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                <title>Rajya Sabha - दैनिक जागरण</title>
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                <title>बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, TMC के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा उपचुनाव से पहले भाजपा ने सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक को बनाया उम्मीदवार, टीएमसी में बढ़ी राजनीतिक हलचल।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-upheaval-in-bengal-politics-three-former-tmc-rajya-sabha/article-58360"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/tmc-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है। भाजपा ने पार्टी में शामिल होते ही तीनों नेताओं को राज्यसभा की रिक्त सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस राजनीतिक बदलाव को पश्चिम बंगाल की बदलती सियासी तस्वीर और आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। राज्यसभा उपचुनाव से ठीक पहले हुए इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। तीनों नेताओं ने कुछ सप्ताह पहले ही राज्यसभा सदस्यता और तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। उस समय उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर मनमाने तरीके से फैसले लेने और वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करने के आरोप लगाए थे। अब भाजपा में शामिल होने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को नई दिशा मिलने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा ने इन तीनों नेताओं को जिस तेजी से राज्यसभा उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया है, उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी बंगाल में अपने संगठन को और मजबूत करने के लिए अनुभवी नेताओं पर भरोसा जता रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। राज्यसभा की इन तीन रिक्त सीटों के लिए 24 जुलाई को मतदान और मतगणना होगी। निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार 14 जुलाई तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे, जबकि 15 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी। ऐसे में अगले कुछ दिनों तक बंगाल की राजनीति पूरी तरह इन उपचुनावों और दल-बदल की चर्चाओं के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा में शामिल होने के बाद सुखेंदु शेखर राय ने अपने इस्तीफे के पीछे की वजह भी सार्वजनिक रूप से बताई। उन्होंने कहा कि आरजी कर अस्पताल रेप और हत्या मामले में उन्होंने सबूतों से कथित छेड़छाड़ और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। उन्होंने दावा किया कि उनके परिवार के सदस्यों के अपहरण की धमकी भी दी गई। सुखेंदु के अनुसार उन्होंने पुलिस आयुक्त और अस्पताल प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की थी, लेकिन उनकी बात पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यहां तक कि खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्हें पुलिस मुख्यालय बुलाया गया, जिसके बाद उन्हें न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुष्मिता देव ने भी भाजपा में शामिल होने के बाद अपने बयान से राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भाजपा की लगातार बढ़ती ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनता के विश्वास को दर्शाती है। उन्होंने असम में लगातार तीसरी बार भाजपा सरकार बनने को इसकी बड़ी मिसाल बताया। साथ ही उन्होंने टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अन्य राजनीतिक दल उन्हें अपने साथ नहीं लेना चाहते, इसलिए वे अब भी टीएमसी में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने इन इस्तीफों और भाजपा में शामिल होने की घटना को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया है। टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि तीनों नेता पहले से ही भाजपा के संपर्क में थे। उनके अनुसार अब भाजपा ने केवल अपनी राजनीतिक जरूरत के कारण उन्हें उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने दावा किया कि इससे तृणमूल कांग्रेस को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा और भाजपा को भी कोई बड़ा लाभ मिलने वाला नहीं है। सौगत रॉय का कहना है कि दल बदलने वाले नेताओं का राजनीतिक प्रभाव सीमित होता है और जनता ऐसे नेताओं को अधिक महत्व नहीं देती।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर लगातार असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने पार्टी छोड़ दी या अलग गुट बना लिया। उपलब्ध राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार लोकसभा में टीएमसी के सांसदों की संख्या में भी कमी आई है। राज्यसभा में भी कई सांसदों के इस्तीफे के बाद पार्टी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।</p>
<p style="text-align:justify;">विधानसभा में भी पार्टी के सामने चुनौती बढ़ी है। चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद कई विधायक अलग गुट का हिस्सा बन चुके हैं। इससे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती और बढ़ गई है। हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार दावा कर रहा है कि संगठन पूरी तरह मजबूत है और कुछ नेताओं के जाने से उसके जनाधार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पश्चिम बंगाल में दल-बदल की राजनीति नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी रफ्तार काफी बढ़ी है। भाजपा और टीएमसी दोनों एक-दूसरे के नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इससे राज्य की राजनीति लगातार अधिक प्रतिस्पर्धी होती जा रही है। राज्यसभा उपचुनाव के नतीजे भले ही सीमित सीटों तक हों, लेकिन उनका राजनीतिक संदेश आने वाले चुनावों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाएगा। भाजपा बंगाल में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दे रही है जिनका प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक पहचान मजबूत हो। वहीं टीएमसी अपने संगठन को मजबूत रखने और असंतुष्ट नेताओं को रोकने की कोशिश में जुटी हुई है। आने वाले महीनों में दोनों दलों के बीच राजनीतिक संघर्ष और तेज होने की संभावना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:41:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा, राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के बाद फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने और भाजपा द्वारा दोबारा उम्मीदवार न बनाए जाने के बाद यह फैसला सामने आया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/resignation-of-union-minister-george-kurien-decision-after-the-end/article-56698"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/george-korean.