागू नियमों के अनुरूप थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह मामला पहली बार वर्ष 2011 में सामने आया था। उस समय आयकर विभाग की टीम कोच्चि के थेवारा इलाके में स्थित मोहनलाल के घर पर छापेमारी के लिए पहुंची थी। अधिकारियों का उद्देश्य वित्तीय दस्तावेज और अन्य रिकॉर्ड की जांच करना था, लेकिन तलाशी के दौरान घर में हाथी दांत और उनसे बनी कई कलाकृतियां मिलीं। इसके बाद मामला वन विभाग तक पहुंचा। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सरकार की अनुमति के बिना हाथी दांत रखना या उसका स्वामित्व रखना प्रतिबंधित है। इसी आधार पर वन विभाग ने इन वस्तुओं को जब्त किया और पेरुम्बावूर की अदालत में मामला दर्ज कराया। तभी से यह प्रकरण कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामला सामने आने के बाद मोहनलाल ने अपनी सफाई भी दी थी। उन्होंने कहा था कि जिन हाथी दांतों की बात हो रही है, वे एक ऐसे पालतू हाथी के थे जिसकी प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हो गई थी। अभिनेता का दावा था कि उन्होंने उन्हें केवल स्मृति के रूप में अपने पास रखा था और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऐसा करना कानून के दायरे में प्रतिबंधित है। बाद में वर्ष 2015 में राज्य सरकार ने उन्हें इन हाथी दांतों की घोषणा करने की अनुमति दी और वर्ष 2016 में स्वामित्व प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया गया। उस समय इस फैसले पर भी कई वन्यजीव संरक्षण संगठनों ने सवाल उठाए थे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा और कानूनी प्रक्रिया जारी रही। मोहनलाल ने निचली अदालत के आदेश को केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उन्हें कुछ समय के लिए अंतरिम राहत मिली। इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार से मामले को वापस लेने का भी अनुरोध किया, लेकिन यह मांग स्वीकार नहीं की गई। बाद में सेवानिवृत्त वन अधिकारियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अभिनेता को जारी स्वामित्व प्रमाणपत्र को अवैध घोषित कर दिया। हालांकि अदालत ने उनके खिलाफ तत्काल आपराधिक मुकदमा चलाने का आदेश नहीं दिया। इसके बाद मामला फिर वन विभाग की जांच के दायरे में आ गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अब सरकार की एमनेस्टी योजना के तहत मोहनलाल द्वारा अतिरिक्त हाथी दांत और मूर्तियों की घोषणा किए जाने के बाद विभाग एक बार फिर सभी तथ्यों की जांच कर रहा है। अधिकारियों के अनुसार यदि आवश्यकता पड़ी तो हाथी दांतों और उनसे बनी मूर्तियों का डीएनए परीक्षण कराया जाएगा। इससे यह पता लगाने की कोशिश होगी कि ये वस्तुएं किस हाथी से संबंधित हैं और इनकी वास्तविक स्थिति क्या है। जांच के नतीजों के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की जाएगी।वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि हाथी दांत से संबंधित मामलों में कानून काफी सख्त है, क्योंकि अवैध शिकार और हाथी दांत के व्यापार पर रोक लगाने के लिए देश में लंबे समय से विशेष प्रावधान लागू हैं। ऐसे मामलों में प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति, स्वामित्व और कानूनी दस्तावेजों की जांच जरूरी होती है। दूसरी ओर अभिनेता के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने एमनेस्टी योजना के तहत स्वयं जानकारी देकर कानून का पालन करने की कोशिश की है और जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 14:48:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कालापीपल में कुएं से मिले 13 हिरण और एक कुत्ते के शव, जांच जारी</title>
                                    <description><![CDATA[खरदौनकलां गांव के खेत में बने कुएं से सड़े-गले शव मिलने से हड़कंप, प्रारंभिक जांच में कुत्ते से बचने के दौरान हिरणों के गिरने की आशंका; वन विभाग पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bodies-of-13-deer-and-a-dog-found-in-a/article-58067"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/kalapipal-deer-death.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शाजापुर जिले के शुजालपुर अनुभाग की कालापीपल तहसील स्थित खरदौनकलां गांव में एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहां एक खेत के कुएं से 13 हिरणों और एक आवारा कुत्ते के शव मिलने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। रविवार को खेत मालिक के परिजन फसल पर कीटनाशक का छिड़काव करने पहुंचे थे। इसी दौरान उन्हें कुएं की तरफ से तेज दुर्गंध महसूस हुई। जब उन्होंने कुएं में झांककर देखा तो अंदर बड़ी संख्या में सड़े-गले शव दिखाई दिए। यह दृश्य देखकर उन्होंने तुरंत गांव के लोगों को सूचना दी। कुछ ही देर में मामला पूरे गांव में फैल गया और सरपंच के माध्यम से पुलिस तथा वन विभाग को इसकी जानकारी दी गई। सूचना मिलने के बाद प्रशासन, पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण शुरू किया। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि हिरणों का झुंड किसी आवारा कुत्ते से बचने के दौरान भागते हुए कुएं में गिर गया। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि मौत की वास्तविक वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि यह कुआं खरदौनकलां निवासी कृष्णाबाई पति राजेश पाटीदार के खेत में स्थित है। खेत मालिक के परिजन जब खेत पहुंचे तो पहले उन्हें दुर्गंध महसूस हुई। शुरुआत में उन्हें लगा कि कोई जानवर आसपास मरा होगा, लेकिन जब उन्होंने कुएं के भीतर देखा तो एक साथ कई हिरणों और एक कुत्ते के शव दिखाई दिए। शवों की स्थिति देखकर अनुमान लगाया गया कि घटना एक-दो दिन पहले हुई होगी। ग्रामीण भी बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए। कई लोगों ने बताया कि कुएं की मुंडेर का एक हिस्सा टूटा हुआ मिला है। आशंका है कि तेज रफ्तार में भागते समय हिरण उसी क्षतिग्रस्त हिस्से से सीधे कुएं में गिर गए होंगे। कुएं की गहराई अधिक होने और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होने के कारण सभी वन्यजीवों की मौत हो गई। जिस आवारा कुत्ते से बचने की कोशिश की जा रही थी, उसके भी कुएं में गिरने की बात सामने आई है। उसके शव भी हिरणों के साथ मिले हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार मृत हिरणों में चार नर और नौ मादा शामिल हैं। सभी हिरण संरक्षित वन्यजीव श्रेणी में आते हैं और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल हैं। ऐसे मामलों में नियमानुसार वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ही पंचनामा और शव निकालने की कार्रवाई की जाती है। बताया गया कि रविवार को सूचना मिलने के समय संबंधित एसडीओ विभागीय कार्य से बाहर थे। इसी वजह से शव निकालने की कार्रवाई सोमवार को नायब तहसीलदार और वन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में की गई। सभी शवों का पोस्टमार्टम कराया गया और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद घटनास्थल के पास ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। कार्रवाई के दौरान आम लोगों और ग्रामीणों को सुरक्षा कारणों से घटनास्थल से दूर रखा गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटनास्थल की जांच के दौरान वन विभाग ने आसपास के हालात का भी निरीक्षण किया। अधिकारियों