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                <title>Lok Sabha - दैनिक जागरण</title>
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                <title>2029 तक ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करने की तैयारी तेज, जेपीसी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की दिशा में आगे</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त संसदीय समिति का दावा- अधिकांश लोगों ने किया समर्थन, राज्यों से सुझाव लेकर तैयार हो रहा रोडमैप; संवैधानिक संशोधन और राजनीतिक सहमति होगी सबसे बड़ी चुनौती]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/preparation-to-implement-one-nation-one-election-by-2029-intensifies/article-58506"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/one-nation-one-election-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश में लंबे समय से चर्चा का विषय बने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की दिशा में केंद्र सरकार और संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) तेजी से आगे बढ़ रही है। समिति का लक्ष्य वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस व्यवस्था को लागू करने की संभावनाओं को मजबूत करना है। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा है कि अब तक हुई बैठकों और विचार-विमर्श में शामिल लगभग 99 प्रतिशत लोगों, संगठनों और विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। </p>
<p style="text-align:justify;">जेपीसी ने हाल ही में गोवा का दौरा कर मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्यों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से इस विषय पर चर्चा की। समिति के सदस्य और सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों का प्रभाव छोटे राज्यों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि गोवा जैसे छोटे राज्य में चुनावी प्रक्रिया का प्रशासनिक और आर्थिक असर इतना अधिक है, तो बड़े राज्यों और पूरे देश पर इसका प्रभाव और भी व्यापक होता है। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी और सरकारें विकास कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति का अगला दौरा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रस्तावित है। यहां मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेताओं, विभिन्न राजनीतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों और विशेषज्ञों से विस्तृत चर्चा की जाएगी। इसके बाद समिति 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर संसद में पेश करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार आगे की रणनीति तय करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मूल उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने के बजाय एक निर्धारित चुनावी चक्र के तहत एक साथ कराना है। समर्थकों का मानना है कि इससे चुनावों पर होने वाला भारी सरकारी खर्च कम होगा, बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे और प्रशासनिक मशीनरी का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है। इसके लिए संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार अनुच्छेद 83, 172 और 356 सहित कई संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव आवश्यक होगा। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ देश के कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होगी। यही कारण है कि सरकार राजनीतिक सहमति बनाने पर विशेष जोर दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे बड़ा सवाल उन राज्यों को लेकर है जिनकी विधानसभा का कार्यकाल वर्ष 2029 के बाद तक रहेगा। ऐसे राज्यों के कार्यकाल को समय से पहले समाप्त कर साझा चुनावी चक्र में शामिल करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। वहीं जिन राज्यों का कार्यकाल 2029 से पहले समाप्त होगा, वहां सीमित अवधि के लिए चुनाव कराने या अन्य संवैधानिक विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। यदि किसी राज्य की सरकार बीच कार्यकाल में गिर जाती है, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मध्यावधि चुनाव केवल शेष कार्यकाल के लिए कराए जाने की संभावना है, ताकि निर्धारित चुनावी चक्र प्रभावित न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार इस व्यवस्था को लागू करने के लिए 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' पर भी विचार कर रही है। इस मॉडल के तहत पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के बजाय इसे दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में वर्ष 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ लगभग 20 राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। इसके बाद वर्ष 2034 तक शेष राज्यों को भी इसी चुनावी चक्र में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इस मॉडल से विधानसभाओं के कार्यकाल में अत्यधिक कटौती या विस्तार की आवश्यकता कम होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस विषय पर संवैधानिक विशेषज्ञ भी अपनी राय दे रहे हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान में इस दिशा में बदलाव की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है, लेकिन व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना इसे लागू करना कठिन होगा। अतीत में भी विशेष परिस्थितियों में लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल में परिवर्तन किए जा चुके हैं। इसलिए कानूनी दृष्टि से यह पूरी तरह असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए संसद और राज्यों के बीच सहमति आवश्यक होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने करीब 191 दिनों तक विभिन्न विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, संवैधानिक संस्थाओं और अन्य हितधारकों से चर्चा की। विस्तृत अध्ययन के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी। अब उसी रिपोर्ट और जेपीसी की सिफारिशों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में स्वतंत्रता के बाद शुरुआती चार आम चुनावों तक लोकसभा और अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में यह व्यवस्था बनी रही। लेकिन 1967 के बाद कई राज्यों में सरकारें समय से पहले गिरने लगीं। 