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">केंद्र सरकार में राज्य मंत्री रहे जॉर्ज कुरियन ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति भवन की ओर से मंगलवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। हालांकि इस्तीफे के पीछे की आधिकारिक वजह सार्वजनिक नहीं की गई है। 65 वर्षीय कुरियन मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनका राज्यसभा कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो गया था और भाजपा ने हालिया राज्यसभा चुनाव में उन्हें दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया।</p>
<p class="isSelectedEnd">जॉर्ज कुरियन अगस्त 2024 से मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्यसभा सदस्य थे। भाजपा संगठन में उनकी पहचान लंबे समय से दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में पार्टी के प्रमुख चेहरों में रही है। राजनीतिक हलकों में उनके इस्तीफे को आगामी संगठनात्मक और मंत्रिमंडलीय बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में संपन्न केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा के अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाने को भी इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में 140 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी, जबकि पार्टी ने राज्य में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाया था।</p>
<h3>केरल में भाजपा का चेहरा</h3>
<p class="isSelectedEnd">जॉर्ज कुरियन केरल के प्रमुख ईसाई संप्रदाय सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च से जुड़े रहे हैं। वे वर्षों तक टीवी डिबेट्स और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाजपा का पक्ष रखने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल रहे।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के केरल दौरों के दौरान कुरियन अक्सर उनके भाषणों का मलयालम में अनुवाद करते दिखाई देते थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करना केरल के ईसाई समुदाय के बीच भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा था।</p>
<h3>राज्यसभा चुनाव से संकेत</h3>
<p class="isSelectedEnd">18 जून को 12 राज्यों की 26 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें अधिकांश सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए। भाजपा ने 4 जून को अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, जिसमें जॉर्ज कुरियन और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा मौका नहीं दिया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों नेताओं के टिकट कटने के बाद से ही केंद्र सरकार में संभावित फेरबदल की अटकलें तेज हो गई थीं। अब कुरियन के इस्तीफे ने इन चर्चाओं को और बल दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा आने वाले महीनों में संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर नई रणनीति के तहत बदलाव कर सकती है। दक्षिण भारत में पार्टी के प्रदर्शन और विस्तार को लेकर भी नेतृत्व नए सिरे से समीक्षा कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इससे पहले तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई के इस्तीफे ने भी दक्षिण भारत की राजनीति में हलचल पैदा की थी। ऐसे में जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा भाजपा की दक्षिण भारत रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p>फिलहाल भाजपा नेतृत्व की ओर से कुरियन की भविष्य की भूमिका को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी है कि पार्टी उन्हें संगठन में नई जिम्मेदारी दे सकती है। केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा अब राष्ट्रीय राजनीति और भारत समाचार अपडेट में प्रमुख चर्चा का विषय बन गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:04:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दैनिक जागरण]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राज्यसभा उम्मीदवारी पर सुप्रीम कोर्ट से मीनााक्षी नटराजन को झटका</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में नामांकन खारिज होने के खिलाफ दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज, चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप से किया इनकार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a2bcf22157b3/article-55735"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/meenakshi-natarajan-(4).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीटों को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र रद्द किए जाने को चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित है और ऐसे मामलों में चुनावी प्रक्रिया के दौरान दखल नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब किसी उम्मीदवार का नामांकन रिटर्निंग अधिकारी द्वारा खारिज कर दिया जाता है, तब संविधान के प्रावधानों को देखते हुए अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि पहले भी कई मामलों में चुनाव प्रक्रिया के बीच अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए न्यायालयों ने हस्तक्षेप से परहेज किया है। सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि नामांकन पत्र खारिज करने में स्पष्ट और गंभीर त्रुटि हुई है। उनके अनुसार यह ऐसा मामला था जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी था। सिंघवी ने यह भी सवाल उठाया कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में था, तब भी चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने अदालत में कहा कि उनकी मुवक्किल केवल चुनाव लड़ने का अवसर चाहती थीं। उनका तर्क था कि किसी उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतरने का मौका मिलना चाहिए और अंतिम फैसला मतदाताओं या निर्वाचन प्रक्रिया पर छोड़ दिया जाना चाहिए। सिंघवी ने यह भी कहा कि कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष की गई शिकायत पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था, इसके बावजूद परिणाम घोषित कर दिए गए। हालांकि अदालत ने इस दलील पर सहमति नहीं जताई। पीठ ने पूछा कि क्या ऐसा कोई उदाहरण मौजूद है जिसमें नामांकन खारिज होने के बाद चुनाव प्रक्रिया के बीच सर्वोच्च अदालत ने हस्तक्षेप किया हो। अदालत ने कहा कि चाहे रिटर्निंग अधिकारी का निर्णय गलत ही क्यों न हो, लेकिन कानून ने इसके लिए अलग उपचार का प्रावधान किया है और चुनाव प्रक्रिया के दौरान सीधे न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान भाजपा उम्मीदवारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी भी उपस्थित रहे। उन्होंने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत के कई पुराने फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि चुनाव लड़ने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता। मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटों में से एक के लिए मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया था, लेकिन भाजपा नेताओं ने उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में हैदराबाद की एक अदालत से जुड़े मामले का पूरा विवरण नहीं दिया। आपत्तियों पर विचार करने के बाद रिटर्निंग अधिकारी और मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा ने नटराजन का नामांकन पत्र खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया कि उनके द्वारा दाखिल किया गया फॉर्म-26 अधूरा था और उसमें एक न्यायिक नोटिस का उल्लेख नहीं किया गया था। रिटर्निंग अधिकारी ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने की श्रेणी में माना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस निर्णय के बाद कांग्रेस ने इसे राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चुनौती दी। पार्टी का कहना था कि मीनाक्षी नटराजन किसी आपराधिक मामले में आरोपी नहीं हैं। कांग्रेस के अनुसार जिस मामले का हवाला दिया गया, उसमें उनका नाम केवल एक अलग निजी शिकायत में आया था और उनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। पार्टी ने यह भी तर्क दिया कि प्रारंभिक नोटिस को लंबित आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता, इसलिए उसका खुलासा करना आवश्यक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इन दलीलों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की। अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश का असर भविष्य में दायर की जाने वाली किसी चुनाव याचिका पर नहीं पड़ेगा। यानी यदि मीनाक्षी नटराजन या कांग्रेस इस मामले को आगे चुनाव याचिका के रूप में संबंधित उच्च न्यायालय में ले जाना चाहें तो उनके लिए रास्ता खुला रहेगा। उधर, राज्यसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं। नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद चुनावी मुकाबले की संभावना लगभग समाप्त हो गई थी और भाजपा उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय माना जा रहा था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>चुनाव</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:20:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>टीएमसी को एक और झटका, राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने दिया इस्तीफा</title>
                                    <description><![CDATA[एक हफ्ते में तीसरे सांसद ने छोड़ी पार्टी, बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल; ममता बनर्जी के नेतृत्व पर उठने लगे सवाल]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a2a563257bd5/article-55605"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/prakash-chik-baraik.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को एक और बड़ा झटका लगा है। पार्टी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने अपने पद से इस्तीफा देकर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। पिछले एक सप्ताह के भीतर टीएमसी छोड़ने वाले वे तीसरे राज्यसभा सांसद बन गए हैं। इससे पहले सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव के इस्तीफे ने भी पार्टी को असहज स्थिति में ला दिया था। लगातार हो रहे इन इस्तीफों को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">जानकारी के मुताबिक प्रकाश चिक बराइक ने अपना इस्तीफा राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन को सौंप दिया है। अपने संक्षिप्त इस्तीफा पत्र में उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का अनुरोध किया है। साथ ही उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान मिले सहयोग के लिए सभापति और राज्यसभा सचिवालय का आभार भी व्यक्त किया। हालांकि इस्तीफे के पीछे की स्पष्ट वजह सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में बदले राजनीतिक समीकरणों का असर अब टीएमसी के संगठन और संसदीय दल पर भी दिखाई देने लगा है। राज्यसभा में पार्टी की ताकत लगातार घट रही है। प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे के बाद उच्च सदन में टीएमसी सांसदों की संख्या और कम हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd"> बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने सार्वजनिक रूप से संगठन की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर नाराजगी जताई थी। अब सांसदों के इस्तीफे उस असंतोष को और स्पष्ट रूप से सामने ला रहे हैं। बताया जा रहा है कि राज्य में कई विधायक भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर नए विकल्प तलाश रहे हैं। इसी बीच कुछ नेताओं के दूसरे राजनीतिक समूहों के संपर्क में होने की चर्चाएं भी तेज हैं। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक इन अटकलों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। टीएमसी के लिए चिंता की बात केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं है। बंगाल विधानसभा में भी पार्टी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं मानी जा रही। राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विपक्ष लगातार दावा कर रहा है कि टीएमसी के कई विधायक और नेता पार्टी नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने ऐसे समय में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है, जब राज्य में विपक्षी दल लगातार टीएमसी पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में और सांसद या विधायक पार्टी छोड़ते हैं तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में टीएमसी की भूमिका पर भी पड़ सकता है। टीएमसी लंबे समय से खुद को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विपक्षी शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती रही है। लेकिन लगातार सामने आ रही अंदरूनी चुनौतियां उस रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं। पार्टी नेतृत्व के सामने अब संगठन को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">उधर, विपक्षी दल इन इस्तीफों को टीएमसी के कमजोर होते जनाधार और संगठनात्मक संकट से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति अब खुलकर सामने आने लगी है। हालांकि टीएमसी के नेताओं का दावा है कि पार्टी अभी भी मजबूत स्थिति में है और कुछ नेताओं के जाने से संगठन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। आने वाले सप्ताह टीएमसी के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि पार्टी नेतृत्व असंतुष्ट नेताओं को मनाने में सफल रहता है तो स्थिति संभल सकती है, लेकिन यदि इस्तीफों का सिलसिला जारी रहा तो बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बनते दिखाई दे सकते हैं। प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल अभी थमने वाली नहीं है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 12:36:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>TMC में बढ़ी सियासी हलचल, एक और राज्यसभा सांसद ने दिया इस्तीफा</title>
                                    <description><![CDATA[सुष्मिता देव के इस्तीफे से तृणमूल कांग्रेस को नया झटका, सांसदों और विधायकों की बगावत के बीच ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी सक्रिय]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/political-stir-increases-in-tmc-another-rajya-sabha-mp-resigns/article-55548"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sushmita-dev-resignation.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के लिए मुश्किलों का दौर थमता नजर नहीं आ रहा है। पार्टी में लगातार जारी टूट के बीच बुधवार को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और संसद दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया है। पिछले तीन दिनों में यह दूसरा मौका है जब तृणमूल कांग्रेस के किसी राज्यसभा सांसद ने पार्टी से किनारा किया है। इससे पहले 8 जून को सुखेंदु शेखर ने भी पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुष्मिता देव के इस्तीफे ने ऐसे समय में तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है जब पार्टी पहले से ही सांसदों और विधायकों की बगावत का सामना कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष की ओर भी संकेत करता है। हालांकि सुष्मिता देव ने अपने इस्तीफे को व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों से जुड़ा फैसला बताया है, लेकिन उनके इस कदम के दूरगामी राजनीतिक असर देखने को मिल सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस्तीफे के बाद मीडिया से बातचीत में सुष्मिता देव ने कहा कि राज्यसभा की सीट उन्हें पार्टी की ओर से मिली थी, इसलिए पार्टी छोड़ने के साथ उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ना भी उचित समझा। उन्होंने साफ किया कि फिलहाल वह किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर कोई निर्णय नहीं ले रही हैं। भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर उन्होंने कहा कि अभी वह कुछ समय आराम करना चाहती हैं और अपने परिवार के साथ समय बिताएंगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष लगातार बड़ा रूप लेता दिखाई दे रहा है। पार्टी के लोकसभा सांसदों और विधायकों के एक बड़े वर्ग ने अलग रुख अपनाया है। हाल के दिनों में बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी हलचल तब देखने को मिली जब बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग गुट बनाकर अपना नेता चुन लिया। बागी खेमे का दावा है कि उनके साथ और भी विधायक जुड़ सकते हैं। इससे पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">लोकसभा में भी पार्टी की स्थिति चुनौतीपूर्ण होती दिखाई दे रही है। हाल के घटनाक्रमों के बाद तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों ने अलग रुख अपनाया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में कुछ और नेता भी अपना फैसला बदल सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से स्थिति को नियंत्रण में बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लगातार हो रहे इस्तीफे और बगावत के संकेत अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन घटनाक्रमों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। दिल्ली में अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच विपक्षी एकजुटता और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। इससे एक दिन पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं की बैठक करीब एक घंटे तक चली थी।</p>