ने टूटी हुई मुंडेर, कुएं की संरचना और आसपास के पैरों के निशानों का परीक्षण किया। प्रारंभिक तौर पर ऐसा माना जा रहा है कि हिरणों का झुंड किसी खतरे से बचने के लिए तेजी से भाग रहा था और अंधेरे या घबराहट में कुएं को नहीं देख पाया। हालांकि अभी यह भी जांच का विषय है कि घटना रात के समय हुई या दिन में। वन विभाग का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा। फिलहाल किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस घटना के बाद ग्रामीणों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि खेतों के बीच बने कई पुराने कुएं खुले हैं या उनकी सुरक्षा दीवारें पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में वन्यजीवों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी खतरा बना रहता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि खुले और क्षतिग्रस्त कुओं की पहचान कर उन्हें सुरक्षित बनाया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि विभाग ने घटना की जानकारी सार्वजनिक होने से रोकने की कोशिश की, हालांकि अधिकारियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कालापीपल और शुजालपुर क्षेत्र लंबे समय से हिरणों की बड़ी आबादी के लिए जाना जाता है। यहां खेतों और खुले इलाकों में अक्सर हिरणों के झुंड दिखाई देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में वन्यजीवों की संख्या बढ़ने के कारण किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। इसी को देखते हुए करीब दो महीने पहले वन विभाग ने विशेष अभियान चलाकर बोमा पद्धति के माध्यम से हेलीकॉप्टर की सहायता से लगभग 800 हिरणों को दूसरे वन अभयारण्यों में स्थानांतरित किया था। इसके बावजूद क्षेत्र में बड़ी संख्या में हिरण मौजूद हैं। ऐसे में वन्यजीवों की सुरक्षा और खुले कुओं जैसी संभावित दुर्घटनाओं से बचाव के लिए प्रभावी उपायों की जरूरत एक बार फिर महसूस की जा रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 12:37:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कटघोरा में 13 हाथियों की जलक्रीड़ा, वीडियो वायरल</title>
                                    <description><![CDATA[सलिहाभाठा जलाशय में मस्ती करते दिखा हाथियों का झुंड, वन विभाग अलर्ट]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/water-sports-video-of-13-elephants-in-katghora-goes-viral/article-57040"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-elephants.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के कटघोरा वनमंडल में 13 हाथियों के झुंड का एक दुर्लभ और मनमोहक दृश्य सामने आया है। ऐतमा नगर परिक्षेत्र के सलिहाभाठा जलाशय में इन हाथियों को जलक्रीड़ा करते और ‘डस्ट बाथ’ लेते हुए देखा गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह दृश्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है और वन्यजीव प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बन गया है। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि हाथियों का झुंड पानी में उतरकर एक-दूसरे पर सूंड़ से पानी उछालते हुए मस्ती कर रहा है। कुछ हाथी गहरे पानी में लोटपोट होते नजर आते हैं, जबकि अन्य किनारे पर खड़े होकर अपने शरीर पर सूखी मिट्टी और धूल डालते दिखाई देते हैं। यह पूरी गतिविधि प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा है, जिसे देखकर स्थानीय लोग भी हैरान रह गए। सुबह और शाम के समय यह दृश्य और भी ज्यादा सक्रिय रहता है, जब हाथियों का झुंड जलस्रोतों की ओर पहुंचता है। हाथियों द्वारा धूल-मिट्टी अपने शरीर पर डालने की प्रक्रिया को ‘डस्ट बाथ’ कहा जाता है। यह उनकी प्राकृतिक आदत है, जो उन्हें तेज धूप, गर्मी और कीड़ों के हमले से बचाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलक्रीड़ा के बाद हाथी अक्सर इस प्रक्रिया को अपनाते हैं, जिससे उनकी त्वचा सुरक्षित रहती है और शरीर का तापमान भी नियंत्रित होता है। यह व्यवहार हाथियों के सामाजिक और प्राकृतिक जीवन का अहम हिस्सा माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, कटघोरा वनमंडल में हाथियों की आवाजाही कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतने बड़े झुंड का एक साथ जलाशय में दिखाई देना दुर्लभ है। बताया जा रहा है कि इस इलाके में करीब 50 हाथियों का एक स्थायी दल विचरण करता है, जो अक्सर भोजन और पानी की तलाश में जंगलों से निकलकर खेतों और जलस्रोतों की ओर पहुंचता है। रात के समय इनकी गतिविधियां अधिक बढ़ जाती हैं, जिससे कई बार ग्रामीण क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ानी पड़ती है। वीडियो वायरल होने के बाद कटघोरा वन विभाग तुरंत अलर्ट हो गया है। वन विभाग की टीम ने सलिहाभाठा जलाशय और आसपास के गांवों में गश्त तेज कर दी है। अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से अपील की है कि वे हाथियों के करीब जाने की कोशिश न करें और उन्हें किसी भी तरह से परेशान न करें। विभाग का कहना है कि ऐसे प्राकृतिक दृश्यों को दूर से देखना ही सुरक्षित और उचित है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग ने ग्रामीणों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह भी दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि हाथियों के दिखने पर शोर न मचाया जाए, पटाखे न जलाए जाएं और किसी भी प्रकार की उकसाने वाली गतिविधि से बचा जाए। ऐसा करने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना बढ़ सकती है, जो दोनों पक्षों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। अधिकारियों के अनुसार, गर्मी के मौसम में जंगलों में जलस्रोत सूखने लगते हैं, जिससे हाथियों के झुंड पानी की तलाश में नदी, तालाब और जलाशयों की ओर बढ़ते हैं। यही कारण है कि कटघोरा वनमंडल जैसे क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही अधिक देखी जाती है। इस समय वन विभाग लगातार निगरानी बनाए हुए है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग ने निगरानी को और मजबूत करते हुए ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों का उपयोग भी शुरू किया है। इन तकनीकों के जरिए हाथियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि इससे उनकी लोकेशन ट्रैक करने में मदद मिलती है और ग्रामीणों को समय रहते सतर्क किया जा सकता है। यह पूरा दृश्य जहां एक ओर प्रकृति की सुंदरता और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी याद दिलाता है कि मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। कटघोरा का यह वायरल वीडियो लोगों को प्रकृति के करीब लाने के साथ-साथ सतर्कता का संदेश भी दे रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 16:20:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोहन यादव का बड़ा फैसला: वन्यजीव प्रबंधन में नए कदम तेज हुए</title>
