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                <title>GlobalPolitics - दैनिक जागरण</title>
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                <title>अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत तेज, होर्मुज जलडमरूमध्य पर बनी सहमति की चर्चा</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा- समझौता पहले से ज्यादा करीब, वहीं इजराइल पर बातचीत पटरी से उतारने की कोशिश का आरोप]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/signs-of-us-iran-agreement-intensify-discussion-of-consensus-on-strait/article-55824"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-deal.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही तनातनी के बीच एक संभावित समझौते को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि दोनों देशों के बीच एक प्रस्तावित समझौता पहले की तुलना में कहीं अधिक करीब पहुंच गया है। हालांकि उन्होंने मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों से अपील की है कि अंतिम रूप दिए जाने से पहले समझौते की शर्तों को लेकर अटकलें लगाने से बचें। अराघची का कहना है कि जब भी किसी दस्तावेज पर अंतिम सहमति बनेगी, तब उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। उनके बयान ने ऐसे समय में ध्यान खींचा है जब मध्य पूर्व पहले से ही युद्ध, समुद्री सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रमों को लेकर बढ़ते तनाव का सामना कर रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरानी मीडिया में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच जिस प्रारूप समझौते पर चर्चा चल रही है, उसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन व्यवस्था, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम को लेकर आगे की बातचीत का ढांचा शामिल बताया जा रहा है। हालांकि ईरान ने साफ किया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए इस जलमार्ग से जुड़ी किसी भी खबर का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों और वैश्विक राजनीति दोनों पर पड़ता है। अराघची ने अपने बयान में इजराइल पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को पटरी से उतारने की कोशिश कर रही हैं। उनका इशारा स्पष्ट रूप से इजराइल की ओर माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि इजराइल क्षेत्रीय तनाव को बनाए रखना चाहता है और किसी भी ऐसे समझौते का विरोध करता है जिससे तेहरान और वाशिंगटन के संबंधों में सुधार हो सकता हो। दूसरी तरफ इजराइल का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्षेत्र और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा है तथा उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी बयान दिया है कि वह और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के मुद्दे पर पूरी तरह एकमत हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका की ओर से संभावित समझौते के संकेत दिए जा रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि कूटनीतिक बातचीत के समानांतर सुरक्षा और रणनीतिक चिंताएं भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोई समझौता होता भी है तो उसमें परमाणु गतिविधियों पर निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सख्त प्रावधान शामिल हो सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बीच समुद्री सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुख बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से निकल रहे भारतीय जहाजों पर ड्रोन हमले किए हैं। उनके अनुसार ओमान तट के पास इस सप्ताह तीन जहाज हमले की चपेट में आए थे। इनमें से एक घटना में भारतीय चालक दल के तीन नाविकों की मौत हो गई। इस आरोप के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। हालांकि ईरान की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े देशों की नजर अब इस पूरे मामले पर टिकी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान की सरकारी मीडिया ने दावा किया है कि प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका और ईरान के बीच अगले 60 दिनों तक परमाणु समझौते को लेकर गहन बातचीत की जा सकती है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह मसौदा केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है बल्कि क्षेत्रीय संघर्षों को कम करने और कई मोर्चों पर तनाव घटाने के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करने का प्रयास है। लेबनान सहित कई क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों को भी इस बातचीत से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि अमेरिका और ईरान किसी साझा समझ पर पहुंचते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व, वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। वहीं यदि बातचीत किसी कारण से विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। फिलहाल दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से सतर्क रुख अपनाए हुए हैं, लेकिन लगातार आ रहे बयानों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण स्तर की बातचीत जारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित समझौता वास्तव में अंतिम रूप ले पाता है या नहीं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 14:11:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ईरान को 28 लाख करोड़ रुपए के फंड का प्रस्ताव, परमाणु समझौते पर नए दावे</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्धविराम समझौते की चर्चा तेज, ट्रम्प ने परमाणु कार्यक्रम पर सहमति का दावा किया, तेहरान ने किया खंडन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/fund-proposal-of-rs-28-lakh-crore-to-iran-new/article-54559"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/iran-reconstruction-fund.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक नई कूटनीतिक पहल की खबर सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों देशों के बीच प्रस्तावित 60 दिन के युद्धविराम समझौते में ईरान को 300 अरब डॉलर यानी करीब 28.5 लाख करोड़ रुपए के पुनर्निर्माण फंड का प्रस्ताव दिया गया है। बताया जा रहा है कि इस आर्थिक पैकेज के तहत अमेरिकी कंपनियों को भी ईरान में निवेश की अनुमति मिल सकती है। हालांकि समझौते को लेकर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सामने आई जानकारियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू कर दी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">जानकारी के अनुसार यह प्रस्ताव उस व्यापक समझौते का हिस्सा माना जा रहा है, जिस पर पिछले कुछ समय से विभिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है। एक ईरानी अधिकारी ने इसे रीकंस्ट्रक्शन प्रोग्राम बताते हुए कहा कि यदि अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होते हैं तो ईरान को आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए बड़ी सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है। वर्षों से प्रतिबंधों, क्षेत्रीय तनाव और सैन्य टकरावों का सामना कर रहे ईरान के लिए यह फंड बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहमति बनने के संकेत मिल रहे हैं। ट्रम्प के अनुसार संभावित समझौते के तहत ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और उसके संवर्धित यूरेनियम को समाप्त किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि समझौता सफल होता है तो अमेरिका कुछ आर्थिक और समुद्री प्रतिबंधों में राहत देने पर विचार कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि ट्रम्प के इन दावों को ईरान ने तुरंत खारिज कर दिया। