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किसान परिवार से निकलकर बना सुपरस्टार, चौकीदार की नौकरी से बदली अपनी किस्मत
बॉलीवुड डेस्क
किसान परिवार से निकलकर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने केमिस्ट और चौकीदार की नौकरी छोड़कर 13 साल संघर्ष किया और बॉलीवुड में बड़ा नाम बनाया।
बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की जिंदगी संघर्ष, मेहनत और धैर्य की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है, जिसे सुनकर लोग आज भी दंग रह जाते हैं। अब नवाजुद्दीन को इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन कलाकारों में गिना जाता है, लेकिन इस मंजिल तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं रहा। एक छोटे किसान परिवार से निकलकर, उन्होंने केमिस्ट की नौकरी छोड़कर एक्टिंग के अपने जुनून का पीछा किया, ऐसे रास्ते पर कदम रखा जिसमें असफलताएं, इंतजार और अनिश्चितता थी। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना में हुआ था, और बचपन से ही उनके मन में अभिनय का सपना पल रहा था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद, नवाजुद्दीन ने हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में वे गुजरात के वडोदरा पहुंचे, जहां एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में उन्हें केमिस्ट की नौकरी मिल गई। जीवन सामान्य था, और नौकरी भी स्थिर, लेकिन अंदर से कहीं एक बेचैनी थी कि वो कुछ और करना चाहते हैं। इसी जुनून ने उन्हें दिल्ली की ओर खींचा, जहां उन्होंने थिएटर की दुनिया को करीब से जानने का फैसला किया और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में दाखिला लेकर एक्टिंग की बारीकियों को सीखा।
इस संघर्ष के दौरान आर्थिक तंगी भी झेली। कभी-कभी उन्हें चौकीदार यानी वॉचमैन की नौकरी भी करनी पड़ी। मुंबई आने के बाद वापसी रास्ता भी आसान नहीं था। उन्हें छोटे-छोटे रोल मिलते रहे, कभी चोर का किरदार निभाया तो कभी भीड़ में शामिल होकर स्क्रीन पर दिखे। साल 1999 में आमिर खान की फिल्म ‘सरफरोश’ में एक छोटा सा रोल मिला, लेकिन उससे कोई खास पहचान नहीं बनी। इसके बाद ‘शूल’, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ जैसी फिल्मों में भी उनका काम नजर आया, लेकिन वो लंबे समय तक वो सफलता नहीं मिली जिसकी उन्हें तलाश थी।
करीब 13 साल के संघर्ष के बाद, आखिरकार साल 2012 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस फिल्म में फैजल खान का किरदार निभाकर नवाजुद्दीन ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बना ली। उनका डायलॉग “बाप का, दादा का, भाई का… सबका बदला लेगा तेरा फैजल” आज भी लोगों की जुबान पर है। इसके बाद नवाजुद्दीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और ‘द लंचबॉक्स’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘रमन राघव 2.0’, ‘मंटो’ और ‘रात अकेली है’ जैसी फिल्मों में अपने अदाकारी का लोहा मनवाया।
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी ‘सेक्रेड गेम्स’ वेब सीरीज में उनके किरदार को दर्शकों ने खूब सराहा। नवाजुद्दीन की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि अगर आपके इरादे मजबूत हों, तो हालात चाहे जैसे भी हों, इंसान अपनी मंजिल हासिल कर सकता है। अब वो सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं, जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकलते हैं।
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किसान परिवार से निकलकर बना सुपरस्टार, चौकीदार की नौकरी से बदली अपनी किस्मत
बॉलीवुड डेस्क
बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की जिंदगी संघर्ष, मेहनत और धैर्य की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है, जिसे सुनकर लोग आज भी दंग रह जाते हैं। अब नवाजुद्दीन को इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन कलाकारों में गिना जाता है, लेकिन इस मंजिल तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं रहा। एक छोटे किसान परिवार से निकलकर, उन्होंने केमिस्ट की नौकरी छोड़कर एक्टिंग के अपने जुनून का पीछा किया, ऐसे रास्ते पर कदम रखा जिसमें असफलताएं, इंतजार और अनिश्चितता थी। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना में हुआ था, और बचपन से ही उनके मन में अभिनय का सपना पल रहा था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद, नवाजुद्दीन ने हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में वे गुजरात के वडोदरा पहुंचे, जहां एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में उन्हें केमिस्ट की नौकरी मिल गई। जीवन सामान्य था, और नौकरी भी स्थिर, लेकिन अंदर से कहीं एक बेचैनी थी कि वो कुछ और करना चाहते हैं। इसी जुनून ने उन्हें दिल्ली की ओर खींचा, जहां उन्होंने थिएटर की दुनिया को करीब से जानने का फैसला किया और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में दाखिला लेकर एक्टिंग की बारीकियों को सीखा।
इस संघर्ष के दौरान आर्थिक तंगी भी झेली। कभी-कभी उन्हें चौकीदार यानी वॉचमैन की नौकरी भी करनी पड़ी। मुंबई आने के बाद वापसी रास्ता भी आसान नहीं था। उन्हें छोटे-छोटे रोल मिलते रहे, कभी चोर का किरदार निभाया तो कभी भीड़ में शामिल होकर स्क्रीन पर दिखे। साल 1999 में आमिर खान की फिल्म ‘सरफरोश’ में एक छोटा सा रोल मिला, लेकिन उससे कोई खास पहचान नहीं बनी। इसके बाद ‘शूल’, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ जैसी फिल्मों में भी उनका काम नजर आया, लेकिन वो लंबे समय तक वो सफलता नहीं मिली जिसकी उन्हें तलाश थी।
करीब 13 साल के संघर्ष के बाद, आखिरकार साल 2012 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस फिल्म में फैजल खान का किरदार निभाकर नवाजुद्दीन ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बना ली। उनका डायलॉग “बाप का, दादा का, भाई का… सबका बदला लेगा तेरा फैजल” आज भी लोगों की जुबान पर है। इसके बाद नवाजुद्दीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और ‘द लंचबॉक्स’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘रमन राघव 2.0’, ‘मंटो’ और ‘रात अकेली है’ जैसी फिल्मों में अपने अदाकारी का लोहा मनवाया।
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी ‘सेक्रेड गेम्स’ वेब सीरीज में उनके किरदार को दर्शकों ने खूब सराहा। नवाजुद्दीन की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि अगर आपके इरादे मजबूत हों, तो हालात चाहे जैसे भी हों, इंसान अपनी मंजिल हासिल कर सकता है। अब वो सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं, जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकलते हैं।