                                    <description><![CDATA[आंध्रप्रदेश से बाघ-गौर के आदान-प्रदान, मानव-वन्यजीव संघर्ष राज्य आपदा घोषित करने की तैयारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/big-decision-of-mohan-yadav-new-steps-in-wildlife-management/article-56374"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mohan-yadav.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरुवार को मुख्यमंत्री निवास समत्व भवन में हुई उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने वन विभाग की गतिविधियों और आने वाले समय की योजनाओं को लेकर कई बड़े और अहम फैसले लिए। बैठक में वन्यजीव संरक्षण से लेकर पर्यटन और मानव-वन्यजीव संघर्ष तक कई मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी दौरान आंध्रप्रदेश और अन्य राज्यों के साथ वन्यजीव आदान-प्रदान को लेकर भी महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। बैठक में बताया गया कि Andhra Pradesh की ओर से मध्यप्रदेश से बाघ और गौर उपलब्ध कराने की मांग की गई है। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर बाघ और गौर भेजने की कार्रवाई की जाए। साथ ही यह भी सुझाव दिया गया कि बदले में आंध्रप्रदेश से वाइल्ड डॉग्स और अन्य वन्य प्रजातियों को प्राप्त करने की दिशा में भी काम किया जाए। इसी तरह राजस्थान से सोन चिरैया प्राप्त करने पर सहमति बनी है, जिसे घाटीगांव और गांधीसागर जैसे वन क्षेत्रों में छोड़ा जाएगा। यह पूरा आदान-प्रदान वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने वन पर्यटन को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि जंगल क्षेत्रों में आने वाले पर्यटकों के लिए सुविधाएं और मजबूत की जाएं। होम-स्टे मॉडल को बढ़ावा देने की बात भी सामने आई, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सके और पर्यटक सीधे वन जीवन के अनुभव से जुड़ सकें। इसके अलावा सफारी वाहनों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार करने के निर्देश दिए गए, जिससे पर्यटन गतिविधियों में तेजी आए। बैठक में मानव और वन्यजीव संघर्ष को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने संकेत दिए कि इस समस्या को राज्य आपदा घोषित करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। इससे प्रशासन, पुलिस, वन विभाग और आपदा प्रबंधन एजेंसियां मिलकर एक समन्वित प्रणाली के तहत ऐसे मामलों को संभाल सकेंगी। यह निर्णय आने वाले समय में ग्रामीण और वन क्षेत्रों में होने वाले संघर्षों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग ने बैठक में बताया कि प्रदेश में टाइगर स्ट्राइक फोर्स की तर्ज पर अब एक राज्य स्तरीय टास्क फोर्स गठित की जाएगी, जिसका उद्देश्य वनों में संगठित अपराधों पर सख्त नियंत्रण रखना होगा। इसके साथ ही वन मुख्यालय में कमांड और कंट्रोल रूम स्थापित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है, जिससे निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणाली और मजबूत होगी। खनिज परिवहन से जुड़े अनुज्ञा शुल्क में वृद्धि के प्रस्ताव को भी स्वीकृति मिली है, जिससे विभागीय संसाधनों में बढ़ोतरी की उम्मीद है। बैठक में यह भी जानकारी दी गई कि राज्य में चीतों की संख्या वर्तमान में 52 हो चुकी है, जिनमें से 32 का जन्म कूनो राष्ट्रीय उद्यान में हुआ है। सागर जिले के वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व को तीसरे चीता घर के रूप में विकसित किया जा रहा है। मंदसौर के गांधीसागर अभ्यारण्य में भी जल्द ही नए चीतों को छोड़े जाने की तैयारी है। वन विभाग का दावा है कि बाघ, तेंदुआ, चीता, गिद्ध और घड़ियाल जैसे वन्यजीवों के संरक्षण में मध्यप्रदेश देश में अग्रणी राज्यों में शामिल है। इसी बीच, प्रदेश के डिंडोरी और अनूपपुर जिलों में साल बोरर नामक वन रोग फैलने की जानकारी भी सामने आई है, जो लगभग तीन दशक बाद दोबारा दिखाई दिया है। इसके नियंत्रण के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। तेंदूपत्ता संग्रहण और वन ग्रामों के राजस्व ग्राम में परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी तेजी से काम चल रहा है। सरकार का फोकस अब संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर भी है, ताकि वन क्षेत्र विकास और रोजगार दोनों का केंद्र बन सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 11:15:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुंगेली के जंगल में तेंदुओं की खूनी जंग, एक की मौत; दूसरा गंभीर घायल</title>
                                    <description><![CDATA[क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई में हुआ जानलेवा संघर्ष, कानन पेंडारी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम करेगी पोस्टमार्टम]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a3270ab1daf9/article-56214"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mungeli-leopard-death.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के मुंगेली वनमंडल में मंगलवार शाम एक दुर्लभ और चौंकाने वाली वन्यजीव घटना सामने आई। लोरमी वन परिक्षेत्र के चंदूपारा बीट स्थित जंगल में दो तेंदुओं के बीच हुए भीषण संघर्ष में एक तेंदुए की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल बताया जा रहा है। घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे क्षेत्र को सुरक्षा घेरे में लेकर जांच शुरू कर दी। दोनों तेंदुओं के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर संघर्ष हुआ, जो इतना हिंसक था कि एक तेंदुए की जान चली गई। घटना मंगलवार शाम करीब सात बजे की बताई जा रही है। स्थानीय ग्रामीणों ने जंगल से तेज गर्जना और जानवरों के लड़ने जैसी आवाजें सुनी थीं। कुछ लोगों ने दूर से टॉर्च की रोशनी में दो बड़े वन्यजीवों को आपस में भिड़ते हुए देखने का दावा भी किया है। हालांकि अंधेरा बढ़ने के कारण कोई भी व्यक्ति घटनास्थल के करीब नहीं जा सका। बाद में ग्रामीणों की सूचना पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, जहां जंगल के भीतर एक तेंदुआ मृत अवस्था में पड़ा मिला।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन अधिकारियों के अनुसार मृत तेंदुए के शरीर पर कई गंभीर घाव पाए गए हैं। उसके चेहरे, गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर गहरे जख्म के निशान मिले हैं। इन निशानों को देखकर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि संघर्ष काफी देर तक चला होगा। वन अमले ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद मृत तेंदुए के आसपास के इलाके को सुरक्षित कर लिया और रातभर निगरानी के लिए कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई। घटना के बाद दूसरा तेंदुआ जंगल की ओर चला गया। वन विभाग की टीम ने उसकी तलाश शुरू की, लेकिन देर रात तक उसका कोई स्पष्ट सुराग नहीं मिल पाया। हालांकि सर्च अभियान के दौरान कुछ स्थानों से कराहने जैसी आवाजें सुनाई देने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों का मानना है कि दूसरा तेंदुआ भी गंभीर रूप से घायल हो सकता है और उसे चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी संभावना को देखते हुए जंगल के भीतर निगरानी और खोज अभियान लगातार जारी रखा गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग का कहना है कि तेंदुए स्वभाव से एकाकी और क्षेत्रीय प्रवृत्ति वाले वन्यजीव होते हैं। विशेष रूप से वयस्क नर तेंदुए अपने क्षेत्र में दूसरे नर तेंदुओं की मौजूदगी को आसानी से स्वीकार नहीं करते। कई बार भोजन, क्षेत्र और मादा तेंदुए की उपस्थिति को लेकर उनके बीच संघर्ष की स्थिति बन जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे संघर्ष सामान्यतः छोटे स्तर पर होते हैं, लेकिन