<p class="isSelectedEnd"> तृणमूल कांग्रेस फिलहाल दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक ओर पार्टी को अपने संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष को संभालना है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका भी मजबूत बनाए रखनी है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व से लगातार हो रही मुलाकातों को विपक्षी राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पार्टी में टूट के बाद कई राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। सबसे पहले कानूनी और संवैधानिक लड़ाई की संभावना जताई जा रही है। बागी गुट और मूल नेतृत्व दोनों अपने-अपने दावों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। विधानसभा, चुनाव आयोग और न्यायालयों में इस मामले को लेकर विवाद बढ़ सकता है। साथ ही दल-बदल कानून को लेकर भी कई सवाल खड़े हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि बागी नेताओं का प्रभाव बढ़ता है तो राज्य की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों और भविष्य के विधानसभा चुनावों पर भी इसका असर पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि यदि मतभेद और गहरे हुए तो अलग राजनीतिक संगठन या स्थायी गुट के रूप में नई ताकत उभर सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा। पार्टी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है, जबकि बागी गुट अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश में जुटा हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 17:29:26 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सिद्धारमैया को राष्ट्रीय भूमिका का ऑफर, कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की चर्चा तेज</title>
                                    <description><![CDATA[सीएम पद छोड़ने के बदले राज्यसभा और 2029 लोकसभा चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी की पेशकश, दिल्ली में हाईलेवल मीटिंग के बाद अटकलें बढ़ीं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/siddaramaiah-offered-national-role-discussion-on-change-of-power-in/article-54302"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/karnataka-politics.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। दिल्ली में मंगलवार को कांग्रेस हाईकमान के साथ हुई लंबी बैठकों के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को सीएम पद छोड़ने के बदले राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका का प्रस्ताव दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस नेतृत्व उन्हें राज्यसभा भेजकर 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सूत्रों का दावा है कि दिल्ली में करीब सात घंटे चली हाईलेवल मीटिंग के दौरान सत्ता परिवर्तन और संगठनात्मक बदलावों पर गंभीर चर्चा हुई। हालांकि सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस नेताओं ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत केवल राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों को लेकर थी, लेकिन अंदरखाने से निकल रही जानकारी कुछ और ही संकेत दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि सिद्धारमैया को यह समझाने की कोशिश की गई है कि पार्टी को अब राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत ओबीसी नेतृत्व की जरूरत है। खासकर ऐसे समय में जब कांग्रेस सामाजिक न्याय और जाति जनगणना जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय एजेंडे में आगे बढ़ा रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>राज्यसभा और दिल्ली भूमिका का ऑफर</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस नेतृत्व ने सिद्धारमैया से कहा है कि यदि वे मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा के रास्ते दिल्ली आते हैं तो उन्हें केंद्र में एक बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी दी जा सकती है। इसमें 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति में अहम भूमिका शामिल हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रस्ताव को एक “सम्मानजनक एग्जिट फॉर्मूला” के रूप में देखा जा रहा है, ताकि सिद्धारमैया का राजनीतिक कद भी बना रहे और कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन भी सहज तरीके से पूरा हो सके। इसी बीच यह भी चर्चा है कि पार्टी उन्हें ओबीसी चेहरे के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रोजेक्ट करना चाहती है, जिससे कांग्रेस की सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूती मिल सके।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की तैयारी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक हलकों में यह लगभग तय माना जा रहा है कि कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन हो सकता है। चर्चा है कि सिद्धारमैया 28 मई के आसपास मुख्यमंत्री पद छोड़ सकते हैं, जबकि उनके स्थान पर डीके शिवकुमार के नाम पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस के भीतर पिछले काफी समय से नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही थी, जो अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। सूत्रों का कहना है कि सिद्धारमैया को पार्टी की ओर से यह संकेत दे दिया गया है कि उन्हें राष्ट्रीय भूमिका स्वीकार करनी चाहिए। बताया जा रहा है कि गुरुवार को सिद्धारमैया अपने आवास पर राज्य कैबिनेट के मंत्रियों के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग भी करने वाले हैं, जिसे राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>दिल्ली में हुई अहम बैठकें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के साथ सिद्धारमैया की सीधी बातचीत हुई, जिसमें नेतृत्व परिवर्तन और भविष्य की भूमिका पर चर्चा की गई। सूत्रों के मुताबिक इसी बैठक में उन्हें संकेत दिए गए कि पार्टी चाहती है कि वे मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करते हुए राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाएं। हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक बयान में इन सभी दावों को खारिज किया है और कहा है कि अभी केवल संगठनात्मक चुनावों और राज्यसभा नामांकन पर चर्चा हो रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>परिवार और राजनीतिक समीकरण</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">एक राजनीतिक फॉर्मूले के तहत सिद्धारमैया के बेटे को कर्नाटक में डिप्टी सीएम बनाए जाने की भी चर्चा है, हालांकि इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। साथ ही उनके करीबी नेताओं को सरकार में महत्वपूर्ण विभाग दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। राज्यसभा नामांकन की अंतिम तारीख 8 जून होने के कारण कांग्रेस नेतृत्व के पास इस फैसले को टालने का ज्यादा समय नहीं है। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति में बड़ा फैसला देखने को मिल सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 13:05:24 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>AAP को बड़ा झटका, 7 सांसदों के BJP में विलय को मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा में भाजपा की ताकत बढ़कर 113 हुई, AAP घटकर 3 सांसदों तक सिमटी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-blow-to-aap-approval-for-merger-of-7-mps/article-52217"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/aap,-bjp.jpg" alt=""></a><br /><p>राज्यसभा में आज बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब सभापति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">CP Radhakrishnan</span></span> ने आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय को मंजूरी दे दी। इस फैसले के बाद राज्यसभा में AAP की संख्या घटकर 3 रह गई, जबकि भाजपा की ताकत बढ़कर 113 सांसदों तक पहुंच गई।इस घटनाक्रम ने संसद के ऊपरी सदन में राजनीतिक संतुलन को बदल दिया है और विपक्षी खेमे में हलचल तेज कर दी है।</p>
