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                <title>Delimitation - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Delimitation RSS Feed</description>
                
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                <title>केरल और तमिलनाडु में राज्य चुनाव आयुक्त को लेकर बढ़ा विवाद, संवैधानिक स्वायत्तता पर फिर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया पर छिड़ी बहस, स्थानीय निकाय चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने वाले राज्य चुनाव आयोग की भूमिका फिर चर्चा में।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/election/controversy-over-state-election-commissioner-increases-in-kerala-and-tamil/article-58313"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/state-election-commission.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश में स्थानीय निकाय चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले राज्य चुनाव आयोग (SEC) की भूमिका एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इसकी वजह केरल और तमिलनाडु में सामने आए दो अलग-अलग घटनाक्रम हैं, जिन्होंने राज्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, अधिकारों और संवैधानिक स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दोनों राज्यों में उठे विवादों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को किस तरह सुरक्षित रखा जाए और राजनीतिक हस्तक्षेप से उन्हें कैसे दूर रखा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">केरल में राज्य चुनाव आयुक्त पद के लिए सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एन. शेषाद्रिनाथन के नामांकन को लेकर विवाद शुरू हुआ है। इस नियुक्ति का विरोध करते हुए केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के महासचिव पी.एम. नियास ने राज्य के गृह विभाग से इस मामले की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि शेषाद्रिनाथन कथित तौर पर एक विशेष वैचारिक संगठन से जुड़े रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर आधिकारिक स्तर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है और न ही किसी जांच एजेंसी ने इस संबंध में कोई निष्कर्ष सार्वजनिक किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एन. शेषाद्रिनाथन न्यायपालिका में लंबे समय तक सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने एर्नाकुलम स्थित केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया है। इसके अलावा वे लक्षद्वीप के कवरत्ती में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश भी रह चुके हैं। उनके प्रशासनिक और न्यायिक अनुभव को देखते हुए उनकी नियुक्ति की गई, लेकिन राजनीतिक आरोपों के चलते यह मामला विवादों में आ गया।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर तमिलनाडु में राज्य सरकार और वर्तमान राज्य चुनाव आयुक्त बी. ज्योति निर्मलासामी के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। राज्य सरकार ने उनसे पद छोड़ने के लिए कहा है। बी. ज्योति निर्मलासामी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और राज्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं। इस घटनाक्रम ने संवैधानिक पद पर कार्यरत अधिकारियों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य चुनाव आयोग भारतीय संविधान द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है। इसका मुख्य दायित्व राज्यों में पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों जैसे स्थानीय स्वशासी निकायों के चुनावों का स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी संचालन सुनिश्चित करना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती में इस संस्था की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर चुनी जाने वाली सरकारें सीधे जनता के दैनिक जीवन से जुड़ी होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम घोषित करने, नामांकन प्रक्रिया की निगरानी, मतदान, मतगणना और परिणामों की घोषणा तक की पूरी प्रक्रिया का संचालन करता है। इसके साथ ही जहां राज्य कानून में व्यवस्था हो, वहां मतदाता सूची का पुनरीक्षण और अद्यतन कराने की जिम्मेदारी भी आयोग निभाता है। चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू कर उसका पालन सुनिश्चित करना भी आयोग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा स्थानीय निकाय चुनावों से पहले वार्डों और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का कार्य भी कई राज्यों में राज्य चुनाव आयोग की देखरेख में किया जाता है। चुनाव से जुड़े विवादों का निपटारा संबंधित राज्य कानूनों के अनुसार नामित न्यायालयों या अधिकृत प्राधिकरणों के माध्यम से किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि संविधान में राज्य चुनाव आयुक्त बनने के लिए कोई समान या अनिवार्य योग्यता निर्धारित नहीं की गई है। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में नियुक्ति की प्रक्रिया और पात्रता अलग-अलग दिखाई देती है। कई राज्यों में सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को इस पद पर नियुक्त किया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में पूर्व आईएएस अधिकारियों या अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी जाती है। केरल में राज्य चुनाव आयुक्त को एक अतिरिक्त जिम्मेदारी भी निभानी होती है। वे परिसीमन आयोग से जुड़े सदस्य के रूप में विधानसभा और लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के निर्धारण से संबंधित प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं। साथ ही पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों के वार्ड परिसीमन के लिए गठित राज्य परिसीमन आयोग के अध्यक्ष भी होते हैं। तमिलनाडु में भी राज्य चुनाव आयुक्त परिसीमन आयोग के पदेन अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। चुनाव से पहले स्थानीय निकायों के वार्डों की सीमाओं का निर्धारण, आरक्षण व्यवस्था और जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य उनके नेतृत्व में पूरे किए जाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>चुनाव</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:38:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने का गणित समझाया, परिसीमन पर बोले अमित शाह—किसी राज्य को नुकसान नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने स्पष्ट किया फॉर्मूला, दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ने का दावा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/explained-the-mathematics-of-increasing-lok-sabha-seats-to-850/article-51403"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/loksabha-(2).jpg" alt=""></a><br /><p>लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Amit Shah</span></span> ने परिसीमन और लोकसभा सीटों की संभावित बढ़ोतरी को लेकर सरकार का पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित बदलावों से किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होगा और कुल सीटों में बढ़ोतरी के बाद संतुलन बनाए रखा जाएगा।</p>