कभी-कभी यह जानलेवा रूप भी ले लेते हैं। मुंगेली की यह घटना भी उसी प्रकार के संघर्ष का परिणाम मानी जा रही है। वन अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी प्रकार के शिकार या अवैध गतिविधि की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया गया। घटनास्थल पर पहुंचने के बाद मृत तेंदुए के शरीर का विस्तृत निरीक्षण किया गया। उसके नाखून, दांत और अन्य अंग सुरक्षित पाए गए हैं। शरीर पर गोली, फंदे या किसी अन्य बाहरी हमले के संकेत नहीं मिले। इसी वजह से फिलहाल शिकार की आशंका कमजोर मानी जा रही है और आपसी संघर्ष को मौत का प्रमुख कारण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बुधवार को मृत तेंदुए के शव को कानन पेंडारी भेजने की तैयारी की गई, जहां विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम पोस्टमार्टम करेगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि हो सकेगी। वन विभाग का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद आगे की जांच और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शरीर के आंतरिक अंगों की भी जांच की जाएगी ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मृत्यु केवल बाहरी चोटों के कारण हुई या कोई अन्य कारण भी इसमें शामिल था। ग्रामीणों से मिली जानकारी और घटनास्थल पर मिले साक्ष्यों के आधार पर संघर्ष की आशंका मजबूत है। उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। वन विभाग पूरे क्षेत्र में निगरानी बढ़ा रहा है और घायल तेंदुए की तलाश प्राथमिकता के आधार पर की जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण और जंगलों में बढ़ते दबाव को लेकर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वन क्षेत्रों में आवास और संसाधनों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि तेंदुओं के बीच क्षेत्रीय संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी संघर्ष में एक तेंदुए की मौत हो जाना बेहद दुर्लभ माना जाता है। वन विभाग की टीम जंगल में लगातार गश्त कर रही है। आसपास के ग्रामीणों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है। घायल तेंदुए के मिलने पर उसका उपचार कराने और उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाने की तैयारी की गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 15:56:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रायगढ़ में मालगाड़ी की चपेट में आई मादा हाथी, उपचार के दौरान मौत</title>
                                    <description><![CDATA[चारमार गांव के पास रेल लाइन पार करते समय हुआ हादसा, वन विभाग ने किया रेस्क्यू लेकिन नहीं बच सकी हाथी की जान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/female-elephant-hit-by-goods-train-in-raigarh-dies-during/article-56105"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/raigarh-elephant-accident.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां मालगाड़ी की चपेट में आने से एक मादा हाथी गंभीर रूप से घायल हो गई। हादसे के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और हाथी को बचाने के लिए रेस्क्यू व उपचार की प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। इलाज के लिए उसे बिलासपुर ले जाने की तैयारी की जा रही थी, तभी उसकी मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर रेलवे ट्रैक और हाथियों के आवागमन के बीच बढ़ते टकराव को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह घटना रायगढ़ वन मंडल के घरघोड़ा रेंज अंतर्गत चारमार गांव के पास सोमवार रात करीब नौ बजे हुई। बताया जा रहा है कि 10 से अधिक हाथियों का एक दल जंगल से निकलकर रेलवे लाइन पार कर रहा था। उसी दौरान खरसिया की ओर से धरमजयगढ़ की दिशा में कोयला लेने जा रही एक मालगाड़ी वहां से गुजर रही थी। हाथियों के झुंड के बीच मौजूद एक मादा हाथी ट्रेन की चपेट में आ गई और गंभीर रूप से घायल हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों और ग्रामीणों के मुताबिक टक्कर इतनी जोरदार थी कि मादा हाथी के शरीर के पिछले हिस्से में गंभीर चोटें आईं। उसका पिछला पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसके कारण वह उठने और चलने की स्थिति में नहीं थी। हादसे के बाद हाथी रेलवे लाइन के पास ही घायल अवस्था में पड़ी रही। घटना की जानकारी मिलते ही आसपास के गांवों के लोग मौके पर पहुंचने लगे और इसकी सूचना वन विभाग को दी गई। सूचना मिलने के बाद वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी तत्काल घटनास्थल पर पहुंचे। शुरुआती जांच में यह स्पष्ट हो गया कि हाथी की हालत बेहद गंभीर है और उसे तत्काल चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता है। वन विभाग ने घायल हाथी के उपचार के लिए आवश्यक इंतजाम शुरू किए और विशेषज्ञ चिकित्सकों से भी संपर्क किया गया। हालांकि स्थिति को संभालना आसान नहीं था, क्योंकि जिस हाथी को चोट लगी थी उसके साथ मौजूद पूरा झुंड आसपास ही डटा हुआ था।</p>
<p class="isSelectedEnd">वन अधिकारियों के अनुसार हाथियों का दल लगातार घायल मादा हाथी के आसपास घूम रहा था। ऐसे में बचाव दल के लिए उसके करीब पहुंचना काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। हाथियों का व्यवहार स्वाभाविक रूप से संवेदनशील और सुरक्षात्मक था, जिसके कारण वन अमले को बेहद सावधानी बरतनी पड़ी। कई बार ऐसा लगा कि झुंड आक्रामक हो सकता है, इसलिए रेस्क्यू टीम को दूरी बनाकर रणनीति तैयार करनी पड़ी। घटना की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण भी मौके पर पहुंचने लगे। वन विभाग ने लोगों से घटनास्थल के आसपास भीड़ न लगाने और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील की। अधिकारियों ने चेतावनी दी कि जंगली हाथियों का व्यवहार किसी भी समय बदल सकता है और वे खतरा महसूस होने पर आक्रामक हो सकते हैं। इसके बावजूद कई लोग हाथी को देखने के लिए मौके की ओर बढ़ते रहे, जिससे वन विभाग की चिंता और बढ़ गई। घायल हाथी की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। वन विभाग के अधिकारियों ने उच्च अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। रायगढ़ वनमंडल के अधिकारियों ने बिलासपुर स्थित मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) मनोज पांडेय को घटना से अवगत कराया। इसके बाद उन्होंने तत्काल निगरानी बढ़ाने और आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही वन्यजीव विशेषज्ञों को भी मौके पर भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">बताया गया कि कानन पेंडारी जू के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. पी.के. चंदन को भी रायगढ़ के लिए रवाना किया गया था ताकि घायल हाथी का बेहतर इलाज किया जा सके। वन विभाग की योजना थी कि प्राथमिक उपचार के बाद हाथी को विशेष चिकित्सा सुविधा के लिए बिलासपुर ले जाया जाए। लेकिन हाथी की हालत लगातार बिगड़ती रही और इलाज के प्रयासों के बीच ही उसने दम तोड़ दिया। मादा हाथी की मौत के बाद वन विभाग ने पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारी यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि हादसे के समय ट्रेन की गति क्या थी और क्या रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौजूदगी की कोई सूचना पहले से उपलब्ध थी। इसके अलावा वन विभाग और रेलवे के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में रेलवे ट्रैक पार करते समय हाथियों के घायल होने और मौत की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग और रेलवे लाइनों के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा है। जंगलों के सिकुड़ते दायरे और मानव गतिविधियों के विस्तार के कारण हाथियों को अक्सर रेलवे ट्रैक पार करने पड़ते हैं। ऐसे में दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। विशेषज्ञ लंबे समय से हाथी कॉरिडोर की सुरक्षा, ट्रेनों की गति नियंत्रण और निगरानी तंत्र को मजबूत करने की मांग करते रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 16:20:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>250 साल पुराने बिकमा तालाब में निकले मगरमच्छ के बच्चे, वन विभाग ने सुरक्षित छोड़ा खूंटाघाट बांध</title>