<h5><span><strong>कौन-कौन हुए शामिल</strong></span></h5>
<p>जिन सात सांसदों के विलय को मंजूरी मिली है, उनमें <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Raghav Chadha</span></span>, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Swati Maliwal</span></span>, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रमजीत साहनी और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। इन सभी ने हाल ही में भाजपा नेतृत्व से मुलाकात के बाद पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया था। बता दें, इन सांसदों ने सभापति को आवेदन देकर खुद को भाजपा सांसद के रूप में मान्यता देने की मांग की थी, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है।</p>
<h5><span><strong>क्या है पूरा मामला</strong></span></h5>
<p>यह घटनाक्रम 24 अप्रैल को शुरू हुआ, जब राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भाजपा नेतृत्व से मुलाकात के बाद पार्टी में शामिल होने की घोषणा की थी। बाद में अन्य सांसदों ने भी इसी राह को अपनाया।इन सांसदों ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है और आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी है।</p>
<p>यह निर्णय संसद भवन, नई दिल्ली में राज्यसभा सभापति द्वारा आज सोमवार को लिया गया। इसके बाद राज्यसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इन सांसदों को भाजपा के सदस्य के रूप में अपडेट कर दिया गया।</p>
<p>इस पूरे घटनाक्रम ने दलबदल कानून की वैधानिकता और व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आम आदमी पार्टी ने इसे संविधान की 10वीं अनुसूची का उल्लंघन बताया है और आरोप लगाया है कि यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है।पार्टी के वरिष्ठ नेता <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Sanjay Singh</span></span> ने सभापति को पत्र लिखकर सभी सात सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है।</p>
<h5><span><strong>कैसे बदला राजनीतिक समीकरण</strong></span></h5>
<p>इस विलय के बाद राज्यसभा में भाजपा की ताकत 106 से बढ़कर 113 हो गई है, जिससे उसे सदन में और मजबूत स्थिति मिली है। वहीं आम आदमी पार्टी अब केवल 3 सांसदों तक सीमित रह गई है, जिससे उसका संसदीय प्रभाव काफी कम हो गया है।</p>
<p>राघव चड्ढा ने पहले कहा था कि वे खुद को “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” महसूस कर रहे थे। वहीं स्वाति मालीवाल ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए थे और कहा था कि उनके साथ पार्टी में दुर्व्यवहार हुआ।दूसरी ओर, AAP का कहना है कि यह राजनीतिक दबाव और रणनीतिक हस्तक्षेप का परिणाम है।फिलहाल यह मामला संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है, और आगे इसकी कानूनी जांच और राजनीतिक प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 15:52:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>AAP के संदीप पाठक समेत 7 सांसद BJP में शामिल, सियासत गरमाई</title>
                                    <description><![CDATA[AAP से BJP में शामिल होने पर संदीप पाठक चर्चा में, छत्तीसगढ़ में संगठन पर असर की आशंका AAP के बड़े रणनीतिक चेहरे के पाला बदलते ही सियासी हलचल तेज हो गई है।इस फैसले का असर कई राज्यों की राजनीति पर पड़ता दिख रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/7-mps-including-aaps-sandeep-pathak-join-bjp-politics-heated/article-52106"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/chhattisgarh-news.jpg" alt=""></a><br /><p>देश की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">संदीप पाठक</span></span> समेत आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। शुक्रवार शाम दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद इन नेताओं ने औपचारिक रूप से भाजपा मुख्यालय पहुंचकर पार्टी जॉइन की। इस घटनाक्रम ने खासतौर पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है, क्योंकि संदीप पाठक को AAP का प्रमुख रणनीतिकार और संगठन का मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है।</p>
<p>बताया जा रहा है कि इस राजनीतिक बदलाव के साथ AAP के भीतर संगठनात्मक संतुलन पर असर पड़ सकता है। खासकर उन राज्यों में जहां पार्टी विस्तार की कोशिश कर रही थी। छत्तीसगढ़ में पाठक की सक्रिय भूमिका को देखते हुए उनके भाजपा में जाने को बड़ा झटका माना जा रहा है।</p>
<h5><strong>कौन-कौन शामिल</strong></h5>
<p>इस घटनाक्रम में <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">राघव चड्ढा</span></span> समेत सात सांसदों के नाम सामने आए हैं, जिन्होंने BJP जॉइन की। इनमें अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी, स्वाति मालीवाल और राजेंद्र गुप्ता जैसे नेता भी शामिल हैं।</p>
<p>सूत्रों के मुताबिक, प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद सभी नेता भाजपा मुख्यालय पहुंचे और औपचारिक सदस्यता ली। इस दौरान पार्टी नेतृत्व ने उनका स्वागत किया और इसे भाजपा के प्रति बढ़ते विश्वास का संकेत बताया।</p>
<h5><strong>छत्तीसगढ़ कनेक्शन</strong></h5>
<p>संदीप पाठक का छत्तीसगढ़ से गहरा जुड़ाव रहा है। वे राज्य के प्रभारी रह चुके हैं और यहां संगठन खड़ा करने में उनकी भूमिका अहम मानी जाती है। बताया जा रहा है कि उनके जाने से प्रदेश में AAP कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।</p>