<h5><strong>क्या है 850 सीटों का फॉर्मूला</strong></h5>
<p>अमित शाह ने सदन में बताया कि वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं। परिसीमन के बाद इन सीटों में लगभग 50% की वृद्धि की जा सकती है, जिससे कुल संख्या 816 तक पहुंच सकती है। उन्होंने कहा कि 850 सीटों का आंकड़ा केवल एक अनुमानित (राउंड फिगर) है। इसके साथ ही 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी।</p>
<p>उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि 100 सीटों में 33% आरक्षण लागू करना हो, तो पहले सीटों की संख्या बढ़ाकर 150 करनी होगी। इससे आरक्षण लागू करने के बाद संतुलन बना रहेगा।</p>
<h5><strong>दक्षिणी राज्यों को भी मिलेगा लाभ</strong></h5>
<p>विपक्ष की आशंकाओं को खारिज करते हुए शाह ने कहा कि परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों को भी फायदा होगा। वर्तमान में दक्षिण के पांच राज्यों के पास 129 सीटें हैं, जो बढ़कर 195 हो सकती हैं। प्रतिशत के लिहाज से भी उनकी हिस्सेदारी लगभग समान बनी रहेगी।</p>
<p>राज्यों के अनुसार संभावित बढ़ोतरी:</p>
<p>तमिलनाडु: 39 से 59 सीट</p>
<p>केरल: 20 से 30 सीट</p>
<p>तेलंगाना: 17 से 26 सीट</p>
<p>आंध्र प्रदेश: 25 से 38 सीट</p>
<p>इसके अलावा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों को भी सबसे अधिक अतिरिक्त सीटें मिलने की संभावना जताई गई है।</p>
<h5><strong>परिसीमन प्रक्रिया और आधार</strong></h5>
<p>गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि परिसीमन आयोग मौजूदा कानून के तहत ही काम करेगा और इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। नए निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण 2011 की जनगणना के आधार पर होगा। इसके लिए संविधान के कई अनुच्छेदों—55, 81, 82, 170, 330, 332 और 334(ए)—में संशोधन प्रस्तावित हैं।</p>
<h5><strong>विपक्ष ने जताई आपत्ति</strong></h5>
<p>बहस के दौरान कई विपक्षी नेताओं ने इस प्रस्ताव पर सवाल उठाए। <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Priyanka Gandhi</span></span> ने पूछा कि मौजूदा 543 सीटों में ही 33% आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता। <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Asaduddin Owaisi</span></span> ने तर्क दिया कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय कर सकता है। वहीं <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Akhilesh Yadav</span></span> ने इसे राजनीतिक रणनीति बताया।</p>
<p>सरकार का कहना है कि परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों प्रक्रियाएं संवैधानिक प्रावधानों के तहत होंगी और सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर लागू की जाएंगी। हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 09:10:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महिला आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश: विपक्ष का हंगामा, अखिलेश-शाह में तीखी बहस, मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर गरमाई राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[तीन संविधान संशोधन बिलों पर संसद में जोरदार बहस, सीट बढ़ोतरी और परिसीमन प्रस्ताव पर राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर बढ़ा विवाद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/draftwomens-reservation-amendment-bill-introduced-in-lok-sabha-oppositions-ruckus/article-51328"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/loksabha-(1).jpg" alt=""></a><br /><p>लोकसभा में गुरुवार को महिला आरक्षण से जुड़े तीन संविधान संशोधन बिल पेश किए जाने के साथ ही सदन में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। सरकार ने जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसके संवैधानिक और संघीय ढांचे पर असर को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।</p>
<p>केंद्रीय सरकार की ओर से पेश किए गए इन विधेयकों में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने, परिसीमन प्रक्रिया को नए आधार पर तय करने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव शामिल है। इसमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव 1971 की जनगणना आधारित व्यवस्था को अद्यतन करने के लिए जरूरी है।</p>
<p>बहस के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के विरोध में नहीं है, लेकिन प्रक्रिया और संरचना पर आपत्ति है। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए सरकार से स्पष्टता मांगी। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब देते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है और राजनीतिक दलों को अपनी पार्टी टिकट वितरण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।</p>
<p>कांग्रेस, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों ने भी बिल का विरोध किया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ कर रही है। डीएमके सांसद टीआर बालू ने इन विधेयकों को “सैंडविच बिल” बताते हुए कहा कि ये आपस में जुड़े हुए हैं और संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन प्रस्ताव का विरोध करते हुए बिल की प्रतियां तक जला दीं।</p>
<p>वहीं एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे संघवाद के खिलाफ बताया और कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि राज्यों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न भी है।</p>
<p>सरकारी पक्ष की ओर से कहा गया कि महिला आरक्षण देश की आधी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक सुधार है। भाजपा सांसद रवि किशन ने कहा कि यह कदम हर भारतीय महिला के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।</p>
<p>संसद में हुई वोटिंग में विधेयकों के पुनर्स्थापन के पक्ष में 207 वोट पड़े, जबकि 126 सांसदों ने विरोध किया। यह स्पष्ट करता है कि इस प्रस्ताव पर राजनीतिक सहमति अभी भी पूरी तरह नहीं बन पाई है।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन और सीट बढ़ोतरी जैसे मुद्दे आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि यह कदम लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण कानून को वास्तविक रूप देने के लिए आवश्यक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:28:17 +0530</pubDate>
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