1968 और 1969 में कई विधानसभाएं भंग हुईं, जबकि 1970 में लोकसभा भी अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दी गई। इसके बाद चुनावों का साझा चक्र टूट गया और अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 17:50:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>उद्धव सेना में बगावत के संकेत, संसदीय बैठक से गायब रहे 6 सांसद</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में हुई संसदीय दल की बैठक में सिर्फ तीन सांसद पहुंचे, छह सांसदों की गैरमौजूदगी से शिवसेना (यूबीटी) में नए राजनीतिक संकट के संकेत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/signs-of-rebellion-in-uddhav-sena-6-mps-missing-from/article-56326"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/shiv-sena-ubt.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की दिल्ली में आयोजित संसदीय दल की बैठक में नौ में से केवल तीन सांसदों के पहुंचने से पार्टी के भीतर नए संकट की चर्चा तेज हो गई है। बैठक में लोकसभा सांसद अनिल देसाई, अरविंद सावंत और राजाभाऊ वाजे शामिल हुए, जबकि छह सांसदों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी नेतृत्व ने बैठक से पहले सभी सांसदों को व्हिप जारी कर अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में सांसदों के नहीं पहुंचने को राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। बैठक के बाद सांसद अरविंद सावंत ने स्पष्ट किया कि अनुपस्थित सांसदों को नोटिस जारी किया जाएगा और उनसे जवाब मांगा जाएगा। उधर, राज्यसभा सांसद और पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता संजय राउत ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के सांसदों पर दबाव बनाया जा रहा है। राउत ने कहा कि जो सांसद बैठक में शामिल हुए हैं, वे पार्टी के साथ खड़े हैं, जबकि जो नहीं पहुंचे, उन्हें जनता जवाब देगी। लगातार दूसरे दिन उन्होंने बागी माने जा रहे सांसदों पर तीखे शब्दों में हमला बोला।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच गृह मंत्रालय द्वारा महाराष्ट्र पुलिस को छह सांसदों की सुरक्षा बढ़ाकर Y+ श्रेणी करने के निर्देश दिए जाने की खबर ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। सूत्रों के अनुसार इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भेजकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने या अलग समूह के गठन की इच्छा जताई है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। यदि छह सांसद एक साथ कोई निर्णय लेते हैं तो यह दल-बदल कानून के तहत महत्वपूर्ण स्थिति बन सकती है। लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के कुल नौ सांसद हैं। संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी भी दल में विभाजन के बाद अयोग्यता से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। इस स्थिति में छह सांसदों का समूह कानूनी रूप से मजबूत दावा पेश कर सकता है। बीते कुछ दिनों की घटनाओं पर नजर डालें तो राजनीतिक हलचल लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। 15 जून से ही ऐसी चर्चाएं शुरू हो गई थीं कि उद्धव ठाकरे गुट के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इस संभावित अभियान को राजनीतिक गलियारों में ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम दिया गया। उस समय पार्टी नेताओं ने इन खबरों को अफवाह बताते हुए खारिज कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद 16 जून को संजय राउत ने सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया कि सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए भारी आर्थिक प्रलोभन दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सांसदों को करोड़ों रुपये का प्रस्ताव दिया गया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। 17 जून को घटनाक्रम और तेज हो गया जब शिंदे गुट के नेताओं ने दावा किया कि छह सांसदों ने अलग समूह बनाने से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके बाद उद्धव गुट के वरिष्ठ नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर किसी भी निर्णय से पहले उनका पक्ष सुनने की मांग की। यह घटनाक्रम केवल शिवसेना तक सीमित नहीं है। आगामी मानसून सत्र और भविष्य में संभावित संवैधानिक एवं राजनीतिक बदलावों को देखते हुए विभिन्न दलों में राजनीतिक पुनर्संरचना की कोशिशें तेज हो सकती हैं। संसद में संख्या बल बढ़ाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हुई हैं। शिवसेना के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब पार्टी बड़े विभाजन का सामना कर रही है। जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने बगावत कर अलग गुट बनाया था। उस घटनाक्रम के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई थी। अब सांसदों के स्तर पर संभावित टूट की खबरें उद्धव ठाकरे के लिए नई चुनौती बनकर सामने आई हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 16:54:07 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>तृणमूल के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़ एनसीपीआई में किया विलय</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीपीआई में शामिल होकर बगावती सांसदों ने साधा संवैधानिक दांव, भाजपा से सीधा जुड़ाव टालने के पीछे भी रही राजनीतिक रणनीति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/20-trinamool-mps-left-the-party-and-merged-with-ncpi/article-56133"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/trinamool-congress.