<p>AAP के कार्यकारी अध्यक्षों ने हालांकि दावा किया है कि पाठक पिछले दो वर्षों से राज्य में सक्रिय नहीं थे और उनके जाने से पार्टी को बड़ा नुकसान नहीं होगा। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।</p>
<p>पूर्व मुख्यमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भूपेश बघेल</span></span> ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए AAP को भाजपा की ‘बी टीम’ करार दिया। वहीं मुख्यमंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">विष्णुदेव साय</span></span> ने इसे भाजपा की नीतियों में बढ़ते भरोसे का संकेत बताया।</p>
<h5><strong>रणनीतिक भूमिका</strong></h5>
<p>AAP के भीतर संदीप पाठक की पहचान एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर रही है। उन्होंने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। उम्मीदवार चयन, बूथ मैनेजमेंट और कैडर निर्माण में उनकी रणनीति को सफल माना गया।</p>
<p>पार्टी ने उन्हें गुजरात, गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विस्तार की जिम्मेदारी भी दी थी। ऐसे में उनका जाना सिर्फ एक नेता का बदलाव नहीं, बल्कि संगठनात्मक ढांचे में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।फिलहाल, AAP के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को मजबूत बनाए रखना और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 16:39:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राघव चड्ढा BJP में शामिल, AAP के 7 सांसद साथ आने का दावा</title>
                                    <description><![CDATA[राघव चड्ढा ने BJP जॉइन का ऐलान किया, AAP के दो-तिहाई राज्यसभा सांसदों के समर्थन की बात AAP से बड़ा राजनीतिक झटका, राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बदली सियासी पारी। दावा—पार्टी के 10 में से 7 सांसद साथ, राजनीति में हलचल तेज।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/raghav-chadha-claims-that-7-aap-mps-will-join-bjp/article-52026"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/raghav-chadha-bjp.jpg" alt=""></a><br /><p>दिल्ली में आज आम आदमी पार्टी (AAP) को बड़ा झटका देते हुए राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि उनके साथ AAP के राज्यसभा के कुल 10 में से 7 सांसद भी भाजपा में शामिल होंगे। उनके साथ संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी मौजूद रहे। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में अशोक मित्तल के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई हुई थी।</p>
<p>राघव चड्ढा ने कहा कि पिछले कुछ समय से उन्हें महसूस हो रहा था कि वे “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि AAP अपने मूल सिद्धांतों और नैतिकता से भटक चुकी है और अब निजी हितों के लिए काम कर रही है।</p>
<h5><strong>कौन-कौन साथ</strong></h5>
<p>राघव चड्ढा ने जिन सांसदों के नाम गिनाए, उनमें संदीप पाठक, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह और अशोक मित्तल शामिल हैं। उनके मुताबिक, संविधान के प्रावधानों के तहत यदि दो-तिहाई सदस्य साथ हों, तो दल बदल संभव है।</p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि अभी और सांसद उनके संपर्क में हैं और आने वाले समय में और नाम सामने आ सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल होने की प्रक्रिया शाम तक पूरी हो सकती है।इस घटनाक्रम से पहले AAP ने 2 अप्रैल को राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटा दिया था। पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर उन्हें बोलने का समय न देने की भी सिफारिश की थी।</p>
<p>इसके बाद राघव चड्ढा ने वीडियो जारी कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि उनकी “खामोशी को हार न समझा जाए।”दूसरी ओर, AAP के कई नेताओं ने उन पर पार्टी लाइन से हटने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रहने के आरोप लगाए थे। पार्टी का कहना था कि वे संगठन की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे थे।</p>
<h5><strong>राजनीतिक प्रतिक्रिया</strong></h5>
<p>AAP नेता संजय सिंह ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “ऑपरेशन लोटस” का हिस्सा बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार विपक्षी दलों को तोड़ने का प्रयास कर रही है।संजय सिंह ने कहा कि पंजाब की जनता ने जिन नेताओं को भरोसे के साथ राज्यसभा भेजा, उन्होंने उसी जनादेश के साथ धोखा किया है।वहीं भाजपा की ओर से इस मुद्दे पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, हालांकि सूत्रों के मुताबिक पार्टी इस घटनाक्रम को अपने पक्ष में बड़े राजनीतिक बदलाव के तौर पर देख रही है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 16:20:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरिवंश नारायण सिंह तीसरी बार राज्यसभा के उपसभापति बने, सदन ने जताया भरोसा</title>
                                    <description><![CDATA[पहली बार मनोनीत सदस्य को मिली यह जिम्मेदारी, पीएम मोदी ने दी बधाई, कहा– अनुभव का सदन को मिला लाभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/harivansh-narayan-singh-becomes-deputy-chairman-of-rajya-sabha-for/article-51472"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/rajya-sabha-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली में राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जहां हरिवंश नारायण सिंह को लगातार तीसरी बार उपसभापति चुना गया। शुक्रवार को हुए चुनाव में वे निर्विरोध चुने गए, क्योंकि विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा गया था।</p>
<p>यह पहली बार है जब किसी मनोनीत सदस्य को राज्यसभा का उपसभापति बनाया गया है। उनके समर्थन में कुल पांच प्रस्ताव पेश किए गए। इनमें पहला प्रस्ताव केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री जेपी नड्डा ने रखा, जबकि दूसरा प्रस्ताव नितिन नवीन की ओर से प्रस्तुत किया गया।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश के पुनः चयन पर उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह सदन के विश्वास का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि उपसभापति के रूप में उनके अनुभव से राज्यसभा को लगातार लाभ मिला है और उन्होंने सभी सदस्यों को साथ लेकर काम करने का प्रयास किया है।</p>