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने स्पष्ट कहा कि परमाणु मुद्दे पर इस समय किसी तरह की बातचीत नहीं चल रही है। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जो बातें सामने आ रही हैं, वे वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शातीं। इसके अलावा ईरान की फार्स न्यूज एजेंसी ने भी सूत्रों के हवाले से बताया कि समझौते के किसी मसौदे में परमाणु सामग्री को नष्ट करने जैसी कोई शर्त शामिल नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह विरोधाभास दिखाता है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक बयानों और बंद कमरे में चल रही वार्ताओं के बीच अंतर होना असामान्य नहीं है। अक्सर ऐसे संवेदनशील समझौतों में अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग संदेश देते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">उधर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी तनाव बना हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ट्रम्प ने कहा कि संभावित समझौते के बाद इस क्षेत्र में नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त की जा सकती है और जहाजों से किसी प्रकार का अतिरिक्त टोल नहीं लिया जाएगा। दूसरी ओर अमेरिका ने ओमान को चेतावनी दी है कि यदि उसने ईरान की किसी टोल व्यवस्था का समर्थन किया तो संबंधित देशों, कंपनियों और व्यक्तियों पर कार्रवाई की जा सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने भी अमेरिका के प्रति अविश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि तेहरान केवल बयानों पर नहीं बल्कि वास्तविक कार्रवाई पर भरोसा करता है। उनके अनुसार जब तक अमेरिका अपने व्यवहार में ठोस बदलाव नहीं दिखाता, तब तक ईरान भी किसी प्रकार की रियायत देने के पक्ष में नहीं है। यह बयान दोनों देशों के बीच मौजूद गहरे अविश्वास को दर्शाता है, जो वर्षों से विभिन्न विवादों के कारण बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी दौरान ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया कि पिछले 24 घंटों में 24 जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दी गई। ईरान का कहना है कि समुद्री यातायात को नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से संचालित किया जा रहा है। हालांकि पश्चिमी देशों की ओर से लगातार इस क्षेत्र में गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।</p>
<p>क्षेत्रीय हालात को और जटिल बनाते हुए इजराइल ने दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों में नई चेतावनी जारी की है। इजराइली सेना का कहना है कि वह हिजबुल्लाह के खिलाफ संभावित अभियान की तैयारी कर रही है और नागरिकों को सुरक्षा के मद्देनजर प्रभावित क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह दी गई है। इससे पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद तनाव और बढ़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 13:56:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>भारत-वेनेजुएला संबंध: जयशंकर ने हालात पर जताई चिंता, सभी पक्षों से शांतिपूर्ण हल की अपील</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बाद वेनेजुएला में तनाव, भारत ने सुरक्षित समाधान और नागरिक सुरक्षा पर जोर दिया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/india-venezuela-relations-jaishankar-expressed-concern-over-the-situation-and-appealed/article-42303"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-01/desha-(62).jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वेनेजुएला में हाल के घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की है और सभी संबंधित पक्षों से आग्रह किया है कि वे वहां के लोगों के हित में शांतिपूर्ण समाधान खोजें। उन्होंने कहा कि भारत और वेनेजुएला के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं और किसी भी विवाद का हल संवाद के माध्यम से ही निकाला जाना चाहिए।</p>
<p> 2 जनवरी की रात अमेरिका ने वेनेजुएला में सैन्य अभियान चला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को हिरासत में लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे वेनेजुएला में लोकतंत्र बहाल करने की दिशा में जरूरी कदम बताया। मादुरो और उनकी पत्नी को न्यूयॉर्क में डिटेंशन सेंटर में रखा गया है और उन पर ड्रग्स, हथियार तस्करी तथा गंभीर अपराधों के आरोप हैं।</p>
<p>यह घटनाक्रम वेनेजुएला की राजधानी कराकस में 2 जनवरी की रात घटा, जिसके बाद क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ गया।</p>
<p>अमेरिका का दावा है कि मादुरो लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय ड्रग और हथियार तस्करी के नेटवर्क में शामिल थे। भारत की प्रतिक्रिया में विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि किसी भी देश के आंतरिक मामलों में सैन्य हस्तक्षेप जटिल परिणाम ला सकता है और शांतिपूर्ण वार्ता ही स्थायी समाधान है।</p>
<p> जयशंकर ने लक्ज़मबर्ग में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय फोरम में यह बयान दिया। उन्होंने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बातचीत को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत के लिए वेनेजुएला की जनता की सुरक्षा सर्वोपरि है।</p>
<p>भारतीय विदेश मंत्रालय ने हाल ही में कहा कि कराकस में भारतीय दूतावास वहां रह रहे नागरिकों के संपर्क में है और उन्हें हर संभव सहायता दी जा रही है। मंत्रालय ने भारतीय नागरिकों से गैर-जरूरी यात्रा टालने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की सलाह दी है। जयशंकर ने यह भी संकेत दिए कि बाहरी देशों द्वारा भारत को दी जाने वाली सलाह कभी-कभी उनके स्वार्थ से प्रेरित होती है, और इसलिए भारत अपनी विदेश नीति में संतुलित और स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाता है।</p>
<p>इस घटनाक्रम से लैटिन अमेरिका में तनाव बढ़ा है। कई देशों ने अमेरिका की कार्रवाई पर चिंता जताई है, जिनमें रूस, चीन और ईरान शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का रुख स्पष्ट रूप से शांतिपूर्ण समाधान और नागरिक सुरक्षा पर केंद्रित है, जो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति के अनुरूप है।</p>
<p> भारतीय विदेश मंत्रालय स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है। विशेषज्ञों का कहना है कि आगामी दिनों में क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रयास और बातचीत का मार्ग ही कारगर रहेगा।</p>
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<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 07 Jan 2026 13:58:19 +0530</pubDate>
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