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के एक साथ पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करने के फैसले ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पहली नजर में यह फैसला चौंकाने वाला लग सकता है क्योंकि जिस पार्टी में इन सांसदों ने विलय किया है, वह राष्ट्रीय स्तर पर लगभग अज्ञात राजनीतिक संगठन मानी जाती है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी रणनीति भी जुड़ी हुई बताई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष एनसीपीआई में विलय का दावा पेश किया। यह संख्या तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है। यही आंकड़ा इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए यह रास्ता चुना, क्योंकि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में केवल दो-तिहाई सदस्यों के साथ किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय ही उन्हें अयोग्यता से बचा सकता है। एनसीपीआई की बात करें तो यह पार्टी त्रिपुरा में पंजीकृत है, लेकिन अभी तक राष्ट्रीय राजनीति में उसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं रहा है। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सीमित स्तर पर चुनाव लड़ा था और उसे बेहद कम वोट मिले थे। इसके बावजूद अब अचानक यह पार्टी लोकसभा में 20 सांसदों के साथ चर्चा के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बागी सांसदों ने इतनी छोटी पार्टी को ही क्यों चुना। शुरुआत में सांसदों के बीच अलग राजनीतिक समूह बनाने पर भी चर्चा हुई थी। लेकिन दल-बदल कानून की मौजूदा व्यवस्था के तहत ऐसा करना आसान नहीं था। यदि सांसद अलग समूह बनाते तो उन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता था। यही वजह रही कि उन्होंने विलय का विकल्प चुना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ की पृष्ठभूमि इस फैसले को समझने में अहम भूमिका निभाती है। जब यह कानून 1985 में लागू हुआ था तब इसमें एक-तिहाई विधायकों या सांसदों के समर्थन से अलग समूह बनाने की छूट थी। लेकिन बाद के वर्षों में इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ। कई राज्यों और केंद्र की राजनीति में नेताओं ने बार-बार दल बदलकर सरकारों की दिशा बदल दी। इसे देखते हुए वर्ष 2003 में कानून में संशोधन किया गया और अलग समूह बनाने वाली व्यवस्था समाप्त कर दी गई। संशोधन के बाद केवल एक ही रास्ता बचा, जिसमें किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर सकते हैं। इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का फैसला किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पूरी तरह संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें सामने आती रही थीं कि बागी सांसद भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं। अटकलें लगाई जा रही थीं कि वे सीधे भाजपा में शामिल हो सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। इसके पीछे भी राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रही हैं। ऐसे में यदि सांसद सीधे भाजपा में शामिल हो जाते तो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में इसका नकारात्मक संदेश जा सकता था। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी इतने बड़े समूह को सीधे पार्टी संरचना में समायोजित करना आसान नहीं होता। पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी असंतोष पैदा हो सकता था। एनसीपीआई का विकल्प इस लिहाज से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया। यह पार्टी राजनीतिक रूप से छोटी है और उसका संगठनात्मक ढांचा सीमित है। ऐसे में बागी सांसद वहां अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रख सकते हैं। साथ ही वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन देकर केंद्र की राजनीति में अपनी भूमिका भी कायम रख सकते हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ने से एनडीए को भी राजनीतिक लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से उन विधेयकों के संदर्भ में, जिनके लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता होती है। माना जा रहा है कि लोकसभा में संख्या बल बढ़ने से सरकार की रणनीतिक स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आने की संभावना जताई जा रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:23 +0530</pubDate>
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                <title>टीएमसी में बड़ी टूट, 20 सांसदों ने NCPI में विलय कर NDA को समर्थन दिया</title>