                                    <description><![CDATA[रतनपुर के ऐतिहासिक तालाब में सुबह दिखा दुर्लभ नजारा, स्थानीय लोगों और वन विभाग की सतर्कता से छह मगरमच्छ शावकों को सुरक्षित स्थानांतरित किया गया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/crocodile-babies-hatched-in-250-year-old-bikma-pond-forest/article-55822"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/bikma-talab-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित ऐतिहासिक बिकमा तालाब में शुक्रवार सुबह उस समय लोगों की उत्सुकता बढ़ गई, जब तालाब के किनारे मगरमच्छ के अंडों से बच्चों को निकलते हुए देखा गया। सुबह स्नान और दैनिक कार्यों के लिए पहुंचे स्थानीय लोगों ने यह दुर्लभ दृश्य देखा तो पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कुछ ही देर में यह खबर आसपास के इलाके में फैल गई और तालाब के किनारे लोगों की भीड़ जुटने लगी। हालात को देखते हुए स्थानीय नागरिकों ने समझदारी दिखाते हुए मगरमच्छ के नवजात बच्चों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की और तुरंत वन विभाग तथा पुलिस को सूचना दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक सुबह के समय तालाब के किनारे कुछ हलचल दिखाई दी। करीब जाकर देखने पर पता चला कि मगरमच्छ के अंडों से बच्चे बाहर निकल रहे हैं। चूंकि तालाब के आसपास लोगों की आवाजाही रहती है, ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। स्थानीय लोगों ने बिना किसी नुकसान के सभी बच्चों को सावधानीपूर्वक एक टब में रखा ताकि उन्हें किसी प्रकार का खतरा न पहुंचे। सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे घटनाक्रम का निरीक्षण किया। वन विभाग के अधिकारियों ने प्रारंभिक जांच के बाद बताया कि तालाब में मौजूद मगरमच्छों द्वारा दिए गए अंडों से इन बच्चों का जन्म हुआ है। बच्चों की उम्र कुछ ही घंटे आंकी गई। विशेषज्ञों की सलाह के बाद निर्णय लिया गया कि इन्हें ऐसे जलाशय में छोड़ा जाए जहां इनके सुरक्षित विकास की संभावना अधिक हो। इसके बाद सभी छह मगरमच्छ शावकों को खूंटाघाट बांध ले जाया गया और वहां प्राकृतिक वातावरण में छोड़ दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के कर्मचारियों ने विशेष सावधानी बरती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वार्ड पार्षद मनोज पाटले ने बताया कि बिकमा तालाब में लंबे समय से मगरमच्छों की मौजूदगी दर्ज की जाती रही है। वर्तमान में तालाब में तीन मगरमच्छ होने की जानकारी है, जिनकी समय-समय पर निगरानी भी की जाती है। उन्होंने कहा कि मगरमच्छ के बच्चों के निकलने की जानकारी मिलते ही वन विभाग से संपर्क किया गया ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। बच्चों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में स्थानीय नागरिकों ने भी सहयोग किया। इस घटना ने एक बार फिर बिकमा तालाब को चर्चा में ला दिया है। रतनपुर का यह तालाब केवल जल स्रोत नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का केंद्र भी माना जाता है। बताया जाता है कि इसका निर्माण करीब 250 वर्ष पहले मराठा शासनकाल में कराया गया था। इतिहासकारों के अनुसार छत्तीसगढ़ में स्वतंत्र और प्रत्यक्ष शासन स्थापित करने वाले मराठा शासक विंबाजी राव भोसले ने इस तालाब का निर्माण करवाया था। वर्षों से यह तालाब क्षेत्र की पहचान बना हुआ है और स्थानीय लोगों की आस्था तथा इतिहास से जुड़ा हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बिकमा तालाब से जुड़ी कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि तालाब की खुदाई के दौरान भगवान राम की एक प्रतिमा प्राप्त हुई थी। बाद में इस प्रतिमा को रतनपुर की रामटेकरी स्थित श्रीराम मंदिर में स्थापित किया गया। क्षेत्र के बुजुर्गों और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े लोगों के बीच यह कथा लंबे समय से सुनाई जाती रही है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन लोगों की आस्था आज भी इस मान्यता से जुड़ी हुई है। रतनपुर निवासी अजय गुप्ता बताते हैं कि मंदिर में स्थापित प्रतिमा सालिगराम पत्थर से निर्मित मानी जाती है। प्रतिमा में भगवान श्रीराम को अजानुबाहू स्वरूप में दर्शाया गया है। यही कारण है कि तालाब और मंदिर दोनों स्थानीय धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। कई श्रद्धालु आज भी इस कथा को सुनने और मंदिर के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दूसरी ओर पुरातत्व विशेषज्ञ इस मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कहते हैं। पुरातत्ववेत्ता राहुल सिंह के अनुसार बिकमा तालाब निश्चित रूप से ऐतिहासिक महत्व का स्थल है, लेकिन तालाब से भगवान राम की प्रतिमा मिलने संबंधी दावे के समर्थन में उनके पास कोई प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थानीय परंपराओं और आस्था से जुड़ा विषय है, इसलिए बिना पर्याप्त साक्ष्यों के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। मगरमच्छ के बच्चों के जन्म की इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर भी चर्चा बढ़ा दी है। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह संकेत है कि क्षेत्र का प्राकृतिक वातावरण अभी भी वन्यजीवों के लिए अनुकूल बना हुआ है। मगरमच्छ जैसे संवेदनशील जीवों का प्रजनन होना पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से सकारात्मक माना जाता है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे ऐसे वन्यजीवों के प्रति सतर्कता और संवेदनशीलता बनाए रखें तथा किसी भी असामान्य स्थिति की सूचना तत्काल संबंधित विभाग को दें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 14:11:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रायगढ़ में हाथी शावकों की मौत का खुलासा, संक्रमण बना वजह</title>