<p>हरिवंश नारायण सिंह का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा उन्हें पुनः मनोनीत किया गया। वे 2032 तक राज्यसभा के सदस्य बने रहेंगे। संविधान के अनुसार राज्यसभा में 12 सदस्य मनोनीत होते हैं, जिन्हें कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में योगदान के आधार पर नामित किया जाता है।</p>
<p>राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो हरिवंश मूल रूप से पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं और बाद में राजनीति में आए। उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के माध्यम से राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व किया। वे 2018 में पहली बार उपसभापति बने और 2020 में दोबारा इस पद पर चुने गए थे।</p>
<p>सूत्रों के अनुसार, 18 मार्च को बजट सत्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उनके कार्यकाल को लेकर संकेत दिए थे। उन्होंने सदन में कहा था कि हरिवंश ने लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाई है और उनका योगदान सराहनीय रहा है, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं।</p>
<p>विपक्ष की ओर से कोई नामांकन न आने के कारण चुनाव निर्विरोध रहा। सदन में इस निर्णय को सहमति और स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/harivansh-narayan-singh-becomes-deputy-chairman-of-rajya-sabha-for/article-51472</link>
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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:14:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राज्यसभा उपनेता पद से हटे राघव चड्ढा, बोले- 'AAP मेरी आवाज दबा रही'</title>
                                    <description><![CDATA[राघव चड्ढा को राज्यसभा उपनेता पद से हटाने पर AAP में हलचल, बोले- आवाज दबाई जा रही। जानें पूरा मामला।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/69cf649a2df65/article-50040"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/raghav-chadha-aap-rajya-sabha-deputy-leader-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राघव चढ्ढा (Raghav Chadha) को राज्यसभा में उपनेता (डिप्टी लीडर) के पद से हटाए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए चड्ढा ने आरोप लगाया कि पार्टी उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा कि वह सदन में आम लोगों के मुद्दे उठाते रहे हैं और यदि यही कारण है तो यह सवाल उठता है कि इसमें गलत क्या है। चड्ढा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “खामोश करवाया गया हूं, हारा नहीं हूं,” और इसे अपनी राजनीतिक लड़ाई का नया चरण बताया। इस घटनाक्रम को Arvind Kejriwal के नेतृत्व में लिए गए निर्णय के रूप में देखा जा रहा है, जिसने पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर चर्चाओं को जन्म दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर चड्ढा की जगह सांसद अशोक मित्तल को उपनेता नियुक्त करने की सिफारिश की है। पार्टी की ओर से इसे “रूटीन प्रक्रिया</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;">”</span><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;"> बताया गया है। पत्र में यह भी कहा गया कि सदन में पार्टी के कोटे का जो समय पहले चड्ढा को मिलता था, अब वह अशोक मित्तल को दिया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">बयान और विवाद</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राघव चड्ढा ने अपने 2 मिनट 18 सेकंड के वीडियो संदेश में कहा कि उन्होंने संसद में मोबाइल डेटा की कीमत, मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ, एयरपोर्ट पर महंगे खाने और डिलिवरी कर्मियों की समस्याओं जैसे मुद्दे उठाए। उनके मुताबिक इन मुद्दों को जनता का समर्थन मिला और कुछ मामलों में समाधान भी निकला।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ये मुद्दे जनता से जुड़े हैं, तो इन्हें उठाने से पार्टी को क्या नुकसान हो सकता है। चड्ढा ने यह भी दावा किया कि पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को लिखकर उनके बोलने के समय को सीमित करने की मांग की थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">राजनीतिक संकेत</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">चड्ढा का बयान केवल व्यक्तिगत नाराजगी तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसे पार्टी नेतृत्व को खुली चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझना, मैं वो दरिया हूं जो सैलाब ला सकता हूं,” जो सियासी संदेश के तौर पर लिया जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पार्टी के भीतर इससे पहले भी नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर इन्हें कभी स्वीकार नहीं किया गया। सूत्रों के मुताबिक, हाल के महीनों में चड्ढा की सक्रियता और उनके मुद्दों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग राय थी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">पृष्ठभूमि</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">AAP में राज्यसभा में डिप्टी लीडर का पद पहले एनडी गुप्ता के पास था, जिसके बाद यह जिम्मेदारी राघव चड्ढा को सौंपी गई थी। चड्ढा को पार्टी का युवा और मुखर चेहरा माना जाता रहा है, जिन्होंने संसद में कई जनहित से जुड़े मुद्दे उठाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">हालांकि, हालिया घटनाक्रम यह संकेत देता है कि पार्टी अब अपने संसदीय चेहरों और रणनीति में बदलाव कर रही है। अशोक मित्तल की नियुक्ति इसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">असर और आगे की राह</span></strong></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">इस फैसले का असर केवल पार्टी के अंदरूनी समीकरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संसद में AAP की रणनीति और आवाज पर भी पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले समय में पार्टी की छवि और आंतरिक एकजुटता को प्रभावित कर सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 14:02:10 +0530</pubDate>
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