                                    <description><![CDATA[ममता बनर्जी को बड़ा झटका, बागी सांसदों ने नई राजनीतिक राह चुनी; चर्चा में आई छोटी पार्टी NCPI]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-break-in-tmc-20-mps-merged-with-ncpi-and/article-55992"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-mps-split.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान भी अपनी ओर खींच लिया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इसके साथ ही इन सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ काम करने की इच्छा भी जताई है। इस घटनाक्रम को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों का एक साथ अलग होना पार्टी की ताकत को सीधे प्रभावित करता है। सांसदों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सदस्यता बचाने की थी। यदि वे सीधे किसी अन्य दल में शामिल होते या एनडीए का समर्थन करने का ऐलान करते, तो दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी लोकसभा सदस्यता खतरे में पड़ सकती थी। इसी वजह से उन्होंने एक अलग रणनीति अपनाई और सामूहिक रूप से एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना। चूंकि सांसदों की संख्या दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है, इसलिए दल-बदल कानून के प्रावधानों के तहत उन्हें राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिस पार्टी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आया है, वह है नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई। राजनीतिक हलकों में यह नाम अब तक बहुत कम लोगों ने सुना था, लेकिन टीएमसी सांसदों के विलय के बाद यह पार्टी अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। दिलचस्प बात यह है कि जिस पार्टी का अब तक न कोई सांसद था और न कोई विधायक, वह एक झटके में लोकसभा में 20 सांसदों वाली पार्टी बनने का दावा कर रही है। एनसीपीआई का गठन 20 जनवरी 2023 को किया गया था। यह एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। पार्टी का पंजीकरण पश्चिम बंगाल में हुआ था, लेकिन इसकी सक्रियता मुख्य रूप से त्रिपुरा में देखने को मिली। गठन के समय पार्टी ने खुद को सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की आवाज बताने का प्रयास किया था। इसके चुनावी संदेशों में दलबदल की राजनीति का विरोध भी प्रमुख रूप से शामिल था। यही वजह है कि अब टीएमसी से आए सांसदों के इस पार्टी में शामिल होने को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में बताया जाता है। पार्टी के अध्यक्ष शेली कुंडू हैं, जबकि संगठनात्मक गतिविधियों में उनके सहयोगियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पार्टी को अब तक बहुत सीमित आर्थिक सहयोग मिला है और इसके संसाधन भी अपेक्षाकृत छोटे स्तर के रहे हैं। एनसीपीआई ने अपना पहला चुनाव त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में लड़ा था। उस चुनाव में पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी, लेकिन कई उम्मीदवारों के नामांकन खारिज हो गए थे। अंततः पार्टी सीमित सीटों पर ही चुनाव लड़ पाई और उसे कोई सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद पार्टी ने खुद को राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास जारी रखा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">टीएमसी सांसदों के इस कदम के पीछे पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष को भी एक कारण माना जा रहा है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनावी नतीजों के बाद संगठन के भीतर मतभेदों की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग राय दिखाई दे रही थी। अब सांसदों के इस बड़े समूह के अलग होने के बाद यह असंतोष खुलकर सामने आ गया है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने इस राजनीतिक बदलाव की घोषणा करते हुए कहा कि उनका समूह भविष्य में एनडीए के साथ मिलकर काम करेगा। इसके बाद बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से भी मुलाकात कर अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर भी राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 17:05:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टीएमसी में बगावत तेज, ममता के करीबी सुदीप बंदोपाध्याय भी बागी खेमे में शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, बागी सांसदों ने लोकसभा में ‘असली टीएमसी’ होने का दावा ठोकने की तैयारी की, स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात संभव।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/rebellion-in-tmc-intensifies-mamatas-close-friend-sudeep-bandopadhyay-also/article-55921"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-rebellion.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है और पार्टी की शीर्ष नेतृत्व के लिए यह स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। ताजा घटनाक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी और पार्टी के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंदोपाध्याय के बागी खेमे के साथ खड़े होने की खबरों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि यह घटनाक्रम टीएमसी के अंदर चल रहे शक्ति संघर्ष को और तेज कर सकता है। विधानसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद संगठन के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। अब यह असंतोष खुली बगावत का रूप लेता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि सुदीप बंदोपाध्याय ने बागी सांसदों के साथ बैठकें की हैं और आगे की रणनीति पर चर्चा भी की है। इस घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सुदीप लंबे समय से ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागी गुट सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर सकता है। इस मुलाकात के दौरान बागी सांसद अपने पक्ष को विस्तार से रखने और संसदीय स्तर पर मान्यता की मांग कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह टीएमसी के लिए एक बड़ा संस्थागत संकट साबित हो सकता है। लोकसभा में पार्टी की स्थिति और नेतृत्व को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं। बागी खेमे की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि लोकसभा में उनके समूह का नेतृत्व सुदीप बंदोपाध्याय करें। विद्रोही नेताओं का मानना है कि उनके अनुभव और राजनीतिक पकड़ को देखते हुए वे इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इस विषय पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी बीच केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ सुदीप बंदोपाध्याय की मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। रिपोर्टों के अनुसार इस मुलाकात में टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय भी मौजूद थीं। इसके अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की खबरों ने भी राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। विपक्षी दल और राजनीतिक पर्यवेक्षक इन बैठकों को बंगाल की राजनीति में संभावित नए समीकरणों के संकेत के रूप में देख रहे हैं। टीएमसी के भीतर असंतोष केवल संसदीय स्तर तक सीमित नहीं है। विधानसभा में भी स्थिति पार्टी नेतृत्व के लिए चिंताजनक बताई जा रही है। खबरों के मुताबिक बड़ी संख्या में विधायक पहले ही हाईकमान के फैसलों पर सवाल उठा चुके हैं। बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी को नेता के रूप में समर्थन देने का संकेत दिया है। इससे साफ है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभरकर सामने आए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूर्व मंत्री मानस भूनिया का हाल ही में पार्टी से इस्तीफा देना भी इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। उनके इस्तीफे के बाद यह संदेश गया कि असंतोष केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के विभिन्न स्तरों पर इसकी गूंज सुनाई दे रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाता तो आने वाले समय में और भी नेता खुलकर विरोध का रास्ता अपना सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागी सांसद जगदीश चंद्र बसूनिया ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट कहा कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंप दिया है और वे जल्द ही अपने समूह की ओर से औपचारिक दावा पेश करेंगे। उनका कहना है कि उनका गुट ही वास्तविक तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है और इसी आधार पर वे संसदीय मान्यता की मांग करेंगे। इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उधर टीएमसी समर्थकों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व अभी भी मजबूत स्थिति में है और बागी नेताओं की गतिविधियां संगठन को स्थायी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगी। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह असंतोष अस्थायी है और समय के साथ स्थिति सामान्य हो जाएगी। हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना आसान नहीं है कि विवाद किस दिशा में जाएगा। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से नाटकीय घटनाक्रमों और तीखे राजनीतिक संघर्षों के लिए जानी जाती रही है। मौजूदा संकट भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 17:25:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>TMC में बड़ी टूट के बीच ममता ने कल्याण बनर्जी को बनाया चीफ व्हिप</title>
                                    <description><![CDATA[20 बागी सांसदों के NDA समर्थन के दावे के बाद ममता बनर्जी का बड़ा कदम, लोकसभा स्पीकर को भेजा पत्र]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mamata-made-kalyan-banerjee-the-chief-whip-amid-major-rift/article-55444"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-crisis-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे सियासी घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है। पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और सांसदों की बगावत के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी को पार्टी का नया चीफ व्हिप नियुक्त कर दिया है। मंगलवार को इस संबंध में लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजा गया और अनुरोध किया गया कि इस नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ चुका है और कई सांसद नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता लोकसभा में उसके सांसदों की एकजुटता को लेकर है। पार्टी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों के अलग रुख अपनाने का दावा किया गया है। बागी सांसदों का कहना है कि उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को संभालने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसी रणनीति के तहत कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंपे जाने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक दिन पहले बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार को अपना चीफ व्हिप चुने जाने का दावा किया था। इसके बाद उन्होंने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र भी भेजा था। बताया गया कि इस पत्र में बागी सांसदों के हस्ताक्षर मौजूद थे और उन्होंने अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में बैठने की अनुमति मांगी थी। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि संसदीय राजनीति में चीफ व्हिप की भूमिका काफी अहम होती है। पार्टी लाइन को लागू करवाना, सांसदों के बीच समन्वय बनाए रखना और महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकजुटता सुनिश्चित करना इसी पद की जिम्मेदारी होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">काकोली घोष पहले ही पार्टी छोड़ चुकी हैं, लेकिन उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह अब भी खुद को लोकसभा में मुख्य सचेतक मानती हैं। उनके बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि वह दशकों से पार्टी के साथ जुड़ी रही हैं और संघर्ष के रास्ते से आगे बढ़ी हैं। उनके इस बयान को पार्टी नेतृत्व के प्रति नाराजगी के रूप में भी देखा गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उधर, तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेताओं ने बागी सांसदों पर तीखे हमले किए हैं। राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोगों की वफादारी केवल सत्ता तक सीमित रहती है और राजनीतिक दबाव के सामने उनके सिद्धांत कमजोर पड़ जाते हैं। वहीं कल्याण बनर्जी ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीतिक ताकतों के सामने उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता और पार्टी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी अभी भी बंगाल में मजबूत स्थिति में है और कार्यकर्ताओं का समर्थन नेतृत्व के साथ बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजनीतिक संकट केवल सांसदों तक सीमित नहीं है। इससे पहले राज्य की राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला था, जब बड़ी संख्या में विधायकों के अलग गुट बनाने की खबर सामने आई। पार्टी के भीतर लगातार बढ़ते असंतोष ने नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर इस तरह की घटनाएं पार्टी की संगठनात्मक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिल्ली में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गतिविधियां तेज रहीं। बागी सांसदों की कई बैठकें हुईं।  कुछ बैठकें गोपनीय स्थानों पर आयोजित की गईं, जहां आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। इसी दौरान कुछ सांसदों की वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मुलाकात की खबरें भी सामने आईं। इन मुलाकातों ने राजनीतिक अटकलों को और मजबूत किया। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन बैठकों को लेकर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी भी इसी बीच दिल्ली पहुंचे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका दौरा केवल विपक्षी गठबंधन की बैठकों तक सीमित नहीं था, बल्कि पार्टी के भीतर उभर रहे संकट का आकलन करना भी इसका हिस्सा था। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व बागी सांसदों को मनाने में कितना सफल होता है या फिर यह असंतोष और बड़ा रूप लेता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:41:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पहले एक्टिंग कर जीता दिल, फिर राजनीति में बनाई पहचान, जानें रामायण के रावण का अभिनय से संसद तक का अनोखा सफर</title>
                                    <description><![CDATA[रामायण के रावण बने अरविंद त्रिवेदी का अभिनय से राजनीति तक का सफर। 300 से ज्यादा फिल्मों और सांसद बनने तक की पूरी कहानी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/first-he-won-hearts-by-acting-and-then-made-his/article-53519"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/ramayana-ravana,-arvind-trivedi-story.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">39 साल पहले जो ऐतिहासिक टीवी धारावाहिक रामायण प्रसारित हुआ था</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो आज भी दर्शकों के दिलों में ताजा है। इस शो में लंकापति रावण का प्रभावशाली किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी ने अपनी गहरी आवाज और शानदार अभिनय के जरिए हर किसी का ध्यान खींचा। उस जमाने में जब पूरा परिवार एक साथ टीवी के सामने बैठकर इस धारावाहिक का आनंद लेता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रावण का किरदार सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया था। कुछ लोग इससे डरते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कुछ इससे प्रभावित होते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अरविंद त्रिवेदी ने इस किरदार को इतनी मजबूती से निभाया कि वो भारतीय टेलीविजन इतिहास का अभिन्न हिस्सा बन गया।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इंदौर से संबंध रखने वाले अरविंद त्रिवेदी का जन्म 8 नवंबर 1938 को हुआ था। बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था और पढ़ाई के बाद उन्होंने थिएटर से अपने करियर की शुरुआत की। शुरुआती दिनों में उन्होंने गुजराती रंगमंच और फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। कहा जाता है कि उन्होंने अपने करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हिंदी और गुजराती दोनों भाषाओं की फिल्में शामिल थीं। उनकी आवाज और गंभीर अभिनय शैली ने उन्हें रावण के किरदार तक पहुंचाया। रामानंद सागर के इस बड़े प्रोजेक्ट में पहले उन्होंने साधु का किरदार निभाने के लिए स्क्रीन टेस्ट दिया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनकी आवाज और चेहरे के हाव-भाव को देखकर उन्हें रावण की