                                    <description><![CDATA[25 दिनों में चार शावकों की मौत से बढ़ी चिंता, देहरादून और बरेली लैब की रिपोर्ट में हेपेटाइटिस व सेप्टिसीमिया की पुष्टि]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/infection-became-the-reason-for-the-death-of-elephant-cubs/article-55393"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/elephant-calf-death.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडलों में पिछले कुछ सप्ताह से हाथी शावकों की लगातार हो रही मौतों के मामले में अब जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिन शावकों की मौत हुई, उनमें से एक की जान हेपेटाइटिस यानी लिवर संक्रमण और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया यानी गंभीर रक्त संक्रमण के कारण हुई। इससे पहले एक अन्य शावक की मौत निमोनिया से होने की पुष्टि हो चुकी थी। महज 25 दिनों के भीतर एक ही हाथी दल के चार शावकों की मौत ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। मामले को गंभीर मानते हुए विभाग ने विशेषज्ञों की मदद से जांच कराई थी और अब रिपोर्ट आने के बाद मौतों के पीछे की वजह काफी हद तक साफ हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">8 मई से 1 जून के बीच रायगढ़ और धरमजयगढ़ क्षेत्र के जंगलों में अलग-अलग स्थानों पर हाथी शावकों के शव मिले थे। शुरुआती स्तर पर यह स्पष्ट नहीं था कि मौतों की वजह क्या है। कई मामलों में शावकों के शव जल स्रोतों और तालाबों के आसपास पाए गए थे, जिससे वन अमले के सामने कई सवाल खड़े हो गए थे। चूंकि सभी शावक एक ही हाथी दल से जुड़े बताए जा रहे थे, इसलिए संक्रमण फैलने की आशंका भी जताई जा रही थी। अधिकारियों के अनुसार पोस्टमॉर्टम के दौरान आवश्यक नमूने एकत्र किए गए और उन्हें जांच के लिए देहरादून तथा बरेली स्थित प्रयोगशालाओं में भेजा गया था। अब आई रिपोर्ट में दो अलग-अलग तरह के संक्रमण की पुष्टि हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस ऐसा संक्रमण है जो सीधे लिवर को प्रभावित करता है। इसके कारण शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित होने लगती हैं। दूसरी ओर सेप्टिसीमिया एक गंभीर स्थिति होती है जिसमें रक्त संक्रमित हो जाता है और संक्रमण पूरे शरीर में फैलने लगता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक छोटे शावकों में ऐसी बीमारियां तेजी से असर दिखाती हैं और समय पर इलाज या पहचान नहीं होने पर जान का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि हाथी शावकों की मौत के मामलों को लेकर विभाग अब पहले से ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद वन विभाग ने हाल ही में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन भी किया। दो दिन तक चले इस कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान हाथियों में होने वाली बीमारियों, संक्रमण के कारणों, स्वास्थ्य निगरानी और बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को भी यह बताया गया कि जंगलों में किसी हाथी या शावक के असामान्य व्यवहार को कैसे पहचानना है और बीमारी की आशंका होने पर तत्काल क्या कदम उठाने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि रायगढ़ और धरमजयगढ़ के जंगलों में इस समय कुल 137 हाथी मौजूद हैं। इनमें 37 नर, 62 मादा और 35 शावक शामिल हैं। शावकों की लगातार मौत के बाद विभाग ने विशेष निगरानी अभियान शुरू कर दिया है। हाथी मित्र दल, ट्रैकर्स और वनकर्मियों की टीमें लगातार जंगलों में सक्रिय हैं। हाथियों के मूवमेंट पर नजर रखने के लिए ट्रैप कैमरों और ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। रात के समय थर्मल ड्रोन की मदद से हाथियों की लोकेशन और गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की समस्या का समय रहते पता लगाया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">वन अधिकारियों का मानना है कि जंगलों में रहने वाले हाथियों के स्वास्थ्य की निगरानी आसान नहीं होती। कई बार बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते और जब तक स्थिति स्पष्ट होती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ऐसे में तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से निगरानी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विभाग का उद्देश्य सिर्फ मौतों के कारणों की पहचान करना नहीं बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की मौजूदगी में पोस्टमॉर्टम कराया गया था। जांच रिपोर्ट में एक शावक की मौत हेपेटाइटिस और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया के कारण होने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग अब एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर रहा है ताकि हाथी शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और जंगलों में संक्रमण से जुड़े मामलों की समय रहते पहचान हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:57:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पोल्ट्री फार्म में घुसा तेंदुआ, 10 मुर्गियों का किया शिकार</title>
                                    <description><![CDATA[धमतरी के मोहलाई गांव में CCTV में कैद हुई घटना, रिहायशी इलाके के करीब तेंदुए की मौजूदगी से ग्रामीणों में बढ़ी चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a2541ae6b9a3/article-55190"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/leopard-attack-dhamtari.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक बार फिर तेंदुए की आमद ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। जिले के केरेगांव रेंज अंतर्गत ग्राम मोहलाई स्थित एक निजी पोल्ट्री फार्म में गुरुवार देर रात तेंदुआ घुस गया और उसने करीब 10 मुर्गियों का शिकार कर लिया। पूरी घटना वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई, जिसका वीडियो अब सामने आया है। वीडियो में तेंदुआ फार्म के भीतर घूमता दिखाई देता है और कुछ मुर्गियों को अपने जबड़े में दबाकर ले जाते हुए नजर आता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जानकारी के मुताबिक, घटना गुरुवार रात की है। बताया जा रहा है कि तेंदुआ पोल्ट्री फार्म की सुरक्षा जाली को नुकसान पहुंचाकर अंदर दाखिल हुआ था। जैसे ही वह फार्म के भीतर पहुंचा, वहां मौजूद मुर्गियों में अफरा-तफरी मच गई। कई मुर्गियां इधर-उधर भागने लगीं जबकि कुछ डर के कारण एक कोने में सिमट गईं। इसी दौरान तेंदुए ने एक के बाद एक कई मुर्गियों को अपना शिकार बना लिया। सुबह जब फार्म संचालक वहां पहुंचे तो उन्हें कई मुर्गियां गायब मिलीं और कुछ मृत अवस्था में पड़ी थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल है क्योंकि जिस पोल्ट्री फार्म में तेंदुआ घुसा, वह रिहायशी क्षेत्र से महज 500 से 700 मीटर की दूरी पर स्थित है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर तेंदुआ भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाके की ओर बढ़ा तो लोगों की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो सकता है। खासकर बच्चों और मवेशियों को लेकर ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। गांव के लोगों ने वन विभाग से लगातार निगरानी और सुरक्षा इंतजाम बढ़ाने की मांग की है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्थानीय लोगों के अनुसार मोहलाई गांव जंगल से सटा हुआ क्षेत्र है। यहां अक्सर हिरण, चीतल, सियार और लकड़बग्घा जैसे वन्य जीव दिखाई देते रहते हैं। हालांकि तेंदुए की मौजूदगी ने लोगों की चिंता कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ समय में यह तीसरी बार है जब आसपास के पोल्ट्री फार्मों के नजदीक तेंदुआ देखा गया है। इससे पहले भी उसकी गतिविधियां दर्ज की गई थीं, लेकिन मुर्गियों पर इस तरह हमला करने की घटना सामने नहीं आई थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पोल्ट्री फार्म संचालक साजिद अब्दुल हमीद ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज में तेंदुआ दो से तीन मुर्गियों को उठाकर ले जाता दिखाई दे रहा है, लेकिन वास्तविक नुकसान इससे कहीं ज्यादा है। उनके अनुसार करीब 10 मुर्गियां गायब मिलीं और कुछ मुर्गियां मृत पड़ी थीं। उन्होंने बताया कि बीते 10 दिनों के दौरान फार्म में लगभग 500 मुर्गियों की मौत हुई है, जिससे उन्हें एक से डेढ़ लाख रुपये तक का नुकसान होने का अनुमान है। लगातार हो रहे नुकसान को देखते हुए उन्होंने पूरे फार्म को फिलहाल खाली करा दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। अधिकारियों ने आसपास के क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है। वन विभाग के कर्मचारियों ने ग्रामीणों से रात के समय अकेले जंगल की ओर नहीं जाने, छोटे बच्चों को घर के आसपास रखने और पालतू पशुओं को सुरक्षित स्थान पर बांधने की सलाह दी है। गांव में लोगों को सतर्क रहने के लिए भी कहा गया है। धमतरी वन मंडल के डीएफओ श्रीकृष्ण जाधव ने बताया कि मोहलाई गांव स्थित पोल्ट्री फार्म में तेंदुए के घुसने की सूचना विभाग को मिली है। प्रारंभिक जांच में तेंदुए की गतिविधि की पुष्टि हुई है। उन्होंने बताया कि विभाग की टीम लगातार गश्त कर रही है और पूरे इलाके पर नजर रखी जा रही है। साथ ही पोल्ट्री फार्म में हुए नुकसान का आंकलन करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि नियमानुसार क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया पूरी की जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग का मानना है कि जंगलों में भोजन की उपलब्धता कम होने और मानव बस्तियों के विस्तार के कारण कई बार जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पहुंच जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में लोगों को घबराने की बजाय सतर्क रहने की जरूरत होती है। वहीं ग्रामीण चाहते हैं कि वन विभाग इलाके में कैमरा ट्रैप लगाए और तेंदुए की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे ताकि किसी बड़ी घटना को रोका जा सके। मोहलाई गांव और आसपास के क्षेत्रों में तेंदुए की मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है। सीसीटीवी में कैद तस्वीरों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि वन विभाग जल्द ही प्रभावी कदम उठाएगा, जिससे लोगों और पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 16:27:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>नंदनवन जू और जंगल सफारी घूमना हुआ महंगा, टिकट दरों में बड़ा इजाफा</title>
                                    <description><![CDATA[नई रेट पॉलिसी लागू, बच्चों से लेकर विदेशी पर्यटकों तक सभी पर बढ़े शुल्क का असर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/visiting-nandanvan-zoo-and-jungle-safari-becomes-expensive-big-increase/article-54613"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/nandanvan-zoo.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नवा रायपुर स्थित नंदनवन जू और जंगल सफारी घूमने का प्लान बना रहे पर्यटकों को अब पहले की तुलना में ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने जंगल सफारी और नंदनवन जू की टिकट दरों में संशोधन करते हुए नई रेट पॉलिसी लागू कर दी है। नई व्यवस्था के तहत प्रवेश टिकट, सफारी राइड और अन्य सुविधाओं के शुल्क में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है। कई श्रेणियों में टिकट दरें लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ाई गई हैं, जबकि कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी दोगुनी से भी अधिक है। नए शुल्क लागू होने के बाद परिवार के साथ घूमने आने वाले पर्यटकों के बजट पर सीधा असर पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नई दरों के अनुसार अब 6 से 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए जू एंट्री टिकट 25 रुपए के बजाय 50 रुपए देना होगा। यानी बच्चों के टिकट शुल्क में सीधे 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। वहीं 12 वर्ष से अधिक उम्र के पर्यटकों के लिए जू एंट्री टिकट 50 रुपए से बढ़ाकर 100 रुपए कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि अब एक सामान्य परिवार को पहले की तुलना में प्रवेश के लिए लगभग दोगुना खर्च करना पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विदेशी पर्यटकों के लिए भी शुल्क में बड़ा बदलाव किया गया है। पहले जहां विदेशी नागरिकों के लिए प्रवेश टिकट 200 रुपए था, वहीं अब इसे बढ़ाकर 500 रुपए कर दिया गया है। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि विदेशी पर्यटकों के लिए शुल्क में हुई यह वृद्धि काफी बड़ी है और इसका असर आने वाले समय में पर्यटक संख्या पर भी पड़ सकता है। हालांकि वन विभाग का कहना है कि बढ़ी हुई राशि का उपयोग सुविधाओं के विकास और रखरखाव पर किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नई नीति में वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों को कुछ राहत जरूर दी गई है। 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग व्यक्तियों को पहले की तरह नि:शुल्क प्रवेश की सुविधा जारी रहेगी। इसके लिए उन्हें अपना वैध पहचान पत्र दिखाना होगा। हालांकि विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह छूट सप्ताहांत, सार्वजनिक अवकाश और सरकारी छुट्टियों के दौरान लागू नहीं होगी। ऐसे दिनों में उन्हें भी निर्धारित नियमों का पालन करना होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जंगल सफारी और जू के रखरखाव, पशु संरक्षण, सुरक्षा व्यवस्था और पर्यटक सुविधाओं पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ा है। इसी को ध्यान में रखते हुए टिकट दरों में संशोधन का फैसला लिया गया है। विभाग का दावा है कि नई आय से सफारी क्षेत्र में बेहतर सुविधाएं विकसित की जाएंगी, पर्यटकों के लिए आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाएंगी और वन्यजीवों की देखभाल को और मजबूत बनाया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गौरतलब है कि पूर्व में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान जंगल सफारी के शुल्क में कमी की गई थी। उस समय नंदनवन जू का प्रवेश भी सफारी पैकेज में शामिल रहता था। बाद में दोनों को अलग-अलग कर दिया गया, जिससे पर्यटकों को अलग टिकट लेना पड़ने लगा। अब नए संशोधन के बाद कुल खर्च और बढ़ गया है। इससे खासकर उन परिवारों पर असर पड़ेगा जो बच्चों के साथ सप्ताहांत में यहां घूमने आते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नंदनवन जंगल सफारी छत्तीसगढ़ की प्रमुख पर्यटन और वन्यजीव स्थलों में से एक मानी जाती है। यह नवा रायपुर के सेक्टर-39 में स्थित है और राजधानी रायपुर से अच्छी सड़क कनेक्टिविटी के कारण बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। रायपुर रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 35 किलोमीटर और स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट से करीब 15 किलोमीटर है। लगभग 800 एकड़ क्षेत्र में फैली यह सफारी प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली के लिए जानी जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सफारी परिसर में 130 एकड़ का खांडवा जलाशय भी मौजूद है, जहां हर वर्ष विभिन्न प्रजातियों के प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं। यह क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों और वन्यजीव फोटोग्राफरों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना रहता है। यहां आने वाले पर्यटक प्राकृतिक वातावरण के बीच वन्यजीवों को करीब से देखने का अनुभव प्राप्त करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जंगल सफारी में चार अलग-अलग सफारी जोन विकसित किए गए हैं। इनमें शाकाहारी सफारी, भालू सफारी, टाइगर सफारी और शेर सफारी शामिल हैं। प्रत्येक जोन को वन्यजीवों की जरूरतों के अनुसार डिजाइन किया गया है। जानवरों के लिए प्राकृतिक वातावरण तैयार करने के उद्देश्य से यहां बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया गया है और लगभग 55 हजार पौधे लगाए गए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गर्मी के मौसम में वन्यजीवों की सुरक्षा और आराम के लिए विशेष इंतजाम भी किए गए हैं। कई बाड़ों में कूलर और पानी के फव्वारे लगाए गए हैं ताकि जानवरों को अत्यधिक तापमान से राहत मिल सके। भालुओं समेत अन्य वन्यजीवों के लिए विशेष आहार की व्यवस्था भी की जा रही है। उन्हें तरबूज और अन्य मौसमी फल दिए जा रहे हैं ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। नई टिकट दरों को लेकर पर्यटकों की मिश्रित प्रतिक्रिया सामने आ रही है। कुछ लोगों का मानना है कि बेहतर सुविधाओं के लिए शुल्क बढ़ाना जरूरी है, जबकि कई पर्यटक इसे आम परिवारों के बजट पर अतिरिक्त बोझ बता रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 18:05:07 +0530</pubDate>
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                <title>बस्तर के तेंदूपत्ता गोदाम में भीषण आग, हजार बोरे राख; बीजापुर मामले में DFO हटाए गए</title>
                                    <description><![CDATA[सरगीपाल गोदाम में आग से बड़ा नुकसान, शॉर्ट सर्किट और लापरवाही की आशंका; बीजापुर अग्निकांड के बाद सरकार सख्त, सागर जाधव को नई जिम्मेदारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/major-fire-in-tendupatta-godown-of-bastar-thousands-of-sacks/article-54441"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/bastar-fire.jpg" alt=""></a><br /><p>छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में तेंदूपत्ता गोदाम में लगी भीषण आग ने वन विभाग और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। बुधवार शाम सरगीपाल स्थित गोदाम में अचानक आग भड़क उठी, जिसने देखते ही देखते पूरे परिसर को अपनी चपेट में ले लिया। इस हादसे में करीब एक हजार बोरा तेंदूपत्ता जलकर राख हो गया। आग इतनी तेजी से फैली कि मौके पर मौजूद कर्मचारियों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। घंटों की मशक्कत के बाद वन विभाग और दमकल टीम ने आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक भारी नुकसान हो चुका था।</p>
<p>जानकारी के अनुसार गोदाम में बड़ी मात्रा में तेंदूपत्ता का स्टॉक रखा गया था, जिसे सुकमा जिले से लाकर यहां सुरक्षित रखा गया था। यह तेंदूपत्ता पिछले साल का संग्रहित स्टॉक बताया जा रहा है। आग लगने की सूचना मिलते ही वन अमला, दमकल विभाग और स्थानीय प्रशासन की टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं। आग पर नियंत्रण पाने के लिए कई दमकल वाहनों का इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक आग की लपटें काफी ऊंचाई तक उठ रही थीं और धुएं का गुबार दूर-दूर तक दिखाई दे रहा था। आसपास के ग्रामीण भी आग बुझाने के प्रयास में जुट गए थे। हालांकि सूखे तेंदूपत्ते और गर्म मौसम के कारण आग तेजी से फैलती चली गई। अधिकारियों ने समय रहते आसपास के हिस्सों को खाली कराया, जिससे कोई जनहानि नहीं हुई।</p>
<p>वन विभाग के शुरुआती अनुमान के अनुसार करीब एक हजार बोरा तेंदूपत्ता पूरी तरह जल चुका है। फिलहाल नुकसान का सटीक आंकलन किया जा रहा है। आग लगने के कारणों की जांच भी शुरू कर दी गई है। शुरुआती तौर पर शॉर्ट सर्किट या किसी प्रकार की लापरवाही को वजह माना जा रहा है। हालांकि अधिकारी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विस्तृत जांच की बात कह रहे हैं।</p>
<p>यह घटना ऐसे समय हुई है जब कुछ दिन पहले ही बीजापुर जिले में एक निजी तेंदूपत्ता गोदाम में भीषण आग लगी थी। उस हादसे में करीब 18 हजार बोरे जलकर खाक हो गए थे। शुरुआती अनुमान के मुताबिक बीजापुर की घटना में 10 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ था। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<p>बीजापुर अग्निकांड के बाद राज्य सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने मामले की उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक ली थी। इसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए बीजापुर के डीएफओ रमेश कुमार जांगड़े को उनके पद से हटा दिया गया। उनकी जगह सागर जाधव को नई जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए हैं।</p>
<p>सरकार का मानना है कि तेंदूपत्ता जैसे महत्वपूर्ण वन उत्पाद के संरक्षण में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यही कारण है कि लगातार दूसरी बड़ी आग की घटना के बाद विभागीय स्तर पर भी सतर्कता बढ़ा दी गई है। अधिकारियों को गोदामों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने और आग से बचाव के इंतजाम मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।</p>
<p>तेंदूपत्ता छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा माना जाता है। हजारों ग्रामीण और वनवासी परिवार इसकी तुड़ाई और व्यापार से जुड़े हुए हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर तेंदूपत्ता का नुकसान न केवल सरकारी राजस्व को प्रभावित करता है बल्कि स्थानीय रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर डालता है।</p>
<p>इन घटनाओं के बाद बीमा क्लेम को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। जानकारी के मुताबिक तेंदूपत्ता के बड़े स्टॉक का अक्सर बीमा कराया जाता है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं इन घटनाओं के पीछे बीमा क्लेम का एंगल तो नहीं हो सकता। हालांकि अधिकारियों ने अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि संबंधित गोदामों का बीमा हुआ था या नहीं और सुरक्षा मानकों का पालन किस हद तक किया गया।</p>
<p>वन विभाग का कहना है कि जांच में यह भी देखा जाएगा कि गोदामों में अग्निशमन उपकरण उपलब्ध थे या नहीं, बिजली व्यवस्था सुरक्षित थी या नहीं और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की गई थी या नहीं। लगातार हो रही आग की घटनाओं ने विभाग को अलर्ट मोड पर ला दिया है। गर्मियों के मौसम में सूखे तेंदूपत्ते अत्यधिक ज्वलनशील हो जाते हैं। यदि गोदामों में पर्याप्त वेंटिलेशन, बिजली सुरक्षा और अग्निशमन व्यवस्था न हो तो छोटी सी चिंगारी भी बड़े हादसे में बदल सकती है। इसलिए गोदामों की नियमित जांच और आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था बेहद जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 16:11:07 +0530</pubDate>
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