भूमिका निभाने का मौका मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उनकी जिंदगी बदल दी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">Ramayan <span lang="hi" xml:lang="hi">की अभूतपूर्व सफलता के बाद अरविंद त्रिवेदी का नाम पूरे देश में फैल गया। लोग उन्हें असल जिंदगी में भी रावण की तरह पहचानने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि असल में वो बेहद शांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। इस शो ने उन्हें इतनी प्रसिद्धि दी कि गुजरात सरकार ने उन्हें कई बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया। बाद में उन्होंने अभिनय से हटकर राजनीति में कदम रखा और 1991 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गुजरात के साबरकांठा से लोकसभा सांसद चुने गए। उन्होंने संसद में पांच साल तक सक्रिय भूमिका निभाई और जनसेवा से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया। अभिनय से राजनीति तक का उनका ये सफर उनके व्यक्तित्व की बहुआयामी छवि को दर्शाता है - एक तरफ वो पर्दे पर रावण बने और दूसरी तरफ असल जिंदगी में वो एक जनप्रतिनिधि के रूप में उभरे।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अरविंद त्रिवेदी ने अपने जीवन में कला</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति और सार्वजनिक जीवन तीनों क्षेत्रों में गहरी छाप छोड़ी। उनका योगदान आज भी भारतीय टेलीविजन और सिनेमा के इतिहास में याद किया जाता है। रामायण में रावण का किरदार उन्हें अमर कर गया और आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें इसी रूप में याद करेंगी। सालों बाद भी जब लोग रामायण देखते हैं या उस वक्त की याद करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अरविंद त्रिवेदी का नाम सबसे पहले उन कलाकारों में आता है जिन्होंने अपने अभिनय से एक पौराणिक चरित्र को सजीव बना दिया।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 16:04:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>महिला आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश: विपक्ष का हंगामा, अखिलेश-शाह में तीखी बहस, मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर गरमाई राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[तीन संविधान संशोधन बिलों पर संसद में जोरदार बहस, सीट बढ़ोतरी और परिसीमन प्रस्ताव पर राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर बढ़ा विवाद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/draftwomens-reservation-amendment-bill-introduced-in-lok-sabha-oppositions-ruckus/article-51328"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/loksabha-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>लोकसभा में गुरुवार को महिला आरक्षण से जुड़े तीन संविधान संशोधन बिल पेश किए जाने के साथ ही सदन में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। सरकार ने जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसके संवैधानिक और संघीय ढांचे पर असर को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।</p>
<p>केंद्रीय सरकार की ओर से पेश किए गए इन विधेयकों में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने, परिसीमन प्रक्रिया को नए आधार पर तय करने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव शामिल है। इसमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव 1971 की जनगणना आधारित व्यवस्था को अद्यतन करने के लिए जरूरी है।</p>
<p>बहस के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के विरोध में नहीं है, लेकिन प्रक्रिया और संरचना पर आपत्ति है। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए सरकार से स्पष्टता मांगी। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब देते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है और राजनीतिक दलों को अपनी पार्टी टिकट वितरण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।</p>
<p>कांग्रेस, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों ने भी बिल का विरोध किया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ कर रही है। डीएमके सांसद टीआर बालू ने इन विधेयकों को “सैंडविच बिल” बताते हुए कहा कि ये आपस में जुड़े हुए हैं और संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन प्रस्ताव का विरोध करते हुए बिल की प्रतियां तक जला दीं।</p>
<p>वहीं एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे संघवाद के खिलाफ बताया और कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न भी है।</p>
<p>सरकारी पक्ष की ओर से कहा गया कि महिला आरक्षण देश की आधी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक सुधार है। भाजपा सांसद रवि किशन ने कहा कि यह कदम हर भारतीय महिला के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।</p>
<p>संसद में हुई वोटिंग में विधेयकों के पुनर्स्थापन के पक्ष में 207 वोट पड़े, जबकि 126 सांसदों ने विरोध किया। यह स्पष्ट करता है कि इस प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति अभी भी पूरी तरह नहीं बन पाई है।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन और सीट बढ़ोतरी जैसे मुद्दे आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि यह कदम लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण कानून को वास्तविक रूप देने के लिए आवश्यक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:28:17 +0530</pubDate>
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